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KMSRAJ51-Always Positive Thinker

“तू ना हो निराश कभी मन से” – (KMSRAJ51, KMSRAJ, KMS)

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हिन्दी साहित्य

सावन।

Kmsraj51 की कलम से…..

♦ सावन। ♦

आया सावन
अति मनभावन
पड़ गए झूले
अमुआ की डाल पे
चल सखि झूलें
नभ तक ले – लें
पींगे सँभाल के।

आया सावन —
करतल करके
वृक्षों के पात भी
मिल बूँदों से
ख़ुश हो कर के
करते हैं बात भी।

आया सावन —
प्यासी धरती
सूखे हैं गात भी
जल बिन तरसी
बदली बरसी
जल की सौग़ात दी।

आया सावन —
बम-बम भोले
गूँजे शिव द्वार पे
शंकर भोले
सारे बोलें
तू पालनहार रे।

आया सावन —
चूनर धानी
धरती ने ओढ़ ली
बरखा रानी
करे मनमानी
सागर से होड़ की।

आया सावन —
काग़ज़ कश्ती
पानी में डाल के
छोड़ के सुस्ती
मिलकर मस्ती
करते हैं बाल रे।

आया सावन —
साजन सजनी
हाथों में हाथ ले
अपनी अपनी
प्रेम प्रीत की
करते हैं बात रे।

आया सावन —
जंगल – जंगल
नाचे हैं मोर रे
नभ से थल तक
केवल जल-जल
नदियों का शोर रे।
आया सावन,
अति मनभावन।

♦ वेदस्मृति ‘कृती’ जी – पुणे, महाराष्ट्र ♦

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  • “वेदस्मृति ‘कृती’ जी“ ने, बिलकुल ही सरल शब्दों में समझाने की कोशिश की हैं – सावन के मौसम में धीमी – धीमी बारिश का होना, प्रकृति का खूबसूरत दृश्य, झूला-झूलना, हर तरफ हरियाली ही हरियाली, पृथ्वी पर चारो ओर प्रकृति का सुन्दर नज़ारा नजर आती है। मन खुशियों में झूमता है जैसे मोर मस्त होकर नाचता हैं।

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यह गीत/कविता/आर्टिकल (सावन।) ” वेदस्मृति ‘कृती’ जी “ की रचना है। KMSRAJ51.COM — के पाठकों के लिए। आपकी कवितायें/गीत सरल शब्दों में दिल की गहराइयों तक उतर कर जीवन बदलने वाली होती है। मुझे पूर्ण विश्वास है आपकी कविताओं और लेख से जनमानस का कल्याण होगा। आपकी लेखन क्रिया यूँ ही चलती रहे जनमानस के कल्याण के लिए।

साहित्यिक नाम : वेदस्मृति ‘कृती’
शिक्षा : एम. ए. ( अँग्रेजी साहित्य )
बी.एड. ( फ़िज़िकल )
आई आई टी . शिक्षिका ( प्राइवेट कोचिंग क्लासेज़)
लेखिका, कहानीकार, कवियित्री, समीक्षक, ( सभी विधाओं में लेखन ) अनुवादक. समाज सेविका।

अध्यक्ष : “सिद्धि एक उम्मीद महिला साहित्यिक समूह”
प्रदेश अध्यक्ष : अखिल भारतीय साहित्य सदन ( महाराष्ट्र इकाई )
राष्ट्रीय आंचलिक साहित्य संस्थान बिहार प्रान्त की महिला प्रकोष्ठ,
श्री संस्था चैरिटेबल ट्रस्ट : प्रदेश प्रतिनिधि ( महाराष्ट्र )
अंतर्राष्ट्रीय हिंदी परिषद में – सह संगठन मंत्री, मुंबई ज़िला, महाराष्ट्र
हिन्दी और अँग्रेजी दोनों विधाओं में स्वतंत्र लेखन।

अनेक प्रतिष्ठित हिन्दी/अँग्रेजी पत्र – पत्रिकाओं में नियमित रचनाएँ प्रकाशित।

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जैसे शरीर के लिए भोजन जरूरी है वैसे ही मस्तिष्क के लिए भी सकारात्मक ज्ञान और ध्यान रुपी भोजन जरूरी हैं।-KMSRAj51

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“सफलता का सबसे बड़ा सूत्र”(KMSRAJ51)

“स्वयं से वार्तालाप(बातचीत) करके जीवन में आश्चर्यजनक परिवर्तन लाया जा सकता है। ऐसा करके आप अपने भीतर छिपी बुराईयाें(Weakness) काे पहचानते है, और स्वयं काे अच्छा बनने के लिए प्रोत्साहित करते हैं।”

 

“अगर अपने कार्य से आप स्वयं संतुष्ट हैं, ताे फिर अन्य लोग क्या कहते हैं उसकी परवाह ना करें।”~KMSRAj51

 

 

 

 

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प्रातः उठ हरि हर को भज।

Kmsraj51 की कलम से…..

