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KMSRAJ51-Always Positive Thinker

“तू ना हो निराश कभी मन से” – (KMSRAJ51, KMSRAJ, KMS)

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हिन्दी-कविता

दुहागन रोटी।

Kmsraj51 की कलम से…..

♦ दुहागन रोटी। ♦

औरंगाबाद की पटरियों पर,
बिखरी रोटी आज शर्मिंदा है।
तार -तार है इज्जत उसकी,
खाने वाला ही न जिंदा है।

खून-पसीना बहा कर उसने,
मुश्किल से इसको पाया था।
क्षुधा नाशनी इस महासुंदरी से,
निवाला एक न खाया था।

पटरी पर थी बिखरी रोटी,
पटक रही थी अपने माथे।
जलमग्न नयन थे उस बेचारी के,
कहानी इश्क की बताते-बताते।

अपने बाबा को मेरे बारे,
गांव में सुना था उसने बतियाते।
फिदा हुआ था मुझ पर तब वह,
मेरे कदमों में बाबा थे शीश नमाते।

निकल पड़ा वह गांव छोड़कर,
शहर को मेरी तलाश में।
मैं पा के रहूंगा, उस महा प्रेयसी को,’
क्या, ताकत थी उसके विश्वास में?

वह ललचता रहा, मैं ललचाती रही,
वह भटकता गया, मैं भटकाती गई।
खूब थी खेली ठिठोली उससे,
मैं भी कितनी मदमाती रही?

मुझे पाने को देख सखी,
क्या-क्या पीड़ा न उसने झेली है?
शायद मेरे गुनाहों की सजा है,
आज पटरियों पर अकेली है।

न जाने क्यों सड़कों से डर कर,
पटरी पर वह आया था?
आज सरकार ने नचाया उसको,
जीवन भर मैंने नचाया था।

धूप – धार की होकर मैंने,
पीछा उससे करवाया था।
वह भी मोह में पड़कर मेरे,
गांव से शहर को आया था।

मुझे पाने की जद्दोजहद में,
उसने, खूब मेहनत से कमाया था।
एक से बढ़कर एक करतब,
दिखा कर, उसने मुझे रिझाया था।

मैं बंध चली थी उसके पल्लू में,
मेहनत का लोहा मुझसे मनवाया था।
चल दिए अब बिन भोगे मुझको,
क्यों मेरी जिंदगी में आया था?

बेवफा न कहना प्यारे मुझको,
मैंने कदम-कदम पर सताया था।
तेरे प्यार को हे प्रियतम प्यारे!
जी भर कर मैंने आजमाया था।

क्यों छोड़ दिया इसे हालत पर इसकी?
इसका जीवन क्या इतना सस्ता है?
वह रोटी है सिसक रही आज,
यह भी कैसी व्यवस्था है?

महबूब मेरे क्या मिलन हुआ यह?
देख रहा ये जमाना है।
किस्मत में मिलन था इतना ही शायद,
मौत तो महज एक बहाना है।

हो गई हूं अछूत सी अब मैं,
कोई मानुष न मुझको अब खाएगा।
कौन मिलेगा प्रीतम ऐसा?
जो तुझ सा मुझे कमाए गा।

तू जा प्यारे में जी लूंगी,
भूखा, चील-कौआ मुझे कोई नोचेगा।
है कौन सहारा, बेसहारा का अब?
जो मेरी इज्जत की इतनी सोचेगा।

आज मैं समझी प्रीतम-प्यारे,
सच्चा प्यार क्या होता है?
तू जिया मेरे लिए, मरा मेरे लिए,
मुझे पाने को हल तक जोता है।

बाकी तो खरीददार है सब,
चंद पैसा ही मोल मेरा होता है।
वे क्या जाने कीमत मेरी?
रोटी का मोल क्या होता है?

तेरी शहादत पर आज प्रिये,
मेरा जर्रा-जर्रा रोता है।
तेरा अरमान थी मैं, तेरा भगवान थी मैं,
मुझसे बढ़कर तेरा, और कोई न होता है।

खामोश है बिखरी रोटी बेचारी,
आंखों से अश्रुओं का सोता है।
किया प्रेम न जीवन में जिसने, वह क्या जाने?
मिलकर बिछड़ने का, दर्द क्या होता है?

♦ हेमराज ठाकुर जी – जिला – मण्डी, हिमाचल प्रदेश ♦

—————

  • “हेमराज ठाकुर जी“ ने, बहुत ही सरल शब्दों में सुंदर तरीके से समझाने की कोशिश की है — मैं रोटी हूं, हर किसी को मुझे देखकर बहुत ही खुशी होती है क्योंकि मैं हर किसी की भूख मिटा देती हूं। चाहे गरीब हो, चाहे अमीर हो, चाहे बच्चे हो, बूढ़े हो, नौजवान हो सभी को सदैव ही मेरी जरूरत होती है। मैं दूसरों के काम आती हूं हर किसी की मैं मदद करती हूं, भूखे बेसहारा लोगों के चेहरे पर पलभर में मुझे देखकर मुस्कान आ जाती है। मेरे लिए ही सब अपना घर बार छोड़कर गांव से शहर को आते है, लेकिन उन्हें कहाँ पता था की कोरोना रुपी राक्षस, असुर, दैत्य आएगा और हमें (मजदूरों) रुलाएगा। हमें क्या पता था की हम एक एक रोटी के लिए मोहताज हो जायेंगे।

—————

यह कविता (दुहागन रोटी।) “हेमराज ठाकुर जी“ की रचना है। KMSRAJ51.COM — के पाठकों के लिए। आपकी कवितायें/लेख सरल शब्दो में दिल की गहराइयों तक उतर कर जीवन बदलने वाली होती है। मुझे पूर्ण विश्वास है आपकी कविताओं और लेख से जनमानस का कल्याण होगा।

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“सफलता का सबसे बड़ा सूत्र”(KMSRAJ51)

“स्वयं से वार्तालाप(बातचीत) करके जीवन में आश्चर्यजनक परिवर्तन लाया जा सकता है। ऐसा करके आप अपने भीतर छिपी बुराईयाें(Weakness) काे पहचानते है, और स्वयं काे अच्छा बनने के लिए प्रोत्साहित करते हैं।”

 

“अगर अपने कार्य से आप स्वयं संतुष्ट हैं, ताे फिर अन्य लोग क्या कहते हैं उसकी परवाह ना करें।”~KMSRAj51

 

 

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रंग पंचमी होली समापन।

Kmsraj51 की कलम से…..

