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KMSRAJ51-Always Positive Thinker

“तू ना हो निराश कभी मन से” – (KMSRAJ51, KMSRAJ, KMS)

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You are here: Home / Archives for सुखमंगल सिंह जी की कविताये।

सुखमंगल सिंह जी की कविताये।

खाने में शामिल न करें।

Kmsraj51 की कलम से…..

♦ खाने में शामिल न करें। ♦

आम खाने में लगता मजेदार।
स्वास्थ्य वर्धक और लाजवाब।
आम में अच्छे तत्व पाए जाते।
इसी लिए तरह तरह से खाते।

सबके मन भाते तथा लुभाते।
शरीर को पुष्ट निरोग बनाते।
साल भर में पेड़ पर लटकते।
चाव से इसको लोग मिल खाते।

एक बात याद आई उस कराते,
आम खाने के बाद में करेला,
को कभी भी नहीं लोग खाते।
खाने से हानि शरीर में आते।

रायता और छाछ भी बराते।
यह काया में जहर पिला देते।
भिन्डी की सब्जी लगे लाजवाब।
पौष्टिक आहारों का यह संसार।

विविध रूपों में इसका प्रयोग।
खाने में बहुत लगती है मजेदार।
भोजन में सलाद का हो साथ।
कहते होता इससे बहुत लाभ।

पर कुछ वस्तु में होता बरताव।
साथ मिलकर लेने से करें इंकार।
वरना हो जाएंगे तंग और लाचार।
शरीर को कर देगा वह बेकार।

लीबर भी हो जाएगा कमजोर।
पर नहीं चलेगा किसी का जोर।
शरीर आप में करती रहेगी शोर।
भूल नहीं पाएंगे कभी यह रोग।

करेला खाने से हो होते निरोग।
भिंडी साथ खाएंगे होगा रोग।
दोनों को अलग-अलग खाइए।
सुखमय जीवन अपना बनाइए।

बड़े कष्ट से शरीर को बताइए।
करेला भिंडी को न मिलाइए।
यद्यपि शुगर में इसे खूब खाइए।
दोनों एक साथ नहीं लीजिए।

आजकल लोग खिचड़ी पकाते,
एक में सब कुछ मिला कर लेते?
वैज्ञानिक प्रभाव नहीं समझते।
मनमर्जी पे सब कुछ वे खाते।

निरोगी काया होती रोग बुलाते।
राष्ट्र विरोधी, मिल जस गाते।
वे कभी कभी स्टोरी सुनाते।
भ्रम में डालकर गरम हो जाते।

ठंडी-ठंडी मूली खाना में खाते।
अकड़ मूवी मसाला लगाये लाते।
मूली के बहुत फायदे हम बतला दे।
जड़ पत्ता पीने से अनेक फायदे।

मूली को खाने से गैस भाग जाते।
सलाद में मूली जो लोग मिला दे।
औषधीय गुण इसमें पाए जाते।
वैद्य ही लोग इसका गुण बताते।

भिंडी के साथ करेला नहीं खाते।
इसके खाने से पेट में रोग बढ़ाते।
सोच समझकर जो भोजन खाते।
निरोगी काया वे अपना बनाते।

स्वस्थ समाज वही लोग बनाते।
जो लोग निरोगी काया हैं पाते।
जो कुछ भी हम सब कभी खाते।
सोच समझकर उसे अपना बनाते।

♦ सुखमंगल सिंह जी – अवध निवासी ♦

—————

  • “सुखमंगल सिंह जी“ ने, बहुत ही सरल शब्दों में सुंदर तरीके से, कविता के माध्यम से बखूबी समझाने की कोशिश की है – बहुत सारे उदाहरण के माध्यम से बताया है, किसके साथ क्या खाये और किसके साथ क्या न खाये। किसके साथ क्या-क्या खाने से लाभ होता है, और क्या-क्या खाने से नुकसान भी होता है शरीर को। इसलिए जो भी खाये बहुत सोच समझकर ही खाये, किसी भी खाने के साथ कुछ भी न खाये । जिसके साथ जो उपयुक्त हो, जिसके खाने से शरीर को नुकसान न हो वही साथ-साथ खाये केवल।

