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KMSRAJ51-Always Positive Thinker

“तू ना हो निराश कभी मन से” – (KMSRAJ51, KMSRAJ, KMS)

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Hindi Poems

प्रकृति और खिलवाड़।

Kmsraj51 की कलम से…..

♦ प्रकृति और खिलवाड़। ♦

पावन प्रकृति के आंचल में जब, मानव ने खोली आंखे थी।
कितना निश्छल रहा मानव होगा? खिलती उसकी बांछे थी।

वक्त गुजरा तो होड़ बढ़ी, उसने कुदरत से खिलवाड़ किया।
हरे भरे और खिलते चमन को, नादान मानुष ने उजाड़ दिया।

अब रोगी काया और भोगी मानस, बाँछों में पड गई झाईं है।
धन वैभव तो है बहुत बड़ा पर, सुख सन्तोष पास में नाही है।

प्रकृति महतारी जग सब जीवों की, मानव ने उसको लूटा है।
भूल गया वह मरना है इक दिन, मोह इस जग का झूठा है।

जंगल काटे, भूमि खोदी, हवा, पानी व व्योम को दूषित किया।
जोशीमठ की दरारें आज डराती, प्रकृति से खिलवाड़ किया।

काश ! यूं न रौंदता कुदरत को, खुद खुदा मान के भूल करी।
नतीजन सांसे उखड़ रही है, जवां फेफड़ों में है अब धूल भरी।

♦ हेमराज ठाकुर जी – जिला – मण्डी, हिमाचल प्रदेश ♦

—————

  • “हेमराज ठाकुर जी“ ने, बहुत ही सरल शब्दों में सुंदर तरीके से इस कविता के माध्यम से समझाने की कोशिश की है — इस धरा पर इंसान से भी काफी समय पहले से ही प्रकृति अतिसुन्दर और मनोरम रूप में उपस्थित है। मनुष्य ने अपनी नाशवान भौतिक सुख सुविधा के लिए प्रकृति के साथ खिलवाड़ किया जिसके परिणाम स्वरूप आज अब रोगी काया और भोगी मानस हो गया है। धन वैभव तो है बहुत बड़ा पर, सुख सन्तोष उसके पास में नाही है। प्रकृति माँ है सभी जीवों की, मानव ने उसको इस क़दर लूटा है की भूल गया, वह मरना है इक दिन, मोह इस जग का सब झूठा है, सब कुछ यही रह जाना है। मानव ने जंगल काटे, भूमि खोदी, हवा, पानी व व्योम को भी दूषित किया, इसी कारण जोशीमठ की दरारें आज डराती, प्रकृति से खिलवाड़ किया बढ़चढ़ कर क्यों? काश ! यूं न रौंदता कुदरत को, मनुष्य ने खुद भगवान् मान के भूल करी। नतीजन सांसे उखड़ रही है, जवां फेफड़ों में है अब धूल भरी। अगर अब भी नहीं सुधरे तो, आने वाला समय और भी भयावह होगा।

—————

यह कविता (प्रकृति और खिलवाड़।) “हेमराज ठाकुर जी“ की रचना है। KMSRAJ51.COM — के पाठकों के लिए। आपकी कवितायें/लेख सरल शब्दो में दिल की गहराइयों तक उतर कर जीवन बदलने वाली होती है। मुझे पूर्ण विश्वास है आपकी कविताओं और लेख से जनमानस का कल्याण होगा।

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“सफलता का सबसे बड़ा सूत्र”(KMSRAJ51)

“स्वयं से वार्तालाप(बातचीत) करके जीवन में आश्चर्यजनक परिवर्तन लाया जा सकता है। ऐसा करके आप अपने भीतर छिपी बुराईयाें(Weakness) काे पहचानते है, और स्वयं काे अच्छा बनने के लिए प्रोत्साहित करते हैं।”

 

“अगर अपने कार्य से आप स्वयं संतुष्ट हैं, ताे फिर अन्य लोग क्या कहते हैं उसकी परवाह ना करें।”~KMSRAj51

 

 

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मुश्किल नहीं नामुमकिन है।

Kmsraj51 की कलम से…..

♦ मुश्किल नहीं नामुमकिन है। ♦

मानव मन के मतभेदों को, धरती से मिटाना मुश्किल है,
रामायण हुआ महाभारत हुआ, मानव मदहोशी वैसी है।
मानव ही कहलाया कभी देव तो कभी दानव या राक्षस,
जाति धर्म में बंटे इंसानों की, आज भी यह लड़ाई कैसी है?

उम्मीद तो जागती है अंधेरे में जुगनुओं की रोशनी से भी,
पर उनकी टिमटिमाहट से मुकमल उजाला नहीं होता है।
लगता तो है दूर से कि मानो टीका अंबर क्षितिज पर ही है,
पर असल में तो अंबर को किसी ने संभाला नहीं होता है।

मुश्किल नहीं नामुमकिन है इस दौर में नीति समझाना,
क्योंकि आज हर तरकश में तर्कों के तीखे तीर भरे हैं।
जब पूछते हो सब कोई सवाल यही कि “ईश्वर कहां है?”
“तुमने देखा क्या?” ऐसे माहौल में भगवान से कौन डरे हैं?

