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हिन्दी साहित्य

दुनिया का प्यारा – राष्ट्र का दुलारा – काशी का बना सहारा – सांसद हमारा।

Kmsraj51 की कलम से…..

♦ दुनिया का प्यारा – राष्ट्र का दुलारा – काशी का बना सहारा – सांसद हमारा। ♦

चर्चित लोकप्रिय नेता जननायक के रूप में उभरे नरेंद्र मोदी की कीर्ति जनता के हृदय में सहानुभूति जगाती रही। अधिकांश लोग नरेंद्र मोदी को राष्ट्र धारक और जननायक के रूप में देखने लगे। घर में आर्थिक अभावों के कारण भी वह किसी पर बोझ बन कर नहीं जीना चाहते थे। जीवन में बहुत सारी परेशानियां आई उन्हें काटते झाड़ते जीवन का रास्ता खोजा और अपने संपूर्ण हाथ बल से परिस्थितियों से संघर्ष करते हुए क्षितिज पर पहुंचे।

सारी दुनिया से मेल मिलाप करके वसुधैव कुटुंबकम का नारा लेकर विश्व बंधुत्व के लिए अलख जगाई। आज दुनिया उनकी ओर टकटकी लगाए देख रही है। यात्रा के बहुआयामी पड़ाव और उसके इस पद की स्वीकार्यता भारतीय समाज और लोकतंत्र की गौरव पूर्ण उपलब्धियों में से हैं।

संघर्षों के बाद यह ऊंचाई प्राप्त।

श्री नरेंद्र मोदी जी को अब्राहम लिंकन और एपीजे अब्दुल कलाम की तरह से संघर्षों के बाद यह ऊंचाई प्राप्त हुए। राष्ट्रीय निर्माण की उनके सपने और योजना में हम सभी भागीदार होकर भारत को फिर से सोने की चिड़िया जैसा बना सकते हैं। भारत में महान स्वप्न दृष्टा के रूप में भरनी वाले वास्तव उत्कृष्ट क्षमता हिंदी सपनों में व्याप्त है। गुजरात के उत्थान के उपरांत राष्ट्र निर्माण के लिए आगे आने वाले व्यक्ति के धनी विकसित मानसीकता का लिए हुए संपूर्ण विश्व पर अपनी छाप छोड़ने का काम किया।

स्वास्थ्य, शिक्षा सशक्तिकरण।

स्वास्थ्य, शिक्षा सशक्तिकरण के इस युग में टेक्नॉलाजी और विज्ञान में गहन रुचि रखने वाले कर्मयोगी की भांति कुशलता पूर्वक नेतृत्व करने की क्षमता रखते हैं। हिंदी साहित्य हृदय के अंदर धारण करने वाले प्रबल आशावादी होने के साथ – साथ वास्तविक आबादी और आदर्शवादी भी हैं। माता – पिता के प्रति उनकी चिंता और संस्कारों का उनके ऊपर उत्तम प्रभाव रखता है।

नरेंद्र मोदी ने अपने जीवन का निर्माण धरा से गुरुदेव तक जुड़ते हुए किया है। धरती के प्रति उनकी आस्था है वह धरा से जुड़े हुए इंसान है। यह सूझ – बूझ को ही विशेष महत्व देते हैं। अभाव में रहने के बावजूद उनका कहना था कि हमारे पिता और माता जी कभी अपने को निर्धन नहीं मानते।

स्मरण शक्ति के धनी।

अपनी ईमानदारी और परिश्रम के बल पर हुआ पूरे परिवार का भरण पोषण करने वाले रहे हैं। स्मरण शक्ति के धनी प्रतिभावान व्यतीत स्वयं सेवक राष्ट्र भावना लिए हुए भारत की धरती पर विचरण करते हुए सूर्य की किरणों की भांति चमकते हुए सितारे है मोदी जी।

मोदी जी के राजनीतिक उपलब्धियों पर प्रकाश डालें तो सन 2001 से 2013 तक मुख्यमंत्री काल में तमाम उपलब्धियां देश विदेश से प्राप्त हुआ है जिनका जिक्र इस आलेख में नहीं करेंगे।

पहले 25 अक्टूबर 2021 को काशी वासियों को 5189 करोड़ रुपए की 28 परियोजनाओं की सौगात जिसे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जी के हाथों से लोकार्पित होने हैं उन परियोजनाओं की सूची प्रस्तुत करता हूं।

इन 28 परियोजनाओं से काशी ही नहीं पूरा पूर्वांचल के माध्यम से पूरे प्रदेश का विकास होगा। 25 अक्टूबर 2021 को राजा तालाब के मेहदी गंज रिंग रोड किनारे आदरणीय श्री नरेंद्र मोदी जी की जनसभा का आयोजन है जिनमें परियोजना का लोकार्पण कार्यक्रम है।

काशी से 5189 करोड़ की सौगात का लोकार्पण —

  • काशी हिंदू विश्वविद्यालय में धनराज गिरि हास्टल ब्लाक निर्माण ₹• 28.78 (२८.७८) करोड़।
  • काशी हिंदू विश्वविद्यालय अगर हॉस्टल 200 सिटिंग रूम का निर्माण ₹• 28.78 (२८.७८) करोड़।
  • काशी हिंदू विश्वविद्यालय राजपूताना ग्राउंड में छात्र गतिविधि केंद्र ₹• 27.82 (२७.८२) करोड़।
  • विवेकानंद हॉस्पिटल के पीछे आवासीय अपार्टमेंट का निर्माण ₹• 40 (४०) करोड़।

रोड निर्माण (Road Construction) —

  • वाराणसी गोरखपुर एन एच – 28 (२८), ₹• 3509.14 (३५०९.१४) करोड़।
  • वाराणसी से विरनों गाजीपुर तक 72.15 किलोमीटर राजमार्ग।
  • राजा तालाब से वाजिदपुर हरहुआ मार्ग रिंग रोड फेज – 2 (२), ₹• 1011.29 (१०११.२९) करोड़।
  • छावनी से पड़ाव तक सड़क चौड़ीकरण ( वाराणसी) ₹• 18.66 (१८.६६) करोड़।
  • गोदौलिया से दशाश्वमेध घाट तक पर्यटन विकास लागत ₹• 10.78 (१०.७८) करोड़।

पुल (Bridge) —

  • वाराणसी के सेतु कोनिया सलारपुर वरुणा नदी पुल ₹• 26.21 (२६.२१) करोड़।
  • राजघाट से मालवीय पुल तक विकास कार्य ₹• 2.74 (२.७४) करोड़।
  • कालका धाम सेतु (बाबरपुर, कपसेठी, भदोही मार्ग) पुल कालिका धाम ₹• 19.14 (१९.१४) करोड़।

घाट (Pier) —

  • साढ़े ग्यारह घाटों का पुनरुद्धार ₹• 10.78 (१०.७८) करोड़।
  • शूलटंकेश्वर घाट का पर्यटन विकास कार्य ₹• 1.66 (१.६६) करोड़।
  • मारकंडेय महादेव घाट कैंची में गंगा नदी के तट पर घाट का निर्माण ₹• 5.14 (५.१४) करोड़।
  • गंगा गोमती संगम स्थल कैथी में संगम घाट का निर्माण ₹• 10.66 (१०.६६) करोड़।

कुंड / तालाब (Cistern/Pond) —

  • आठ कुंडों का सुंदरीकरण व संरक्षण कार्य ₹• 18.96 (१८.९६) करोड़।
  • चकरा तालाब का सुंदरीकरण व संरक्षण ₹• 2.59 (२.५९) करोड़।

नदी का चैनेलाइजेशन (Channelization of river) —

  • वरुणा नदी के चैनेलाइजेशन और नदी का विकास कार्य ₹• 201.66 (२०१.६६) करोड़।

मंडी (Mandi/Market) —

  • लाल बहादुर शास्त्री हाल और सब्जी मंडी बढ़िया का नवीनीकरण का कार्य ₹• 8.22 (८.२२) करोड़।

हॉस्पिटल (Hospital) —

  • आराजी लाइन के भादारसी में 50 बेड एक गीत आसमान हॉस्पिटल का निर्माण ₹• 6.41 (६.४१) करोड़।

पार्किंग (Parking) —

  • सर्किट हाउस परिसर में अंदर ग्राउंड पार्क का निर्माण लागत ₹• 26.77 (२६.७७) करोड़।
  • टाउन हॉल अंडर ग्राउंड पार्किंग और संरक्षण ₹• 23.31 (२३.३१) करोड़।

पशुधन एवं कृषि (Livestock and Agriculture) —

  • राजकीय पशुधन एवं कृषि क्षेत्र आराजी लाइन नवीनीकरण ₹• 1.70 (१.७०) करोड़।

औद्योगिक क्षेत्र (Industrial Area) —

  • चांदपुर और औद्योगिक क्षेत्र में आंतरिक अवस्थापना विकास कार्य ₹• 10.85 (१०.८५) करोड़।

गौ आश्रय केंद्र (Cow shelter center) —

  • बायो CNG प्लांट शहंशाहपुर गौ आश्रय केंद्र लागत ₹• 23 (२३) करोड़।

सीवर लाइन (Sewer Line) —

  • रामनगर में 10 एम एल डी एस टी पी और इंटर सेप्टर सीवर लाइन लागत ₹• 72.91 (७२.९१) करोड़।

हाल (Hall) —

  • स्वर्गीय गिरजा देवी सांस्कृतिक संकुल चौका घाट बहुउद्देशीय हाल का उन्नयन कार्य लागत ₹• 6.94 (६.९४) करोड़।
  • कैंट स्टेशन पर ड्यूटी सुविधा के लिए वी आई पी लाउज निर्माण ₹• 1.5 (१.५) करोड़।

माननीय मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ जी समीक्षा बैठक में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जी द्वारा लोकार्पित की जाने वाली परियोजनाओं की सूची से कुछ परियोजनाओं को बाहर किया गया है इसमें जंगम बाड़ी राजमंदिर और दशाश्वमेध वार्ड में स्मार्ट सिटी के तहत कराए गए काम का लोकार्पण अगले महीने होने की संभावना है।

मेहंदी गंज, वाराणसी में होने वाली प्रधानमंत्री जी की जनसभा को पूर्ण रूप से एस पी जी के कब्जे में रखा गया। वहां हेली पैड का निर्माण किया गया जिसपर प्रधानमंत्री सहित कई हेली का0 उतारने की व्यवस्था की गई।

भाषण (Speech) —

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जी ने मेंहदी गंज के मैदान में मंच से घाटी बनारसी अंदाज में अपना संबोधन शुरू किया। उन्होंने भाषण की शुरुआत हर हर महादेव के नारे से की। प्रधानमंत्री का जय घोष सुनते ही पंडाल में जनता भी हर हर महादेव का नारा लगाने लगी। पूरा पंडाल और आसपास डमरु के निनाद और हर-हर महादेव के नारे से गूंज उठा। आवाज आकाश में बुझने लगी चारों तरफ हर हर महादेव गूंजने लगा। प्रधानमंत्री जी को जनता से इजाजत मांगने पड़ी कि अब मैं बोलूं!

प्रधानमंत्री जी ने कहा काशी के सभी बंधु एवं भगिनी लोगन के प्रणाम बा ………!
दीपावली, देव दीपावली, अन्नकूट, भैया दूज और प्रकाश उत्सव आवे वाले डाला छठ की आप सब लोगन के बहुत – बहुत शुभकामना।

इस शुभ अवसर पर उन्होंने 64000 करोड़ रुपए की pm आयुष्मान हेल्थ इंफ्रास्ट्रक्चर मिशन का शुभारंभ किया। इसके जरिए देश के कोने कोने में इलाज के लिए पूरा सिस्टम विकसित किया जाएगा। रिसर्च संस्थानों को सशक्त बनाया जाएगा। इस सिस्टम को विकसित बनाने के बाद बीमारियों का पता लगाना आसान हो जाएगा। इसके अलावा 600 जिलो में क्रिटिकल केयर के लिए बेड तैयार होंगे।आत्मविश्वास और आत्मनिर्भरता का माहौल बनेगा।

नए मेडिकल कॉलेज के उद्घाटन का जिक्र करते हुए उन्होंने कहा कि आजादी के 70 साल में देश को जीतने डाक्टर नहीं मिले आने वाले 10 – 12 साल में उतने ही और डाक्टर मिलने जा रहे हैं।

लोकल फार वोकल का नारा।

उन्होंने कहा कि अभाव से आगे बढ़ना ही भारत की पहचान है। अपने संसदीय क्षेत्र काशी कों पदार्पण 28 बार के 28 वें लोकार्पण समारोह में काशी को सौगात देने के साथ एक बार फिर लोकल फार वोकल का नारा बुलंद किया। उन्होंने कहा सिर्फ इसे दीयों तक ही सीमित ना रखी जाए। जिसमें हमारे देश वासियों का पसीना लगा है, जिसके उत्पादन में मेरे देश की मिट्टी की सुगंध है, वह मेरे लिए लोकल है।

कलाकारों, कारीगरों और कपड़े के जादूगरी बिखेरने वाले गुण करूं।

यदि हमारी आदत बन जाएगी देश की निर्मित चीजों को खरीदने की। उससे उत्पादन भी बढ़ेगा और रोजगार भी। गरीबों को काम भी मिलेगा और काम हम सब मिलकर कर सकते हैं। यह पूरा क्षेत्र कलाकारों, कारीगरों और कपड़े के जादूगरी बिखेरने वाले गुण करूं के लिए जाना जाता है।

सरकारी प्रयास से पांच सालों में वाराणसी में खादी और कुटीर उद्योग के उत्पादन में 60% और बिक्री में 90 प्रतिशत तक की बढ़ोतरी हुई है। उन्होंने कहा एक बार मैं फिर देशवासियों से आग्रह करूंगा कि वह अपनी यहां देश की बनी हुई वस्तुओं का प्रयोग करने पर ध्यान दें।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जी पहली बार 7 नवंबर 2014 को पहली दौरे पर बड़ा लालपुर मेरी फिसलटी सेंटर और टेक्सटाइल सेंटर की सौगात से बनारस के विकास को गति देने की शुरुआत की थी। हर एक दौड़ी में उन्होंने अपने संसदीय क्षेत्र वाराणसी को हजारों करोड़ की सौगात के साथ जनता से मिलते रहे।

एक छोटी सी रचना प्रस्तुत करने की कोशिश कर रहा हूं —

“जिसके अंदर प्रभु वास,
महाराज मांधाता सा हाथ।
हरिश्चंद्र सा त्याग भरा हो,
वह काशी को देता सौगात।

लोकार्पण के साथ-साथ,
मन में शिव का ध्यान।
विश्व बंधुत्व भावना जिसकी,
जन जन का रखता मान।

त्रिदेवों का जिसके सर हाथ,
उसकी बुद्धि में धरा उद्धार।
निकला करने आया उपकार,
जैसा चाहे वह करी विचार।”

प्रधानमंत्री ने कहा आज मैं काशी की धरती से 130 करोड़ देशवासियों को, हिंदुस्तान के कोने-कोने को, हिंदुस्तान के शहर को, हर किसी को बहुत-बहुत बधाई देता हूं। काशी आध्यात्मिक के साथ-साथ ग्रामीण अर्थव्यवस्था का भी एक अहम केंद्र है। काशी सहित संपूर्ण पूर्वांचल के किसान की उपज को देश विदेश के बाजार तक पहुंचाने के लिए बीते साल में सुविधाएं विकसित गई है।

काशी में परियोजनाओं की सौगात देकर 2014 ई. में अस्सी घाट से स्वच्छता अभियान की शुरुआत और बड़ा लालपुर मेरे फिसलती सेंटर की नींव रखी थी।

इसी प्रकार सन 2015 ईस्वी में काशी हिंदू विश्वविद्यालय ट्रामा सेंटर को देश को समर्पित किया था। इसकी साथ 45 हजार करोड़ रुपए की भवन डेवलपमेंट की शुरुआत की। सन 2016 ईस्वी में पंडित मदन मोहन मालवीय कैंसर सेंटर, हॉस्पिटल की आधारशिला रखी। सन 2018 ई. में 900 करोड रुपए की काशी के विकास कार्यों का तोहफा दिया। सन 2019 ईस्वी में काशी श्री काशी विश्वनाथ धाम की आधारशिला रखी और 15 जुलाई 2021 के दौरान प्रधानमंत्री ने 1500 करोड़ से अधिक की परियोजनाओं का लोकार्पण और शिलान्यास किया था।