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यह कविता (खाने में शामिल न करें।) “सुखमंगल सिंह जी” की रचना है। KMSRAJ51.COM — के पाठकों के लिए। आपकी कवितायें सरल शब्दो में दिल की गहराइयों तक उतर कर जीवन बदलने वाली होती है। मुझे पूर्ण विश्वास है आपकी कविताओं और लेख से जनमानस का कल्याण होगा।

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जैसे शरीर के लिए भोजन जरूरी है वैसे ही मस्तिष्क के लिए भी सकारात्मक ज्ञान और ध्यान रुपी भोजन जरूरी हैं।-KMSRAj51

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“सफलता का सबसे बड़ा सूत्र”(KMSRAJ51)

“स्वयं से वार्तालाप(बातचीत) करके जीवन में आश्चर्यजनक परिवर्तन लाया जा सकता है। ऐसा करके आप अपने भीतर छिपी बुराईयाें(Weakness) काे पहचानते है, और स्वयं काे अच्छा बनने के लिए प्रोत्साहित करते हैं।”

 

“अगर अपने कार्य से आप स्वयं संतुष्ट हैं, ताे फिर अन्य लोग क्या कहते हैं उसकी परवाह ना करें।”~KMSRAj51

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योग साधना।

Kmsraj51 की कलम से…..

♦ योग साधना। ♦

पढ़ो लिखो बनो महान।
जिससे बढ़े कुल की शान।

पूरा हो मंगल का गान।
है देश में सबका सम्मान।

योग से मानव की पहचान।
योग है भरता सबमें जान।

काया बनी निरोगी महान।
योग करें जीवन का कल्याण।

जब तक सूरज चांद रहे।
योग मानव का साथ धरे।

अंधियारे में नव प्रात खिले।
शांति सुप्रीम का हाथ रहे।

सुंदर विचार मन में आते रहे।
नई दिशा को दिखाते रहे।

योग से बल बुद्धि ज्ञान बढ़े।
काया का यह कल्याण करें।

विश्व जगत को खुशहाल करें।
सत्य अहिंसा बढ़ाते के चले।

धैर्य का दीपक जलाते चले।
संकट में योग सिखाते चले।

टन – टन घंटा बजाते चले।
ज्ञान की सीख सिखाते चले।

चाव चमक चेहरे पर लाते रहे।
मेरे चमन में अमन आते रहे।

योग रोग का सर्व नाश करें।
अनुलोम विलोम का साथ दे।

योग करता सबका कल्याण।
योग सिखाया बनें गुणवान।

♦ सुखमंगल सिंह जी – अवध निवासी ♦

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  • “सुखमंगल सिंह जी“ ने, बहुत ही सरल शब्दों में सुंदर तरीके से, कविता के माध्यम से बखूबी समझाने की कोशिश की है – किसी भी मनुष्य के लिए योग और साधना क्यों जरूरी है। योग व साधना कितने प्रकार के होते है तथा योग व साधना से क्या – क्या लाभ होते है। क्यों हर एक मनुष्य को प्रतिदिन योग जरूर करना चाहिए। योग व साधना से तन व मन पवित्र और निरोगी होता है। योग व साधना करें, आरोग्य, सुखमय, पवित्र तथा शांतिमय जीवन जिए।

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“सफलता का सबसे बड़ा सूत्र”(KMSRAJ51)

“स्वयं से वार्तालाप(बातचीत) करके जीवन में आश्चर्यजनक परिवर्तन लाया जा सकता है। ऐसा करके आप अपने भीतर छिपी बुराईयाें(Weakness) काे पहचानते है, और स्वयं काे अच्छा बनने के लिए प्रोत्साहित करते हैं।”

 

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मानव जन्म हुआ मेरा।

Kmsraj51 की कलम से…..