♦ रंग पंचमी होली समापन। ♦

रंग पंचमी को होली का होता समापन,
महापर्व देवताओं को होते समर्पित।
नकारात्मक असर को करता नाश
सकारात्मक सोच का होता विकास।

आसमान में जो लोग गुलाल उड़ाते,
मनवांछित फल वही भक्त पाते हैं।
रखने से व्रत सभी दोष मिट जाए,
रंग पंचमी पर्व जो श्रद्धा से मनाते।

सभी अनिष्ट शक्तियां दूर ही रहती,
विघटन कारी शक्ति पास न आती।
रज – तम गुण दासी रूप में रहती,
सत्तवगुण जीवन में सुख शांति देते।

सगुण ऊपर पर्व विजय का प्रतीक,
आध्यात्मिक विकास करे भलीभूत।
पांच तत्वों का महापर्व देता प्रकाश,
किए धूलिवंदन विष्णु जी पालनहार।

त्रेता युग से चला आ रहा त्यौहार,
सांसारिक करते हैं इस पर विचार!
कृष्ण राधा को लगाते अबीर गुलाल,
लक्ष्मी जी की लाल करने से सत्कार।

तेजो मय ही है पूरा ब्रह्मांड हमारा,
विविध रंगों के घटक से भारी तारा।
गुलाल उड़ाकर देवों को हम पुकारें,
कल्याणकारी शक्ति होती हैं सहारा।

पारिवारिक कष्ट खत्म होवे समर्पण से,
ईश्वर की भक्ति होती है जल अर्पण से।
रंगपंचमी महापर्व मनाएं श्रद्धाभक्ति से,
सकारात्मक ऊर्जा आती ईश शक्ति से।

♦ सुखमंगल सिंह जी – अवध निवासी ♦

—————

— Conclusion —

  • “सुखमंगल सिंह जी“ ने, बहुत ही सरल शब्दों में सुंदर तरीके से इस कविता में समझाने की कोशिश की है — रंग पंचमी का पर्व होली त्योहार के पांच दिन के बाद मनाया जाता है। होली का पर्व चैत्र कृष्ण पक्ष की प्रतिपदा से प्रारंभ हो जाता है और पंचमी तिथि तक चलता है। पंचमी के दिन मनाए जाने के कारण ही रंग पंचमी कहा जाता है। रंग पंचमी पर माता लक्ष्मी और भगवान विष्णु की पूजा करनी चाहिए। लक्ष्मी धन, संपत्ति, ऐश्वर्य की देवी हैं। उनकी पूजा के साथ कनकधका स्तोत्र का पाठ करें। मां लक्ष्मी और श्रीहरि को लाल गुलाल अर्पित करें। इससे परिवार के समृद्धि में वृद्धि होगी। रंग पंचमी के दिन भगवान श्रीकृष्ण और राधारानी की पूजा करें। उन्हें गुलाल चढ़ाएं। ऐसा करने से वैवाहिक जीवन की परेशानी खत्म होंगी। प्रेम संबंध मजबूत होंगे। वैवाहिक जीवन में खुशहाली के लिए पति और पत्नी साथ में पूजा करें।

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sukhmangal-singh-ji-kmsraj51.png

यह कविता (रंग पंचमी होली समापन।) “सुखमंगल सिंह जी” की रचना है। KMSRAJ51.COM — के पाठकों के लिए। आपकी कवितायें, व्यंग्य / लेख सरल शब्दो में दिल की गहराइयों तक उतर कर जीवन बदलने वाली होती है। मुझे पूर्ण विश्वास है आपकी कविताओं और लेख से जनमानस का कल्याण होगा। आपकी कविताओं और लेख से आने वाली पीढ़ी के दिलो दिमाग में हिंदी साहित्य के प्रति प्रेम बना रहेगा। आपकी लेखन क्रिया यूं ही चलती रहे, बाबा विश्वनाथ की कृपा से।

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ज़रूर पढ़ें — प्रातः उठ हरि हर को भज।

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“सफलता का सबसे बड़ा सूत्र”(KMSRAJ51)

“स्वयं से वार्तालाप(बातचीत) करके जीवन में आश्चर्यजनक परिवर्तन लाया जा सकता है। ऐसा करके आप अपने भीतर छिपी बुराईयाें(Weakness) काे पहचानते है, और स्वयं काे अच्छा बनने के लिए प्रोत्साहित करते हैं।”

 

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सभ्यता और संस्कृति।

Kmsraj51 की कलम से…..

♦ सभ्यता और संस्कृति। ♦

हम और हमारी नदी।

• विश्व जल दिवस के अवसर पर…

हम शैवालिनी के अन्तरीप हैं।
नहीं कहते की हम को छोड़ कर,
निर्झरणी बहती जाये हमें यह स्वरूप देती जाये।
शंकु, वीथिका, भूनासिका, उचनि, बलुआही अवारी,
इन सब को वर्तुलाकार उसने सृजन किया है।

पवित्र जल माँ है और इसी से हमारा अस्तित्व है,
मगर हम सब तो जजीरा हैं हममें नहीं प्रवाह हैं।
अटल अभ्यर्पण है हमारा इसके साथ,
चिर-काल से हम माँझा हैं पुलिनवती के,
लेकिन हम प्रवाही नहीं हैं।

चूंकि प्रवाहित होना हममें नहीं,
हम प्राण रणभूमि ही होंगे।
हम श्रवनेगें तो बचेंगें ही नहीं,
अंध्रि उन्मूलित होगी तैरना होगा।
ध्वस्त होगें, झेलना पड़ेगा और बह जायेंगे।