मूर्खता है आज कहना किसी से कि भगवान से तो डरो,
इतनी भी लूटपाट और अभद्रता बिल्कुल ठीक नहीं है।
आज हर कोई देता फिरता है जवाब यही कि “बस करो,
यह जमाना है प्रैक्टिकल का, जिन्दगी कोई भीख नहीं है।

फिर सोचता हूं कि होना चाहिए फिर से कोई महाभारत,
जो बेकाबू इंसान सातवें आसमान से जमीन पर आ जाए।
फिर से जाग उठे इन्सान के भीतर वही पुरानी इंसानियत,
आदमी फितरतों को छोड़कर भगवान से डर खा जाए।

आज वश में नहीं है समझाइश चांद सितारों के भी शायद,
आज तो फिर से दुनियां में ज्ञान का सूरज उगना चाहिए।
मकसद नहीं है महज किसी की जिन्दगी में उजाला लाना,
कोशिश यह है कि जग में अहम अंधकार ही डूबना चाहिए।

♦ हेमराज ठाकुर जी – जिला – मण्डी, हिमाचल प्रदेश ♦

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  • “हेमराज ठाकुर जी“ ने, बहुत ही सरल शब्दों में सुंदर तरीके से इस कविता के माध्यम से समझाने की कोशिश की है — आज का इंसान इंसानियत को बिलकुल भूल गया है, उसे अपने स्वार्थ के अलावा और कुछ दिखता ही नहीं है। अपने स्वार्थ सिद्धि के लिए आज का इंसान कोई भी बड़े से बड़ा विकर्म करने से डरता नहीं है। उसे भगवान या उस अनंत सत्ता का भी डर भी अब नहीं रहा। क्या फिर से इंसान को सुधारने के लिए महाभारत की जरूरत है। आखिर क्यों आज का इंसान इतना स्वार्थी हो गया है। अपने अहंकार में डूबा आज का इंसान अपने विकर्मो के कारण अपना सर्वनाश करता जा रहा है। आने वाली पीढ़ी का भविष्य और भी ज्यादा अंधकारमय बना रहा है। अगर अब भी नहीं संभले और सुधरे तो तुम्हारा विनाश निश्चित है।

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यह कविता (मुश्किल नहीं नामुमकिन है।) “हेमराज ठाकुर जी“ की रचना है। KMSRAJ51.COM — के पाठकों के लिए। आपकी कवितायें/लेख सरल शब्दो में दिल की गहराइयों तक उतर कर जीवन बदलने वाली होती है। मुझे पूर्ण विश्वास है आपकी कविताओं और लेख से जनमानस का कल्याण होगा।

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“सफलता का सबसे बड़ा सूत्र”(KMSRAJ51)

“स्वयं से वार्तालाप(बातचीत) करके जीवन में आश्चर्यजनक परिवर्तन लाया जा सकता है। ऐसा करके आप अपने भीतर छिपी बुराईयाें(Weakness) काे पहचानते है, और स्वयं काे अच्छा बनने के लिए प्रोत्साहित करते हैं।”

 

“अगर अपने कार्य से आप स्वयं संतुष्ट हैं, ताे फिर अन्य लोग क्या कहते हैं उसकी परवाह ना करें।”~KMSRAj51

 

 

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जरूरत।

Kmsraj51 की कलम से…..

♦ जरूरत। ♦

मेरे दोस्त, तुम्हारी नजरें गर पाक है,
तो कसम खुदा की, पर्दे की जरूरत नहीं।
काले – काले बादल को गर बरसना है,
तो उसे गरजने की जरूरत नहीं।

बेइंतहां मुहब्बत करते हो अगर,
तो इज़हार क्यूं नहीं करते।
मेरे दोस्त मुहब्बत छुपाए नहीं छुपती,
इसे छुपाने की जरूरत क्या है।

चाहे रहो भौंरा या गिद्ध बन जाओ,
गर तेरे खून में फितरत है शिकार करने की,
तो इस सैयाद को डरने की जरूरत क्या है।
तुम्हारी आंखें ही काफी हैं रमजा के लिए,
बोलने की जरूरत क्या है।

मैं तेरी ख़ामोशी समझता हूं, मेरे दोस्त,
कुछ भी बोलने की जरूरत क्या है।
सच बोलना और लिखना मेरी फितरत है बुरी,
अंजाम से डरता नहीं, कभी विचार करता नहीं।

नाज़ है तुझपे, तेरे जैसा होशियार तो नहीं,
रहता हूं जमीन पर, पर जमींदार नहीं।

♦ भोला शरण प्रसाद जी – सेक्टर – 150/नोएडा – उत्तर प्रदेश ♦

—————

  • “भोला शरण प्रसाद जी“ ने, बहुत ही सरल शब्दों में सुंदर तरीके से इस लेख के माध्यम से समझाने की कोशिश की है — सच्चा प्यार एक-दूसरे के लिए एक मजबूत, गहरा और स्थायी स्नेह है। यह किसी के लिए गर्मजोशी और देखभाल की भावना है, और उन्हें खुश करने की इच्छा है। सच्चे प्यार में आपसी सम्मान, विश्वास और निस्वार्थता की भावना के साथ-साथ एक-दूसरे के लिए त्याग करने की इच्छा शामिल है। यह एक ऐसा प्यार है जो बिना शर्त है, जिसका अर्थ है कि यह एक-दूसरे के कार्यों या भावनाओं पर निर्भर नहीं है, बल्कि स्वतंत्र रूप से और बिना शर्त के दिया जाता है। सच्चा प्यार एक दुर्लभ और खास चीज है, और यह उन लोगों के लिए बहुत खुशी और खुशी ला सकता है जो इसका अनुभव दिलसे करते हैं।