दीपावली से पहले आई आई टी काशी हिंदू विश्वविद्यालय में साथ और शिक्षकों को बड़ी सौगात दी। छात्र हॉस्टल, छात्र गतिविधि केंद्र और शिक्षकों के लिए आवासीय अपार्टमेंट का लोकार्पण भी मेहदी गंज, सभा स्थल से प्रधानमंत्री जी ने किया। प्रधानमंत्री के सभा स्थल के पास ही राष्ट्रीय राजमार्ग वक्त इससे संबंधित प्रोजेक्ट की प्रदर्शनी लगाई गई थी।

कोनियां बरुना नदी पर पुल का उद्घाटन होने से आवागमन के लिए यह मार्ग खुल गया, जिसे लगभग 25 से अधिक गांवों को विशेष लाभ हुआ। जिन गांवों को इसका विशेष लाभ होगा उसमें बरियासनपुर, रमना, कमौली, रमचंदीपुर, गोबरहा, दीनापुर, शंकरपुर, सलारपुर, मोकलपुर आदि गांव शहर से सीधे जुड़ जाएंगे।

रामनगर में लंबे समय से ही जल – मल समस्या से जनता गुजर रही थी। नगर महा-पालिका रामनगर से निकलने वाले जल – मल को गंगा में गिरने से समस्या दूर होगी। सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट लगने के बाद ही बरखा शोधन कर पानी को सिंचाई के कार्य में लिया जाएगा। और कचरा से खाद का निर्माण किया जाना है। जैसे रामनगर की जनता को राहत मिल सकती है।

शहंशाहपुर में बायो CNG गैस प्लांट लगने से पास के किसानों से गोबर खरीदा जाएगा। जिससे किसानों का आर्थिक लाभ होगा। इस प्लांट से CNG गैस बनाई जाएगी साथ ही खाद भी तैयार किया जाएगा। जैविक खाद प्रयोगशाला के साथ जैविक खाद प्रशिक्षण की सुविधा भी उपलब्ध कराया गया।

इन सभी परियोजना के केंद्र में प्रधानमंत्री द्वारा काशी में प्रथम आगमन पर पूर्वांचल के साथ उपचार होती रही है उसको इनमें रखकर बहुत बड़ा कार्य हुआ है और आगे भी इस तरह के कार्य होने की संभावनाएं हैं। ऐसा लगता है कि प्रधानमंत्री जी के मिशन में पूर्वांचल का भी अपना एक महत्व पूर्ण स्थान है। पूर्वांचल को उन्होंने महत्व दिया है। भारत को आत्मनिर्भर बनने की दिशा में काम बढ़ रहा है।

ज़रूर पढ़ें — इतिहास में मोदी को किस लिए जाना पहचाना जाएगा?

♦ सुखमंगल सिंह जी – अवध निवासी ♦

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— Conclusion —

  • “सुखमंगल सिंह जी“ ने, बहुत ही सरल शब्दों में सुंदर तरीके से इस लेख में समझाने की कोशिश की है — नरेंद्र दामोदरदास मोदी जी के द्वारा किये गए पूर्वांचल के विकास के महान कार्यों का वर्णन किया है, इन कार्यों के लिए इतिहास में नरेंद्र मोदी जी को सदैव ही याद रखा जायेगा। ऐसा लगता है कि प्रधानमंत्री जी के मिशन में पूर्वांचल का भी अपना एक महत्व पूर्ण स्थान है। पूर्वांचल को उन्होंने महत्व दिया है। भारत को आत्मनिर्भर बनने की दिशा में काम बढ़ रहा है। दुनिया का प्यारा – राष्ट्र का दुलारा – काशी का बना सहारा – सांसद हमारा। काशी का विस्तार हो, सड़क व ब्रिजों का निर्माण, हॉस्पिटल का निर्माण हो, उनका विस्तार किया जाना। इस तरह से बहुत सारे कार्यों के लिए इतिहास में नरेंद्र मोदी जी को सदैव ही याद रखा जायेगा। आओ हम सब मिलकर एक नए भारत के निर्माण में अपना अमूल्य सहयोग दे।

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यह लेख (दुनिया का प्यारा – राष्ट्र का दुलारा – काशी का बना सहारा – सांसद हमारा।) “सुखमंगल सिंह जी” की रचना है। KMSRAJ51.COM — के पाठकों के लिए। आपकी कवितायें / लेख सरल शब्दो में दिल की गहराइयों तक उतर कर जीवन बदलने वाली होती है। मुझे पूर्ण विश्वास है आपकी कविताओं और लेख से जनमानस का कल्याण होगा। आपकी कविताओं और लेख से आने वाली पीढ़ी के दिलो दिमाग में हिंदी साहित्य के प्रति प्रेम बना रहेगा। आपकी लेखन क्रिया यूं ही चलती रहे, बाबा विश्वनाथ की कृपा से।

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हिन्दी को राष्ट्रभाषा बनाने की जरूरत।

Kmsraj51 की कलम से…..

♦ हिन्दी को राष्ट्रभाषा बनाने की जरूरत। ♦

किसी भी देश के गौरव के वैभव की गाथा यदि समग्र रूप से कोई गा सकता है तो वह है उस देश की राष्ट्रभाषा का स्वरूप। बड़े खेद के साथ कहना पड़ता है कि हमारे भारत देश की आज दिन तक कोई राष्ट्रभाषा निर्धारित ही नहीं हो सकी। भारत देश को आजाद हुए आज 7 दशक से ज्यादा समय हो चुका है परंतु इस देश की विडंबना देखिए कि अभी तक हम इस देश के गौरव का गुणगान करने वाली इसकी मातृ भाषा हिंदी को न्याय नहीं दिला सके।

हिंदी भाषा को राजनीति का शिकार बना दिया।

सन 1949 में अगर इस दिशा में कार्य कुछ हुआ भी तो वह भी अधूरा ही हुआ। भारत के अधिकतर लोगों द्वारा बोली जाने वाली और समझी जाने वाली हिंदी भाषा को राजनीति का शिकार बना दिया गया और इसे इस देश की अपनी भाषा होने के बावजूद विदेशी भाषा अंग्रेजी के समकक्ष भारत की मात्र राजभाषा ही स्वीकार किया गया।

यह सत्य किसी से छुपा नहीं है कि जब आर्यवर्त या जंबूद्वीप की राष्ट्रभाषा संस्कृत हुआ करती थी तो इस देश का अपना एक समृद्ध साहित्य था और उस भाषा में लिखित नाना प्रकार की विधाओं के ज्ञान विज्ञान थे। उस भाषा के बल पर भारत विश्व गुरु की उपाधि से सुसज्जित था।

उस समस्त ज्ञान-विज्ञान का लाभ मात्र भारतवासी ही नहीं लेते थे बल्कि उनका लाभ प्राप्त करने के लिए हयुत्संग और फाह्यान जैसे लोग विदेशों से भारत के प्रतिष्ठित विश्वविद्यालय में शिक्षा ग्रहण करने आते हैं। समय बदला ,परिस्थितियां बदली, भारत पर हूणों,मंगोलों,डचों,तुर्कों, अफगानों आदि ने अपने आक्रमण किए।

भारत के इस गौरवशाली वैभव को धीरे-धीरे तोड़ने मरोड़ने की कोशिश।

भारत के इस गौरवशाली वैभव को धीरे-धीरे तोड़ने मरोड़ने की कोशिश की गई। 1000 ईसवी के आसपास शौरसेनी और अर्धमाग्धी अपभ्रांशों से विकसित हिंदी का स्वरूप स्वतंत्र रूप से साहित्यिक क्षेत्र में दिखने लगा। साहित्य संदर्भों में प्रयोग होने वाली यही भाषाएं बाद में विकसित होकर आधुनिक भारतीय आर्य भाषाओं के रूप में अभिहित हुई।

इस बीच भारत में मुगलों का आगमन हुआ। मुगल भारत में स्थाई रूप से बस गए। इससे पूर्व के आक्रमणकारी आक्रमण करते रहे और यहां से पुनः स्वदेश लौटते रहे। परंतु मुगल शासकों ने जिस तरह से भारतीय राजनीति को अपने हाथों में ले लिया, उससे भारत में अपभ्रंशों से विकसित एवं पलवित होने वाली हिंदी का स्वरूप हिंदुस्तानी में बदल गया।

यह सच है कि 1000 ईसवी के आसपास डिंगल पिंगल का बोलबाला भारतीय साहित्य में रहा हिंदी साहित्य का आदिकाल अधिकतर इसी दौर का है। मध्यकाल तक भक्ति साहित्य का वैभव हिंदी की विभिन्न उप भाषाओं ने कुछ यूं सुसज्जित कर दिया कि उसे चाह कर भी हम सदियों तक भुला नहीं सकते।

मिश्रित भाषा।

रीतिकाल तक आते-आते मुगल शासकों की शासकीय कामकाज की भाषा अरबी फारसी होने के कारण भारतीय जनमानस की आमजन भाषाएं उसमें मिश्रित हो गई जिस मिश्रित भाषा को हिंदुस्तानी का नाम दिया गया। जो भारतीय जनमानस की भाषा अपना एक राष्ट्रीय नया स्वरूप तैयार कर रही थी उसने एक नया मोड़ ले लिया। अर्यवर्त या जंबूद्वीप की राष्ट्रभाषा संस्कृत का प्रभाव धीरे- धीरे क्षीण होने लगा और हिंदुस्तानी ने अपना प्रभाव दिखाना शुरू कर दिया। जो हिंदी शौरसेनी और अर्धमाग्धी से 1000 ईस्वी के आसपास विकसित हुई थी उसको राष्ट्रभाषा का दर्जा नहीं मिल सका।

हिन्द – यूरोपीय भाषा।

हिन्द – यूरोपीय भाषा परिवार से होती हुई हिंदी – ईरानी, हिन्दी – आर्य, संस्कृत, केंद्रीय क्षेत्र (हिन्दी), पश्चिमी हिंदी , हिंदुस्तानी और खड़ी बोली से हिंदी का रूप लेने वाली वर्तमान हिंदी भाषा लगभग 18वीं शताब्दी में मूलतः अस्तित्व में आई। इस नव विकसित हिंदी भाषा के स्वरूप को देवनागरी में ही लिखा जाने लगा जो संस्कृत की मानक लिपि थी और है।

भारतेंदु और द्विवेदी युग।

भारतेंदु और द्विवेदी युग ने इस नव विकसित भाषा को और दृढ़ता प्रदान की। हिंदी भारतीय साहित्य की एक मानक भाषा उभर कर सामने आई। भारतीय जनमानस की इस भाषा ने धीरे – धीरे भारत के अधिकतर प्रांतों में अपना अधिकार जमाया। इस बीच भारत में शासन कर रहे अंग्रेजों ने भी अपनी राष्ट्रीय भाषा अंग्रेजी के प्रचार – प्रसार में भारत में कोई कसर नहीं छोड़ी।

पुरातन वैदिक गुरुकुल परंपरा को खंडित कर नवीन शिक्षा नीति।

1936 में लार्ड मैकाले ने भारत की पुरातन वैदिक गुरुकुल परंपरा को खंडित कर नवीन शिक्षा नीति को इस उद्देश्य से स्थापित किया कि भारत के लोगों को न तो ठीक से हिंदी समझ में आ सके और न ही अंग्रेजी ही समझ में आ सके। अपने शासन को चलाने के लिए उन्हें सस्ते लिपिकों की जरूरत थी, जिन्हें तैयार करने में वे लगभग सफल भी हुए।

धीरे – धीरे तथाकथित अंग्रेजी शिक्षित भारतीयों के भीतर भी अंग्रेजी का ऐसा भूत सवार हुआ कि थोड़ी बहुत अंग्रेजी जान लेने के बाद वह अपने आपको अंग्रेजी का विद्वान समझने लगे और जो हिंदी बोलने वाला आम भारतीय था उसको तुच्छ एवम हेय समझने लगे। यह चलन भारत के आजाद होने तक इतना बढ़ गया था कि सरमायादार लोग दूर देशों में जाकर के अपने बच्चों को अंग्रेजी की तालीम लेने के लिए भेजने लगे।

फिर वे चाहे हिंदू थे या मुस्लिम। इस प्रक्रिया में सभी अपने देश की मातृभाषा हिंदी के वजूद को स्थापित करना ही भूल गए, जबकि भारत की आजादी के वक्त तक हिंदी में बहुत कुछ लिखा जा चुका था जो भारत के गौरव गान के लिए किसी भी दृष्टि से कम नहीं था। इस दृष्टि से शायद 1949 में हिंदी को राष्ट्रभाषा स्वीकार करने की मुहिम तेज हुई थी परंतु वहां हिंदी को पुनः राजनीति की भेंट चढ़ा दिया गया और हिंदी को मात्र राजभाषा का दर्जा दिया गया।

इसके पीछे साजिश शायद यह भी रही हो कि भारत के जो तथाकथित अंग्रेजी शिक्षित लोग मानसिक रूप से अभी भी अंग्रेजों के गुलाम ही थे, उन्होंने जानबूझकर यह चालाकी की हो कि हिंदी जानने और बोलने वाले लोगों के ऊपर राज करने के लिए यदि अंग्रेजी भाषा को हिंदी के समकक्ष रखा जाए तो अच्छा रहेगा। उससे उन तथाकथित अंग्रेजी शिक्षित सरमायादारों की संतानें भारत की हिंदी भाषी जनता पर शासन करती रही और भारत की हिंदी भाषी आम जनता उनकी सेवा करती रही।

भले ही अंग्रेज भारत से चले गए थे परंतु अंग्रेजी के मानसिक रूप से गुलाम ये भारतीय अंग्रेज लंबे समय तक भारत की इस हिंदी भाषी जनता को मूर्ख बनाने में कामयाब रहे। अब यदि यह कहा जाए कि आप की बात अतिशयोक्ति हो गई है तो मैं स्पष्टीकरण जरूर देना चाहूंगा।

क्यों राजभाषा होने के बावजूद भी भारत की न्यायिक व्यवस्थाओं के पत्राचार, राजस्व विभाग सम्बन्धी पत्राचार और चिकित्सीय व्यवस्था संबंधित शिक्षा प्रणाली हिंदी भाषा में न की गई? क्या यह एक सोचा समझा षड्यंत्र नहीं था? या फिर इसलिए कि आम जनमानस की जन भाषा में यदि इन व्यवस्थाओं की बातों को लिख दिया जाएगा या पढ़ा दिया जाएगा तो फिर तथाकथित अंग्रेजी शिक्षित लोग और उनकी संतान लोगों को मूर्ख बनाने में कामयाब कैसे हो पाएगी? उनकी रोजी रोटी कैसे चल पाएगी?