पुन: एक बार हम कल्क होकर भी,
किसी समय उत्पत्ति बन सकते हैं।
विशिका बन कर हम घनरस को थोड़ा
अमृष्ट ही करेंगे निर्रथक ही सब बनाएँगे,
जो हम जजीरा हैं सब।

नहीं यह है अभिशाप हम सबका है प्रारब्ध,
हम सरिता के अंगज हैं।
अध्यासीन हैं अर्णा के उछंग में,
वह दीर्घकाय भूभाग से हमको मिलती है,
इसके अलावा यह धरा अपने पुरखों की है।

हे सरिते, तुम यूं ही बहती चलो।
भू-भाग से जो दातव्य हमको मिला है,
वो हमें मिलता रहे सदा,
मलती, संस्कृति और संस्कार देती चलो।
जब ऐसा कभी हो आपका उल्लासों से या
दूसरों के किसी स्वेच्छाचार से उत्क्रमण से तुम बढ़ते रहो।

जल प्रलय तुम्हारा हिलकोर मारते उठे,
तब हे स्रोतस्विनी तुम कृतघ्नी ख्याति नाशिनी भीषण,
काल-प्रवाहिनी बन जाना।
हमें सब अंगीकार है यह भी,
उसी में रेणुका से होकर फिर बिछुड़ेंगे हम।

बसेंगें हम कहीं न कहीं फिर पैर रखेंगें,
कहीं पुन: फिर से खड़ा होगा नया अस्तित्व और स्वरूप।
हे मातु सरिते तुम उसे फिर से,
संस्कृति रीति नीति और संस्कार तुम ही देना।

♦ सतीश शेखर श्रीवास्तव `परिमल` जी — जिला–सिंगरौली, मध्य प्रदेश ♦

—————

  • “सतीश शेखर श्रीवास्तव `परिमल`“ जी ने, बहुत ही सरल शब्दों में सुंदर तरीके से समझाने की कोशिश की है — हम बचपन से सुनते आ रहे है की “जल ही जीवन है” जल के बिना जीवन की कल्पना भी मुश्किल है। जल के बिना कोई भी प्राणी जीवित नहीं रह सकता ये सभी जानते है। अगर ऐसी ही स्थिति बनी रही तो हमारे आने वाली नई पीढ़ी को जल मिलेगा ही नहीं। प्रदूषण, कल कारखानों के कारण बढ़ता ही चला जा रहा है। कल कारखानों से निकलता हुआ कचरा और विषाक्त पदार्थ नदियों और तालाबों में प्रवाहित कर दिए जाते है। जिससे पीने योग्य पानी भी विषाक्त होता जा रहा है। इंसानो ने अंधाधुन पेड़ों को काटा जिस कारण वर्षा का संतुलन बिगड़ गया पूर्ण धरा पर। अभी भी समय है संभल जाओ और सभी संकल्प करों की प्रत्येक वर्ष एक पेड़ जरूर लगाएंगे और उसका देखरेख करेंगे तब तक जब तक वह पेड़ अपना खुराक धरा से खुद न लेने लगे। जब हम सभी पेड़ लगाएंगे तो फिर से सभी नदियों में भरपूर पानी बहने लगेगा, और सभी का जीवन सुखमय होगा।

—————

यह कविता (सभ्यता और संस्कृति। – हम और हमारी नदी।) “सतीश शेखर श्रीवास्तव `परिमल` जी“ की रचना है। KMSRAJ51.COM — के पाठकों के लिए। आपकी कवितायें/लेख सरल शब्दो में दिल की गहराइयों तक उतर कर जीवन बदलने वाली होती है। मुझे पूर्ण विश्वास है आपकी कविताओं और लेख से जनमानस का कल्याण होगा।

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विश्व कविता दिवस।

Kmsraj51 की कलम से…..

♦ विश्व कविता दिवस। ♦

काव्य जगत।

धरणि के खंडों में विकसित अपनी-अपनी बोली,
हर साँस में बसी गंगा साहित्य काव्य की लहरी।

रंग बिरंगी आभा जिसकी मधुर-मधुर है वाणी,
प्रेम प्रीति बसी वक्ष में आकर्षित करती शैली।

चारण चाक्रिक भट्ट मंख भू जग में भरे सभी,
पावन पुनीत कोमल पल्लवन से सजे सभी।

हर्षित हो लिखें सभ्यता हृदय की भावों से भरी,
मसीपथ बनी आदर्श सभी की उत्कीर्ण करे मन की।

खलक जगत में कविता की मीठी-मीठी स्वर लहरी,
सुर-सरगम से सदा रची रहे विश्व जगत की ये बोली।

साहित्य सभ्यता संदर्प यहां कथन काव्य की जननी,
चिर-काल से संघर्ष समर करे वर्णाका मसी लेखनी।

♦ सतीश शेखर श्रीवास्तव `परिमल` जी — जिला–सिंगरौली, मध्य प्रदेश ♦

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  • “सतीश शेखर श्रीवास्तव `परिमल`“ जी ने, बहुत ही सरल शब्दों में सुंदर तरीके से समझाने की कोशिश की है — कविता दिल की एक सच्ची अनुभूति है, जो एक कवि के हृदय की गहराई से निकली हुई कृति है। भाव स्वरूप कविता तो होता है जीवन का एक प्रवाह, जो सदैव ही प्रेरित करता है कार्यशील होने के लिए। हृदय की गहराई से निकली हुई कृति में न तो होती उसमें कोई भी बनावट, होती बस दिल के उदगारों की सजावट है। याद रखें – केवल शब्दों को लयबद्ध करना ही नही काफी होता है, सार्थक अर्थ के बिना तो शब्दों के संग नाइंसाफी होता है। गहरे अर्थ लिए हुए शब्दों का इक आईना होती है कविता, जिसमें अति सुंदर भाव के साथ-साथ होता हर शब्द का मायना है। ये कविता प्रेम का गहरा समुद्र है, दरिया इश्क का भी, जिसमें करुणा, जज्बात का अहसास, मरहम होता अश्क का भी। कहते है इंसान जब भी इसमें खो जाए तो हर शह में ही कविता गुनगुनाए, फिर जज्बातों की कलम से सदैव ही ह्रदय पर भाव अंकित करता जाए।