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यह कविता (जरूरत।) “भोला शरण प्रसाद जी” की रचना है। KMSRAJ51.COM — के पाठकों के लिए। आपकी लेख/कवितायें सरल शब्दो में दिल की गहराइयों तक उतर कर जीवन बदलने वाली होती है। मुझे पूर्ण विश्वास है आपकी कविताओं और लेख से जनमानस का कल्याण होगा। आपकी लेखन क्रिया यूं ही चलती रहे।

आपका परिचय आप ही के शब्दों में:—

मैं भोला शरण प्रसाद बी. एस. सी. (बायो), एम. ए. अंग्रेजी, एम. एड. हूं। पहले केन्द्रीय विघालय में कार्यरत था। मेरी कई रचनाऍं विघालय पत्रिका एंव बाहर की भी पत्रिका में छप चूकी है। मैं अंग्रेजी एंव हिन्दी दोनों में अपनी रचनाऍं एंव कविताऍं लिखना पसन्द करता हूं। देश भक्ति की कविताऍं अधिक लिखता हूं। मैं कोलकाता संतजेवियर कालेज से बी. एड. किया एंव महर्षि दयानन्द विश्वविघालय रोहतक से एम. एड. किया। मैं उर्दू भी जानता हूं। मैं मैट्रीकुलेशन मुजफ्फरपुर से, आई. एस. सी. एंव बी. एस. सी. हाजीपुर (बिहार विश्वविघालय) बी. ए. (अंग्रेजी), एम. ए. (अंग्रेजी) बिहार विश्वविघालय मुजफ्फरपुर से किया। शिक्षा से शुरू से लगाव रहा है। लेखन मेरी Hobby है। इस Platform के माध्यम से सुधारात्मक संदेश दे पाऊं, यही अभिलाषा है।

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“सफलता का सबसे बड़ा सूत्र”(KMSRAJ51)

“स्वयं से वार्तालाप(बातचीत) करके जीवन में आश्चर्यजनक परिवर्तन लाया जा सकता है। ऐसा करके आप अपने भीतर छिपी बुराईयाें(Weakness) काे पहचानते है, और स्वयं काे अच्छा बनने के लिए प्रोत्साहित करते हैं।”

 

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गाँव की व्यथा।

Kmsraj51 की कलम से…..

♦ गाँव की व्यथा। ♦

लोग थे मेरे भोले भाले,
लोग थे मेरे भोले भाले।
लाखो संकट सहन किए,
मानव को मानवता मे रहने दिए,
कभी ना हुए ओ मन के काले।

चका चौध की इस दुनिया को,
शांति उनकी रास न आई।
कई अंधेरों ने आगे आकर,
उलटी उनको राह दिखाई।

देश से विदेश गए कुछ,
गाँव से प्रदेश गए कुछ।
लगी भनक जब चका चौध की,
अपनों को ही मानने लगे तुच्छ।

पर औकात क्या थी,
उनकी ऐसा करने की।
अगर जागरूक सरकारी तंत्र होता,
उन भोले ग्रामीणों के लिए,
इनके पास उन्नति का मंत्र होता।

भेज दिया गाँव को ढूंढने,
एक पतली सी सड़क को।
हाफ़्ती हाफ़्ती गाँव पहुंची,
बची कसर पूरी करने को।

आना था उसे वर्षो पहले,
बड़ी उलझनों से आज आई।
ग्रामीण संस्कृति को आँख दिखाकर,
फिर वह सभ्य कहलाई।

उदय होता…
सम्पूर्ण सनातनता का।
यदि गाँव का पूर्ण उदय होता,
रखते लाज मेरे संरक्षण की।
हाल न आज ऐसा होता,
लोग थे मेरे भोले भाले,
लोग थे मेरे भोले भाले।

♥ गाँव को समर्पित कविता। ♥

♦ लाल सिंह वर्मा जी – जिला – सिरमौर, हिमाचल प्रदेश ♦

—————

• Conclusion •

  • “लाल सिंह वर्मा जी“ ने, बहुत ही सरल शब्दों में सुंदर तरीके से इस कविता के माध्यम से समझाने की कोशिश की है — देश से विदेश गए कुछ, गाँव से प्रदेश गए कुछ। आखिर क्यों आजकल के बच्चें गांव से शहर को जाकर वहां की लगी भनक जब चका चौध की अपना सुध-बुध खोकर गांव वालों को व अपनों को ही मानने लगे तुच्छ। पर औकात क्या थी, उनकी ऐसा करने की। अगर जागरूक सरकारी तंत्र होता तो उन भोले ग्रामीणों के लिए, इनके पास भी उन्नति का मंत्र होता। गांव भी उन्नति से सराबोर होता। अभी कुछ समय पहले जब कोरोना आया था तो सभी को अपना गांव ही याद आया सभी बचने के लिए गांव भागकर आये। उदय होता… सम्पूर्ण सनातनता का, यदि गाँव का पूर्ण उदय होता। रखते लाज मेरे संरक्षण की हाल न आज ऐसा होता। गांव के लोग थे मेरे भोले भाले। एक बात याद रखना – आज भी गांव में इंसानियत जीवित है, ताज़ी हवा व खानपान सात्विक है, सभी मिल जुलकर प्रेम से रहते है, मुसीबत में एक दूसरे के काम आते है। जब जब तुम तकलीफ में रहोगे तुम्हे अपना गांव ही याद आएगा।