♦ प्रातः उठ हरि हर को भज। ♦

प्रातः उठ हरि हर को भज लो,
धरती का अभिनंदन कर लो।
उल्लसत मनसे बंदन कर लो,
मुक्त कंठ में चंदन धर लो॥

निर्मल पानी गुनगुन पी लो,
चाय की चुस्की रुक कर ले लो।
लिखनी ले साहित्य लिख लो,
प्रातः उठ हरि हर भज लो॥

नित्य – क्रिया में निवृत्ति हो,
गंगा जल ले काया धो लो।
धूप – दीप ले प्रभु से बोलो,
प्रातः उठकर आंखें खोलो॥

पेपर आया उसको पढ़ लो,
देश दुनिया की खबर ले लो।
दूरदर्शन से – मेल कर लो,
प्रातः उठ हरि विनती कर लो॥

भूखा – नंगा जो भी भेजा,
झोली सबकी भर के दे दो।
कोई खाली हाथ न जाये,
प्रातः उठकर प्रभु से बोलो॥

कभी न गलती हरि करने दो,
स्वच्छ हृदय मन भरने को।
अपना हमको प्रभु बना लो,
प्रातः उठ हरिहर को जप लो॥

♦ सुखमंगल सिंह जी – अवध निवासी ♦

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  • “सुखमंगल सिंह जी“ ने, बहुत ही सरल शब्दों में सुंदर तरीके से इस कविता में बताया है, सुबह उठकर आपका नित्य क्रिया कर्म, का क्या क्रम होना चाहिए। जिससे आपका हर एक कार्य शांति पूर्वक, सही समय पर पूर्ण हो जाये।

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यह कविता (प्रातः उठ हरि हर को भज।) “सुखमंगल सिंह जी” की रचना है। KMSRAJ51.COM — के पाठकों के लिए। आपकी कवितायें / लेख सरल शब्दो में दिल की गहराइयों तक उतर कर जीवन बदलने वाली होती है। मुझे पूर्ण विश्वास है आपकी कविताओं और लेख से जनमानस का कल्याण होगा। आपकी कविताओं और लेख से आने वाली पीढ़ी के दिलो दिमाग में हिंदी साहित्य के प्रति प्रेम बना रहेगा। आपकी लेखन क्रिया यूं ही चलती रहे, बाबा विश्वनाथ की कृपा से।

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ज़रूर पढ़ें: पृथु का प्रादुर्भाव।

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“सफलता का सबसे बड़ा सूत्र”(KMSRAJ51)

“स्वयं से वार्तालाप(बातचीत) करके जीवन में आश्चर्यजनक परिवर्तन लाया जा सकता है। ऐसा करके आप अपने भीतर छिपी बुराईयाें(Weakness) काे पहचानते है, और स्वयं काे अच्छा बनने के लिए प्रोत्साहित करते हैं।”

 

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हार्दिक शुभकामनाएं – नीरज चोपड़ा।

Kmsraj51 की कलम से…..

♦ हार्दिक शुभकामनाएं – नीरज चोपड़ा। ♦

खिलते कंवल की तरह, तू राष्ट्रीय पहचान बन गया।
नीरज तू अपने नामानुरूप खिल कर, देश की शान बन गया॥

तूनें तो, एक गौरवमय इतिहास ही रच डाला।
बचपन से शौकीन, पकड़ हाथ में भाला॥

कभी अपने दर्द की भी, तूनें नही की परवाह।
सदैव सपनों को हकीकत में बदलने की, भरी आह॥

बना है तू देश का प्रहरी, अपने स्वप्न को भी शिखर तक पहुचाया।
एक नमन तेरे मात-पिता को, जिनका सीना आज गर्व से भर आया॥

कोटिशः सादर वंदन तेरे गुरु को, जिसने अपने शिष्य के नाम का परचम लहरवाया।
तूनें भी शिष्य-गुरु की परंपरा को रख कायम, गुरु का मान बढ़ाया॥