♦ मानव जन्म हुआ मेरा। ♦

मैं कोई विद्वान नहीं,
विद्वता का पाठ पढ़ाऊ।
कोई मैं अज्ञानी नहीं,
अज्ञानी में अज्ञानी कहाउं।

सिंधु में सानी नहीं,
ज्ञानियों में ज्ञानी नहीं।
सिंह में शानी नहीं,
दानियों में दानी नहीं।
और मेरे देंह – गेह में,
बैठी अशांत भी नहीं।

मैं ध्रुव भी नहीं,
जो वन गमन करूं।
मैं राम नहीं हूं कि,
राक्षसों का वध करूं।

मैं कृष्ण भी नहीं ज्यों,
गोपियों को बंसी सुनाऊं।
वृंदावन में उनके संग,
मिल रास लीला रचाऊं।

महाराजा पृथु नहीं कि,
मेरी पृथ्वी स्तुति करें।
मैं ऋषि संकादि नहीं कि,
महाराजा पृथु सा उपदेश करें।

महाराज पुरंजन नहीं कि,
शिकार खेलने से रानी कुपित होंगी।
मैं राजर्षी भरत भी नहीं,
की मृग योनि को पाऊंगा।
और ऋषि अंगिरा पुत्र कहाउं,
ब्राह्मण कुल जन्म पाऊंगा।

मैं महिंद्र भी नहीं कि,
ब्रह्म हत्या ले बिकाऊ।
मैं चित्रकेतु भी नहीं,
कि विषपान करूं।
वामन भगवान भी नहीं,
तीन पग में ब्रह्माण्ड नापूं।

मैं योग माया भी नहीं,
कि कंस बध भविष्यवाणी करूं।
प्रलंबसुर – अधसुर नहीं,
की उद्धार की सोचूं।
और सुदर्शन शंख चूर्ण नहीं,
जो उद्धार के लिए सोचूं।

मैं अक्रूर जी नहीं कि,
ब्रज यात्रा पर जाऊं।
श्री कृष्ण की स्तुति में,
अपने को लगाऊं।
उद्धव जी की ब्रज यात्रा,
का वर्णन लोगों को सुनाऊं।

और ऋषि अंगिरा पुत्र कहाऊं,
ब्राह्मण कुल में जन्म पाऊं।
मैं इंद्र भी नहीं हूं,
ब्रह्मा हत्या लेकर बिताऊं।

♦ सुखमंगल सिंह जी – अवध निवासी ♦

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  • “सुखमंगल सिंह जी“ ने, बहुत ही सरल शब्दों में सुंदर तरीके से, कविता के माध्यम से बखूबी समझाने की कोशिश की है – साधारण मानव के बारे में बताया है बहुत सारे उदाहरण देकर। जीवन साधारण हो लेकिन उत्तम हो, विकार से मुक्त हो, तो अच्छा। शांत, पवित्र जीवन हो। ज्ञान और शील हो, मन शांत व पवित्र हो, आपका। किसी को दुःख न दे, तो अच्छा।

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यह कविता (मानव जन्म हुआ मेरा।) “सुखमंगल सिंह जी” की रचना है। KMSRAJ51.COM — के पाठकों के लिए। आपकी कवितायें सरल शब्दो में दिल की गहराइयों तक उतर कर जीवन बदलने वाली होती है। मुझे पूर्ण विश्वास है आपकी कविताओं और लेख से जनमानस का कल्याण होगा।

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“सफलता का सबसे बड़ा सूत्र”(KMSRAJ51)

“स्वयं से वार्तालाप(बातचीत) करके जीवन में आश्चर्यजनक परिवर्तन लाया जा सकता है। ऐसा करके आप अपने भीतर छिपी बुराईयाें(Weakness) काे पहचानते है, और स्वयं काे अच्छा बनने के लिए प्रोत्साहित करते हैं।”

 

“अगर अपने कार्य से आप स्वयं संतुष्ट हैं, ताे फिर अन्य लोग क्या कहते हैं उसकी परवाह ना करें।”~KMSRAj51

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कथा का सार तत्व।

Kmsraj51 की कलम से…..