—————

यह कविता (गाँव की व्यथा।) “लाल सिंह वर्मा जी“ की रचना है। KMSRAJ51.COM — के पाठकों के लिए। आपकी कवितायें/लेख सरल शब्दो में दिल की गहराइयों तक उतर कर जीवन बदलने वाली होती है। मुझे पूर्ण विश्वास है आपकी कविताओं और लेख से जनमानस का कल्याण होगा।

आपका परिचय आप ही के शब्दों में:—

मैं लाल सिंह वर्मा सुपुत्र श्री भिन्दर सिंह, गांव – खाड़ी, पोस्ट ऑफिस – खड़काहँ, तहसील – शिलाई, जिला – सिरमौर, हिमाचल प्रदेश का निवासी हूँ। मैं एक शिक्षक हूं, शिक्षा विभाग में भाषा अध्यापक के पद पर कार्यरत हूँ। शिक्षा से शुरू से लगाव रहा है। लेखन मेरी Hobby है, हिंदी भाषा से सम्बन्धित साहित्यिक विधाओं में रचनाएं लिखना तथा विशेष रूप से सांस्कृतिक, आध्यात्मिक व मानवीय मूल्यों से सम्बन्धित रचनाओं का अध्ययन करना पसंद है। इस Platform (KMSRAJ51.COM) के माध्यम से सुधारात्मक संदेश दे पाऊं, यही अभिलाषा है।

शैक्षिक योग्यता – J.B.T, BEd., MA in English and MA in Hindi, हिंदी विषय में राष्ट्रीय पात्रता परीक्षा उत्तीर्ण की है। अध्यापक पात्रता परीक्षा L.T., J.B.T., TGT पास की है। केंद्र विश्वविद्यालय PHD• (पीएचड•) प्रवेश परीक्षा उत्तीर्ण की है।

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Filed Under: 2022-KMSRAJ51 की कलम से, लाल सिंह वर्मा जी की कविताएं।, हिंदी कविता, हिन्दी-कविता Tagged With: Hindi Poems, कवि‍ताएँ, गाँव की मिट्टी, गाँव की यादें पर कविता, गाँव की व्यथा, गाँव की व्यथा - लाल सिंह वर्मा, गाँव पर कविता, गांव पर कविता इन हिंदी, बचपन की मासूमियत शायरी, बचपन की यादें इन हिंदी, लाल सिंह वर्मा, लाल सिंह वर्मा जी की कविताएं, शहर और गांव पर कविता

दो बातें।

Kmsraj51 की कलम से…..

♦ दो बातें। ♦

आंखे प्यासी है आज भी प्रिये,
तेरे उस सादे सहज दीदार की।
जमाना बीत गया है किए हुए,
दो बातें तुमसे शालीन प्यार की।

किससे कहूं और क्या कहूं, कि सब कुछ?
नहीं होता है प्यार में किसी को पा जाना?
प्रेम अन्त है, वासनाएं अतृप्त है, चाहत है,
नाम बस एक दूसरे की याद में खो जाना।

जाती हैं दूर तलक वो यादें और वादे,
मुश्किल होता है जिन्हे करके निभाना।
छुप – छुप कर मिलना और फिर बिछुड़ना,
सदियों से प्यार का दुश्मन रहा है जमाना।

वे अन्दर ही अन्दर कई बातों को छुपाना,
बड़ा मुश्किल होता था उन्हे जुबां पर लाना।
वे आंखों ही आंखों की बेबाक सी बातें,
मुश्किल होता था जिन्हे इशारों में समझना।

आज भी हसरत है सीने में, है वही मुहब्बत,
मुश्किल होता है इश्क मुश्क को दफनाना।
जाने क्या रखा है लिव इन रिलेशनशिप में?
क्यों नहीं समझाता है आज इन्हे यह जमाना?

हमने किया नहीं इजहार – ए – इश्क कभी भी था,
रह गया होकर भी प्यार भीतर ही भीतर बेगाना।
तुम हो गए थे उनके पल भर में देखते ही देखते,
हमने सहर्ष देखा था सब, तनिक भी बुरा न माना।

होता कुछ इस कदर का नई पीढ़ी के साथ तो शायद,
खैर ! छोड़िए, सब्र करें, हो गया प्रेम प्रलाप है बहुतेरा,
हो न सका किस्मत से गर दैहिक मिलन तो क्या हुआ?
बस होता रहे रूहों से रूहों का मिलन यूं ही तेरा मेरा।

जालिम जमाने की भीड़ में मुश्किल है जी ढूंढ पाना,
एक दूसरे को, यहां छाया है जी बस अंधेरा ही अंधेरा।
यहां होती नहीं है कभी भी सुबह रात गुजर जाने पर,
यहां का दस्तूर है कि जब जाग जाए तो समझो सवेरा।

♦ हेमराज ठाकुर जी – जिला – मण्डी, हिमाचल प्रदेश ♦

Must Read : क्या लिव इन रिलेशनशिप ठीक है?