हार्दिक बधाइयां नीरज चोपड़ा तुम्हें, तू बन गया आज बुलंदी के आसमाँ का सितारा।
इस गौरवमय दिन के लिए, हर भारतीय का दिल ऋणी रहेगा तुम्हारा॥

हार्दिक बधाइयां💐हार्दिक बधाइयां॥

भारत के स्टार जैवलीन थ्रोअर नीरज चोपड़ा ने टोक्यो ओलंपिक में 87.58 मीटर दूर भाला फेंककर गोल्ड मेडल पर अपना कब्जा जमाया है। भारत के पिछले सौ साल के इतिहास में यह ट्रैक एंड फील्ड में पहला ओलंपिक मेडल है। ट्रैक एंड फील्ड में गोल्ड मेडल जीतकर नीरज ने अपना नाम ओलंपिक इतिहास में सुनहरे अक्षरों से दर्ज करवा लिया है।

♦ सुशीला देवी जी – करनाल, हरियाणा ♦

—————

  • “श्रीमती सुशीला देवी जी“ ने, बहुत ही सरल शब्दों में सुंदर तरीके से गोल्ड मेडलिस्ट नीरज चोपड़ा को तहे दिल से हार्दिक शुभकामनाएं दी है, गौरवमयी इतिहास रचने के लिए।

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यह कविता (हार्दिक शुभकामनाएं – नीरज चोपड़ा।) “श्रीमती सुशीला देवी जी” की रचना है। KMSRAJ51.COM — के पाठकों के लिए। आपकी कवितायें सरल शब्दो में दिल की गहराइयों तक उतर कर जीवन बदलने वाली होती है। मुझे पूर्ण विश्वास है आपकी कविताओं और लेख से जनमानस का कल्याण होगा। आपकी लेखन क्रिया यूं ही चलती रहे।

आपका परिचय आप ही के शब्दों में:—

मेरा नाम श्रीमती सुशीला देवी है। मैं राजकीय प्राथमिक पाठशाला, ब्लॉक – घरौंडा, जिला – करनाल, में J.B.T.tr. के पद पर कार्यरत हूँ। मैं “विश्व कविता पाठ“ के पटल की सदस्य हूँ। मेरी कुछ रचनाओं ने टीम मंथन गुजरात के पटल पर भी स्थान पाया है। मेरी रचनाओं में प्रकृति, माँ अम्बे, दिल की पुकार, हिंदी दिवस, वो पुराने दिन, डिजिटल जमाना, नारी, वक्त, नया जमाना, मित्रता दिवस, सोच रे मानव, इन सभी की झलक है।

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भारत में भूतहा जगह कहां और कौन?

Kmsraj51 की कलम से…..

♦ भारत में भूतहा जगह कहां और कौन? ♦

भारत में भूत-ही जगह देखने जब जाइए,
नियम और कानून का पालन करते हुए जाइए।
आप जब स्थानीय आदेश पर चलोगे अगर,
तो पर्यटन का आनंद मिलता रहेगा मंगल॥

पुणे का शनिवार बाड़ा किला है पुराना महान,
बाजीराव पेशवा से जुड़ा हुआ है यह स्थान।
हॉन्टेड माना जाने वाला इस किले के अंदर,
मना किया जाता है सूरज डूबने के बाद जाना॥

राजस्थान के अलवर में स्थित भानगढ़ का किला,
बहुत ही सुंदर सुहाना लेकिन किला है डरावना।
कहते 17 वीं सदी में इसका निर्माण हुआ था,
भूतिया गतविधियों से विद्यमान यह किला है।
सूरज डूबने के बाद शाम से यहां इंट्री बंद रहती,
यहां चाहे कोई राजनीतिक जाए या आए विद्वान॥

मुंबई के कोलाबा में स्थित है मुकेश मिल्स,
देश की 10 हॉन्टेड जगहों में यह शामिल हिल।
फिल्मों की शूटिंग के लिए मशहूर है मिल,
भूतों की कहानियां से भरपूर है सबका दिल॥

राजस्थान से 18 किलोमीटर दूरी पर स्थित गांव,
कुलधरा गांव में कभी 600 परिवार रहते थे।
सुना था रसोई के बाद यहां भी कोई नहीं रहता,
रातों रात गांव छोड़ कर लोग कहीं चले गये॥