♦ कथा का सार तत्व। ♦

आज यहां मैं कथा – सार
तुम्हें सुनाने आया हूं।
यहां सुकदेव परीक्षित का
संबाद बताने आया हूं।

इंद्रिय – शक्ति अगर चाहो तो,
इंद्र का पूजन शुरू करो।
ब्रह्म तेज की चाह अगर हो,
बृहस्पती – कृपा भरो।

चाहें श्री लक्ष्मी को खुश करना।
माया देवी का जप करना।
तेज की हो चाहे यदि तुम्हें,
अग्नि प्रज्ज्वलित करके पूजना।

वीर तुम्हें है बनना यदि,
रूद्र को खुश करते जाओ।
धन पाने की हो जो लालसा,
वसुओं के आराधक बन जाओ।

अन्न कृपा तुम पर होगी ही,
अदिति को यदि आप मनायें।
स्वर्ग प्राप्ति की हो अभिलाषा,
अदिति पुत्रों का जप करें कराएं।

राज्य प्राप्ति के लिए सुनो,
विश्व – देव को तुम गुनो।
अनुकूल प्रजा अगर चाहो तो,
साध्य देव को तुरंत चुनो।

दीर्घायु की इच्छा वाले,
अश्वनी कुमारों को न भूलना।
अगर पुष्टि की तेरी कामना,
पृथ्वी को है तुम्हें पूजना।

प्रतिष्ठा की यदि चाह तुम्हारी,
पृथ्वी आकाश की पूजा न्यारी।
सौंदर्य अगर तुम्हें है पाना,
गंधर्व के पूजन पे दृष्टि हो सारी।

पत्नी प्राप्ति की खातिर तुम,
करो उर्वशी अप्सरा की पूजा।
सभी का स्वामी बनना चाहो,
ब्रह्मा के अतिरिक्त कोई न दूजा।

यश की कामना अगर तुम्हारी,
यज्ञ पुरुष का ध्यान धरो।
और खजाना आप आना चाहो,
वरुण देव का मान करो।

यदि ध्यान विद्या प्राप्ति पर,
शिव – शिव का ध्यान लगावे।
पति-पत्नी परस्पर प्रेम पावें,
मां पार्वती की पूजा करावें।

धन उपार्जन के लिए हे नर,
विष्णु भगवान की पूजा कर।
बाधाओं पर पढ़ोगे भारी,
मरुत गनों का हो आभारी।

राज्य कायम रखने का हो ध्यान,
मन्वंतर के अधिपति का रख मान।
अभि-चारक के लिए तू नर,
देवों का मान तूं कर।

भोगों खातिर तेरा यदि सफर,
चंद्रमा की उपासना कर।
निष्काम प्राप्त की खातिर ध्यान,
परम पुरुष नारायण का मान।

सभी थपेड़े दूर भगाओ,
श्री नारायण की स्तुति गाओ।
संवाद सुकदेव और परीक्षित,
पढ़ो – पढ़ाओ और सुनाओ।

♦ सुखमंगल सिंह जी – अवध निवासी ♦

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  • “सुखमंगल सिंह जी“ ने, बहुत ही सरल शब्दों में सुंदर तरीके से, कविता के माध्यम से बखूबी समझाने की कोशिश की है – किस-किस व्रत और पूजा, जप, तप, आराधना से क्या-क्या सिद्धि और प्राप्ति होगी। व्रत और पूजा, जप, तप, आराधना के महत्व व गुणों को समझाया हैं। आम इंसान के जीवन में सुख, शांति और खुशहाली के लिए उसे किस-किस व्रत और पूजा, जप, तप, आराधना को करना चाहिए, बहुत ही सरल तरीके से समझाया हैं।

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यह कविता (कथा का सार तत्व।) “सुखमंगल सिंह जी” की रचना है। KMSRAJ51.COM — के पाठकों के लिए। आपकी कवितायें सरल शब्दो में दिल की गहराइयों तक उतर कर जीवन बदलने वाली होती है। मुझे पूर्ण विश्वास है आपकी कविताओं और लेख से जनमानस का कल्याण होगा।

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अस्तित्व।

Kmsraj51 की कलम से…..