—————

यह कविता (विश्व कविता दिवस। – काव्य जगत।) “सतीश शेखर श्रीवास्तव `परिमल` जी“ की रचना है। KMSRAJ51.COM — के पाठकों के लिए। आपकी कवितायें/लेख सरल शब्दो में दिल की गहराइयों तक उतर कर जीवन बदलने वाली होती है। मुझे पूर्ण विश्वास है आपकी कविताओं और लेख से जनमानस का कल्याण होगा।

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हर्षाती कविता।

Kmsraj51 की कलम से…..

♦ हर्षाती कविता। ♦

विश्व कविता दिवस पर।

कविता तो होता जीवन का एक प्रवाह है।
होता जिसमें हर भाव ही बस वाह है॥

कविता दिल की एक सच्ची अनुभूति है।
कवि के हृदय से निकली हुई कृति है॥

न तो होती उसमें कोई भी बनावट है।
होती बस दिल के उदगारों की सजावट है॥

केवल शब्दों को लयबद्ध करना ही नही काफी है।
सार्थक अर्थ के बिना तो शब्दों के संग नाइंसाफी है॥

गहरे अर्थ लिए हुए शब्दों का इक आईना है।
जिसमें अति सुंदर होता हर शब्द का मायना है॥

प्रेम का गहरा समुद्र है, दरिया इश्क का भी।
करुणा, जज्बात का अहसास, मरहम होता अश्क का भी॥

इंसान जब इसमें खो जाए हर शह में ही कविता गुनगुनाए।
फिर जज्बातों की कलम से ह्रदय पर भाव अंकित करता जाए॥

थाम कर कलम अपने लफ्ज़ो में किसी बात को कहना चाहे।
सच मानो दोस्तों स्वतः ही तैयार हो जाये लेखन की राहें॥

फिर हर किसी का दुख, सुख अपना लगता है।
लेखन उस मुकाम पर पहुँचा दे जो सपना लगता है॥

सभी कवियों के ह्रदय का करते हैं हम अभिनन्दन।
चेहरों पर खुशी लाने वाली हर कलम को मेरा वन्दन॥

♦ सुशीला देवी जी – करनाल, हरियाणा ♦

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  • “श्रीमती सुशीला देवी जी“ ने, बहुत ही सरल शब्दों में सुंदर तरीके से इस कविता के माध्यम से समझाने की कोशिश की है — कविता दिल की एक सच्ची अनुभूति है, जो एक कवि के हृदय की गहराई से निकली हुई कृति है। भाव स्वरूप कविता तो होता है जीवन का एक प्रवाह, जो सदैव ही प्रेरित करता है कार्यशील होने के लिए। हृदय की गहराई से निकली हुई कृति में न तो होती उसमें कोई भी बनावट, होती बस दिल के उदगारों की सजावट है। याद रखें – केवल शब्दों को लयबद्ध करना ही नही काफी होता है, सार्थक अर्थ के बिना तो शब्दों के संग नाइंसाफी होता है। गहरे अर्थ लिए हुए शब्दों का इक आईना होती है कविता, जिसमें अति सुंदर भाव के साथ-साथ होता हर शब्द का मायना है। ये कविता प्रेम का गहरा समुद्र है, दरिया इश्क का भी, जिसमें करुणा, जज्बात का अहसास, मरहम होता अश्क का भी। कहते है इंसान जब भी इसमें खो जाए तो हर शह में ही कविता गुनगुनाए, फिर जज्बातों की कलम से सदैव ही ह्रदय पर भाव अंकित करता जाए।

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यह कविता (हर्षाती कविता। – विश्व कविता दिवस पर।) “श्रीमती सुशीला देवी जी“ की रचना है। KMSRAJ51.COM — के पाठकों के लिए। आपकी कवितायें सरल शब्दो में दिल की गहराइयों तक उतर कर जीवन बदलने वाली होती है। मुझे पूर्ण विश्वास है आपकी कविताओं और लेख से जनमानस का कल्याण होगा। आपकी लेखन क्रिया यूं ही चलती रहे।

आपका परिचय आप ही के शब्दों में:—

मेरा नाम श्रीमती सुशीला देवी है। मैं राजकीय प्राथमिक पाठशाला, ब्लॉक – घरौंडा, जिला – करनाल, में J.B.T.tr. के पद पर कार्यरत हूँ। मैं “विश्व कविता पाठ“ के पटल की सदस्य हूँ। मेरी कुछ रचनाओं ने टीम मंथन गुजरात के पटल पर भी स्थान पाया है। मेरी रचनाओं में प्रकृति, माँ अम्बे, दिल की पुकार, हिंदी दिवस, वो पुराने दिन, डिजिटल जमाना, नारी, वक्त, नया जमाना, मित्रता दिवस, सोच रे मानव, इन सभी की झलक है।

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“सफलता का सबसे बड़ा सूत्र”(KMSRAJ51)

“स्वयं से वार्तालाप(बातचीत) करके जीवन में आश्चर्यजनक परिवर्तन लाया जा सकता है। ऐसा करके आप अपने भीतर छिपी बुराईयाें(Weakness) काे पहचानते है, और स्वयं काे अच्छा बनने के लिए प्रोत्साहित करते हैं।”

 

“अगर अपने कार्य से आप स्वयं संतुष्ट हैं, ताे फिर अन्य लोग क्या कहते हैं उसकी परवाह ना करें।”~KMSRAj51

 

 

 

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चिरायता अमृत आयुर्वेदिक औषधि।

Kmsraj51 की कलम से…..