खैर कुछ भी हो, आज परिस्थितियां कुछ और ही है। आज हिंदी सिर्फ भारत के ही अधिकतर क्षेत्र में नहीं बोली जाती परंतु वैश्विक धरातल पर इसने अपनी एक विशेष पहचान बना ली है। इसलिए आज यह बहुत जरूरी हो जाता है कि हिंदी को राष्ट्रभाषा का दर्जा दिया जाए। यह सिर्फ आधारहीन एवं तथ्य से हटकर बात नहीं है बल्कि इसके पीछे एक बहुत लंबी – चौड़ी तथ्यपरक बातों की सूची है: —

  1. 2011 की भारतीय जनगणना के अनुसार भारत की 57.1% जनता हिंदी को बोल और समझ सकती है। जिसमें 43.63% भारतीयों ने तो हिंदी को अपनी मातृभाषा ही घोषित किया है। यह एक प्रबल आधार है कि भारत की अधिकतर जनता हिंदी बोलती है और समझती है। इस दृष्टि से हिंदी को अब भारत की राष्ट्रभाषा घोषित कर देना चाहिए ताकि भारत का आम नागरिक वैधानिक, प्रशासनिक, कार्मिक, व्यवहारिक और शैक्षिक आचार – विचारों को अपनी भाषा में प्राप्त कर सकें।
  2. हिंदी भाषा बिहार, छत्तीसगढ़, हरियाणा, हिमाचल प्रदेश, झारखंड, मध्य प्रदेश, राजस्थान, उत्तराखंड, जम्मू और कश्मीर के साथ – साथ उत्तर प्रदेश तथा दिल्ली आदि जनसंख्या बाहुल्य क्षेत्रों की मात्र संपर्क भाषा ही नहीं है बल्कि वाच बाहुल्य के साथ – साथ यहां इन क्षेत्रों की रोजमर्रा की व्यवसायिक भाषा भी है।
  3. आज हिंदी सिर्फ भारत में ही नहीं बोली जाती है परंतु भारत के साथ-साथ कई अन्य देशों में भी इसे बोलने और समझने वालों की संख्या कम नहीं है। एक आंकड़े के मुताबिक हिंदी को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर बोली जाने वाली भाषाओं में दूसरा दर्जा प्राप्त है। आज हिंदी पाकिस्तान, भूटान, नेपाल, बांग्लादेश, श्रीलंका, मालदीव, मंयांमार, इंडोनेशिया, सिंगापुर, थाईलैंड, चीन, जापान, ब्रिटेन, जर्मनी, न्यूजीलैंड, दक्षिण अफ्रीका, मारीशस, यमन, युगांडा, त्रिनाड एण्ड टोबैगो, कनाडा, अमेरिका तथा मध्य एशिया आदि कई देशों में बोली जाती है और समझी जाती है। यदि देखा जाए तो आज हिंदी लगभग 80 करोड से ज्यादा लोगों के द्वारा बोली और समझी जाती है।
    — इन देशों में से चीन में 6, जर्मनी में 7, ब्रिटेन में 4, अमेरिका में 5, कनाडा में 3, रूस, इटली, हंगरी, फ्रांस और जापान में 2 – 2 विश्वविद्यालयों में आज हिंदी पढ़ाई जाती है। एक आंकड़े के मुताबिक लगभग 150 के करीब – करीब विश्वविद्यालय में अंतरराष्ट्रीय स्तर पर आज हिंदी को पढ़ाया जा रहा है। ऐसे में भारत को हिंदी को अपनी राष्ट्रीय भाषा घोषित करने में आखिर दिक्कत ही क्या है? भारत से बाहर के लोग आज हिंदी में कई सत्संग और अध्यात्म की चर्चाएं सुनने और समझने भारत में आते हैं और भारत से बाहर हमारे हिंदी भाषी मनीषियों को हिंदी में सत्संग और चर्चा परिचर्चा करने के लिए अपने देशों में ले जाते हैं। बहुत से विदेशी लोग बाहर से आकर भारत में भी हिंदी को समझने और जानने का प्रयास कर रहे हैं। ऐसे में निश्चित है की हिंदी में कुछ तो खास है जो इसे समझने की और जानने की इतनी लालसा गैर हिंदी भाषी लोगों में भी निरंतर बढ़ती जा रही है। फिर भारतवासी और भारत की राजनीतिक शक्तियां क्यों हिंदी को राष्ट्रभाषा बनाने से परहेज कर रही है?
  4. पाठकों की जानकारी के लिए यह भी बताना उचित समझ रहा हूं कि आज सरकार हिंदी को संयुक्त राष्ट्र की आधिकारिक भाषा बनाने के लिए तो प्रयास कर रही है परंतु अपने देश में हिंदी को राष्ट्रभाषा का दर्जा देने की ओर कोई भी ठोस कदम ठीक से नहीं उठाया जा रहा है।वैसे यूनेस्को की 7 भाषाओं में हिंदी पहले से ही शामिल है, परंतु फिर भी सरकार का इसे संयुक्त राष्ट्र की आधिकारिक भाषा बनाने के लिए प्रयास निरंतर जारी है।
  5. इतना ही नहीं विश्व आर्थिक मंच की गणना के अनुसार हिंदी विश्व की 10 शक्तिशाली भाषाओं में से एक है। यह बात भी अंतरराष्ट्रीय व्यापारिक आचार व्यवहार की दृष्टि से हिंदी को राष्ट्रभाषा का सम्मान देने की पैरवी पुरजोर करती है। यदि हिंदी को अंतर्राष्ट्रीय व्यापार की भाषा में मानक रूप प्राप्त हो जाता है तो निश्चित ही भारत के व्यापार एवं आर्थिक मोर्चों में भी हिंदी अपनी अहम भूमिका निभाएगी। परंतु इसके लिए हिंदी को राष्ट्रभाषा का दर्जा देना बहुत ही जरूरी है।
  6. एथ्नोलॉग के अनुसार हिंदी विश्व की तीसरी सबसे अधिक बोली जाने वाली भाषा है। यह बात भी हिंदी को भारत की राष्ट्रभाषा बनाने के लिए प्रबल सहयोग करती है। यह बात उन तथाकथित अवधारणाओं का भी खंडन करती है कि ‘अंग्रेजी विश्व की भाषा है, इसलिए इसे महत्व देना जरूरी है। हिन्दी तो कहीं स्टैण्ड ही नहीं करती।’इतना ही नहीं हिंदी व संस्कृत की लिपि को संगणकीय टंकण प्रणाली में वैज्ञानिक लिपि भी सिद्ध कर लिया गया है। ऐसे में हिन्दी को भारत में यूं नकारना कहीं से भी ठीक नहीं है।
  7. इधर आबूधाबी में हिंदी को 2019 में अपने वहां न्यायालय की तीसरी भाषा घोषित कर दिया गया है। परंतु एक भारत है कि अपने ही देश की मातृभाषा को राष्ट्रभाषा का दर्जा देने के मामले में संजीदगी नहीं दिखा रहा है।

कई बातें हैं जो हिंदी को राष्ट्रभाषा बनाने की जरूरत को स्पष्ट करती है।

ऐसी कई बातें हैं जो हिंदी को राष्ट्रभाषा बनाने की जरूरत को स्पष्ट करती है परंतु यह सब भारत की राजनीतिक शक्तियों की इच्छाशक्ति पर निर्भर करता है। आज भारतवासियों की हालत यह हो गई है कि भले ही हम अंग्रेजी में एम ए क्यों ना हो परंतु जब बात करने की बारी हो तो वह हिंदी में ही की जाती है। यह जरूर है कि कुछ लोग अपना रौब झाड़ने के लिए उस हिंदी में अंग्रेजी मिक्स कर देते हैं परंतु वह खिचड़ी न ही तो ठीक से हिंदी का मान – सम्मान कर पाती है और न ही तो अंग्रेजी का। बात यह नहीं है कि हमें अंग्रेजी से नफरत है।

अंग्रेजी को भी पढ़ा जाना चाहिए और समझा जाना चाहिए। हर भाषा का मान – सम्मान करना हमारे देश की संस्कृति रही है परंतु किसी भी देश के उत्थान एवं विकास के लिए उस देश की अपनी राष्ट्रभाषा का होना नितांत आवश्यक होता है। देश कितनी भी तरक्की कर लें, परंतु जब तक उसके पास अपनी राष्ट्रभाषा नहीं है तब तक उस तरक्की का कोई औचित्य नहीं रह जाता।

Conclusion:

अपने राष्ट्र के गौरवशाली इतिहास को ही न भूल बैठे।

कहीं ऐसा न हो कि हम हिंदी का तिरस्कार करते – करते अपने राष्ट्र के गौरवशाली इतिहास को ही भूल बैठे। यदि हिंदी को राष्ट्रभाषा बनाने की जरूरत नहीं है तो फिर क्यों वे सारे कारोबार हिंदी में किए जाते हैं जिनसे राष्ट्रीय खजाने में निरंतर बढ़ोतरी होती रहती है।

उदाहरण के लिए फिल्मी कारोबार हिंदी में ही किया जाता है। आम जनमानस से संपर्क साधने के लिए राजनीतिक पार्टियां हिंदी में ही अपनी बातचीत करती है।अधिकतर समाचार पत्र – पत्रिकाएं तथा चैनल सब हिन्दी में ही कार्य करते हैं। बस हिंदी में अगर कुछ होता नहीं है तो वह सरकारी कार्यालयों का पत्राचार नहीं होता है। न जाने क्यों इतना महत्व सरकारी पत्राचार में अंग्रेजी को दिया जाता है जब कि हिंदुस्तान आज आजाद हो चुका है।

हमारे भारत के जन समुदाय में एक ट्रेंड सा बन चुका है कि पड़ोसी का बच्चा अंग्रेजी स्कूल में पढ़ने जा रहा है तो मैं भी अपने बच्चे को अंग्रेजी स्कूल में ही पढ़ाऊंगा। भले ही वह वहां कुछ सीखे या न सीखे परंतु सोसाइटी की नकल करना हमारी आदत बन गई है। जबकि सत्य यह है कि बच्चा जो कुछ अपनी मातृभाषा में सीखता है वह किसी दूसरी भाषा में नहीं सीख सकता परंतु एक हम है कि अपनी जिद पर अड़े हुए हैं।

हां वर्तमान सरकार ने एक मेहरबानी जरूर की है कि राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 में अंग्रेजी को पांचवी तक मात्र एक विषय के रूप में पढ़ाने का प्रावधान किया है न कि माध्यम के रूप में। परंतु क्या हिंदी को राष्ट्रभाषा बनाए बिना इस प्रकार के प्रयासों का भी कोई महत्व सिद्ध हो सकेगा या नहीं? इस बात पर हमें आत्म चिंतन और मंथन करने की नितांत आवश्यकता है।

♦ हेमराज ठाकुर जी – जिला मण्डी, हिमाचल प्रदेश ♦

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  • “हेमराज ठाकुर जी“ ने, बहुत ही सरल शब्दों में सुंदर तरीके से समझाने की कोशिश की है — अंग्रेजो से आजादी के इतने वर्षों बाद भी हिंदी भाषा को राष्ट्रभाषा की मान्यता आधिकारिक रूप से क्यों दर्ज नही हुआ, हिंदी को उसका सम्मान क्यों नहीं मिला? हिन्दी राष्ट्रभाषा के महत्व, गुणों और प्रभाव को बताया है। हिन्दी हर भारतीय के दिल से निकलने वाली भाषा हैं। हिन्दी भाषा दिल को दिल से जोड़ने का कार्य करती है। एकलौती हिन्दी भाषा ही है जिसमे अपनापन है दुनिया की किसी भी अन्य भाषा अपनापन का स्थान नहीं।

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यह लेख (हिन्दी को राष्ट्रभाषा बनाने की जरूरत।) “हेमराज ठाकुर जी” की रचना है। KMSRAJ51.COM — के पाठकों के लिए। आपकी कवितायें/लेख सरल शब्दो में दिल की गहराइयों तक उतर कर जीवन बदलने वाली होती है। मुझे पूर्ण विश्वास है आपकी कविताओं और लेख से जनमानस का कल्याण होगा।

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चौथ के चाँद।

Kmsraj51 की कलम से…..

♦ चौथ के चाँद। ♦

प्रिय चौथ के चाँद,

हर वर्ष की भांति इस वर्ष भी मैं आपका तहे दिल से धन्यवाद प्रदान करती हूं। कि कार्तिक माह की चतुर्थी को यदि उषा की स्वर्णिम किरणे जीवन के अनंत रूपों की पर्याय हैं। तो निशाकर की शीतलता और पवित्र किरणें एक बार फिर मेरे जीवन में प्रेम का उदय कर रही है। तो इसलिए एक बार फिर से तहे दिल से धन्यवाद प्रदान करती हूं।

अब आप यह प्रश्न मत उठाना कि पहले क्या जीवन में प्रेम नहीं था। प्रेम था, प्रेम है, प्रेम रहेगा। लेकिन आप की उपस्थिति में मुझे मेरा चाँद अति प्रिय लगता है। आप तो जानते ही हैं ना कि एक स्त्री का जीवन कितना भागदौड़ वाला होता है। अगर पूरे वर्ष में से एक दिन वह इत्मीनान से अपने चाँद का दीदार करना चाहती है। तो उसके लिए आपकी उपस्थिति अति आवश्यक है। परस्पर विश्वास, त्याग और समर्पण को आप की शीतल छाया में और भी मजबूती मिलती है। और हां सुनो देह की सुंदरता को तो सभी निहारते हैं।

लेकिन आज तो मेरी रूह नवयौवन के भाँति श्रृंगार कर फिर से दुल्हन जो बनती है उसके लिए आपका शुक्रिया। ना जाने पूरे वर्ष कितने ही ऐसे पूरे और अधूरे वादे होते हैं जो प्रेम की रंगीन छाया में पलना चाहते हैं।

लेकिन किन्ही कारणों वश वह पूरे नहीं हो पाते हैं ऐसे ही कुछ पूरे ओर अधूरे वादों को मैं आज आपकी चांदनी किरणों से बांधकर अपने चाँद के समक्ष उर में समाहित कर उन्हें समर्पण की दहलीज़ पर रखूंगी। और विश्वास की रंगीन मौली में बांधकर उन्हें मन की चौखट पर नजरबट्टू के साथ टाँग दूँगी ताकि उसे किसी की भी नजर न लगे। औऱ हाँ जब सूर्योदय से लेकर चंद्रोदय तक मेरे निर्जल व्रत को जब आप कि शीतल छाया में मेरा चाँद मेरे अधरों को अमृत रूपी जल से तृप्त करता है तो वो वह मात्र मेरी प्यास ही तृप्त नहीं करता करता अपितु मेरी आत्मा तक को संतृप्त कर देता है।

जिस प्रकार मेहंदी का अर्थ “रंग” नहीं “रचना” होता है ठीक उसी प्रकार करवाचौथ सिर्फ एक साधारण व्रत न होकर सृष्टि की सर्वोत्तम रचनाओं को एक करने का पवित्र बंधन होता है।

जो अपने सुहाग की लंबी उम्र के लिए प्रतिपल कामना करता है।
हे चौथ! के चांद बस आपसे यही कामना है आप अपना स्नेह व प्यार सभी करवाओ पर बनाये रखे और सप्त-पदी के संकल्प को सात जन्मों के साथ वाले इस अनुष्ठान को पूरा करना का सभी को सामर्थ्य प्रदान करे।

बस एक अंतिम बात थोड़ा जल्दी निकल आना॥
॥ शुभ करवा चौथ ॥

♦ कविता पाल जी – नई दिल्ली ♦

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  • “कविता पाल जी“ ने, बिलकुल ही सरल शब्दों का प्रयोग करते हुए उदाहरण के माध्यम से समझाने की कोशिश की हैं — स्त्री (नारी) और प्रकृति अनंत ऊर्जा से संपन्न है। स्त्री की गोद में उत्थान और पालन होता है नई पीढ़ी का। पति-पत्नी के पवित्र रिश्ते को और अधिक मजबूती देने वाले पर्व करवा चौथ के बारे में विस्तार से बताया है। तेरी चंद्र कलाओं से भी सुंदर, सजने का इनका सलीका होगा। चाँद और नारी के गुणों व पति के प्यार संग सोलह श्रृंगार का सुंदर मधुर वर्णन किया है। पति-पत्नी एक दूसरे के पूरक होते है इसलिए संगनी का आधार, पिया का गुरुर, बनाता संबंध मजबूत। एक दूसरे का कर सम्मान, अर्धनारीश्वर यही कराता भान, जीवन संगनी के प्यार से संघर्षमय जीवन, हो जाता आसान।

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यह लेख (चौथ के चाँद।) ” कविता पाल जी “ की रचना है। KMSRAJ51.COM — के पाठकों के लिए। आपकी कवितायें/गीत/दोहे/लेख सरल शब्दों में दिल की गहराइयों तक उतर कर जीवन बदलने वाली होती है। मुझे पूर्ण विश्वास है आपकी दोहे/कविताओं और लेख से आने वाली नई पीढ़ी और जनमानस का कल्याण होगा। आपकी लेखन क्रिया यूँ ही चलती रहे जनमानस के कल्याण के लिए, माता रानी की कृपा से।

नाम : कविता पाल
शिक्षा : पुस्तकालय विज्ञान में D.LIS, B.LIS, और M.LIS
PG Diploma in YOGA.

शौक : अध्यापन, लेखन, समाज सेवा द्वारा महिलाओं की स्थिति में जागरूकता लाना।

— अपने बारे में कुछ शब्द साहित्यिक गतिविधियां काव्य लेखन, गद्य लेखन एवं फेसबुक के विभिन्न साहित्यिक समूहों में सक्रिय सहभागिता रहती है अतः सक्रिय लेखक सम्मान एवं पुरस्कार भी प्राप्त हुए हैं।
— मेरे द्वारा फेसबुक पर अनमोल अल्फाज नामक पेज का संचालन भी किया जाता है। जिसका एकमात्र उद्देश्य समाज में मेरी कविताओं द्वारा महिलाओं एवं अन्य क्षेत्र में जागरूकता का कार्य करना है।

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शैलपुत्री : माँ दुर्गा की पहली शक्ति की पावन कथा।

Kmsraj51 की कलम से…..