♦ अस्तित्व। ♦

पीड़ा और शोक की कहानी,
आरोप-प्रत्यारोप की कहानी,
से बड़ी होती है।

संतोष और विवेक पूर्ण धरोहरों,
सुख शांति का एकमात्र साधन है।
अस्तित्व का कभी अंत नहीं होता।
वस्तु का ही सदा अंत होता है।

आत्मा न जन्म लेती है ना मरती।
जिसका जन्म नहीं होता,
उसकी मृत्यु नहीं होती है।
आत्मा का प्रारंभ ना और ना अंत।

इसलिए आत्मा की अमरता है।
जिसका कोई नहीं होता है।
उसकी मृत्यु नहीं होती है।

ब्रह्मांड में प्रकाशित होने वाला,
ब्रह्मांड के बगीचे का अंग है मनुष्य।

सब कुछ उसके अंदर होने के बावजूद।
प्रकृति और समाज पर निर्भर होता है मनुष्य।
मनुष्य एक सामाजिक प्राणी है।
इसलिए वह समाज में रहता है।

अपने अस्तित्व के लिए,
वह समाज पर निर्भर है।
मनुष्य समाज से अलग हो जाता है,
तो उसका विनाश संभव है।

अपने बारे में केवल विचार करके,
मनुष्य खुशहाल नहीं जि सकता।
व्यक्ति समाज से अलग,
रह कर सुखी नहीं होता।

संत पुरुष समाज से अलग,
रह कर ईश्वर से लगन लगाते हैं।
ईश्वर और ऋषि जब साथ होते हैं,
तो वह आनंदा की अनुभूति होती हैं।

मनुष्य को समाज के,
अनुसार चलना पड़ता है।
व्यक्तिगत सोच समाज के,
अनुसार ही रखनी पड़ती है।

सभी व्यक्ति अपनी सोच के अनुसार,
के लोगों के साथ रहना चाहते हैं।
जबकि सब के विचारों में विविधता होती है।

आत्मा का अर्थ होता है अस्तित्व,
अस्तित्व तो कभी मरता नहीं है।
यह पंच तत्वों से निर्मित,
शरीर भी अपनी नहीं है।

आत्मा जब शरीर को छोड़ देती है,
तब शरीर पंचतत्व में ही मिल जाती है।
विद्वान पुरुष आत्मा और शरीर में अंतर जानते हैं।
आत्मा न जन्म लेती है और न हीं मरती है।

♦ सुखमंगल सिंह जी – अवध निवासी ♦

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  • “सुखमंगल सिंह जी“ ने, बहुत ही सरल शब्दों में सुंदर तरीके से, कविता के माध्यम से बखूबी समझाने की कोशिश की है – आत्मा का अर्थ होता है अस्तित्व, यह पंच तत्वों से निर्मित शरीर भी अपनी नहीं है। आत्मा के सभी गुणों का महत्व और रियलिटी को बताया हैं। मनुष्य क्या है और मनुष्य समाज में क्यों रहता है, इसे भी समझाया हैं।

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यह कविता (अस्तित्व।) “सुखमंगल सिंह जी” की रचना है। KMSRAJ51.COM — के पाठकों के लिए। आपकी कवितायें सरल शब्दो में दिल की गहराइयों तक उतर कर जीवन बदलने वाली होती है। मुझे पूर्ण विश्वास है आपकी कविताओं और लेख से जनमानस का कल्याण होगा।

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“सफलता का सबसे बड़ा सूत्र”(KMSRAJ51)

“स्वयं से वार्तालाप(बातचीत) करके जीवन में आश्चर्यजनक परिवर्तन लाया जा सकता है। ऐसा करके आप अपने भीतर छिपी बुराईयाें(Weakness) काे पहचानते है, और स्वयं काे अच्छा बनने के लिए प्रोत्साहित करते हैं।”

 

“अगर अपने कार्य से आप स्वयं संतुष्ट हैं, ताे फिर अन्य लोग क्या कहते हैं उसकी परवाह ना करें।”~KMSRAj51

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माँ सरयू बहुत महान।

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♦ माँ सरयू बहुत महान। ♦

माँ सरयू बहुत महान।
यहां घूमते थके ना राम।
जिह्वा पर बस एक ही नाम,
राम राम बस राम ही राम।