♦ चिरायता अमृत आयुर्वेदिक औषधि। ♦

दुनिया की सबसे पुरानी औषधि को,
मंगल कामनाओं हेतु बताता हूं!
वैकल्पिकता से सीधे दूर ले जाता हूं,
मुख्य चिकित्सा प्रणाली समझाता हूं।

चिरायता मधुमेह जड़ से खत्म करे,
नीम के काढे से भी कडवा यह लगे।
इसमें कालमेघ का गुण है मिलता,
खून से संबंधित विकार दूर करता।

चिरायता का स्वाद होता है तीखा,
रक्त पित्त विकार के रामबाण सरीखा,
खुजली बवासीर में प्रयोग में लाएं,
कैंसर जैसे रोग में भी इसे अपनाएं।

लीवर में जब कभी सूजन आ जाए,
सोठ और चिरायता के साथ-साथ-
पुनर्नवा काढा बराबर प्रयोग में लाए,
वैद्य ने (से) संपर्क कर मरीज को पिलाएं।

नई कहानी गर जीवन में बनाने हो,
तुम्हें पुराने ज्वर से मुक्ति पानी हो!
शक्ति रूप में फिर शरीर दिखानी हो,
चिरायता के घूट लेकर सयाने हों।

जीभ पर मिलता न कोई स्वाद हो,
अपना मन जब कभी उदास हो!
उसी समय आप कीचन के द्वार हों,
तभी काढे से आपका सरोकार हो।

यदि मुख में बनती नहीं लार हो,
मुख से निकले दुर्गंध की बयार हो!
कुछ भी खाने से मन घबराता हो,
एक कप भर काढ़ा लाभ दिलाता है।

लीवर में जब निगेटिव कीटाणु हों,
काढ़े पीते ही नहीं नामो निशान हों!
मन पर नियंत्रण प्रसन्नता छा जाती,
दो चुटकी चिरायता जवानी लाती।

इसके अलावा अनिद्रा दूर करने वाला,
खुजली होने पर फायदा पहुंचाने वाला!
खांसी और हरात मे लाभदायक होता,
आधा कप काढ़ा सबको फायदा देता।

♦ सुखमंगल सिंह जी – अवध निवासी ♦

—————

— Conclusion —

  • “सुखमंगल सिंह जी“ ने, बहुत ही सरल शब्दों में सुंदर तरीके से इस कविता में समझाने की कोशिश की है — मधुमेह रोगी चिरायता के सूखे पत्तों का काढ़ा पीकर डायबिटीज से राहत प्राप्त कर सकते हैं। संक्रमण से लड़ने व बचाव के लिए चिरायता का सेवन काफी पुराने समय से किया जाता रहा है। इसमें मौजूद एंटीवायरल, एंटीबैक्टीरियल और एंटीफंगल गुण काफी मजबूत होते हैं, यह सामान्य सर्दी-जुकाम से राहत देने में काफी कारगर साबित होता है। चिरायता एक आयुर्वेदिक औषधि है, चिरायता का उपयोग आयुर्वेद में जड़ी-बूटी के तौर पर किया जाता है। यह शरीर को खून की कमी से भी बचा सकता है। इसकी पत्तियों में मौजूद विटामिन और खनिज हेमाटिनिक (Haematinic) का प्रभाव होता है। यह प्रभाव शरीर में खून को बनाने में सहायक हो सकता है, इसलिए एनीमिया के घरेलू उपचार में चिरायता का उपयोग प्राचीन काल से ही किया जा रहा है।

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sukhmangal-singh-ji-kmsraj51.png

यह कविता (चिरायता अमृत आयुर्वेदिक औषधि।) “सुखमंगल सिंह जी” की रचना है। KMSRAJ51.COM — के पाठकों के लिए। आपकी कवितायें, व्यंग्य / लेख सरल शब्दो में दिल की गहराइयों तक उतर कर जीवन बदलने वाली होती है। मुझे पूर्ण विश्वास है आपकी कविताओं और लेख से जनमानस का कल्याण होगा। आपकी कविताओं और लेख से आने वाली पीढ़ी के दिलो दिमाग में हिंदी साहित्य के प्रति प्रेम बना रहेगा। आपकी लेखन क्रिया यूं ही चलती रहे, बाबा विश्वनाथ की कृपा से।

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“स्वयं से वार्तालाप(बातचीत) करके जीवन में आश्चर्यजनक परिवर्तन लाया जा सकता है। ऐसा करके आप अपने भीतर छिपी बुराईयाें(Weakness) काे पहचानते है, और स्वयं काे अच्छा बनने के लिए प्रोत्साहित करते हैं।”

 

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होली।

Kmsraj51 की कलम से…..

♦ होली। ♦

(रंग, विचार, उल्लास)

सृष्टि संसार की अगम होती अति वृष्टि,
सजती संवरती निसर्ग ले पल्लव पुष्प आसंग।
चढ़ते माघ शुक्ल पक्ष पंचमी तिथि विशिष्ट,
बसंत राज का आगमन नव श्रृंगार का अहंग।

नए गुलाबी रंग पल्लव मन को मुग्ध करे,
प्रकृति सौन्दर्य प्रधान के त्रयी रंग कमाल।
कानन अगिन उजार दे टेसू पुहुप समान,
पीली साड़ी ओढ़े प्रमृत सदृश सजी धमाल।

आम्र मंजरी पुकारती गुलाब मालती प्रसून,
भटकते प्रियतम बन अलिमक भृंग समरेख।
विकल हो कोकिला करे कुहू-कुहू की टेर,
प्राणों को उद्वेलित करे फगुआ को देख।

वन वृक्षों की हरीतिमा मन को खींचे अपनी ओर,
आकर्षित करे पल-पल बालें गेहूँ-जौ की और बौर।
पतंगम गुंजन मधुकर कोकिला करे अति शोर,
देखो आया गली-गली रंग धुलिवंदन का अंदोर।

गीत गोविंद धमार की गायन वाद्य नृत्य विभोर,
कामिनी कानन यौवन फूटे उत्साह मस्ती चहुँओर।
प्रीति प्रेम त्याग की द्वेषरहित रहे ये संसार,
अन्न-घी-गुड़-दाव रंग से पितृतर्पण करते चहुँओर।