♦ शैलपुत्री : माँ दुर्गा की पहली शक्ति की पावन कथा। ♦

एक बार जब प्रजापति ने यज्ञ किया तो इसमें सारे देवताओं को निमंत्रित किया, भगवान शंकर को नहीं। सती यज्ञ में जाने के लिए विकल हो उठीं। शंकरजी ने कहा कि सारे देवताओं को निमंत्रित किया गया है, उन्हें नहीं। ऐसे में वहां जाना उचित नहीं है।

सती का प्रबल आग्रह देखकर शंकरजी ने उन्हें यज्ञ में जाने की अनुमति दे दी। सती जब घर पहुंचीं तो सिर्फ माँ ने ही उन्हें स्नेह दिया। बहनों की बातों में व्यंग्य और उपहास के भाव थे। भगवान शंकर के प्रति भी तिरस्कार का भाव है। दक्ष ने भी उनके प्रति अपमानजनक वचन कहे। इससे सती को क्लेश पहुंचा। वे अपने पति का यह अपमान न सह सकीं और योगाग्नि द्वारा अपने को जलाकर भस्म कर लिया।

इस दारुण दुःख से व्यथित होकर शंकर भगवान ने उस यज्ञ का विध्वंस करा दिया। यही सती अगले जन्म में शैलराज हिमालय की पुत्री के रूप में जन्मीं और शैलपुत्री कहलाईं। पार्वती और हेमवती भी इसी देवी के अन्य नाम हैं। शैलपुत्री का विवाह भी भगवान शंकर से हुआ। शैलपुत्री शिवजी की अर्द्धांगिनी बनीं। इनका महत्व और शक्ति अनंत है।

♦ विजयलक्ष्मी जी – झज्जर, हरियाणा ♦

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  • “विजयलक्ष्मी जी“ ने, बिलकुल ही सरल शब्दों का प्रयोग करते हुए समझाने की कोशिश की हैं — इस कथा के द्वारा माँ शैलपुत्री और भगवान शंकर जी के जीवन का उदाहरण देकर एक अच्छी पत्नी के कर्त्तव्य को समझाया है। एक अच्छी पत्नी के दिल में अपने पति के लिए सम्मान का क्या महत्व है, और अपने पति के सम्मान के लिए एक अच्छी पत्नी किसी भी हद तक जा सकती है। एक अच्छी पत्नी अपने पति के सम्मान के लिए किस हद तक त्याग कर सकती है।

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यह कविता (शैलपुत्री : माँ दुर्गा की पहली शक्ति की पावन कथा।) “विजयलक्ष्मी जी” की रचना है। KMSRAJ51.COM — के पाठकों के लिए। आपकी कवितायें सरल शब्दो में दिल की गहराइयों तक उतर कर जीवन बदलने वाली होती है। मुझे पूर्ण विश्वास है आपकी कविताओं और लेख से जनमानस का कल्याण होगा। आपकी लेखन क्रिया यूं ही चलती रहे।

आपका परिचय आप ही के शब्दों में:—

मेरा नाम विजयलक्ष्मी है। मैं राजकीय प्राथमिक कन्या विद्यालय, छारा – 2, ब्लॉक – बहादुरगढ़, जिला – झज्जर, हरियाणा में मुख्य शिक्षिका पद पर कार्यरत हूँ। मैं पढ़ाने के साथ-साथ समाज सेवा, व समय-समय पर “बेटी बचाओ – बेटी पढ़ाओ” और भ्रूण हत्या पर Parents मीटिंग लेकर उनको समझाती हूँ। स्कूल शिक्षा में सुधार करते हुए बच्चों में मानसिक मजबूती को बढ़ावा देना। कोविड – 19 महामारी में भी बच्चों को व्हाट्सएप ग्रुप से पढ़ाना, वीडियो और वर्क शीट बनाकर भेजना, प्रश्नोत्तरी कराना, बच्चों को साप्ताहिक प्रतियोगिता कराकर सर्टिफिकेट देना। Dance Classes प्रतियोगिता का Online आयोजन कराना। स्वच्छ भारत अभियान के तहत विद्यालय स्तर पर कार्य करना। इन सभी कार्यों के लिए शिक्षा विभाग और प्रशासनिक अधिकारी द्वारा और कई Society द्वारा बार-बार सम्मानित किया गया।

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इतिहास में मोदी को किस लिए जाना पहचाना जाएगा?

Kmsraj51 की कलम से…..

♦ इतिहास में मोदी को किस लिए जाना पहचाना जाएगा? ♦

क्या आपके मन में भी ये प्रश्न चलता है की आखिर — इतिहास में मोदी को किस लिए जाना पहचाना जाएगा ?

भारत अनेकानेक व्यवस्था और शासन प्रशासन से कार्य करते हुए आगे बढ़ता चला आया। परंतु आज हम जिस प्रधानमंत्री के बारे में लिखने की सोच रहे हैं वह पहले मुख्यमंत्री के रूप में 15 वर्षों तक गुजरात का मुख्यमंत्री रहा। मुख्यमंत्री काल की व्यवस्था और विकास तथा उपलब्धियों के बारे में हम बाद में बताना चाहते हैं। अभी हाल में Facebook पर BBC की एक पोस्ट में यह पूछा गया कि मोदी को किस लिए लोग जानेंगे।

हम यहां बता देना चाहते हैं कि नरेंद्र मोदी जी मानते है कि सपने देखने का हक़ सभी को है लेकिन सपने देखना सार्थक उसका है जो अपने सपने को हकीकत में बदलने का हिम्मत रखता है। इस प्रकार हकीकत में बदलने वाला भारत का नायक नरेंद्र दामोदरदास मोदी ने अपने काल में क्या-क्या परिवर्तन किया उसका आम जनता पर या असर पड़ेगा यह सब बताने के लिए शुक्ष्म तरीके से हम आपके सामने उपस्थित हुए हैं।

संपूर्ण देश दुनिया के लोग पर्यावरण प्रदूषण से परेशान हैं वही भारत का प्रधानमंत्री स्वच्छ भारत अभियान भारत में चलाकर देश को देश की जनता को जगाने का कार्य किया। यह सोच महात्मा गांधी ने सोचा था जिसे मोदी जी ने साकार रुप दिया। आसाम से कन्याकुमारी तक, उत्तर भारत से दक्षिण भारत तक। पूरी भारत को 15 अगस्त 2014 को लाल किले की प्राचीन से भारत के प्रधानमंत्री ने साकार होने का बिजन, कई तरह की योजनाओं का संकल्प लिया। 2 अक्टूबर 2014 को मोदी जी ने भारत को स्वच्छ करने का निर्णय महत्वपूर्ण लिया।

उन्होंने बाराणसी के अस्सी घाट पर स्थित प्राचीनकुड़ी के अंबार को अपनी हाथों से खुद खोद कर हटाने का कार्य प्रारंभ किया। सफाई का जो अभियान उन्होंने जगाया यदि ऐसा नहीं हुआ होता और 2014 के पहले कहीं कोरोना वायरस भारत में प्रवेश कर गया होता तो भारत में भयानक लोग मारे जाते। परंतु सौभाग्य था कि भारत में सफाई अभियान चल रहा था। नगर शहर सभी जगह स्वच्छ हो रहे थे।

गांव-गांव में शौचालय का निर्माण किया जा रहा था। लोग सौच करने शौचालय में जाया करते थे। रेलवे स्टेशनों पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जी के कार्यकाल के पहले लाइनों में गंदगी का अम्बार रहता था, जो आजकल साफ सुथरा दिखता है। Platform पर सफाई मशीनें लगा दी गई है चारों तरफ सभी नगर शहर प्लेटफार्म पर साफ सुथरा और चमचम करता हुआ स्टेशन दिखाई देता है।

सरकारी बैंकों के लोग चक्कर लगाया करती थी खाता खोलने के लिए दलालों के चक्कर में किसी तरह से खाता खुलवा मिलता था। न्यायालय का फैसला के लिए लोग चक्कर लगाया करते लोगों के जूते घिस जाते थे। खेती किसानी के लिए यूरिया खाद के लिए एक शहर से दूसरे शहर लोग किसी तरह से प्राप्त किया करते थे। सेना के साथ-साथ सभी कर्मचारी पूरे देश के अंदर खुश होकर दिखाई नहीं देते थे। जहां देखिए वही जिस प्रदेश में देखिए उस प्रदेश में ही घोटाला हो गया, घोटाला हो गया कि आवाज उठाती रही थी। सन 2014 में जनता ने पिछली सरकार से कुंभकर्ण की नींद से जगाने के लिए आगे आकर मोदी जी का भारत की जनता ने साथ दिया सहयोग किया।

उन्होंने अपने कार्यकाल में जो कार्य किए उन्हें हम सूक्ष्म रूप से प्रस्तुत करने का प्रयत्न कर रहा हूं …….

  • बिना जरूरी कानूनों का हटाया जाना।
  • आवश्यक नए कानून का निर्माण करना।
  • धारा 370 और 35 ए का खात्मा।
  • हलाला जैसी कुरीति को दूर करने का कानून बनाना।
  • तीन तलाक जैसी कुरीति का खात्मा।
  • राम मंदिर का निर्माण।
  • राम वन गमन परिपथ के लिए सहयोग।
  • विदेशों में भी मंदिर का निर्माण करना।
  • काशी का विस्तार।
  • सड़क, उनका विस्तार किया जाना।
  • ब्रिजों का निर्माण।
  • टनल का निर्माण/ विस्तार।
  • नई एम्स बनाया जाना।
  • हॉस्पिटल में ऑक्सीजन गैस की व्यवस्था करना।
  • हॉस्पिटल में प्रधानमंत्री योजना से ऑक्सीजन प्लांट लगाना।
  • कोरोना वैक्सीन का भारत में निर्माण किया जाना।
  • कोरोना महामारी से दुनियां को बचाने के लिए उन देशों को दवा का सप्लाई किया जाना।
  • कोरोना वैक्सीन अपने पड़ोसी देशों को भी देकर उनकी जान को बचाना।
  • भारतीय सीमा पर सड़कों का निर्माण करना।
  • सीमा पर टनल आदि का निर्माण करना।
  • भारत के अंदर हवाई अड्डे का निर्माण करना/विस्तार करना।
  • रेल लाइनों का विस्तार करना।
  • नई रेल का निर्माण करना।
  • नई रेल लाइन बिछाना।
  • नए मेट्रो रेल का चलाया जाना।
  • रोपवे का निर्माण कार्य कराना।
  • किसान क्रेडिट कार्ड का विस्तार करना।
  • किसानों को एक बरस में 6000 रुपये पेंशन के रूप सहयोग में देना।
  • किसान की खेती के लिए यूरिया खाद के कारखाने की व्यवस्था करना।
  • गरीब पेंशन की व्यवस्था करना।
  • बुजुर्ग पेंशन विधवा पेंशन आदि की व्यवस्था करना।
  • सबको गैस का चूल्हा उपलब्ध कराना।
  • गरीबों को गैस सिलेंडर देना।
  • जल परिवहन का चलाया जाना।
  • नदियों को जोड़ने की योजना, काम करना।
  • शौचालय का निर्माण कराया जाना।
  • गांव-गांव में शौचालय लिए अनुदान देना।
  • सड़क के किनारे शौचालय का निर्माण करना।
  • गरीबों को मुफ्त घर देना।
  • सबको पक्का घर की व्यवस्था की परिकल्पना।
  • घोटालेबाज पर, कड़ा कदम उठाना।
  • घर-घर गैस पहुंचाने की व्यवस्था करना।
  • पूरे भारत में गैस की किल्लत को दूर करना।
  • सभी नागरिकों का बैंक खाता खुलवाना।
  • डिजिटल पेमेंट की व्यवस्था करना।
  • ATM मशीनों को सुचारु रुप से काम करने का निर्देश देना।
  • गूगल का हिंदी करण (अनुवाद) आदि कराना।
  • विकिपीडिया का हिंदी करण।
  • Facebook का हिंदी करण आदि।
  • मनरेगा में सुधार करना।
  • भारत में ही मिसाइल बनाने का कार्य करना।
  • रिसर्च इंस्टीट्यूट का बढ़ाया जाना।
  • वैज्ञानिकों को विशेष सम्मान देना।
  • सेना को सम्मान देना उनकी आवश्यकताओं की पूर्ति करना।
  • सेना को आवश्यकताओं के अनुसार निर्णय लेने का अधिकार देना।
  • सेना को वन रैंक वन पेंशन की व्यवस्था करना, आदेश देना।
  • आत्मनिर्भर भारत पर कार्य करना। अमली जामा पहनाना।
  • भारत में ही लड़ाकू विमान का निर्माण करना।
  • भारत में ही Brand LOGO का निर्माण करना।
  • भारत में ब्रह्मोस, अग्नि मिसाइल का नया वर्जन तैयार करना। आगे भी शोध बढ़ाना।
  • DRDO द्वारा आकाश प्राइम मिसाइल को तैयार करना।
  • भारत में ही बने आकाश प्राइम मिसाइल को देश के कोने – कोने में तैनात करना।
  • सेना को भरपूर सहयोग देना।
  • स्वास्थ्य कर्मियों का सम्मान करना।
  • तीनों सेनाओं को मिल कर भी संयुक्त क्षमता प्रदान करना।
  • विश्व में भारत का है स्थान नाम यश आगे बढ़ाने का काम करना।
  • संयुक्त राष्ट्र संघ में भारत के प्रधानमंत्री का भाषण हिंदी में देना।
  • भारत के प्रधानमंत्री का विश्व के अनेकों देशमुख द्वार सम्मानित किया जाना।
  • अभिव्यक्ति की आजादी देना।
  • अनरगल बयानबाजी करने वालों को भी अपनी बातों को रखने का अधिकार देना।
  • अमेरिका, रूस, फ्रांस, इजराइल Sea भारत की सुरक्षा के लिए ड्रोन, लड़ाकू विमान आदि सेना के Weapon मगाना आदि।

अभी इस लेखनी के कुछ अंश रूप में हमने नरेंद्र मोदी जी के कार्यों की, का वर्णन किया। बहस साधारण परिवार में जन्मे नरेंद्र मोदी जी ने भारत में राष्ट्र भक्ति के कारण, देश और समाज के कल्याण के लिए महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। उन्होंने भारत के उन तमाम नेताओं को यह बता दिया कि किस तरह से शासन सत्ता चलाया जा सकता है।

लोगों के कल्याण के लिए इस तरह से काम करना चाहिए। देश को आगे बढ़ने के लिए उसे आगे बढ़ाने के लिए तेज गति से काम करने की आवश्यकता होती है। जिसके अंदर जितनी क्षमता होती है वह उतना ही ज्यादा काम कर सकता है। यह भी सच है कि मनुष्य के अंदर सोचने की विचार कर सकने की अलग-अलग शक्ति होती है। परंतु यह भी सच है कि समय आपका इंतजार नहीं कर सकता जो समय पर चूक जाता है वह समय पुनः वापस नहीं आता। दुनिया तरक्की के मार्ग पर आगे बढ़ती जा रही हो, ऐसे में भारत कैसे पीछे रह सकता है यह सोच लेकर नरेंद्र मोदी जी ने मेहनत के साथ परिश्रम के साथ कार्य किया। जन भागीदारी और जन विश्वास को उन्होंने समझा सिथिल हो रही सरकार को उन्होंने जगाया।

प्राकृतिक संसाधनों की तरफ अपना ध्यान लगाया। देश की संस्थान को मजबूत करने का हर संभव प्रयास किया। धरोहर को सुसज्जित करने का प्रयास किया। महापुरुषों को उचित सम्मान देने का प्रयत्न किया।

उनका मानना था कि पहले धोने, शुद्ध होने के बाद ही पूजा पाठ कर सकते हैं। इसी भावना को लेकर उन्होंने पूरे देश में शौचालय की जरूरत को समझा। उन्होंने माना कि शरीर की शुद्धि बहुत जरूरी है। वह एक कुशल राजनीतिज्ञ व्यक्ति हैं जो अपने जीवन में राजनैतिक घटनाओं से परेशान कभी नहीं हुआ है। परेशानी की स्थिति में उनके तेवर कुछ अलग ही दिखाई देते हैं। कभी आक्रामक रवैया अपना लेते जाते हैं और कभी नरम। इतना सो तय है कि वह गलत बात को बर्दाश्त कम करते हैं।

♦ सुखमंगल सिंह जी – अवध निवासी ♦

—————

— Conclusion —

  • “सुखमंगल सिंह जी“ ने, बहुत ही सरल शब्दों में सुंदर तरीके से इस लेख में समझाने की कोशिश की है — नरेंद्र दामोदरदास मोदी जी के द्वारा किये गए महान कार्यों का वर्णन किया है, इन कार्यों के लिए इतिहास में नरेंद्र मोदी जी को सदैव ही याद रखा जायेगा। चाहे वो तीन तलाक जैसी कुरीति का खात्मा की बात हो या धारा 370 और 35 ए का खात्मा। बिना जरूरी कानूनों का हटाया जाना और आवश्यक नए कानून का निर्माण करना। राम मंदिर का निर्माण या राम वन गमन परिपथ के लिए सहयोग। काशी का विस्तार हो, सड़क व ब्रिजों का निर्माण, उनका विस्तार किया जाना। इस तरह से बहुत सारे कार्यों के लिए इतिहास में नरेंद्र मोदी जी को सदैव ही याद रखा जायेगा। आओ हम सब मिलकर एक नए भारत के निर्माण में अपना अमूल्य सहयोग दे।

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यह लेख (इतिहास में मोदी को किस लिए जाना पहचाना जाएगा ?) “सुखमंगल सिंह जी” की रचना है। KMSRAJ51.COM — के पाठकों के लिए। आपकी कवितायें / लेख सरल शब्दो में दिल की गहराइयों तक उतर कर जीवन बदलने वाली होती है। मुझे पूर्ण विश्वास है आपकी कविताओं और लेख से जनमानस का कल्याण होगा। आपकी कविताओं और लेख से आने वाली पीढ़ी के दिलो दिमाग में हिंदी साहित्य के प्रति प्रेम बना रहेगा। आपकी लेखन क्रिया यूं ही चलती रहे, बाबा विश्वनाथ की कृपा से।

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“सफलता का सबसे बड़ा सूत्र”(KMSRAJ51)

“स्वयं से वार्तालाप(बातचीत) करके जीवन में आश्चर्यजनक परिवर्तन लाया जा सकता है। ऐसा करके आप अपने भीतर छिपी बुराईयाें(Weakness) काे पहचानते है, और स्वयं काे अच्छा बनने के लिए प्रोत्साहित करते हैं।”

 

“अगर अपने कार्य से आप स्वयं संतुष्ट हैं, ताे फिर अन्य लोग क्या कहते हैं उसकी परवाह ना करें।”~KMSRAj51

 

 

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दोषी कौन है?