हैदराबाद का गोलकुंडा फोर्ट का 13 वीं सदी में निर्माण हुआ,
इस फोर्ट में रानी तारामती की आत्मा रात में चलती है।
जिसको पति के साथ यहां दफनाया गया था,
डांस करती और डांस करने की आवाज आती॥

बृज राजभवन पैलेस कोटा राजस्थान में स्थित,
लगभग 180 वर्ष पुराना बताया जाता रहा है।
पैलेस को 18 सौ अस्सी में हेरिटेज होटल बना दिया गया,
हेरिटेज होटल में एक ब्रिटिश मेजर बर्टन का भूत रहता है।
ब्रिटिश मेजर बर्टन को सन 1857 में ही मारा गया था,
मेजर को भारतीय सिपाहियों ने हीं मारा था॥

दार्जिलिंग का डाव हिल, कुर्सियांग इलाका,
प्राकृतिक खूबसूरती में बहुत ही मशहूर है।
स्थानीय लकड़ हारो का कहना है कि यहां,
बिना सिर वाला एक लड़का टहलता रहता है।
यह इलाका भुतहा अनुभव से भरा हुआ है,
जंगल में लकड़ी काटने वालों ने सिर विहीन लड़का देखा॥

♦ सुखमंगल सिंह जी – अवध निवासी ♦

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  • “सुखमंगल सिंह जी“ ने, बहुत ही सरल शब्दों में सुंदर तरीके से इस कविता में भारत के सभी मुख्य भूतहा जगह के बारे में बताने की कोशिश की है जो काबिले तारीफ है। भारत में भूत-ही जगह देखने जब जाइए, नियम और कानून का पालन करते हुए जाइए। आप जब स्थानीय आदेश पर चलोगे अगर, तो पर्यटन का आनंद मिलता रहेगा मंगल॥

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यह कविता (भारत में भूतहा जगह कहां और कौन?) “सुखमंगल सिंह जी” की रचना है। KMSRAJ51.COM — के पाठकों के लिए। आपकी कवितायें / लेख सरल शब्दो में दिल की गहराइयों तक उतर कर जीवन बदलने वाली होती है। मुझे पूर्ण विश्वास है आपकी कविताओं और लेख से जनमानस का कल्याण होगा। आपकी कविताओं और लेख से आने वाली पीढ़ी के दिलो दिमाग में हिंदी साहित्य के प्रति प्रेम बना रहेगा। आपकी लेखन क्रिया यूं ही चलती रहे, बाबा विश्वनाथ की कृपा से।

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हस्तिनापुर नरेश परीक्षित।

Kmsraj51 की कलम से…..

♦ हस्तिनापुर नरेश परीक्षित। ♦

युधिष्ठिर द्रोपदी आदि से अनुमति लेकर,
श्री कृष्ण ने द्वारिका पुरी का किया प्रस्थान।
आंखों से ओझल हो जाने पर श्री कृष्ण के,
प्रेम जनित उत्कंठा के पर बस अर्जुन गुणवान॥

अभिन्न निर्दयता और प्रेम व्यवहार लिए,
याद पर याद आती रही वहीं बारंबार उन्हें।
शरीर प्राण से रहित होती तो मृत्यु होती सुने,
परंतु श्री कृष्ण वियोग में संसार अप्रिय दिखता उन्हें॥

उन्हीं के सानिध्य में देवताओं और इंद्र को भी,
जीत कर अग्नि देव को खांडव वन दान किया।
अनु जय भीम सेना ने उन्हें की शक्ति सेवा कर,
अभिमानी जरासंध का भी वध था किया॥

जिन राजाओं को जरासंध ने बंदी था बनाया,
उन्हीं बहुत राजाओं को भगवान ने मुक्त कराया।
जिन – जिन दुष्टों ने भरी सभा में महारानी,
द्रोपदी को छूने का साहस रहा किया॥

आंखों में बिखरे आंसू भरकर तब द्रोपदी,
श्री कृष्ण के चरणों में जा गिरी पड़ी।
उस घोर अपमान का बदला लेने को,
भगवान श्री कृष्ण ने प्रण तब था ठाना॥

मन खडयंती दुर्योधन में आकर वन वास में,
ऋषि दुर्वासा ने हमें दुष्कर संकट में डाला था।
बचे पात्र की शाक की एक पत्ती के भोग,
लगाकर श्री कृष्ण ने हम सबको पता उबारा॥