रंग अबीर गुलाल संग बजे फाग धमार की मृदंग,
धुलेंडी धुरड्डी, धुरखेल धूलिवंदन इसके नाम प्रतिष्ठ।
गीत गायन कर मिटाये कटुता द्वेष सब ये उद्वेग,
पेड़-पौधे, पशु-पक्षी मनुष्य उल्लास इससे यथेष्ट।

मंच (KMSRAJ51.COM) से जुड़े समस्त कवि/कवित्रियों को होलिका दहन एवं होली की शुभकामनायें।

♦ सतीश शेखर श्रीवास्तव `परिमल` जी — जिला–सिंगरौली, मध्य प्रदेश ♦

—————

  • “सतीश शेखर श्रीवास्तव `परिमल`“ जी ने, बहुत ही सरल शब्दों में सुंदर तरीके से समझाने की कोशिश की है — इस समय पतझड़ के बाद नए पतों का वृक्षों पर आना वन वृक्षों की हरीतिमा मन को खींचे अपनी ओर आकर्षित करे पल-पल बालें गेहूँ-जौ की और बौर पतंगम गुंजन मधुकर कोकिला करे अति शोर देखो आया गली-गली रंग धुलिवंदन का अंदोर। होली रंगों का ही नहीं सामाजिक भेदभाव मिटाने एवं सामूहिकता का पर्व भी है। होली बुराई पर अच्छाई के प्रतीक का पर्व भी है। इस बार हम होलिका दहन के साथ कोरोना वायरस का भी दहन करें तो फिर पहले की तरह सौहार्द्र पूर्ण वातावरण में एक-दूसरे से गले मिलते हुए होली मना सकेंगे। होली रंगों का त्योहार है और जीवन में रंग तभी तक हैं, जब तक परिवार-समाज सुरक्षित है।

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यह कविता (होली – रंग, विचार, उल्लास।) “सतीश शेखर श्रीवास्तव `परिमल` जी“ की रचना है। KMSRAJ51.COM — के पाठकों के लिए। आपकी कवितायें/लेख सरल शब्दो में दिल की गहराइयों तक उतर कर जीवन बदलने वाली होती है। मुझे पूर्ण विश्वास है आपकी कविताओं और लेख से जनमानस का कल्याण होगा।

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“स्वयं से वार्तालाप(बातचीत) करके जीवन में आश्चर्यजनक परिवर्तन लाया जा सकता है। ऐसा करके आप अपने भीतर छिपी बुराईयाें(Weakness) काे पहचानते है, और स्वयं काे अच्छा बनने के लिए प्रोत्साहित करते हैं।”

 

“अगर अपने कार्य से आप स्वयं संतुष्ट हैं, ताे फिर अन्य लोग क्या कहते हैं उसकी परवाह ना करें।”~KMSRAj51

 

 

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होली आगे भी आएगी।

Kmsraj51 की कलम से…..

♦ होली आगे भी आएगी। ♦

होली आगे भी आएगी,
गीत नये रचते जाएं।
दुश्मन से नहीं डरना,
जय घोष करते आएं।

अजी गुलामी की जंजीरें,
काटकर बाहर हम आए!
मलेक्षों को पूर्वजों ने सहा,
कैसे – कैसे तुम्हें बताएं।

बदनसीब बस्तियां सारी,
आजादी पर गुलामी भारी।
कच्ची मांस पे मारा मारी,
अस्मत बचाने की दुश्वारी।

जय घोष की करो तैयारी,
होली आई वा की दिवाली।

राह बबूल के कांटो के खारे,
नंगे पांव में गडते सब सारे।
बात-बात पर ठंड गन ठानी,
आशी पर भीस ही थे भारी।

किसका घर अब छूटेगा,
हौसला किसका टूटेगा।
कॉल मुहूर्तं कोसों दूर,
जय घोष पर नहीं छूट।

जय घोष की करो तैयारी,
होली आई वा दीवाली।

हत्या अपहरण और फूट,
भोला झोला पर भी लूट।
दरबार में ही होली मनाते,
खूंटी खुशियां टांगे जाते।

जीवन की बगिया में खड़ी,
च्छोभा अवसादों से भरी।
शासन अंग्रेजों का आया,
कचहरी व सड़क सजाया।

जय घोष की करो तैयारी,
होली आई पड़े ना भारी।

न्याय की उम्मीद जगाया,
मंदिरों पर छापा डलवाया।
राजा ऊपर कस दी नकेल,
चली जनता में फूट के खेल।

हम पर हमी से खेला कीना,
जगिया टैक्स आगे भी लीना।
मलिन घूम के फूट डलवाया,
राजावों के महलों तक आया।

जय घोष की करो तैयारी,
होली में कल्याण की बारी।

जाति पांति का जहर पिलाया,
हीरा मोती अपने घर पहुंचाया।
तब पूर्वजों ने बिगुल बजाया,
आजादी के लिए जान गंवाया।

हम सब सोचे मिली आजादी,
उस पर उसकी पारी – भारी।
वह अपना एजेंट यहां छोड़ा,
लूटा घर और तोड़ा मरोड़ा।

जय घोष की करो तैयारी,
होली आई अब की बारी।

उनके रास्तों को है बदलना,
समझ लो लोग हमें सुधारना।
ये सब हमको हैं भर माते,
शिक्षा के नाम पर लूट मचाते।

यह अपनी झोली भरते जाते,
सब जगह पेट्रोल पंप खुलवाते।
खेत में बबूल की कोशिश करते,
शब्द वाणी में गुलामी समझाते।

जय घोष की करो तैयारी,
होली हो या दिवाली प्यारी।

पिज्जा – बर्गर हमें खिलाते,
बीमारी हमारे घर दे जाते।
कदाचित फैक्ट्री वही चलाते,
मरीज बनाकर लूटते जाते।