Kmsraj51 की कलम से…..

♦ दोषी कौन है? ♦

स्कूलों में गर्मियों की छुट्टियां थी। नरपत काका के चारों बेटे खेतों में जी जान से जोर लगा रहे थे। उम्मीदें सब की ये थी कि इस बार खूब फसल होनी चाहिए। फसल से जो कमाई होगी, बाबा वह जरूर हमारी शिक्षा पर खर्च करेंगे।

नरपत काका अपना पेट मसोस मसोसकर बच्चों की अच्छी तालीम के हर संभव प्रयास करते रहते थे। प्राथमिक से लेकर कॉलेज तक की पढ़ाई। चार – चार बेटों का लाखों का खर्च। काका की दो चार बीघा जमीन से कैसे तैयार हो पाता ये तो वही जाने। काका का कोई सरकारी रोजगार भी तो नहीं है ना।

अबकी चारों कॉलेज से अच्छी डिग्रियां लेकर प्रशिक्षण की जिद पर अड़े हुए हैं। काका भी दिल से प्रशिक्षण कराने की सोचता है। जानता है प्रशिक्षण के बिना सरकारी नौकरियां नहीं मिलने वाली पर माली हालत इजाजत नहीं देती है।

बैंक में गिरवी

दो चार बीघा जमीन है, उसे बैंक में गिरवी रखकर बड़े वाले को शहर डिग्री के बाद प्रशिक्षण हेतु भेज देते हैं। कुछ फसल का जुगाड़ था और कुछ बैंक से ले लिया। बाकी के तीनों को ढाढस बंधाता है। “बच्चों तुम अभी छोटे हो। भैया जब प्रशिक्षण पूरा कर लेगा ना तब तुम्हें भी बारी – बारी से मौका दूंगा।”

बाबा की आंखों की कोरों पर आते आंसुओं को देखकर सब सहमत हो जाते हैं। बड़े वाला साल भर का प्रशिक्षण लाखों का डोनेशन देकर जब घर लौटता है तब तक तीनों बेटों और बाप ने एड़ी चोटी का दम लगा कर बैंक का हिसाब-किताब चुकता कर दिया था।

वह तो कृषि कार्ड की लिमिट थी। उसी लिमिट से पैसा निकाल कर दूसरे को उसकी डिग्री के हिसाब से प्रशिक्षण को भेज दिया। उसका भी कुछ यूं ही निभा। इस बार दिक्कत कुछ ज्यादा रही। सूखे की मार फसलों से इतनी कमाई नहीं करवा पाई, जितना कि पिछली बार हुई थी। पर फिर भी आस पड़ोस में मेहनत मजदूरी करके सब लोगों ने मिलकर इस बार का खाता भी क्लियर कर लिया था। इसी कदर तीसरे का भी कुछ यूं ही बीता।

अब छुटकू की बारी थी।

अब छुटकू की बारी थी। उसकी जिद डॉक्टरी करने की थी। तीनों बड़े भाइयों ने भी नरपत काका को यह कह कर मना लिया “बाबा छुटकू ठीक कहता है। हमारे पूरे इलाके में कोई डॉक्टर नहीं है। छुटकू है भी तेज। कर लेने दो उसे डॉक्टरी। परिवार के साथ साथ सबका भला हो जाएगा।”

“तुम्हारी मत मारी गई है। लाखों का खर्चा होता है उस पर। कहां से आएगा इतना पैसा। कर लेने दो इसे भी कोई छोटा – मोटा डिप्लोमा। फिर ढूंढो कहीं नौकरियां? मेरे पास इतना पैसा नहीं है। “नरपत काका कुछ रूखे से बोले।

छुटकू आंगन की पीपल के नीचे बैठकर सुबकियां भर रहा है। तीनों बड़ों ने मान मनौती करके बाबा को मना लिया और छुटकू को डॉक्टरी के लिए भेज दिया। पर इस बार सौदा कुछ महंगा था। ऐसे में नरपत काका को अपनी दो चार बीघा जमीन से एक आध बीघा को जड़ से बेच देना पड़ा।

छुटकू के जाने के बाद नरपत काका और उनकी पत्नी उस दिन शाम को उसी पीपल के नीचे बैठे – बैठे बतिया रहे थे। “पगली आज मैंने अपनी मां को बेचा है। और करता भी क्या? बच्चों ने मजबूर कर दिया।” यह कहते – कहते नरपत काका की आंखों से अश्रुओं की धारा बहने लगी। उनके साथ काकी की आंखों से भी अश्रुपात होने लगा। पर बच्चों को देखकर दोनों हड़बड़ाहट में आंसू पोंछ लेते हैं।

छुटकू डॉक्टर

चारों बाप बेटों ने दिन रात मेहनत की। एक दिन छुटकू डॉक्टर बनकर के लौट आता है। घर में खुशी का माहौल है। नरपत काका और काकी बहुत खुश है। आस पड़ोस के लोग भी उन्हें बधाइयां देने लगे हैं।

“ओ यारा नरपत्या, हुन ता तू फ्री हुई गया भाई।” रामलू काका नरपत काका से कह रहे थे।

“क्येथी ओ यारा रमालू भाई? हजा ता इन्हा रे ब्याह रही गए।” नरपत काका माथे पर हाथ फेरते हुए कहते हैं।

सरकारी नौकरी का इंतजार

चारों बेटों ने सरकारी नौकरियां पाने के लिए लंबे समय तक इंतजार किया। पर कोई सरकारी नौकरी की अधिसूचना ही जारी नहीं हो पा रही है। एक दिन डॉक्टरी की पोस्टें भरने की अधिसूचना निकली भी थी। वह भी किसी कोर्ट केस के चलते रद्द कर दी गई।

बड़े वाले तीनों निजी कंपनियों में बहुत कम वेतनमान पर नौकरियां करने लगे हैं। हालत यह है कि शहरी जीवन में रहते – रहते उस वेतन से महीने भर के लिए अपने पेट का ही गुजारा नहीं होता। क्वार्टर का किराया, राशन – पानी, बिजली का भाड़ा और एक आध घर का चक्कर। बस सब उसी में खत्म। काका की हालत आज भी ज्यों की त्यों है।

बड़े वाले की शादी तय कर दी गई है। जेब में खर्चने को दमड़ी भी नहीं है। फिर से एक आध बीघा जमीन बेच दी जाती है। आज काका फिर से दुखी है।

एक दिन चारों भाई शाम को आंगन में बैठकर बतिया रहे हैं। “अरे भाई न जाने यह कैसी शिक्षा प्रणाली और व्यवस्था है? इतनी महंगी पढ़ाई हासिल कर भी ढंग की नौकरी ना ही तो सरकारी क्षेत्र में नसीब हो पाती है और ना ही निजी क्षेत्र में। सरकारें वादे तो बड़ी-बड़ी करती है, पर तोड़ती डक्का नहीं।” छुटकू बड़े तैश से बोल रहा था।

“हाथी के दांत खाने के और तथा दिखाने के और वाली कहावत है यह छुटकू। आखिर दोषी कौन?” सबसे बड़े वाले ने विलक्षण स्वरों से जवाब दिया।

इतने में अंदर से आवाज आती है, “अजी सुनते हो। खाना तैयार है।”
सब खाना खाने चले जाते हैं।

घोषणा: यह मेरी मौलिक, स्वरचित रचना है।

♦ हेमराज ठाकुर जी – जिला मण्डी, हिमाचल प्रदेश ♦

—————

ज़रूर पढ़ें — शिक्षक की महानता।

Conclusion — निष्कर्ष

  • “हेमराज ठाकुर जी“ ने, बहुत ही सरल शब्दों में सुंदर तरीके से इस छोटी कहानी के माध्यम से मिडिल क्लास के परिवारों के मजबूरी और समझ को बताने की बखूबी कोशिश की है। मिडिल क्लास परिवार किस कदर मेहनत कर बमुश्किल उच्च डिग्री हासिल करता है। उसके बाद भी उसे अच्छी नौकरी नही मिल पाती।

—————

यह छोटी कहानी (दोषी कौन है?) “हेमराज ठाकुर जी” की रचना है। KMSRAJ51.COM — के पाठकों के लिए। आपकी कहानी/कवितायें/लेख सरल शब्दो में दिल की गहराइयों तक उतर कर जीवन बदलने वाली होती है। मुझे पूर्ण विश्वास है आपकी कविताओं और लेख से जनमानस का कल्याण होगा।

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समय का सदुपयोग।

Kmsraj51 की कलम से…..

♦ समय का सदुपयोग। ♦

पुनः प्रभातं पुनरेव शर्वरी पुनः
शशांकः पुनरुद्यते रविः।
कालस्य किं गच्छति याति यौवनं
तथापि लोकः कथितं न बुध्यते॥

फिर से प्रभात, फिर से रात्रि, फिर से चंद्र, और फिर से सूरज का उगना ! काल का क्या जाता है ? कुछ नहीं; यह तो यौवन जाता है, फिर भी लोग कहाँ समझते हैं? आज हम सभी यांत्रिक युग में जी रहे हैं।

आज हमारे पास ऐसे ऐसे यंत्र हैं जो वे सभी काम कुछ ही पलों में कर देते हैं जिन्हें करने में हमारी पूर्व पीढ़ी को लम्बा समय लगता था। आश्चर्य तो इस बात का है कि तब लोगों के पास व्यायाम से लेकर त्योहारों, रिश्तेदारों, परंपराओं इत्यादि के लिए पर्याप्त समय था।

आज जब यंत्रों की सहायता से चुटकियों में काम हो जाते हैं फिर भी लोग कहते हैं कि उनके पास किसी भी बात तक करने के लिये समय नहीं है।

किन्तु मुझे ऐसा कहना उचित नहीं प्रतीत होता। मैं इस बात को इस तरह कहूँगी कि आज लोगों के पास समय ही समय है किन्तु समय का सदुपयोग करने का विवेक नहीं है।

कहा जाता है कि कुदरत किसी के साथ पक्षपात नहीं करती। सबको कुदरत के उपहार समान रूप से मिले हैं जैसे कि जल, वायु, धूप इत्यादि। परन्तु हमारी पारिवारिक, सामाजिक एवं भौगोलिक परिस्थितियों के चलते हमें ये प्राकृतिक उपहार भी कम या अधिक मात्रा में उपलब्ध हो सकते हैं।

इस जगत में केवल #समय ही एक ऐसा अनमोल उपहार है जिसमें कोई पक्षपात नहीं। राजा हो या रंक सबके पास अपने निजी २४ घंटे।

ये भी सही है कि समय एक ऐसा विमान है जो बिना ईंधन के लगातार उड़ता है परन्तु अच्छी बात ये है कि इस विमान के पायलट हम हैं। पायलट जितना कुशल होगा उड़ान उतनी अच्छी होगी।

काल कोई सा भी हो प्राचीन या वर्तमान, जब-जब जिसने समय खोया वो अन्त में पछताया ही है। प्राचीन काल की कहानियों में प्रायः निकम्मे – परिश्रमी, शेखचिल्ली – आलसी पात्र होते थे वे उस समय के लोगों को समय का महत्व बताने के लिये ही रचे गये होंगे।

पुरातन काल से लेकर अब तक के किसी भी व्यक्तित्व के बारे में यदि नज़दीक से जानेंगे तो हर एक सार्थक, प्रेरक व्यक्तित्व में यह एक विशेष गुण अवश्य मिलेगा कि उनकी सफलता और ओज का कारण उनका समय प्रबंधन रहा है।

जिसने समय साध लिया उसने लोक, परलोक अपना जीवन, अपने सम्पर्क में आने वाले अन्य लोगों का जीवन भी साध लिया।

इस विषय पर असीमित लिखा जा सकता है किन्तु अन्त में बस यही निवेदन करना चाहूँगी कि मित्रों ‘#समय अनमोल है’ ये किताबी बात नहीं है। आज़माया हुआ सत्य है। इसे व्यर्थ न गँवायें।

अपना समय क्रोध, पछतावा, चिंता तथा ईर्ष्या में मत ज़ाया करें। दुखी रहने के लिए ज़िन्दगी बहुत छोटी है। पल – पल का उपयोग करें ताकि पछताना न पड़े।

♦ वेदस्मृति ‘कृती’ जी – पुणे, महाराष्ट्र ♦

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  • “वेदस्मृति ‘कृती’ जी“ ने, बिलकुल ही सरल शब्दों का प्रयोग करते हुए समझाने की कोशिश की हैं — अपना समय क्रोध, पछतावा, चिंता तथा ईर्ष्या में मत ज़ाया करें। दुखी: रहने के लिए ज़िन्दगी बहुत छोटी है। पल – पल का उपयोग करें ताकि पछताना न पड़े।

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यह आलेख (समय का सदुपयोग।) ” वेदस्मृति ‘कृती’ जी “ की रचना है। KMSRAJ51.COM — के पाठकों के लिए। आपकी कवितायें/गीत/दोहे/लेख/आलेख सरल शब्दों में दिल की गहराइयों तक उतर कर जीवन बदलने वाली होती है। मुझे पूर्ण विश्वास है आपकी दोहे/कविताओं और लेख से आने वाली नई पीढ़ी और जनमानस का कल्याण होगा। आपकी लेखन क्रिया यूँ ही चलती रहे जनमानस के कल्याण के लिए।

साहित्यिक नाम : वेदस्मृति ‘कृती’
शिक्षा : एम. ए. ( अँग्रेजी साहित्य )
बी.एड. ( फ़िज़िकल )
आई आई टी . शिक्षिका ( प्राइवेट कोचिंग क्लासेज़)
लेखिका, कहानीकार, कवियित्री, समीक्षक, ( सभी विधाओं में लेखन ) अनुवादक. समाज सेविका।

अध्यक्ष : “सिद्धि एक उम्मीद महिला साहित्यिक समूह”
प्रदेश अध्यक्ष : अखिल भारतीय साहित्य सदन ( महाराष्ट्र इकाई )
राष्ट्रीय आंचलिक साहित्य संस्थान बिहार प्रान्त की महिला प्रकोष्ठ,
श्री संस्था चैरिटेबल ट्रस्ट : प्रदेश प्रतिनिधि ( महाराष्ट्र )
अंतर्राष्ट्रीय हिंदी परिषद में – सह संगठन मंत्री, मुंबई ज़िला, महाराष्ट्र
हिन्दी और अँग्रेजी दोनों विधाओं में स्वतंत्र लेखन।

अनेक प्रतिष्ठित हिन्दी/अँग्रेजी पत्र – पत्रिकाओं में नियमित रचनाएँ प्रकाशित।

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नारी : इच्छा शक्ति ज्ञान शक्ति कर्म शक्ति।

Kmsraj51 की कलम से…..