भगवान के प्रताप से युद्ध में भी हमने आकर,
पार्वती सहित शंकर को आश्चर्य में डाला।
युद्धभूमि खुश होकर शंकर ने अस्त्र पशुपति प्रदान किया,
तरह-तरह के अस्त्र-शस्त्र लोक पालों ने हमें दिया॥

श्रेष्ठ पुरुष मुक्ति पाने को जिन चरणों का सेवन करते!
उन्होंने दुर्लभ और दुस्तर कार्यों को भी सरल बना डाला॥

युद्ध क्षेत्र में वही हमारे रथी बने रहे,
गांडीव धनुष और बाण बहुतेरे पर,
जबकि अस्त्र – शस्त्र सब सधे हैं मेरे,
फिर भी आज रथी मैं अर्जुन हूं॥

बड़े-बड़े राजा कल तक जो सिर झुकाते थे,
श्री कृष्ण के बिना वही सब सार शून्य हो गये।
युद्ध क्षेत्र में उनकी दी गई शिक्षाएं सभी हमको,
तब – तक शांति करने वाली होती थी॥

श्री कृष्ण के चरण कमलों का चिंतन करने से,
अर्जुन की चित्तवृत्ति जब निर्मल होने लगी,
भक्ति में गण के प्रवाह, प्रबल प्रवाह मंथन ने,
अर्जुन के सारे विकारों को बाहर कर डाला॥

बुद्ध क्षेत्र के भगवान श्री कृष्ण का उपदेश,
गीता – ज्ञान पुण्यस्मरण के साथ आया पाले।
जन्म मृत्यु रूपी संसार से मुख्य मुड़ता गया,
अपने को श्रीकृष्ण में लगाते हुए चला, लगाते हुए चला॥

लोक सृष्टि के भगवान श्री कृष्ण ने,
यादव शरीर से पृथ्वी का भार उतारा।
उसी मनुष्य के शरीर का उन्होंने,
पृथ्वी से परित्याग कर डाला॥

इधर पृथ्वी पर कलयुग ने आकर पांव पसारा,
देख महाराज युधिष्ठिर ने महाप्रस्थान का निश्चय कर डाला।
सहित समान गुणों से युक्त पौत्र परीक्षित को,
समुद्री से गिरी हस्तिनापुर का राजा बना डाला॥

♦ सुखमंगल सिंह जी – अवध निवासी ♦

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  • “सुखमंगल सिंह जी“ ने, बहुत ही सरल शब्दों में सुंदर तरीके से इस कविता में बताया हैं की — किस तरह सभी देवी देवताओं ने महाराजा परीक्षित को तरह-तरह के अस्त्र-शस्त्र प्रदान किया। हस्तिनापुर नरेश परीक्षित के जीवन पर सटीक प्रकाश डाला है। अर्जुन का श्रीकृष्ण के प्रति भक्ति और प्रेम को दर्शाया हैं।

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यह कविता (हस्तिनापुर नरेश परीक्षित।) “सुखमंगल सिंह जी” की रचना है। KMSRAJ51.COM — के पाठकों के लिए। आपकी कवितायें / लेख सरल शब्दो में दिल की गहराइयों तक उतर कर जीवन बदलने वाली होती है। मुझे पूर्ण विश्वास है आपकी कविताओं और लेख से जनमानस का कल्याण होगा। आपकी कविताओं और लेख से आने वाली पीढ़ी के दिलो दिमाग में हिंदी साहित्य के प्रति प्रेम बना रहेगा। आपकी लेखन क्रिया यूं ही चलती रहे, बाबा विश्वनाथ की कृपा से।

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“सफलता का सबसे बड़ा सूत्र”(KMSRAJ51)

“स्वयं से वार्तालाप(बातचीत) करके जीवन में आश्चर्यजनक परिवर्तन लाया जा सकता है। ऐसा करके आप अपने भीतर छिपी बुराईयाें(Weakness) काे पहचानते है, और स्वयं काे अच्छा बनने के लिए प्रोत्साहित करते हैं।”

 

“अगर अपने कार्य से आप स्वयं संतुष्ट हैं, ताे फिर अन्य लोग क्या कहते हैं उसकी परवाह ना करें।”~KMSRAj51

 

 

 

 

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अंतरराष्ट्रीय मित्रता दिवस।

Kmsraj51 की कलम से…..