फैशन शो के शहर बस आते,
रंग बिरंगी दृश्य दिखाती।
आतंकियों से भी हाथ मिलाते,
अपनी अपनी में हमें लड़वाते।

जय घोष की करो तैयारी,
होली आई सब कोई है भाई।

ऊर्जा अपनी बचा के रखना,
तिलक – आजाद नहीं भूलना।
जय घोष में आगे भी करना,
शरीर निरोगी हमको रखना।

चारु तरफ से सनक सवार,
कोरोना वायरस का प्रचार।
मास्क लगाकर चल ना यार,
दो गज की दूरी में ही प्यार।

जय घोष का भी करूं प्रचार,
होली आई है पावन त्यौहार।

♦ सुखमंगल सिंह जी – अवध निवासी ♦

—————

— Conclusion —

  • “सुखमंगल सिंह जी“ ने, बहुत ही सरल शब्दों में सुंदर तरीके से इस कविता में समझाने की कोशिश की है — पहले मलेक्षों को पूर्वजों ने सहा, फिर अंग्रेजो को भी सहा, आज भी कुछ गद्दार है जिन्हें सह रहे है सभी आखिर क्यों ? कब तक समझ आएगा सभी को ? कवि कहते है जय घोष की करो तैयारी, चाहे होली आई या दीवाली। 2000 वर्षों से लुटते आ रहे है सभी। अब भी समय है संभल जाओ नहीं तो ना ही होली/दीवाली मना पाओगे। पिज्जा – बर्गर जैसे गन्दी चीजे हमें खिलाते, बीमारी हमारे घर दे जाते। कदाचित फैक्ट्री वही चलाते फिर मरीज बनाकर हमे लूटते जाते। फैशन शो के शहर बस आते, फैशन के नाम पर भी हमे लूट ले जाते रंग बिरंगी दृश्य दिखाती ये फैशन शो। आतंकियों से भी हाथ मिलाते है ये अपनी अपनी में हमें लड़वाते। अब भी समय है संभल जाओ नहीं तो अपने घर व देश से भगाया जाएगा हमें। जय घोष का भी करूं प्रचार, होली आई है पावन त्यौहार।

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sukhmangal-singh-ji-kmsraj51.png

यह कविता (होली आगे भी आएगी।) “सुखमंगल सिंह जी” की रचना है। KMSRAJ51.COM — के पाठकों के लिए। आपकी कवितायें, व्यंग्य / लेख सरल शब्दो में दिल की गहराइयों तक उतर कर जीवन बदलने वाली होती है। मुझे पूर्ण विश्वास है आपकी कविताओं और लेख से जनमानस का कल्याण होगा। आपकी कविताओं और लेख से आने वाली पीढ़ी के दिलो दिमाग में हिंदी साहित्य के प्रति प्रेम बना रहेगा। आपकी लेखन क्रिया यूं ही चलती रहे, बाबा विश्वनाथ की कृपा से।

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“स्वयं से वार्तालाप(बातचीत) करके जीवन में आश्चर्यजनक परिवर्तन लाया जा सकता है। ऐसा करके आप अपने भीतर छिपी बुराईयाें(Weakness) काे पहचानते है, और स्वयं काे अच्छा बनने के लिए प्रोत्साहित करते हैं।”

 

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दिलों की मेलजोली यही है सच्ची होली।

Kmsraj51 की कलम से…..

♦ दिलों की मेलजोली यही है सच्ची होली। ♦

जीवन के बयार में, उड़ रही प्रेम की बोली,
लोग हो गए सेल्फिस वेल्फिस, तंग हो गई टोली।
नहीं रहा अब नाज और नखरा, कैद हो गई बोली,
बदल रही फिज़ा, खो रही दोस्तों की खोली।
प्यार के दो मीठे बोल के लिए, तरस रही आली,
दिल से दिलों की टोली, यही है सच्ची होली,
दिलों की मेलजोली यही है सच्ची होली।

जीवन पथ पर अग्रसर संघर्ष रूपी पथिक को,
न खाने की फुर्सत ही है, न अपनों के लिए वक्त।
इस आपाधापी ने संबंधों में घोला विष,
प्यार ने छोड़ी राह, कड़वाहटों ने दामन थामा।
साल भर के गीले शिकवे मिटाती, रंगों की लाली।
दिल से दिलों की टोली यही है सच्ची होली,
दिलों की मेलजोली यही है सच्ची होली।

रिश्तों में आई दरार भरती हमारी, रंगों की थाली,
हर चेहरे पर रंग चढ़ाती, खासियत है इसकी निराली।
हर सूखे चेहरे पर लाती, मुस्कान की लाली,
बड़ी निराली बड़ी सुहानी खुशियों की हमझोली।
दिल के ढीले तारों को कसकर, शरगम बजाती ताली,
दिल से दिलों की टोली यही है सच्ची होली,
दिलों की मेलजोली यही है सच्ची होली।

सादगी और विश्वास का प्रतीक है हमारी होली,
रंगों से रंग मिलकर, दोस्तों दुश्मन भी गले मिल जाते है।
का पावन संदेश जन जन तक फैलती,
भाईचारे संग दिलों का संगम, यही है इसकी बोली।
अनोखा अनूठा विश्वास से भरा है हमारी होली।
दिल से दिलों की टोली यही है सच्ची होली,
दिलों की मेलजोली यही है सच्ची होली।

♦ विवेक कुमार जी – जिला – मुजफ्फरपुर, बिहार ♦

मेरे प्रिय पाठकों सपरिवार तहे दिल से होली महापर्व की शुभकामनाएं।–KMSRAJ51

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• Conclusion •

  • “विवेक कुमार जी“ ने, बहुत ही सरल शब्दों में सुंदर तरीके से समझाने की कोशिश की है — होली रंगों का ही नहीं सामाजिक भेदभाव मिटाने एवं सामूहिकता का पर्व भी है। होली बुराई पर अच्छाई के प्रतीक का पर्व भी है। इस बार हम होलिका दहन के साथ कोरोना वायरस का भी दहन करें तो फिर पहले की तरह सौहार्द्र पूर्ण वातावरण में एक-दूसरे से गले मिलते हुए होली मना सकेंगे। होली रंगों का त्योहार है और जीवन में रंग तभी तक हैं, जब तक परिवार-समाज सुरक्षित है।