♦ नारी : इच्छा शक्ति ज्ञान शक्ति कर्म शक्ति। ♦

सार —

या देवी सर्वभूतेषु शक्ति-रूपेण संस्थिता, नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः।
या देवी सर्वभूतेषु सृष्टि-रूपेण संस्थिता, नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः॥

नारी अपने आप में शक्ति है। वह चाहे किसी भी प्रकार की हो जैसे सृजन शक्ति, सहन शक्ति, इच्छा शक्ति, ज्ञान शक्ति, वैराग्य शक्ति, श्रृंगार शक्ति, समर्पण शक्ति, श्रद्धा, भक्ति, त्याग शक्ति, आसक्ति, प्रेम, समर्पण और इन सब को यथार्थ रूप प्रदान करने के लिए सबसे बड़ी शक्ति, “कर्म शक्ति”।

शिव और शक्ति की कथा के बारे में कौन नहीं जानता? हमारे भारतवर्ष में “यत्र नार्यस्तु पूज्यंते, रमंते तत्र देवता” इस उक्ति का पालन अनादि काल से ही होता चला आ रहा है। नारी का एक माँ का रूप सबसे सुंदर, आकर्षक, प्रेममय और अनुकरणीय होता है। मेरा ऐसा मानना है कि नारी केवल एक माँ बनकर ही पूर्णता को प्राप्त कर लेती है।

नारी केवल मनुष्य रूप में ही पूजनीय नहीं है अपितु संपूर्ण नारी जाति चाहे वह धरती मां हो या किसी अन्य प्रजाति की भी, सदैव ही अग्रगण्य होती है क्योंकि वह जन्म और पालन पोषण में अपना सर्वस्व त्याग देती है। हमारा पूरा जीवन ही स्त्री जाति पर निर्भर करता है, एक माँ के विभिन्न स्वरूपों पर निर्भर करता है, यदि हम यह कहें तो कोई अतिशयोक्ति नहीं होगी।

हमारी सृष्टि का प्रारंभ शक्ति से होता है, हमारे अस्तित्व से यानी जन्म से होता है। जन्म एक माँ ही दे सकती है ( हालांकि बीज तत्व, पुरुषत्व की भूमिका को नकारा नही जा सकता ) उसके बाद भरण पोषण का कार्य धरती मां पर निर्भर करता है, अन्नपूर्णा द्वारा किया जाता है, विद्या की देवी और अन्य सभी कलाओं की देवी भी स्त्री जाति यानी सरस्वती मां है, और पूरा जीवन लक्ष्मी मां की कृपा से चलता है तथा मृत्यु के बाद मां गंगा या पुन: धरती मां की गोद में ही हम समा जाते हैं।

यानी
“जीवन से पहले, जीवनपर्यंत और जीवन उपरांत”

तीनों ही स्थितियों में मां की भूमिका, नारी जाति की भूमिका अग्रगण्य है, वंदनीय है, अनुकरणीय है, अभिनंदनीय है। परंतु यह भी सत्य है कि बिना पुरुष के हर नारी अधूरी है। उसे जीवन के हर मोड़ पर पुरुष की आवश्यकता है, उसके आलंबन की आवश्यकता है, इस शाश्वत सत्य को नकारा नहीं जा सकता।

परिचय —

नारी इस चराचर जगत की धुरी है या यूं कहा जाए कि यह जगत जिस पर आश्रित है वह आधार, वह आलंबन स्वयं धरती मां ही है जो नारी का ही एक स्वरूप है, तो कोई अतिशयोक्ति नहीं होगी।

हमारा अस्तित्व, हमारे जन्म से आरंभ होता है। जीवन होगा तो सब बातें होंगी। यदि अस्तित्व और जीवन ही नहीं होगा तो कुछ भी संभव नहीं है। तो हम आरंभ से ही आरंभ करते हैं, यानी सृजन, निर्माण से यानि जन्म से। जन्म के लिए मां यानी नारी का होना अपरिहार्य है। जैसे कि पहले भी कहा जा चुका है कि नारी का पूर्ण रूप एक मां का होता है और जन्म प्रक्रिया में हम बीज तत्व यानि “पुरुषत्व” को नकार नहीं सकते। यहाँ मैं स्वरचित कविता की दो पंक्तियां कहना चाहूंगी —

“मां है तो कृष्ण है, राम है, बलराम भी है, क्योंकि मां के बिना असंभव, इंसान तो क्या भगवान भी है।”

इस पृथ्वी पर अवतरित होने के लिए स्वयं सृष्टि के रचयिता विष्णु भगवान को भी माँ के गर्भ की आवश्यकता हुई क्योंकि जन्म प्रक्रिया बिना माँ के असम्भव है। भगवान के बाद नारी वो शक्ति है जो —

“मौत की गोद में जाकर जिंदगी को जन्म देती है”।

आज नारी हर क्षेत्र में कामयाब है। पौराणिक काल से लेकर आज तक हमारे पास इतने जीवंत उदाहरण हैं कि हम इस सत्य को नकार नहीं सकते।

इच्छाशक्ति — Willpower

जब तक नारी अपने मन में किसी बात का संकल्प नहीं लेती तो – उसे कोई भी अपने स्वार्थ हेतु झुका सकता है। परंतु एक बार जब उसने अपनी इच्छा शक्ति को जागृत कर लिया और कोई काम करने की ठान ली, कोई संकल्प ले लिया तो संसार की कोई भी ताकत उसे अपने फैसले से हटा नहीं सकती।

इसी इच्छा शक्ति के बल पर सभी कार्यों की रूपरेखा तैयार की जाती है, जैसे कोई भी कार्य “मनसा, वाचा, कर्मणा” के आधार पर पूर्ण माना जाता है अर्थात किसी भी कार्य को करने के लिए पहले मन में विचार आता है, फिर उस कार्य को करने की ‘इच्छा शक्ति’ जागृत होती है। फिर वाणी से उसे संसार के सामने रखा जाता है और अंत में कार्यक्रम ‘कर्मशक्ति’ के द्वारा उसे यथार्थ का रूप प्रदान किया जाता है।

इच्छा हमारी शक्ति का केंद्र बिंदु है। इसी को आधार मानकर बछेंद्री पाल, अनीता कुंडू, संतोष यादव आदि ने एवरेस्ट की चोटी को भी झुका दिया। उन्होंने दुनिया को यह दिखा दिया कि यदि नारी चाहे तो उसके हौसले पर्वतों से भी बुलंद और तटस्थ होते हैं। इन्हीं बुलंद इरादों को लेकर ये विश्व में अपना नाम रोशन करती आ रही हैं।

ज्ञान शक्ति — Knowledge Power

ज्ञानशक्ति को इच्छा शक्ति का दूसरा पड़ाव माना जा सकता है क्योंकि जब तक कुछ सीखने की इच्छा मन में नहीं होगी तो किसी भी प्रकार का ज्ञान हासिल नही किया जा सकता।

साहित्य और कला के क्षेत्र में भारतीय नारी ने ज्ञान और कला की शक्ति को सजीव प्रमाण प्रदान किया है, जिनमें प्रमुख हैं – लता मंगेशकर,आशा भोंसले, मधुबाला, वैजन्ती माला, अरुंधति राय, सरोजिनी नायडू, महादेवी वर्मा, गिरिजा देवी, परवीन सुल्ताना, नालिनी कामलिनी, आदि ऐसी कितनी ही बड़ी हस्तियां हैं जिन्होंने साहित्य और कला के क्षेत्र में विश्व में अपनी प्रतिभा का लोहा मनवाया है।

कोई भी कला तो बिन नारी के पूर्ण हो ही नही सकती, यदि यूं कहा जाए तो कोई अतिशयोक्ति नहीं होगी क्योंकि साहित्य में, कला में, चित्रों में, नृत्य में, गीत में, संगीत में, अभिनय में, भक्ति में, प्रेम में, त्याग में, समर्पण आदि, इन सब में यदि “नारी” को हटा दिया जाए तो हमारे पास कुछ भी नहीं बचेगा।

एक बार आप कल्पना करके देखें कि मीराबाई, अहिल्याबाई, राधा, देवकी मां, यशोदा मां, कौशल्या, सुमित्रा, केकई, सीता, उर्मिला इत्यादि इन नारी पात्रों को यदि अपने इतिहास से, अपने साहित्य से निकाल दिया जाए तो न हीं कृष्ण कथा का सौंदर्य बचेगा और ना ही राम काव्य का ही स्वरुप कायम रह पायेगा।

यानि जिस प्रकार एक घर, एक परिवार नारी के बिना पूर्ण नहीं हो सकता, एक मां के बिना पूर्ण नहीं हो सकता, क्योंकि नारी जब मां बनती है तभी वह पूर्ण होती है, तथा परिवार का निर्माण भी तभी होता है, जब घर में संतान का जन्म होता है। इस के संदर्भ में पुन: स्वरचित कविता की दो पंक्तियां कहना चाहूंगी कि —

“मां है तो परिवार है, संस्कार है, क्योंकि माँ में ही तो ममता है, प्यार है दुलार है।”

इच्छा शक्ति, प्राण शक्ति है। इसी इच्छा शक्ति को अपना आलंबन बनाकर सावित्री अपने सतीत्व के बल पर अपने पति सत्यवान के प्राण यमराज से भी वापस ले आई थी। एक नारी के धर्म में, उसकी निष्ठा में, उसके प्रेम में बहुत अधिक ताकत होती है। सती अनुसूया ने इसी बल को ढाल बनाकर सूर्य को भी उदय होने से रोक दिया था।

कर्म शक्ति — Karmic Force / Work Power

इच्छा शक्ति और ज्ञान शक्ति को जहां यथार्थ रूप प्राप्त होता है उसे कर्म शक्ति कहते हैं। इसी के आधार पर सभी कार्यों में सफलता प्राप्त की जा सकती है। कर्म शक्ति में तो नारी का कोई सानी ही नही है। वह अकेली ही माँ दुर्गा की भांति एक ही समय में दस काम कर सकती है।

नारी हर रूप में एक शक्ति है। वह पुरुष को जन्म देती है, उसका पालन करती है (एक मां के रूप में) आजीवन उसका साथ देती है (एक पत्नी के रुपमें) जिम्मेदार बनाती है, सोचने का नजरिया बदलती है, (एक बेटी के रूप में) और जीवन को आलंबन देती है (पुत्र वधू के रूप में)।

— यानी जीवन के हर पड़ाव में, हर रिश्ते में वह सशक्त है।

जब हम समाज निर्माण की बात कर रहे हैं, भारतवर्ष की बात कर रहे हैं, स्त्रियों के शौर्य की बात कर रहे हैं तो भारतीय इतिहास में स्वतंत्रता आंदोलन में नारियों की भूमिका की बात को कैसे छोड़ा जा सकता है। इस आंदोलन में रानी लक्ष्मीबाई, चेनम्मा, सावित्रीबाई फुले, अरुणा आसफ अली, दुर्गाबाई, सुचेता कृपलानी, विजयलक्ष्मी पंडित इन सबके नाम स्वर्ण अक्षरों से अंकित है। इन सब नारियों ने न केवल स्वतंत्रता आंदोलन में बढ़-चढ़कर भाग लिया अपितु समाज के उत्थान के लिए भी उन्होंने अपना जीवन समर्पित कर दिया।

समाज हम सब लोगों से ही मिलकर बना है, और जिसमें हमें ऐसे कार्य करने चाहिए कि अधिक से अधिक जन कल्याण हो सके, चाहे वह किसी भी क्षेत्र में हो शिक्षा के, स्वास्थ्य के, खेलों के, सांस्कृतिक आदि।

यानी समाज को हर दृष्टि से सक्षम और सफल बनाना है तो उसमें उसके सभी क्षेत्रों में बराबर उन्नति करनी होगी। लोगों को आम जनता को ऊपर उठाने की बात करनी होगी। यदि हम लोगों में मानवीय गुणों, सांस्कृतिक चेतना मातृभूमि के प्रति प्रेम, समर्पण आदि के भाव जागृत कर पाते हैं तो यह एक उत्कृष्ट कृत्य बन जाता है क्योंकि एक व्यक्ति से ही समाज का निर्माण होता है।

सकारात्मक अभिप्रेरणा —

यदि प्रत्येक व्यक्ति और भावी पीढ़ी यदि सही सोच वाली है, अच्छे विचारों वाली है, सकारात्मक अभिप्रेरणा से प्रेरित है तो वह समाज प्रगति के पथ पर सदैव अग्रसर बना रहता है, और इन सब में एक नारी की भूमिका सर्वोपरि है क्योंकि एक परिवार को बनाने में नारी का स्थान सर्वोच्च है और परिवार समाज की प्राथमिक इकाई है।

जब इतने महान कार्य नारी द्वारा किए जा सकते हैं तो नारी उत्थान की संकल्पना अनिवार्य तत्व बन जाती है और वर्तमान परिदृश्य में इनका मूल्यांकन इन आधारों पर किया जा सकता है कि इतने महान कार्य करने वाली नारी राष्ट्र निर्माण का कार्य बखूबी कर सकती है एवं राष्ट्र निर्माण में सक्रिय सार्थक भूमिका अवश्यंभावी रूप से निभा सकती है और निभाती ही चली आ रही है।

यहां हम कमला नेहरु, श्रीमती इंदिरा गांधी, शीला दीक्षित, सुषमा स्वराज, स्मृति इरानी, मीरा कुमार, वसुंधरा राजे, सुमित्रा महाजन, निर्मला सीतारमण आदि इन सबका नाम ले सकते हैं। यहाँ हमने केवल भारतीय नारी की बात की है इसके अतिरिक्त पूरे विश्व में तो ऐसे अनगिनत उदाहरण मौजूद हैं। ये सब कर्म शक्ति का उदाहरण कहे जा सकते हैं।

निष्कर्ष — Conclusion

निष्कर्षत: यही कहा जा सकता है कि इच्छा शक्ति, ज्ञान शक्ति, कर्म शक्ति के द्वारा समाज निर्माण में नारी की भूमिका सर्वोपरि है। वह निर्माण, पालन और मुक्ति तीनों की हेतु भूता सनातनी देवी के समान है।

एक तरह से वह ‘त्रिदेव’ यानि ब्रह्मा, विष्णु और महेश तीनों का कार्य अकेले ही करती है क्योंकि जिस प्रकार ब्रह्माजी सृष्टि के ‘रचयिता’ माने गए हैं (नारी सृजनकर्ता है) विष्णु जी पालनहार (नारी और धरती माँ ही हम सबका भरण, पोषण करती है) और शिवजी विनाशक या संहारक। [(यहां हम विनाश के स्थान पर मुक्ति का प्रयोग कर रहे हैं माँ गंगा मुक्ती प्रदान करती है) क्योंकि मां कभी भी विनाशक नहीं हो सकती। एक पुत्र कुपुत्र हो सकता है परंतु एक माता कभी कुमाता नहीं हो सकती।]

“कुपुत्रो जायते क्वचिदपि कुमाता न भवति।”
— (श्री दुर्गा सप्तशती)

इस प्रकार जीवन का कोई भी क्षेत्र हो वहां नारी जाति ने अपना लोहा मनवाया ही है। वर्तमान युग में भी ऐसा कोई क्षेत्र नहीं है जहां स्त्रियों की सक्रिय, सार्थक भागीदारी ना हो और वह सफल ना हुई हो।

इतिहास में भी किसी भी क्षेत्र में नारी की सफलता पर प्रश्नचिन्ह नहीं लगाया जा सकता। और वास्तव में ही ‘नारी नारायणी’ है। उसका पूरा जीवन चुनौतियों से भरा होने के बावजूद वो तटस्थ खड़ी है एक और आने वाली चुनौती का सामना करने के लिए।

फिर भी मुस्कुरा कर अपना जीवन व्यतीत करती है तथा सबके लिए अपने अरमानों का हमेशा से ही बलिदान करती आयी है। इस पृथ्वी पर ऐसा कोई जीव नही जिसका संघर्ष जीवन से पहले यानि जन्म लेने से पहले ही आरंभ हो जाता हो या यूं कहें कि जन्म के लिए संघर्ष शुरू हो जाता हो एक माँ के लिए भी और एक बेटी के लिए भी ( दोनो ही नारी जाति )।

इससे अधिक और क्या कहना है कि सब जानते हुए भी नारी ने अपना वर्चस्व कायम रखा है तथा विश्व में तो क्या अंतरिक्ष में भी अपना नाम स्वर्णाक्षरों में अंकित कर इतिहास बनाया है।

और आगे भविष्य में भी ऐसी ही उम्मीद की जा सकती है क्योंकि —

” माना कि पुरुष बलशाली है, पर जीतती हमेशा नारी है,
सांवरिया के छप्पन भोग पर सिर्फ एक तुलसी भारी है”।