♦ अंतरराष्ट्रीय मित्रता दिवस। ♦

आज बहुत ही, शुभ मंगल घड़ी आई।
सबको आज मित्रता दिवस की हार्दिक बधाई॥

मित्रता श्रीकृष्ण और सुदामा की, दुनिया में हो गए चर्चे।
महान थी उनकी मित्रता, दिए ब्रह्मांड ने भी अव्वल दर्जे॥

आओं मित्रों, अपने दिलों में मंथन करें आज।
जुबां से न बोलें सुदामा, फिर भी श्री कृष्ण ने सँवारे काज॥

एक भरोसा, एक आस्था, विश्वास था, दोस्ती के नाम में।
दुनिया भर की खुशी देखी, बस अपने श्याम में॥

अगाध प्रेम, श्रद्धा रखी थी, सुदामा ने अपने मित्र में।
जब-जब दोस्त का चेहरा देखें,
भगवान का ही अक्स नजर आए, उनके चित्र में॥

स्वार्थ वशीभूत होकर सुदामा ने,
कभी अपनी जिंदगी की व्यथा नही सुनाई।
ना ही कभी, अपने मित्र के समक्ष रखी गरीबी की दुहाई॥

सिर्फ एक लगन में ही, सुदामा रमें जा रहा था।
बस मित्रता के नाम में, भगवान जपे जा रहा था॥

बचपन के छुटे सब संगी साथी, रखी बस दोस्ती दिल मे निभायें।
निश्चल प्यार, दुलार की लगन रखी, श्री कृष्ण से लगाएं॥

था वो बहुत ही शुभ दिन, जब भगवान के घर भक्त चला आया।
भगवान ने भी मित्रता को ही, सर्वोपरि मान, मित्र को गले लगाया॥

वो एक ऐतिहासिक दिन था, जब भगवान भक्त के,
प्यार, आस्था, विश्वास से लबालब हो गया।
सिहांसन पर बैठा, चरण धोकर मित्र भक्त सुदामा के,
और भगवान भक्त के वश में हो गया॥

आओं, हम भी मित्रता के शब्द को सार्थकता में पिरोए।
आस्था, लग्न, प्रेम को सच्चे अर्थों में ही सँजोये॥

अपने जीवन में सदैव ही, सच्ची मित्रता के बोए मोती।
मित्र बने और बनायें ऐसे,
जो तेरे पथ को प्रकाशवान करें, ऐसी जगाए ज्योति॥

♦ सुशीला देवी जी – करनाल, हरियाणा ♦

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  • “श्रीमती सुशीला देवी जी“ ने, बहुत ही सरल शब्दों में सुंदर तरीके से, कविता के माध्यम से इस कविता में कवयित्री ने श्री कृष्ण और सुदामा की मित्रता का उदाहरण देकर, एक सच्चे मित्र के गुणों और व्यवहार का सुंदर मनोरम वर्णन किया है।

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यह कविता (अंतरराष्ट्रीय मित्रता दिवस।) “श्रीमती सुशीला देवी जी” की रचना है। KMSRAJ51.COM — के पाठकों के लिए। आपकी कवितायें सरल शब्दो में दिल की गहराइयों तक उतर कर जीवन बदलने वाली होती है। मुझे पूर्ण विश्वास है आपकी कविताओं और लेख से जनमानस का कल्याण होगा। आपकी लेखन क्रिया यूं ही चलती रहे।

आपका परिचय आप ही के शब्दों में:—

मेरा नाम श्रीमती सुशीला देवी है। मैं राजकीय प्राथमिक पाठशाला, ब्लॉक – घरौंडा, जिला – करनाल, में J.B.T.tr. के पद पर कार्यरत हूँ। मैं “विश्व कविता पाठ“ के पटल की सदस्य हूँ। मेरी कुछ रचनाओं ने टीम मंथन गुजरात के पटल पर भी स्थान पाया है। मेरी रचनाओं में प्रकृति, माँ अम्बे, दिल की पुकार, हिंदी दिवस, वो पुराने दिन, डिजिटल जमाना, नारी, वक्त, नया जमाना, मित्रता दिवस, सोच रे मानव, इन सभी की झलक है।

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“स्वयं से वार्तालाप(बातचीत) करके जीवन में आश्चर्यजनक परिवर्तन लाया जा सकता है। ऐसा करके आप अपने भीतर छिपी बुराईयाें(Weakness) काे पहचानते है, और स्वयं काे अच्छा बनने के लिए प्रोत्साहित करते हैं।”

 

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आदि शंकराचार्य कलयुग के प्रथम गुरु।

Kmsraj51 की कलम से…..