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  • “हेमराज ठाकुर जी“ ने, बहुत ही सरल शब्दों में सुंदर तरीके से इस कविता के माध्यम से समझाने की कोशिश की है — सच्चा प्रेम क्या है? क्या जिस्मानी भूख ही सच्चा प्रेम है? सच्चा प्रेम – सच्चे प्रेम में जिस्म की भूख नहीं होती है। सच्चे प्रेम में दो दिलों का आत्मिक प्रेम होता है यह प्रेम ज़िस्म के प्रेम से बिलकुल ही अलग होता है। जहां पर जिस्मानी भूख हो वह प्रेम कभी भी नहीं हो सकता, उसे प्रेम की संज्ञा नहीं दे सकते। क्योंकि हमारी सामाजिक और पारिवारिक व्यवस्था इतनी मजबूत और पवित्र है कि उसमें दम्पति से ले कर बच्चे और बूढ़े तक सुरक्षित है। यदि लिव इन रिलेशनशिप का कानून भारत में स्थान प्राप्त करता है तो भारतीय समाज हवस का शिकार हो जाएगा। न ही तो रिश्तों नातों की अहमियत रहेगी और न ही नारी जाति का सम्मान रहेगा।भविष्य की नई पीढ़ी और वृद्ध लोग असहज और असुरक्षित होंगे। आखिर क्या जरूरत है बिना शादी के लड़का – लड़की को सांसारिक व्यवहार में रहने की? हमारी भारतीय संस्कृति की व्यवस्था के मुताबिक 25 वर्ष तक का समय पढ़ने – लिखने का है और उस बीच दो लड़का – लड़की में प्रेम भी हो जाता है तो कोई गुनाह नहीं है। शर्त यह है कि वह प्रेमी जोड़ा विवाह पूर्व शारीरिक संबंध स्थापित न करें। हमारी संस्कृति के नौजवान अधिकांश भले ही सामाजिक लाज लपेट के चलते ही सही; इस नियम का पालन भी करते आए हैं। उसके पश्चात विवाह घर वालों की सहमति से करते हैं और सांसारिक जीवन का आनंद लेते हैं।

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सागर और सरिता।

Kmsraj51 की कलम से…..

♦ सागर और सरिता। ♦

“सुनो सरिते रौद्र रूप धर,
क्यों तांडव तुम यूं करती हो?
है सहज सरल तुम शांत स्वभावी,
फिर दहशत क्यों तुम भरती हो?

आकंठ डुबाकर जनजीवन जल में,
क्यों त्राहि – त्राहि तुम मचाती हो?
रो उठते हैं प्राणी मात्र सब तब,
जब नीड़ उनका तुम बहाती हो।”

“मैं भूली बिसरी पावन सरिता,
हिमगिरी के शिखर से बहती हूं।
मैं कहां से निकली, कहां को जाती?
कभी, किसी से कुछ न कहती हूं।

गांव के पावन गलियारों में बहती,
पवनों में, शीतलता मैं ही देती हूं।
संचित कर के कृषित भूमि को,
मैं घट – घट को नवजीवन देती हूं।”

घाट – घाट पर तृप्ताती हूं सब को,
सब कूड़ा – कचरा जब मैं ढोती हूं।
सच कहती हूं मैं कुदरत की बेटी,
मानुषी करणी पर तब मैं रोती हूं।

क्यों भूल जाते हैं लोग मुझको?
तृषा नाशिनी मैं उनकी रोटी हूं।
निर्मल – पावन मैं आई गिरी से,
पिया तक पहुंचते मटमैली होती हूं।

जो जिसका किया वह उसे लौटाती,
मैं बदला कहां कब किसी से लेती हूं?
निज करणी का फल भोग रहे हैं सब,
तुम कहते हो मैं यह सब दंड देती हूं?

जिन जनी नहीं कोई जान जिस्म से,
प्रसव पीड़ा को वे भला क्या जाने?
मैं जननी हूं जलचर – थलचर की,
मेरी पीड़ा को भला वे क्यों माने?

मैं सज – धज – पावन निकली थी प्रियतम,
मटमैली गंदली होकर तुमसे मिलती हूं।
निर्दोष हूं मैं सनातनी परंपरा प्रवाहित,
निज प्रहारों से देहे कई की छीलती हूं।

“होती है मुझे भी पीड़ा तब प्रियतम
यह सब सुनकर सागर अकुलाता है।”
“मदहोश मानुष की यह जरूरत?” सागर,
सुनामी लहरों से आगबबूला हो जाता है।

♦ हेमराज ठाकुर जी – जिला – मण्डी, हिमाचल प्रदेश ♦

—————

  • “हेमराज ठाकुर जी“ ने, बहुत ही सरल शब्दों में सुंदर तरीके से इस कविता के माध्यम से समझाने की कोशिश की है — प्रकृति के पांच तत्व सलीके से अपना-अपना चक्र पूर्ण करते है, अर्थात प्रकृति के पांच तत्व तब तक मानव या जीव जंतु का नुकसान नहीं करते जब तक मनुष्य उनके प्राकृतिक रूप व पथ को अवरुद्ध न करें। मनुष्य अपने स्वार्थ के लिए प्रकृति के पांच तत्व के साथ खिलवाड़ करता आ रहा जिसका परिणाम कहीं भूकंप, तो कहीं बाढ़, कहीं सुनामी, तो कहीं बर्फबारी और भी अनेकानेक रूप देखने को मिल रहे है, क्या नदी हो क्या समुद्र मनुष्य ने सभी के साथ खिलवाड़ किया हैं। हे मानव अब भी समय हैं सुधर जा वर्ना ये धरा तेरे रहने के लायक बिलकुल भी नहीं बचेगी। फिर कहां जायेगा तू रहने सोच जरा।

—————

यह कविता (सागर और सरिता।) “हेमराज ठाकुर जी“ की रचना है। KMSRAJ51.COM — के पाठकों के लिए। आपकी कवितायें/लेख सरल शब्दो में दिल की गहराइयों तक उतर कर जीवन बदलने वाली होती है। मुझे पूर्ण विश्वास है आपकी कविताओं और लेख से जनमानस का कल्याण होगा।

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“सफलता का सबसे बड़ा सूत्र”(KMSRAJ51)

“स्वयं से वार्तालाप(बातचीत) करके जीवन में आश्चर्यजनक परिवर्तन लाया जा सकता है। ऐसा करके आप अपने भीतर छिपी बुराईयाें(Weakness) काे पहचानते है, और स्वयं काे अच्छा बनने के लिए प्रोत्साहित करते हैं।”

 

“अगर अपने कार्य से आप स्वयं संतुष्ट हैं, ताे फिर अन्य लोग क्या कहते हैं उसकी परवाह ना करें।”~KMSRAj51

 

 

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खाली समय।

Kmsraj51 की कलम से…..