हमारा साहित्य समाज को न केवल ज्ञान, बोध और मूल्य प्रदान करता है अपितु एक चिंतन की दिशा भी प्रदान करता है ताकि हम सभी यथासंभव प्रयास कर सके जिससे कि भारतीय मूल्य, भारतीय सभ्यता एवम संस्कृति, भारतीय साहित्य का विश्व में सदैव उच्चस्थ स्थान बना रहे तथा भारत पुन: “जगदगुरु” (विश्वगुरु) की उपाधि ग्रहण करे वो भी अपने अक्षय साहित्य, विशुद्ध सभ्यता एवं अलौकिक संस्कृति के बल पर।

इन्ही शुभकामनाओं के साथ — शुभमस्तु।

ज़रूर पढ़ें — साहित्य समाज और संस्कृति।

♦ डॉ विदुषी शर्मा जी – नई दिल्ली ♦

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  • ” लेखिका डॉ विदुषी शर्मा जी“ ने अपने इस लेख से, बहुत ही सरल शब्दों में सुंदर तरीके से बखूबी समझाने की कोशिश की है — नारी अपने आप में शक्ति है। वह चाहे किसी भी प्रकार की हो जैसे सृजन शक्ति, सहन शक्ति, इच्छा शक्ति, ज्ञान शक्ति, वैराग्य शक्ति, श्रृंगार शक्ति, समर्पण शक्ति, श्रद्धा, भक्ति, त्याग शक्ति, आसक्ति, प्रेम, समर्पण और इन सब को यथार्थ रूप प्रदान करने के लिए सबसे बड़ी शक्ति, “कर्म शक्ति”।

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यह लेख (नारी : इच्छा शक्ति ज्ञान शक्ति कर्म शक्ति।) “डॉ विदुषी शर्मा जी” की रचना है। KMSRAJ51.COM — के पाठकों के लिए। आपकी लेख / कवितायें सरल शब्दो में दिल की गहराइयों तक उतर कर जीवन बदलने वाली होती है। मुझे पूर्ण विश्वास है आपकी कविताओं और लेख से जनमानस का कल्याण होगा। आपकी लेखन क्रिया यूं ही चलती रहे।

आपका परिचय आप ही के शब्दों में:—

मेरा नाम डॉ विदुषी शर्मा, (वर्ल्ड रिकॉर्ड होल्डर) है। अकादमिक काउंसलर, IGNOU OSD (Officer on Special Duty), NIOS (National Institute of Open Schooling) विशेषज्ञ, केंद्रीय हिंदी निदेशालय, उच्चतर शिक्षा विभाग, शिक्षा मंत्रालय, भारत सरकार।

ग्रंथानुक्रमणिका —

  1. डॉ राधेश्याम द्विवेदी — भारतीय संस्कृति।
  2. प्राचीन भारत की सभ्यता और संस्कृति — दामोदर धर्मानंद कोसांबी।
  3. आधुनिक भारत — सुमित सरकार।
  4. प्राचीन भारत — प्रशांत गौरव।
  5. प्राचीन भारत — राधा कुमुद मुखर्जी।
  6. सभ्यता, संस्कृति, विज्ञान और आध्यात्मिक प्रगति — श्री आनंदमूर्ति।
  7. भारतीय मूल्य एवं सभ्यता तथा संस्कृति — स्वामी अवधेशानंद गिरी (प्रवचन)।
  8. नवभारत टाइम्स — स्पीकिंग ट्री।
  9. इंटरनेट साइट्स।

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आज की जरूरत।

Kmsraj51 की कलम से…..

♦ आज की जरूरत। ♦

वैचारिक लेख —

वर्तमान में भारत ही नहीं बल्कि पूरे विश्व में एक भयानक महामारी ने अपना तांडव पुरजोर मचाया है। इस चपेट में विश्व का बड़े से बड़ा देश अपनी समस्त ताकतों को विफल-सा हुआ पा रहा है। ऐसे में जब हररोज हजारों लोग काल के गाल में समाते जा रहे हैं तो डर भला किसे नहीं लगेगा।

बस डर नहीं रहे हैं तो कुछ सर फिर लोग और दिल्ली के निजामुद्दीन के मरकज में जमा हुई तब्बलिकी जमात। शायद उन्हें मृत्यु ने मानव जाति के विनाश का जिम्मा सौंपा हो या फिर यह उनके जहन जनित उस अल्लाह की शरणागति का मनमुखी खुरापात है जो किसी पवित्र धार्मिक ग्रंथ में नहीं मिलता है।

अब लीजिए आप पवित्र कुरान शरीफ़ को या फिर इस्लाम धर्म के जो चार पवित्र ग्रंथ माने जाते हैं “पवित्र इंजील, जबूर, तोरात और स्वयं पवित्र कुरान मजीद।” इनमें कहीं कोई जमाती यह सिद्ध कर दें कि वहाँ खुदा की ऐसी आज्ञा है कि किसी को जानबूझ कर मारने या फिर अनजाने में मारने से अल्लाह खुश होता है।

तो मैं मान जाऊंगा कि जिहाद जैसी, जो सोच इन लोगों ने अपनाई है और अपने अनुयायियों को भी उसका अनुसरण करने को कहते हैं; वह सच में ही वाजिब है। पर शर्त है कि यह सिद्ध करने के लिए ‘देवबंध’ जैसी संस्थाओं की स्वयंभु सोच का हवाला न दिया जाए।

मक्का की पवित्र दरगाह की मूल सामग्री का ही सहारा लिया जाए। कोई खुदा, अल्लाह, गॉड, वाहे गुरु, तीर्थंकर या भगवान किसी के प्राणों को लेने की बात नहीं करता है। चाहे वह किसी भी धर्म का क्यों न हो। हाँ यदि कोई करता है तो वह भगवान हो – ही नहीं सकता। क्योंकि किसी को काल के सिवा कोई मारने वाला शैतान कहलाता है भगवान नहीं।

चलो लगे हाथों जिहाद समझ लें। जेहाद पाक कुरान में अंकित है और वह सिर्फ़ मुस्लिम समुदाय के लोगों के ही करने की नहीं है बल्कि समूचे मानव प्राणी को करनी चाहिए।

जिहाद का मतलब संघर्ष करने से है न की साज़िश और खून खराबा करने से। पवित्र कुरान कहता है कि जो लोग तुझे उस एक खुदा की इवादत से भटका कर किसी दूसरे की उपासना करने को मजबूर भी करता है तो उसका प्रभाव भले ही कितना ऊंचा हो, तू उसकी नहीं मानना।

तू अपने धर्म के लिए अपनी जान दे देना पर दूसरों को कष्ट मत देना। अब इन्होंने इसका अर्थ उल्टा ले लिया कि अपना धर्म बचाने के लिए दूसरों की जान ले लेना पर अपने धर्म को बचाए रखना। असल में ऐसा तो हजरत मुहम्मद साहब बयाँ ही नहीं करते।

अब रही धर्म की बात तो यह भी हमें समझना होगा कि धर्म क्या होता है और अध्यात्म क्या होता है? धर्म असल में किसी समुदाय या समाज के सामाजिक जीवन के जीने के तौर – तरीके का नाम है और अध्यात्म आत्मा और परमात्मा के मूल तत्व को जानने का नाम है।

दरअसल हुआ यूं कि लोग धर्म को ही अध्यात्म समझ बैठे। फिर चाहे वह हिन्दू धर्म की बात हो या फिर कोई और धर्म की बात हो। इसीलिए हर धर्म के नियंताओं ने अपने-अपने धर्म के संचालन हेतु किसी नियम का आगाज किया और उन्हें किसी ग्रंथ की सूरत दे दी। यह सच है कि वे नियंता पवित्र भावी थे और उन्होंने उन्हीं ग्रंथो में अध्यात्म को भी भर दिया। यह महज समाज को अनुशासन में बांधने के उद्देश्य से स्थापित किया गया था।

अगर यूं कहा जाए कि “धर्म अध्यात्म का शरीर है और अध्यात्म उस देह की आत्मा तो यह अतिशयोक्ति नहीं होगी। यह बात यहाँ से भी प्रमाणित होती है कि खुदा, भगवान, रब्बा कहो या प्रकृति, उसने तो समूचे जीव जगत को उत्पन किया।”

जब मानव प्राणी के अलावा किसी जीव जगत का कोई सामाजिक नियम ही नहीं है तो मानव का ही क्यों? शायद इसलिए कि उसमें बुद्धि है और वह भी इस प्रकार से उस बनाने वाले ने मानव में डाली कि सब के सब उसे एक बराबर प्रयोग नहीं कर पाते।

हमने इतिहास पढ़ा। जहाँ यह बताया जाता है कि असल में मानव पशुओं से विकसित हो कर बना है। वह भी पहले आदिमानव के रूप में असभ्य और पशु तुल्य जीवन जीता था। जैसे-जैसे उसने बौद्धिक विकास किया तो सभ्यता अस्तित्व में आई और धीरे-धीरे धर्म, समुदाय तथा संस्कृति चलन में आई। इन प्रमाणों को आधार माने तो, तो भी सिद्ध होता है कि धर्म मानव द्वारा स्थापित किया गया एक सामाजिक नियम है और कुछ नहीं।

प्रभु को पाना है तो उसके लिए धर्म की नहीं बल्कि अध्यात्म की ज़रूरत पड़ती है। आप निजी स्कूल में पढ़े या सरकारी में। बात एक ही है क्योंकि उद्देश शिक्षा प्राप्त करना है। वह दोनों जगह मिल जाएगी। मेरे कहने का भाव यह है कि धर्म कोई भी बुरा नहीं है। वे सभी समाज को सुंदर और पुष्ट करने की बृहद संस्थाएँ हैं।

इन्हे विकृत कुछ स्वयंभु धर्म के ठेकेदारों और कुछ राजनीतिक सरोकारों वाले लोगों द्वारा निज स्वार्थ साधने के चलते किया है। बेचारी साधारण जनता उनके बहकावे में आस्थाओं के मकड़ जाल में फंस कर बंध जाती है।

यह किसी धर्म विशेष की बात नहीं है। यह सभी धर्मों की दशा है। हिन्दू धर्म को ही ले लीजिए। हमारे तो यहाँ लोग पढ़-लिख कर भी अनपढ़ो की-सी बात करते हैं। किसी से पूछे कि —

  • हिन्दू धर्म के मूल ग्रन्थ कौन है?
  • पुराणों के नाम क्रमवार बताओ?
  • षड्दर्शन कौन-कौन से हैं?
  • 9 श्रुतियों और स्मृतियों को क्रमवार बताओ?

सब कन्नी काटते हैं। बस हम हिन्दू हैं। इस धर्म का अता पता चाहे कुछ भी न हो। और देखो, यह पूछे कि यह हिन्दू धर्म है क्या? वैदिक धर्म तो सनातन धर्म तथा आर्य धर्म की बात करता है। जिसमें वसुधैव कुटुंबकम की बात होती है। फिर यह हिन्दू धर्म कहाँ से और कैसे निकला? जैन, सिख जैसे धर्म कहाँ से निकले और क्यों?

इन बातों का सही तथा प्रामाणिक ज्ञान 95% लोग नहीं दे सकते। पर है हम फिर भी हिन्दू। तो सिद्ध हुआ कि धर्म असल में एक भीड़ का नाम ही रह गया है और कुछ नहीं। सबसे बड़ा धर्म मानव धर्म है, जिससे ये दुनियाँ के सारे धर्म निकले हैं। पर उसे मानने को कोई तैयार नहीं है।

सभी संतों और ज़िंदा महात्माओं ने चीख-चीख कर इसका प्रचार किया, जिन्होंने असल में जिहाद की। पर मानी किस ने। यह दुनियाँ अपने ही रसूख के लिए जीती है और इसमें मारा जाता है हमेशा गरीब, मजलूम तथा सर्वहारा और असहाय वर्ग।

कोरोना विदेशों से लाने वाले।

हाल ही में सफदर गंज की हालत आप सबने देखी। कोरोना विदेशों से लाने वाले वही रसूखदार लोग थे जिन्होंने अपनी कमाई का तो आधे से ज़्यादा पैसा विदेशों में ही ख़र्च कर दिया होता है, उल्टा हमारी गाढ़ी कमाई को भी वे सरकारी खर्चे से वहाँ उड़ाते आए हैं।

जो ये सुबह कमाते हैं और शाम को खाते हैं। ये लोग हमारे देश की फैक्ट्रियों और कारखानों में काम करने वाले वह लोग हैं, जो अपनी सुविधा बेच कर देश की अर्थव्यवस्था को संभालते हैं।

क्या कोरोना संकट में इनकी समस्याओं को दरकिनार करना उचित था। विदेशों में फंसे भारतीयों को, जो करोना पीड़ित भी थे; उन्हें लाने के लिए सरकार के पास प्लान हैं और सुविधा भी। पर अपने देश के निर्दोष लोगों की आंखों के आंसू पोंछने के लिए कुछ भी नहीं।

खैर ये लोग तो सदियों से इसी पीड़ा से गुजर रहे हैं और गुजरते रहेंगे। सताएँ और तमाम सियासी पार्टियों तो इस वक़्त भी सियासत करने से बाज नहीं आ रही है, जब विश्व व्यापी संकट सिर पर मंडरा रहा है। किसे मालूम कल क्या हो? पर ये है कि ख़ुद को खुदा समझते हैं।

इस गफलत भरे माहौल में यदि ये स्वयं सेवी संगठन और धार्मिक संगठन सामने न आते तो सरकारों की सारी हेकड़ी निकल जाती। अब आप कहेंगे कि ये दोगली बातें क्यों? एक ओर तो धर्म पर चोट करता है और दूसरी ओर उसी की प्रशंसा। नहीं भाई यह मानव धर्म की प्रशंसा है। जो हमें हमारे पुरखों ने और संतों ने विरासत में दिया था और एक हम है कि उस महा-पुनीत भाव बोध को भी अपनी रसुखता की भेंट चढ़ाने पर तुले हैं।

अब रही जमात की बात। तो बता दू कि जमात के द्वारा किया गया वाकया असल में एक अमानवीय कृत्य था। फिर चाहे वह जाने अनजाने कैसे भी हुआ हो। यह मायने नहीं रखता। मायने रखता है परिणाम। दीन बांटने वाले ही अगर नफ़रत बांटने लगे तो उस धर्म और समाज का क्या होगा? उस पर कुछ तथाकथित मानवतावादियों की भी अपनी एक जमात है, जो इस नाज़ुक घड़ी में इस घटना से पूरे मुस्लिम समाज को जोड़ने पर तुली हैं।

वे ये नहीं समझते कि इस समाज में भी सभी लोग एक जैसे नहीं है। बहुत से ऐसे भी मुस्लिम पैरोकार है जो हिन्दू-मुस्लिम की भावना से ऊपर उठ कर मानव धर्म की बात करते हैं। इस पूरे मामले में उन्हें क्यों घसीट रहे हो? यहाँ भी ध्रुवीकरण और मजहबवाद की बू आती है।

तो फिर मैं क्यों न कहूँ कि पूरे फसाद की जड़ धर्म ही है। यदि ये अलग-अलग धर्म न होते तो यह सब न घटता। यह सब सदियों से होता आ रहा है। पहले साम्राज्यवाद के नाम पर तो आज धर्मवाद के नाम पर।

मैं धर्मों का विरोधी नहीं हूँ। मैं विरोधी हूँ तो इन धर्मो की व्यवस्थाओं और सरकारी तंत्र की स्वार्थपरता का। सरकारें चाहें तो यह झगड़ा ही सदा को समाप्त हो सकता है। पर वे ऐसा नहीं करना चाहती। ऐसा करने से उनकी राजनीति नहीं चल पाएगी।

यह भारत है साहब। यहाँ कोई भी इमोशनली ब्लैकमेल हो ही जाता है बस। सरकारें ऐलान करें कि किसी भी धर्म या समुदाय के बच्चों को सरकारी शिक्षा ही लेनी होगी। कोई भी धर्म या समुदाय अपनी निजी पाठशाला नहीं चलाएगा। धर्म को लेकर की जाने वाली पढ़ाई भी स्कूलों में ही होगी। जो उलंघन करता है तो उसे सजा दी जाएगी। तो सारे फसाद बंद हो जाएंगे। पर नहीं, उन्हें तो निजीकरण से अपने चहेतों को लाभ पहुँचाना है। बस फिर उसी की आड में दूसरे लोग भी अपना उल्लू साधने में कामयाब हो जाते हैं।

बच्चों को मुफ्त और सरकारी गुणवत्ता युक्त शिक्षा क्यों नहीं मिल रही है?