♦ आदि शंकराचार्य कलयुग के प्रथम गुरु। ♦

कलयुग में साक्षात शिव रूप में अवतरित हुए,
गुरु आदि शंकराचार्य।
दूर किया मानव के भाती – भाती कलशों को,
आदि शंकराचार्य की तरह आंख मूंदकर,
हठ और तर्क नहीं करते॥

वे शास्त्रीय ढंग से शास्त्र प्रमाण युक्त बातें करते,
सत्य रूप अनुभव और अनुभूतियों से संदेश लोक में देते।
शिव के वैभव और शिष्टता को संसार में,
मुक्त कंठ से बदला आने वाले॥

कलयुग में अवतार लेने वाले सिद्ध गुरुओं में से एक,
आचार्यों में अद्वितीय है आदि शंकराचार्य।
सर्वज्ञान संपन्न महा पंडित जी आदि शंकराचार्य,
ब्रह्मा अनुभूति में रमण करने वाले ब्रह्म ज्ञानी॥

विभिन्न शक्तियों सिद्धियों से युक्त सिद्ध पुरुष शंकराचार्य,
आचार्यों की तरह साधारण पुरुष नहीं थे आदि शंकराचार्य।
असत्य बाद से दूर सत्यवादी थे आदि शंकराचार्य,
बुद्धि वाद या भ्रांति वाद से अलग अनुभूति वादी आदि शंकराचार्य॥

यथार्थवादी गुणों से भरपूर संपन्न आदि शंकराचार्य,
आचार्यों की भांत संकुचित होकर,
देवताओं की निंदा कभी नहीं किया है शंकराचार्य॥

शिव की जितनी उपासना किया उन्होंने,
उतनी ही जगदंबा, विष्णु, नरसिंह स्वामी आदि देवताओं की।
शिवानंद लहरी नामक ग्रंथ की अद्भुत ढंग से लिखा,
अद्वितीय शैली की रचना कर रहस्य ज्ञान को व्यक्त किया॥

जिस प्रकार ज्ञानी को ज्ञानी ही पहचान सकता,
सर्वोत्तम को जिस प्रकार सर्वोत्तम ही पहचानता।
उसी तरह महा ज्ञानी सर्वोत्तम महागुरु आदि शंकराचार्य,
देवाधिदेव शिव शंकर स्वरूप है आदि शंकराचार्य॥

♦ सुखमंगल सिंह जी – अवध निवासी ♦

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  • “सुखमंगल सिंह जी“ ने, बहुत ही सरल शब्दों में सुंदर तरीके से इस कविता में कवि ने, आदि शंकराचार्य जी के गुणों, शक्तियों और कार्यों को समझाने की कोशिश की है। आदि शंकराचार्य जी कलयुग के प्रथम गुरु है।

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यह कविता (आदि शंकराचार्य कलयुग के प्रथम गुरु।) “सुखमंगल सिंह जी” की रचना है। KMSRAJ51.COM — के पाठकों के लिए। आपकी कवितायें / लेख सरल शब्दो में दिल की गहराइयों तक उतर कर जीवन बदलने वाली होती है। मुझे पूर्ण विश्वास है आपकी कविताओं और लेख से जनमानस का कल्याण होगा। आपकी कविताओं और लेख से आने वाली पीढ़ी के दिलो दिमाग में हिंदी साहित्य के प्रति प्रेम बना रहेगा। आपकी लेखन क्रिया यूं ही चलती रहे, बाबा विश्वनाथ की कृपा से।

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“सफलता का सबसे बड़ा सूत्र”(KMSRAJ51)

“स्वयं से वार्तालाप(बातचीत) करके जीवन में आश्चर्यजनक परिवर्तन लाया जा सकता है। ऐसा करके आप अपने भीतर छिपी बुराईयाें(Weakness) काे पहचानते है, और स्वयं काे अच्छा बनने के लिए प्रोत्साहित करते हैं।”

 

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राष्ट्र भक्त बनाना होगा।

Kmsraj51 की कलम से…..