♦ खाली समय। ♦

जब भी बैठिए खाली,
बजाइए जरूर ताली।
शरीर की करती रखवाली,
जैसे हो बाहर वाली।

जब मिले फुर्सत के क्षण,
ईश्वर का कर लो भजन।
मिलेगी मन को शांति,
ना रहेगा कोई भ्रांति।

जब मिले खाली के दो पल,
ऐसा कर जो सोचा हो बिता कल।
खुद से करें बात,
करें कुछ नया करामात।

आंखों को घुमाएं गोल गोल,
जैसे सूरज और चंदा गोल मटोल।
कोयल की निकाले बोली,
जैसे दे रहा हो कोई गाली।

हरकतें करें ऐसी,
दिल खुश हो जाए वैसी।
कभी उठक, कभी बैठक,
साथ में दीजिए आंखों को थोड़ी ठंडक।

आंखों में लगाइए काली,
जैसे हो सुरमा भोपाली।
एक मिनट के लिए हो जाओ मौन,
मिल जायेगा कुछ चैन।

चाय की चुस्की प्याली में,
नयन मटकाईये खाली में।
सिर खुजलाईए बाल खींचिए,
दाएं देखिए, बाएं देखिए।

अजब वाक्या याद कर,
मुस्कान बिखेरिए खुलकर।
खाली समय में भी काफी काम है,
नसीब में कहां लिखा आराम है।

♦ विवेक कुमार जी – जिला – मुजफ्फरपुर, बिहार ♦

—————

• Conclusion •

  • “विवेक कुमार जी“ ने, बहुत ही सरल शब्दों में सुंदर तरीके से इस कविता के माध्यम से समझाने की कोशिश की है — जब हो फुरसत का समय प्रभु का भजन भी कर लिया करो। खाली समय में दोस्तों और परिवार के सदस्यों के साथ बैठकर चाय पीते हुए कुछ फुरसत के पल बिता भी लिया करो, ना जाने कब ये शरीर साथ छोड़ दे, इसलिए प्रेम से दो शब्द बोल लिया करो सभी से। जब भी मिलो किसी से मुस्कुराते हुए मिलो और समय-समय पर ख़ुशी होने पर ताली भी बजा लिया करो मेरे यार। चार दिन की ज़िन्दगी है सभी से हँस बोलकर प्रेम से बिताया करो मेरे यार।

—————

यह कविता (खाली समय।) “विवेक कुमार जी” की रचना है। KMSRAJ51.COM — के पाठकों के लिए। आपकी कवितायें/लेख सरल शब्दो में दिल की गहराइयों तक उतर कर जीवन बदलने वाली होती है। मुझे पूर्ण विश्वास है आपकी कविताओं और लेख से जनमानस का कल्याण होगा।

आपका परिचय आप ही के शब्दों में:—

मैं एक शिक्षक हूं। मुजफ्फरपुर जिला, बिहार राज्य का निवासी हूं। शिक्षा से शुरू से लगाव रहा है। लेखन मेरी Hobby है। इस Platform के माध्यम से सुधारात्मक संदेश दे पाऊं, यही अभिलाषा है।

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“सफलता का सबसे बड़ा सूत्र”(KMSRAJ51)

“स्वयं से वार्तालाप(बातचीत) करके जीवन में आश्चर्यजनक परिवर्तन लाया जा सकता है। ऐसा करके आप अपने भीतर छिपी बुराईयाें(Weakness) काे पहचानते है, और स्वयं काे अच्छा बनने के लिए प्रोत्साहित करते हैं।”

 

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गर्माती तपिश पर बूँदे ठंडक की।

Kmsraj51 की कलम से…..

♦ गर्माती तपिश पर बूँदे ठंडक की। ♦

गर्मी की ऋतु थी सब ओर अभी अपने चरम पर।
प्रकृति की करवट दर्शा गयी जीवन है इसके रहम पर॥

गर्मी की तपिश से हुए थे सभी बेहाल।
ऐसे में मौसम ने बदली खुशनुमा चाल॥

गर्मी की तपिश ने सभी का जीवन दूभर किया।
शायद सबकी करुण पुकार सुन मेंह दिया॥

कल ही प्रकृति ने धूल भरी आंधी बरसाई।
आभार प्रकृति का जो सब पर दया आई॥

इस बारिश ने तो बदल दिया अब नजारा।
धुला-धुला नजर आए साफ हुआ रेत सारा॥

सब पेड़ – पौधे झूमें सब ठंडी हवा के संग।
बूझें दिलों में जागी कुछ नया करने की तरंग॥