सरकारें और सियासी पार्टियाँ तो उल्टा सरकारी अध्यापकों को बदनाम करने पर तुली रहती है और बेचारा समाज उनकी बातों में आ कर असलियत भूल जाता है। ज़रा सोचो भाई कि क्या आजादी के 70 साल बाद भी हमारे बच्चों को मुफ्त और सरकारी गुणवत्ता युक्त शिक्षा क्यों नहीं मिल रही है?

जिसका प्रावधान करने की बात संविधान में की गई है। क्यों गरीब का बेटा या बेटी अमीरों या हुक्मरानों के बच्चों की तरह अच्छी शिक्षा नहीं ले पा रहे हैं? क्योंकि यह एक बड़ी चालाकी है। ताकि इन्हीं के बेटे बड़े-बड़े पदों पर बने रहे और हमारे आजाद गुलाम। यह पूर्ण सत्य है।

आज दुनियाँ के उच्च शैक्षिक धरातल पर भारत की सरकारी शिक्षा प्रणाली की सुविधाओं को रखा जाए तो हम शायद कहीं खड़े ही न हो पाएंगे। कई बदलाव हर सरकारों में करवाए गए। पर सब आंकड़ों और कागजों में। क्योंकि इन स्कूलों में किसी बड़े आला अधिकारी या नेता के अपने बच्चे नहीं पढ़ते हैं। सब ख्याली घोड़े।

सब को बराबर लाने के लिए पूरे देश में एक ही पाठ्यक्रम होना चाहिए और सभी नागरिकों को सरकारी स्कूलों में ही बच्चे पढ़ाने के सरकारी आदेश होने चाहिए। संविधान में संशोधन पर संशोधन किए जा रहे हैं तो क्या यह नहीं हो सकता?

एक शिक्षा एक पाठ्यक्रम।

अब आप कहेंगे कि इस से क्या होगा? एक शिक्षा एक पाठ्यक्रम से गरीब-अमीर सबके बच्चों को समान शिक्षा मिलेगी और बराबर ज्ञान मिलेगा। उससे बड़े से बड़ी सरकारी सेवा में गरीबों के मेहनती बच्चे पहुँच जाएंगे और पूरे राष्ट्र की विचारधारा भी एक बनेगी।

जिससे ये जमात जैसी घटनाएँ नहीं घटेगी। ये सभी धार्मिक संगठन हो, पर धर्म की शिक्षा सरकार के अधीन हो। सरकार तय करें कि किस धर्म के लोगों और बच्चों को कैसी धार्मिक शिक्षा देनी है। नहीं तो हम सब लोग इन ठेकेदारों के यहाँ यूं ही लूटते रहेंगे। भारत में पहले भी धर्म गुरु राजदरबार के ही सदस्य होते थे।

अब तो धर्म के क्षेत्र में ऐसी बाढ़ आ गई है कि जिसे भी अच्छे से बोलना और गाना-बजाना या डराना – धमकाना आ गया, वहीं स्वयंभु धर्मगुरु बन जाता है। न कोई परीक्षा और न ही कोई रोक-टोक। न हींग लगे न फिटकरी रंग चोखे का चोखा।

मैं यह नहीं कहता कि सभी धर्म गुरु निकम्मे हैं। पर सवाल तो उठते हैं। जैसे ग़लत किया जमातियों ने उंगली उठी पूरे मुस्लिम समाज पर। मेरा तो मानना है कि सभी ज्योतिष, अध्यात्म, वास्तु और योग जैसे गूढ़ विषय स्कूलों में पढ़ाए जाने चाहिए और वे भी मुफ्त। तभी निरीह जनता लूटने से बचेगी और इस तरह की आफतों से भी बचेगी, जो आज आई है।

हमें बच्चों को मानव बनाना है न की किसी धर्म का पैरोकार या महज़ कोई कर्मचारी और अधिकारी। वे बने, पर पहले वह एक मानव बने। आज ज़रूरत है सर्व धर्म समभाव की। यह भारत को ही नहीं, पूरी दुनियाँ को समझना होगा।

आज हमें मशीनी – इंजीनियरों से ज़्यादा मानवता के इंजीनियरों की ज़रूरत है। यह महामारी चाहे मानव मस्तिष्क की खोपड़-वाजी हो या फिर किसी दैवी शक्ति का प्रकोप। चाहे फिर प्रकृति की विडम्बना हो। पर हर दृष्टि से कहीं न कहीं इस सब के लिए मानव की अमानवता जिम्मेवार है। अतः आज ज़रूरत है तो मानव को मानव बनाने की है।

सब जानते हैं कि चीन के बुहान से यह रोग दुनियाँ के कोने-कोने तक फैल गया। क्या इसके पीछे भी अमानवीयता का हाथ नहीं है? क्यों विश्व समुदाय के सामने यह बात चीन ने समय पर नहीं रखी? क्यों चीन अन्य देशों की यात्रा अपने लोगों से करवाता रहा, जबकि वह जानता था कि यह एक जानलेवा और लाइलाज घातक बीमारी है।

हम नहीं जानते कि यह चीन की चाल थी या फिर कोई प्राकृतिक घटना। परन्तु विश्व मानवतावादी दृष्टिकोण तो चीन को भी होना चाहिए था। वहीं नहीं रुकी यह गाड़ी। उस पर कई देशों के जमाती टूरिस्ट वीजा पर भारत घूमने आते हैं और यहाँ अपने ही धर्म को शर्मसार कर दिया। क्या फिर भी मानवता का पाठ स्कूलों में पढ़ाने के विपक्ष में खड़े होंगे हम? यह विश्व समुदाय को गहनता से सोचने की ज़रूरत है आज।

पूरे विश्व में ही धार्मिक शिक्षा को सरकारों को अपने हाथों में लेना चाहिए।

वरना भविष्य में इस के और भी गंभीर परिणाम भुगतने होंगे। मैं तो कहता हूँ कि पूरे विश्व में ही धार्मिक शिक्षा को सरकारों को अपने हाथों में लेना चाहिए। भले ही उसके लिए सरकारें जनता की राय समय – समय पर लेती रहे। तभी यह भीड़ तंत्र राह पर आएगा। वरना यह पीढ़ी दर पीढ़ी यूं ही घटता जाएगा।

भले ही आज जान पर बन आई है, इसलिए लोग डाक्टरों को भगवान कहने लगे हैं। कहना भी चाहिए। पर असल में सबसे ज़्यादा ज़रूरी समाज को सही शिक्षा देना है। अगर शिक्षा का विकेंद्रीकरण और दोहरी व्यवस्थाएँ न रोकी गई तो भविष्य में डॉक्टर भी हाथ खड़े कर देंगे।

कुदरत या खुदा अपनी ओर से कुछ नहीं करता है। वह हमारे ही कर्मो को कई गुना बढ़ा कर हमें वापिस करती / करता है। किसी घाटी के बीच डाली जाने वाली आवाज़ ज्युं उल्टा हमारे ही कानों में कई गुना बढ़ कर प्रतिध्वनि के रूप में लौट आती है, उसी प्रकार कर्म भी लौटते हैं।

असल में सारे फसाद की जड़ कौन है?

इसलिए अच्छे कर्म करने की सीख जब तक न दी गई, तब तक अच्छे कर्म की उम्मीद रखना भी बेईमानी है। अब आप समझ गए होंगे कि असल में सारे फसाद की जड़ कौन है। सरकारें हैं कि इसका ठीकरा उसके सिर और उसका ठीकरा इसके सिर पर फोड़ती रहती है। अपनी गलती मानने को न पक्ष तैयार है और न विपक्ष। अब मेरे एक मित्र का कहना है कि ये मुस्लिम साले गद्दार है। ये मोदी जी से जलते हैं, इसलिए इन्होंने ऐसा किया। इन्हे तो गोली मार देनी चाहिए।

वह बेचारा भाजपाई है और उसके विरोध में दूसरे मित्र ने कहा कि हां-हाँ, जो तुम सोचते हो और बोलते हो वहीं सही है और सच भी वहीं होता है। माना कि ये जमाती साज़िश रच गए। तेरे मोदी जी की सरकार कहाँ सोई हुई थी। कहाँ थी खुफिया एजेंसियाँ। क्या वे सिर्फ़ और सिर्फ़ विरोधी पार्टियों की खुफिया जानकारी में ही लगा के रखी है? वे देश के लिए होती है जनाब किसी व्यक्ति या पार्टी की खुशामद के लिए नहीं। वह बेचारा कांग्रेसी था।

भाजपाई ने उसका दोष केजरीवाल के सर मढ़ दिया। यह तो राज्य सरकार को देखना चाहिए था। कांग्रेसी ने जबाव दिया कि पढ़ कल का अखबार। देख आपकी ही पार्टी के वरिष्ठ नेता शांत कुमार का बयान। वे कहते हैं कि इस मामले में चूक दोनों सरकारों ने की है। पर उनकी सुनता कौन है।

आपके तो यहाँ गुजराती जोड़ी की दादागिरी चलती है और भी बहुत कुछ वे अनापशनाप कह गए। सब यहाँ लिख पाना संभव नहीं है। यहाँ गुटवाजियों की बू आ रही थी। तो मुझे लगा कि असल में यह भीड़ तंत्र ही सारे फसाद की जड़ है। यदि आदमी दिमाग़ के बजाए दिल से पढ़ जाए तो सब ठीक हो जाएगा। पर अफसोस यह होगा कैसे?

♦ हेमराज ठाकुर जी – जिला मण्डी, हिमाचल प्रदेश ♦

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  • “हेमराज ठाकुर जी“ ने, बहुत ही सरल शब्दों में सुंदर तरीके से बताया है की — कोरोना संकट के समय पर भी इस्लामिक धार्मिक संगठन की जानबूझकर लापरवाही क्या ठीक था? याद रखे – सबसे बड़ा धर्म मानव धर्म है। “हमें बच्चों को मानव बनाना है न की किसी धर्म का पैरोकार या महज़ कोई कर्मचारी और अधिकारी। आज हमें मशीनी – इंजीनियरों से ज़्यादा मानवता के इंजीनियरों की ज़रूरत है।” यदि आदमी दिमाग़ के बजाए दिल से पढ़ जाए तो सब ठीक हो जाएगा। पर अफसोस यह होगा कैसे?

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यह वैचारिक लेख (आज की जरूरत।) “हेमराज ठाकुर जी” की रचना है। KMSRAJ51.COM — के पाठकों के लिए। आपकी कवितायें/लेख सरल शब्दो में दिल की गहराइयों तक उतर कर जीवन बदलने वाली होती है। मुझे पूर्ण विश्वास है आपकी कविताओं और लेख से जनमानस का कल्याण होगा।

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“सफलता का सबसे बड़ा सूत्र”(KMSRAJ51)

“स्वयं से वार्तालाप(बातचीत) करके जीवन में आश्चर्यजनक परिवर्तन लाया जा सकता है। ऐसा करके आप अपने भीतर छिपी बुराईयाें(Weakness) काे पहचानते है, और स्वयं काे अच्छा बनने के लिए प्रोत्साहित करते हैं।”

 

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आधुनिक हिंदी के दिशा नायक निराला।

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♦ आधुनिक हिंदी के दिशा नायक निराला। ♦

निराला जी के संबंध में कोई स्वतंत्र समीक्षा पुस्तक नहीं लिखी मिली।
समीक्षात्मक मूल्यांकन करने वाले प्रमुख आलोचक पंडित राम चंद्र शुक्ल और नंद दुलारे वाजपेयी जी ही रहे।

निराला जी के काव्य वैशिष्ट्य और उपलब्धियों पर समीक्षा विचार छायावादी की भांति की गई।

नंद दुलारे वाजपेयी जी सुमित्रानंदन पंत को पसंद करते थे, पंडित शुक्ल या अन्य कवि उन्हें काव्य की कृतियों में वैसा नहीं भाते हैं।
फिर भी कवि की अभिव्यंजन पद्धति से समीक्षा प्रारंभ किया, निराला जी के नाद सौंदर्य पर और अधिक ध्यान दिया।

उनकी प्रगीत मुक्तको में संगीतात्मकाता पाया,
उन्होंने संगीत को काव्य के निकट लाने का प्रयास किया।
उनकी पद्य योजना पहुंच में जटिल दिखाई देती है,
समस्त पद विन्यास कवि की कार्यशैली की विशेषता है॥

काव्य में विषम चरण छंदों का प्रयोग,
काव्य की तीसरी विशेषता रही है।
काव्य दृष्टि से शुक्ला नहीं यह स्वीकारा,
बहु स्पर्श नी प्रतिभा निराला मौजूद है।
शैली और सामाजिक मूल्यों के क्षेत्र में,
निराला आदर्श मान्यता बंधन नहीं स्वीकार किया॥

उनके भाषा में व्यवस्था की कमी और पद योजना का अर्थ व्यंजन दुर्बल माना।
फिर भी उनकी विद्रोही भावना और जगत के विविध प्रस्तुत रूपों आदि को लेकर चलने वाली काव्य प्रतिभा के महत्व को, उदासीन भाव से ही सही स्वीकार किया।

निराला जी के काव्य वैशिष्ट्य और काव्य प्रतिभा की तरफ वाजपेयी ने जगत का ध्यान आकृष्ट किया।
विश्लेषण और मूल्यांकन में आलोचक की कठिनाई को वाजपेयी जी ने शुरुआत में ही कह दिया।

कवि के व्यक्तित्व और उसके निर्माण में ऐसी सूक्ष्म शब्दों का प्रयोग मिलता है,
जिसका विश्लेषण हिंदी की वर्तमान धारणा ने विशेष कठिन क्रिया वाजपेयी जी ने बताया।

पंडित नंद दुलारे जी की समीक्षा अनुसार निराला जी, हिंदी काव्य की प्रथम दार्शनिक कभी और सचेत कलाकार हैं।

निराला जी के विकास के मूल में भावना की अपेक्षा बुद्धि तत्व की प्रधानता है।
जो उनके स्वछंद छंदो, से दिखाई पड़ता है।
उनके काव्य में परंपरा के प्रति, गहरा विद्रोह झलकता है।

छंदोबद्ध संगीतात्मक रचनाओं के द्वारा, निराला जी के काव्य का दूसरा चरण शुरू होता है। बौद्धिकता पर नियंत्रण, भावना युक्त रचना, कला सृष्टि का स्वरुप देने में समर्थ हैं।

निराला जी के काव्य के विकास का तीसरा चरण, गीतिका काव्यों में परिलक्षित होता है। काव्य में विराट बौद्धिक चित्रों के स्थान पर रम्मय आकृतियां अधिक मिलती है।

ऐसा परिवर्तन, निराला के काव्य में, बुद्धि तत्व के कलात्मक परिपक्वता की दिशा में आगे ले जाना है।

शुक्ल जी की मत का खंडन करते हुए, पंडित नंद दुलारे वाजपेयी जी ने कहा।

सार्थक शब्द सृष्टि, प्राढ़ सशक्त पद विन्यास और संगीतात्मकता, निराला जी की हिंदी कविता को प्रमुख देन बताया। शब्द संगीत परखने और व्यवहार में लाने,
में निराला जी आधुनिक हिंदी के दिशा नायक हैं बताया।
— ( साभार हिं. सा. का बृहद इतिहास )

♦ सुखमंगल सिंह जी – अवध निवासी ♦

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  • “सुखमंगल सिंह जी“ ने, बहुत ही सरल शब्दों में सुंदर तरीके से इस Article में समझाने की कोशिश की है की, “पंडित नंद दुलारे वाजपेयी जी ने कहा — सार्थक शब्द सृष्टि, प्राढ़ सशक्त पद विन्यास और संगीतात्मकता, निराला जी की हिंदी कविता को प्रमुख देन बताया। शब्द संगीत परखने और व्यवहार में लाने में निराला जी आधुनिक हिंदी के दिशा नायक हैं बताया।”

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यह लेख (आधुनिक हिंदी के दिशा नायक निराला।) “सुखमंगल सिंह जी” की रचना है। KMSRAJ51.COM — के पाठकों के लिए। आपकी कवितायें / लेख सरल शब्दो में दिल की गहराइयों तक उतर कर जीवन बदलने वाली होती है। मुझे पूर्ण विश्वास है आपकी कविताओं और लेख से जनमानस का कल्याण होगा। आपकी कविताओं और लेख से आने वाली पीढ़ी के दिलो दिमाग में हिंदी साहित्य के प्रति प्रेम बना रहेगा। आपकी लेखन क्रिया यूं ही चलती रहे, बाबा विश्वनाथ की कृपा से।

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ज़रूर पढ़ें: पृथु का प्रादुर्भाव।

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