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यह कविता (दिलों की मेलजोली यही है सच्ची होली।) “विवेक कुमार जी” की रचना है। KMSRAJ51.COM — के पाठकों के लिए। आपकी कवितायें/लेख सरल शब्दो में दिल की गहराइयों तक उतर कर जीवन बदलने वाली होती है। मुझे पूर्ण विश्वास है आपकी कविताओं और लेख से जनमानस का कल्याण होगा।

आपका परिचय आप ही के शब्दों में:—

मैं एक शिक्षक हूं। मुजफ्फरपुर जिला, बिहार राज्य का निवासी हूं। शिक्षा से शुरू से लगाव रहा है। लेखन मेरी Hobby है। इस Platform के माध्यम से सुधारात्मक संदेश दे पाऊं, यही अभिलाषा है।

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होलिका दहन।

Kmsraj51 की कलम से…..

♦ होलिका दहन। ♦

होलिका दहन (छोटी होली)

हवाएं जब भी बहना,
देश की संस्कृत में रहना।
पर्वत आये अथवा घाटी,
गांव शहर वा नव परिपाटी।

वैदिक सिद्धांतों में चलना,
सबका तुम कल्याण करना।
रंगीन रास्ते भी आएंगे,
फुसलाकर वहां ले जाएंगे।

माया को उल्लंघन कर जाते,
संसार सागर से भी तर जाते।
साधक के साधना गर पल्लवित,
पापों से मुक्ति और त्रिगुणातीत।

पक्षपात रहित वह हो जाता,
जब भक्ति मार्ग में रम जाता।
जो घृणा – द्वेष करता रहता,
परमात्मा को प्राप्त नहीं होता।

भक्त प्रहलाद विष्णु में रमता,
असुराधिपति मात्र हाथ मलता।
हिरण्यकश्यप विष्णु से जलता,
भगवान से घोर शत्रुता करता।

प्रह्लाद पिता पर नहीं चलता,
विष्णु भक्ति में तत्पर रहता।
दानव पुत्र मात्र दानव न होता,
धर्मात्मा पुत्र धर्म परायण ही!

विष्णु कृपा से प्रहलाद हुआ महान,
उसकी हत्या का पिता किया प्लान!
दानव निज बहन को दिया यह काम,
शाल होलिका ने मिली एक वरदान।

भक्त प्रहलाद की कयाधु है माता,
विष्णु जी थे उसकी भाग्य विधाता।
जब माता ने मन से प्रभु को पुकारा,
तब प्रहलाद बचे होलिका हुई स्वाहा।

आग से बचाने में साल दिखाती करामात,
जिसे ब्रह्मा ने होलिका को दिया वर के साथ।
छल छद्म में उसने प्रहलाद को लिया गोद में,
भली-भांति बर्बरता के थी वह आगोश में।

लोक दिखाओ कार्य से ईश्वर होता रूस्ट,
ध्रुव प्रहलाद सूर तुलसी मीरा में दी प्रभु भक्ति।
जब विशाल अलाव में होलिका संग प्रहलाद को देखा,
हवा को तत्काल बुलावा विष्णु जी ने भेजा।

हवा के संग – संग शीतलता भी वहां तभी आईं,
देवलोक की अप्सराओं ने भी मधुरिम गीत सुनाई!
होलिका के ऊपर से शाल प्रहलाद के ऊपर ऊढ़ाई,
वही होलिका को जलाकर प्रहलाद की जान बचाई।

हिरण्यकश्यप शिव का करता था बड़ा तप,
भगवान शिव की प्रसन्नता से मिला उसको एक वर।
नाय आकाश नहीं पाताल में मारा जाएगा!
उसे ना ही जानवर ना ही मानव मार पाएगा।

आशूरा अधिपति हिरण्यकश्यप को मारने,
नरसिंह रूप में भगवान विष्णु प्रकट होकर आए।
प्राप्त वर को ध्यान में रखकर संहारक बन ढाये,
नरसिंह रूपी नाखून प्रहार कर नव जीवन में पहुंचाएं।

♦ सुखमंगल सिंह जी – अवध निवासी ♦

—————

— Conclusion —

  • “सुखमंगल सिंह जी“ ने, बहुत ही सरल शब्दों में सुंदर तरीके से इस कविता में समझाने की कोशिश की है — भक्त प्रह्लाद की विष्णु भक्ति व हिरण्यकश्यप के अहंकार को कविता के रूप में बताया हैं। होली रंगों का ही नहीं सामाजिक भेदभाव मिटाने एवं सामूहिकता का पर्व भी है। होली बुराई पर अच्छाई के प्रतीक का पर्व भी है। इस बार हम होलिका दहन के साथ कोरोना वायरस का भी दहन करें तो फिर पहले की तरह सौहार्द्र पूर्ण वातावरण में एक-दूसरे से गले मिलते हुए होली मना सकेंगे। होली रंगों का त्योहार है और जीवन में रंग तभी तक हैं, जब तक परिवार-समाज सुरक्षित है।

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यह कविता (होलिका दहन।) “सुखमंगल सिंह जी” की रचना है। KMSRAJ51.COM — के पाठकों के लिए। आपकी कवितायें, व्यंग्य / लेख सरल शब्दो में दिल की गहराइयों तक उतर कर जीवन बदलने वाली होती है। मुझे पूर्ण विश्वास है आपकी कविताओं और लेख से जनमानस का कल्याण होगा। आपकी कविताओं और लेख से आने वाली पीढ़ी के दिलो दिमाग में हिंदी साहित्य के प्रति प्रेम बना रहेगा। आपकी लेखन क्रिया यूं ही चलती रहे, बाबा विश्वनाथ की कृपा से।

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