पत्तों ने ऐसा लिया रूप जैसे अभी नए आये।
चहुँ ओर बारिश इस दिल को खूब लुभाये॥

धरती के सीने पर पड़ी जो ये बूँदे प्यारी।
ऐसा लगे जैसे आसमां ने निभाई यारी॥

प्यारी बूंदों से बन गया खुशनुमा वातावरण।
मानों प्रकृति ने ओढा ठंडी चादर का आवरण॥

♦ सुशीला देवी जी – करनाल, हरियाणा ♦

—————

  • “श्रीमती सुशीला देवी जी“ ने, बहुत ही सरल शब्दों में सुंदर तरीके से इस कविता के माध्यम से समझाने की कोशिश की है — पेड़ के पत्तों ने ऐसा लिया रूप जैसे अभी नए आये, जब चहुँ ओर बारिश इस दिल को खूब लुभाये। धरती के सीने पर पड़ी जो ये बूँदे प्यारी, ऐसा लगे जैसे आसमां ने निभाई अपनी यारी इंसानो के साथ। प्यारी बूंदों से बन गया खुशनुमा पूरा वातावरण, मानों प्रकृति ने ओढा ठंडी चादर का आवरण।

—————

यह कविता (गर्माती तपिश पर बूँदे ठंडक की।) “श्रीमती सुशीला देवी जी“ की रचना है। KMSRAJ51.COM — के पाठकों के लिए। आपकी कवितायें सरल शब्दो में दिल की गहराइयों तक उतर कर जीवन बदलने वाली होती है। मुझे पूर्ण विश्वास है आपकी कविताओं और लेख से जनमानस का कल्याण होगा। आपकी लेखन क्रिया यूं ही चलती रहे।

आपका परिचय आप ही के शब्दों में:—

मेरा नाम श्रीमती सुशीला देवी है। मैं राजकीय प्राथमिक पाठशाला, ब्लॉक – घरौंडा, जिला – करनाल, में J.B.T.tr. के पद पर कार्यरत हूँ। मैं “विश्व कविता पाठ“ के पटल की सदस्य हूँ। मेरी कुछ रचनाओं ने टीम मंथन गुजरात के पटल पर भी स्थान पाया है। मेरी रचनाओं में प्रकृति, माँ अम्बे, दिल की पुकार, हिंदी दिवस, वो पुराने दिन, डिजिटल जमाना, नारी, वक्त, नया जमाना, मित्रता दिवस, सोच रे मानव, इन सभी की झलक है।

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युद्ध की तबाही।

Kmsraj51 की कलम से…..

♦ युद्ध की तबाही। ♦

तीसरे विश्व युद्ध की कगार पर आ खड़ा भव,
इस बारुदी फसलों में अब बम-बारूद उगायेंगे।
खून ही बोयेगें और लाशें ही उगायेंगे,
इस बसी-बसाई दुनिया को वीरान बनायेंगे।

हँसते-मुस्कुराते चमन के गुलाबों को,
बारूदी काले जादू से कलियों को।
अपनी उन्मुक्तता में झूमते बालियों को,
इठलाती बलखाती शोख फूलों के क्यारियों को।

नदियों समन्दरों की लहरों पहरा होगा,
कल-कल करते झरनों के स्वर पर पहरा होगा।
खग-वृंद के नटखट कलरव गुंजन पर,
मोर मैना भौंरो भृंगों के गुंजार पर पहरा होगा।

सब ओर धुंध-धुंआ बारूद बन छा जायेंगें,
कोयल का कुंजन रुदन बन चिल्लायेंगे।
पपीहे की प्रीत भी डर के साये में खो जायेंगें,
लुक-छुप कर गाने वाले मौत की नींद सो जायेंगे।

दामिनियों की कड़-कड़ भी इनके सामने अदने से,
चिंगारियां उठाती भकजोगनियां भी छिप जायेंगी।
झींगुरों-सियारों का रुदन ही हम सुन पायेंगे,
सब ओर सिमटकर खामोशी से तबाही के गीत गायेंगे।

गोलियों की बौछारों से सावन भी शरमायेंगे,
विनाश की अमराई घर गली चौराहों पर आयेंगें।
हर उपवन डाली पर बारूद अंगार बरसायेंगे,
नफरत घृणा लालच आगे-आगे डंका बजायेंगे।

आज तड़प रहा संस्कृति-संस्कारों का देश,
ऋषि-मुनियों और वेद पुराणों पर बना देश।
कहां गये कुरान की वो आयत जिसमें कहा था,
गये कहां यीशू-पैगम्बर शान्ति जो बतलाते थे।

इस युद्ध विभीषिका में नित नये अध्याय जुड़ रहे,
अपनी महत्वाकांक्षा के चलते इक सभ्यता निगल रहा।
हथियारों पर दंभ रखने वालों आगाह है तुमको,
नाको चने चबवाने को अदने भी अड़कर खड़े हैं।

♦ सतीश शेखर श्रीवास्तव `परिमल` जी — जिला–सिंगरौली, मध्य प्रदेश ♦

—————

  • “सतीश शेखर श्रीवास्तव `परिमल`“ जी ने, बहुत ही सरल शब्दों में सुंदर तरीके से समझाने की कोशिश की है — युद्ध से कभी भी किसी समस्या का समाधान नहीं होता। कहने को तो आज मानव अपने आपको बहुत बड़ा ज्ञानी कहता है, लेकिन उसके सोच व कर्म विकर्मी होते जा रहे हैं। पृथ्वी एक बार पुनः विनाश कि तरफ बढ़ रहा है, आज मानव ही मानव के खून का प्यासा हो गया हैं। कोई भी किसी कि कुछ भी सुनने को तैयार ही नहीं है, सभी अपनी-अपनी ही जोत रहे हैं, सभी एक दूसरे को मारने के लिए तैयार हैं। जरा सोचे क्या इसी दिन के लिए मानव सभ्यता का इतना विकास हुआ? क्या विकास का यह परिणाम होता हैं? अगर ऐसे ही मानव विकास होता है तो, इससे अच्छा तो प्राचीन सभ्यता ही अच्छा है आज से ५५०० वर्ष पूर्व का। अभी भी समय है समझदारी सभी अपना दिखाए और सभी मिलजुलकर रहे, नहीं तो मानव सभ्यता पूर्ण रूप से नष्ट हो जाएगा।