तीनो लोक करें गुणगान।
हे माँ सरयू तुझे प्रणाम।

राम – कथा सरयू के तीर,
कहता – सुनता होता वीर।
सुखमय उसका जीवन होता।
वह होता धीर – गंभीर।

पीता सदा वह राम मैं जाम,
हे माँ ! सरजू तुझे प्रणाम।

भोले बाबा औघड़ दानी।
सृष्टि में कोई नहीं है शानी।
शिव भक्तों से जो भी उलझे।
हो जाती उसकी खत्म कहानी।

शिव भक्ति मिले बिन मोल औ दाम।
हे माँ ! सरजू तुझे प्रणाम।

शिव – संग शक्ति, शक्ति से किरपा,
प्रतिपल हो सुलभ आशीष।
सभी का शुभ चाहता चले जो,
रण में होता वही है बीस।

नाम न होवे कभी नाम।
हे माँ ! सरयू तुझे प्रणाम।

♦ सुखमंगल सिंह जी – अवध निवासी ♦

—————

  • “सुखमंगल सिंह जी“ ने, बहुत ही सरल शब्दों में सुंदर तरीके से, कविता के माध्यम से बखूबी समझाने की कोशिश की है – माँ सरयू नदी के महत्व को बताया है, प्रभु श्री राम से माँ सरयू के जुड़ाव का वर्णन किया हैं। शिव और शक्ति के महत्व को समझाया है। प्रभु श्री राम के जीवन में शिव और शक्ति का क्या महत्व था यह भी बताया है।

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यह कविता (माँ सरयू बहुत महान।) “सुखमंगल सिंह जी” की रचना है। KMSRAJ51.COM — के पाठकों के लिए। आपकी कवितायें सरल शब्दो में दिल की गहराइयों तक उतर कर जीवन बदलने वाली होती है। मुझे पूर्ण विश्वास है आपकी कविताओं और लेख से जनमानस का कल्याण होगा।

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“सफलता का सबसे बड़ा सूत्र”(KMSRAJ51)

“स्वयं से वार्तालाप(बातचीत) करके जीवन में आश्चर्यजनक परिवर्तन लाया जा सकता है। ऐसा करके आप अपने भीतर छिपी बुराईयाें(Weakness) काे पहचानते है, और स्वयं काे अच्छा बनने के लिए प्रोत्साहित करते हैं।”

 

“अगर अपने कार्य से आप स्वयं संतुष्ट हैं, ताे फिर अन्य लोग क्या कहते हैं उसकी परवाह ना करें।”~KMSRAj51

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गांव।

Kmsraj51 की कलम से…..

♦ गांव। ♦

जन्म भर की घटनाएं एक – एक कर याद आती है।
सामने आकर घटनाएं अपना रूप दिखाती है।
कभी – कभी कश्मीर की बादी की भी याद आती है।
सद्भावना यात्रा की वह याद दिलवाते हुए आगे बढ़ जाती है।

घूम घुमाकर इधर – उधर मन हमको ले जाता है।
वापस आकर खेलन अहिरौली रानी मऊ आता है।
गांव की दक्षिण में सताई भैया की द्वार पर दिह बाबा स्थान है।
तीन तरफ से उसके जौ – गेहूं का हरा – भरा सिवान है।

गांव की पश्चिम तरफ समय माता का एक स्थान है।
नवरात्र में गांव की औरतें वहां करती धार और जलदान हैं।
माता दरबार की राशि में अगल बगल पिक्चर बंजर वान है।
का बीज हो गई उस पर गांव के ही तथाकथित महान है।

उत्तर दिशा में गांव के कालिका का दिव्य स्थान है।
आसपास उनके पेड़ – पौधों से भरा हुआ बागवान है।
उसके उत्तर में हायर सेकंडरी स्कूल महान है।
जहां से पढ़कर निकले थे, बड़े – बड़े विद्वान है।

हायर सेकेंडरी स्कूल के पास प्राइमरी पाठशाला विद्यमान है।
कक्षा तीन से पांच की पढ़ाई का मेरा यह राजस्थान है।
बाग बगीचे में मिलता है अच्छा खासा महुआ आम है।
सतवा सक्रांति पर वह आता, चटनी बनाने को काम है।

♦ सुखमंगल सिंह जी – अवध निवासी ♦

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  • “सुखमंगल सिंह जी“ ने, बहुत ही सरल शब्दों में सुंदर तरीके से बखूबी समझाने की कोशिश की है – गांव की सादगी सुंदरता व प्रेम को कविता के माध्यम से प्रस्तुत किया है। प्रकृति की सुंदरता हो, मंदिरों की खूबसूरती हो, या पेड़ पौधों का जिक्र हो, स्कूल हो, बाग बगीचे से मिलने वाला अच्छा खासा महुआ आम हो जिससे चटनी मस्त बनती है। वाह कितनी खूबसूरती से एक-एक कर वर्णन किया है। जैसे अभी-अभी की बात हो, जिवंत यूँ ही सबकुछ सामने चित्र रूप में घूमने लगता है।

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“सफलता का सबसे बड़ा सूत्र”(KMSRAJ51)

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हंसिया।

Kmsraj51 की कलम से…..

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♦ हंसिया। ♦

हंसिया हल्के हाथ की,
मालिक से लड़ जाए।
खटर पटर करके चली।
गटर – गटर घर खाए।

हरीयर चारा चटक – चटक,
लपक – लपक नर लाए।
झटक – झटक उस चेहरे को,
मालिक द्वार पर लाए।

पटर पटर चारा मशीन से,
हरीअर चारा बाला जाए।
खेती गहबार अरहर की,
हच हच हंसिया काट गिराए।

धार प्रक्षालन रेती पर कर।
अरहर मालिक घर लाए।
धीराता वीरता के गुण सदा,
मनुष्य में मालिक बताए।

हसिया हाथ हिलाते जाती।
योग साधना बताने आती।
मन मौसम बनाने आती।
नारायण कोठीला भर आती।

अपनों को अपनापन सिखाती।
वह बार-बार लड़ने को जाती।
भूखे भक्तों की भूख मिटाती।
विश्व क भाव का पाठ पढ़ाती।

हंसकर हंसिया हाथ आती।
फंसरी काट मुक्ति दिलाती।
हंसिया हाथ हिलाते जाती।
विविध तरह का रूप दिखाती।

मदुआ सांवा खूब काटती।
उड़द टामुन से घर भारती।
चना चबैना गंगाजल अमृत।
हंसिया के मुठिया में रहता।

♦ सुखमंगल सिंह जी – अवध निवासी ♦

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  • “सुखमंगल सिंह जी“ ने, बहुत ही सरल शब्दों में सुंदर तरीके से बखूबी समझाने की कोशिश की है – बहुत सारे उदाहरण देकर हंसिया के महत्व और हंसिया के कार्य व गुणों को कवि ने बखूबी अक्षरस वर्णित किया हैं। हंसिया किस तरह से एक किसान का महत्वपूर्ण औजार हैं, मुख्य रूप से चारा काटना हो, गेहूँ, जौ, धान, बाजरा या कोई अन्य फसल काटना हो हंसिया का ही मुख्य रोल होता हैं।

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एक दिन फोन आया।

Kmsraj51 की कलम से…..

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♦ एक दिन फोन आया। ♦

विश्व गाथा प्रकाशन से,
मुझे फोन आया।

अ हिंदी क्षेत्र गुजरात,
से भी विश्व गाथा का,
प्रकाशन होता बताया।

लखनऊ में आफिस को,
एक है गाथा का बताया।

हमने उनसे जब नाम,
श्रीमान का जानना चाहा।
उन्होंने प्यार से नाम अपना,
पंकज त्रिवेदी हमें बताया।

हमने कहा श्रीमान आपकी,
पारदर्शिता ही विश्व गाथा,
को ऊंचाई प्रदान किया है।

आगे बढ़कर हिम्मत जुटाया।
अवध निवासी सुख मंगल सिंह।
अपना नाम उन्हें दर्ज कराया।

सोमवंशी क्षत्री कुल मेरा फरमाया।
काशी में प्रवासी हुकुम मैं बताया।
मां भगवती और गंगा को मनाया।
बाबा विश्वनाथ में दिल लगाया।