—————

यह कविता (युद्ध की तबाही।) “सतीश शेखर श्रीवास्तव `परिमल` जी“ की रचना है। KMSRAJ51.COM — के पाठकों के लिए। आपकी कवितायें/लेख सरल शब्दो में दिल की गहराइयों तक उतर कर जीवन बदलने वाली होती है। मुझे पूर्ण विश्वास है आपकी कविताओं और लेख से जनमानस का कल्याण होगा।

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सूर्य देव! आओ तुम्हारा स्वागत है।

Kmsraj51 की कलम से…..

♦ सूर्य देव! आओ तुम्हारा स्वागत है। ♦

हाथ जोड़ नमस्कार कर तेरा स्वागत करते है हम।
हे देव! तेरे दर्शनों के बिना सब आँखें हो गयी थी नम॥

हे सूर्य देव! लगभग एक महीने में दर्शन दिए हैं तुमने।
अपनी प्रकाश भरी किरणों से सराबोर किये तुमने॥

नमन तुझकों बारम्बार तुम्हारी बहुत बाट निहारी हमने।
दर्शन देकर ठंड से ठिठुरती हर जिंदगी सँवारी तुमने॥

इस बर्फीले मौसम में हर इंसान का खून भी जम सा गया था।
जरूरी कार्यों को करने का दौर भी थम सा गया था॥

तेरी रोशनी बिखराती किरणों ने उजियारा भर दिया।
जन-जन के दिलों के अंदर ऊर्जा का संचार कर दिया॥

छंट गया अब सब अंधकार धुंध, कोहरे, बरसात का।
ये सब चमत्कार है तेरे आने की करामात का॥

पचहत्तर करोड़ लोगों ने भी तुझें एक साथ नमस्कार किया।
नमन को स्वीकार कर तूनें अपनी रहमत को बरसा ही दिया॥

जो गुहार लगाई थी हर दिल ने तेरे आने की।
धन्य किया तुमने कृपा की जो धूप बरसाने की॥

हे सूर्य देव! हर अंधेरे को हरने वाली तेरी प्रकाशित किरणों को कोटिशः नमन मेरा।
अपने दर्शन देकर कर दिया तूनें हर घर – आँगन सुखों का सवेरा॥

♦ सुशीला देवी जी – करनाल, हरियाणा ♦

—————

  • “श्रीमती सुशीला देवी जी“ ने, बहुत ही सरल शब्दों में सुंदर तरीके से इस कविता के माध्यम से समझाने की कोशिश की है — आधा से ज्यादा भारत में सर्द मौसम का कहर और उसके ऊपर बारिश का कहर और तो और सूर्य देव का यूँ लुकाछुपी, अचानक से मौसम में सर्द-गर्म होने की वजह से लोगों में ठिठुरन के साथ-साथ स्वास्थ्य संबंधी समस्याएं सर्दी – जुकाम, बुखार का होना। सर्दी से ठिठुरन के कारण जरूरी कार्यों को भी समय से न कर पाना। इस तरह की और भी बहुत सारी समस्याएं थी, लेकिन अभी “तेरी रोशनी बिखराती किरणों ने उजियारा भर दिया। जन-जन के दिलों के अंदर ऊर्जा का संचार कर दिया। छंट गया अब सब अंधकार धुंध, कोहरे, बरसात का। ये सब चमत्कार है तेरे आने की करामात का।” पचहत्तर करोड़ लोगों ने भी तुझें एक साथ नमस्कार किया। नमन को स्वीकार कर तूनें अपनी रहमत को बरसा ही दिया।

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यह कविता (सूर्य देव! आओ तुम्हारा स्वागत है।) “श्रीमती सुशीला देवी जी” की रचना है। KMSRAJ51.COM — के पाठकों के लिए। आपकी कवितायें सरल शब्दो में दिल की गहराइयों तक उतर कर जीवन बदलने वाली होती है। मुझे पूर्ण विश्वास है आपकी कविताओं और लेख से जनमानस का कल्याण होगा। आपकी लेखन क्रिया यूं ही चलती रहे।

आपका परिचय आप ही के शब्दों में:—

मेरा नाम श्रीमती सुशीला देवी है। मैं राजकीय प्राथमिक पाठशाला, ब्लॉक – घरौंडा, जिला – करनाल, में J.B.T.tr. के पद पर कार्यरत हूँ। मैं “विश्व कविता पाठ“ के पटल की सदस्य हूँ। मेरी कुछ रचनाओं ने टीम मंथन गुजरात के पटल पर भी स्थान पाया है। मेरी रचनाओं में प्रकृति, माँ अम्बे, दिल की पुकार, हिंदी दिवस, वो पुराने दिन, डिजिटल जमाना, नारी, वक्त, नया जमाना, मित्रता दिवस, सोच रे मानव, इन सभी की झलक है।

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