त्रिवेदी जी के दीर्घायु की कामना।
हमने फोन पर ही उन्हें सुनाया।
नमस्कार बंदगी के दरमियान।
काशी से अपना नाता है सन पाया।

हां जहां तक मुझे याद आता है।
सितंबर 2017 की यह बात है।
बड़े लोगों से बात कभी होती है।
हृदय में उमंग विशेष होती है।

♦ सुखमंगल सिंह जी – अवध निवासी ♦

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  • “सुखमंगल सिंह जी“ ने, बहुत ही सरल शब्दों में सुंदर तरीके से बखूबी समझाने की कोशिश की है – विश्व गाथा प्रकाशन से, फ़ोन कॉल आया, कवि ने कविता के माध्यम से प्रशंसा करना बताया। कैसे किसी की प्रशंसा करें, और शॉर्ट में अपना परिचय दिया। फोन कॉल के दौरान आपको कैसा व्यवहार करना चाहिए ये समझाया।

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पुकार।

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♦ पुकार। ♦

उठो बहादुर उठो।
बढ़ो बहादुर बढो।

समर सुनसान पड़ा है।
लूटते देख मां की लाज।
निज जंगी बेड़ा पास पड़ा।
बलिदान, बलिदान खड़ा है।

उठो बहादुर उठो।
बढ़ो बहादुर बढ़ो।

कुर्बानी की जंग है लड़नी।
दुश्मन त ललकार रहा है।
फौलादी जंगी बेटा को,
तुम भी तो तैयार करो।

दुश्मन सीमा पर तैनात खड़ा है।
सीमा पर तैनात वह अड़ा है।

उठो बहादुर उठो।
बढ़ो बहादुर बढ़ो।

खड़ा शहीदी जत्था भी,
तुझको आज पुकार रहा है।
सुनसान समर निहार रहा।
बलवीर पुंज बनकर उभरों री।

उठो बहादुर उठो।
बढ़ो बहादुर बढ़ो।

त्याग तपस्या बलिदान का,
यही रहा है केंद्र बिंदु।
मंगल आज पुकार रहा है।

उठो बहादुर उठो।
बढ़ो बहादुर बढ़ो।

चारों तरफ बिछी देख,
लाशों की जब ढेर।
झुकने देना कभी नहीं,
भारत मां का शीश।

होगा तो ढूंढो, पढ़ो बहादुर बढ़ो।
चढ़ो बहादुर बढ़ो, चलो वीर बढ़ो।

तपोभूमि हर ग्राम हमारे,
कवि की वाणी गाती है।
लोरी गाती शाम को,
माता गाय हमारी प्यारी है।

कहां सिंह बन गए खिलौने,
वाली रानी बलिदान खड़ा है।
पढ़ो बहादुर पढ़ो,
लड़ो बहादुर लड़ो।

उठो बहादुर उठो।
बढ़ो बहादुर बढ़ो।

♦ सुखमंगल सिंह जी – अवध निवासी ♦

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  • “सुखमंगल सिंह जी“ ने, बहुत ही सरल शब्दों में सुंदर तरीके से बखूबी समझाने की कोशिश की है – सैनिकों का उमंग – उत्साह बढ़ाते हुए कवि कहते है, चाहे कुछ भी हो जाये कभी भी झुकने ना देना भारत माँ का शीश। त्याग तपस्या बलिदान का, यही रहा है केंद्र बिंदु। उठो बहादुर उठो। बढ़ो बहादुर बढ़ो।

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यह कविता (पुकार।) “सुखमंगल सिंह जी” की रचना है। KMSRAJ51.COM — के पाठकों के लिए। आपकी कवितायें सरल शब्दो में दिल की गहराइयों तक उतर कर जीवन बदलने वाली होती है। मुझे पूर्ण विश्वास है आपकी कविताओं और लेख से जनमानस का कल्याण होगा।

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