♦ राष्ट्र भक्त बनाना होगा। ♦

रक्षा सुरक्षा का साजो सामान,
सुरक्षित शस्त्र आगामी रखना।
देश के रक्षक नौजवान हो को,
महत्वपूर्ण सहयोग करना होगा।

अस्त्र – शस्त्र विद्या की बरसा से,
बचने के लिए वंकर बनाना होगा।
आडंबर के भंवरे झाल का भी,
समूल रूप से नष्ट करना होगा।

महा पराक्रमी हिरण्याक्ष का सा,
फिर – फिर बध करना ही होगा।
जयद्रथ जैसी झूठ बोलने वाले,
को भी वैसा ही वध करना होगा।

भूखे प्यासे व्याकुल हो तो उसका,
हमें भरण – पोषण करना होगा।
कोई न भूखा नंगा रहे अपने राष्ट्र में,
विधि पूर्वक व्यवस्था करनी होगी।

देवी – देवताओं की पराक्रम गाथा,
शरणागत वत्सल को सुहाना होगा।
गृहस्थ आश्रम में रहकर सभी को,
गृहस्थ – धर्म अनुसार रहना होगा।

बुद्धिमानों को आवश्यकता अनुसार,
घर और राष्ट्र की सेवा करनी होगी।
सारी समाज को भी आगे आकर,
राष्ट्र भक्ति में योगदान करनी होगी।

गुरुकुल के नियमों में ही अब,
सत्संगी तुमको भी चलना होगा।
शास्त्र विद्या की यादें साथ – साथ,
शस्त्र विद्या का ध्यान करना होगा।

अर्जुन सा श्री कृष्ण का उपदेश,
प्रजाओं ने प्रचार करना होगा।
एकलव्य के धनुर्विद्या का ज्ञान,
शिक्षा साधारण को देनी होगी।

धर्म के अनुसार करता का ध्यान,
सारी समाज को करना होगा।
धर्म के अंदर अनादर करता का,
त्याग समाज को करना होगा।

तीर्थ का सेवन कराकर उसका,
अंतकरण से शुद्ध कराना होगा।
तत्व ज्ञानियों से शिक्षा का ज्ञान,
पास उनके जाकर लेना होगा।

पवित्र कथाओं का चरण बद्ध,
प्रचार – प्रसार भी करना होगा।
प्राकृतिक कोसी बचने के उपाय,
यज्ञ अनुष्ठान सब करना होगा।

♦ सुखमंगल सिंह जी – अवध निवासी ♦

—————

  • “सुखमंगल सिंह जी“ ने, बहुत ही सरल शब्दों में सुंदर तरीके से, कविता के माध्यम से बखूबी समझाने की कोशिश की है – इस कविता में कवि ने बताया है हम सभी को मिलकर ये प्रयास करना है की जो भूखे प्यासे व्याकुल हो तो उसका हमें भरण – पोषण करना होगा। कोई न भूखा नंगा रहे अपने राष्ट्र में विधि पूर्वक व्यवस्था करनी होगी। गृहस्थ आश्रम में रहकर सभी को गृहस्थ – धर्म अनुसार रहना होगा। शास्त्र विद्या के साथ-साथ शस्त्र विद्या का ध्यान करना होगा।

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यह कविता (राष्ट्र भक्त बनाना होगा।) “सुखमंगल सिंह जी” की रचना है। KMSRAJ51.COM — के पाठकों के लिए। आपकी कवितायें / लेख सरल शब्दो में दिल की गहराइयों तक उतर कर जीवन बदलने वाली होती है। मुझे पूर्ण विश्वास है आपकी कविताओं और लेख से जनमानस का कल्याण होगा। आपकी कविताओं और लेख से आने वाली पीढ़ी के दिलो दिमाग में हिंदी साहित्य के प्रति प्रेम बना रहेगा। आपकी लेखन क्रिया यूं ही चलती रहे, बाबा विश्वनाथ की कृपा से।

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पावन माह सावन।

Kmsraj51 की कलम से…..

♦ पावन माह सावन। ♦

पावन माह सावन में, देव शिव भी चले आयें।
इंद्रदेव भी उनके स्वागत में, मेघों से जल बरसाये।
मंगल ही मंगल होगा, अब तो सब।
सारे संकट संसार के, भोले भंडारी हर लेगें अब॥

इस पावन श्रावण मास में जप से ही,
त्रिलोकी नाथ ने सबको भव से उतार दिया।
माता पार्वती की भक्ति से प्रसन्न हो,
उनको वर का उपहार दिया॥

श्रावण मास में ही शिव ने,
समुन्द्र मंथन का विष-पान कर डाला।
समस्त ब्रह्मांड के कष्टों को,
इस भोले ने पल में हर डाला॥

ऋषि मार्कण्डेय की भी भक्ति से,
प्रसन्न हो, दिया ऐसा वरदान।
यमदेव भी नतमस्तक हो सम्मुख इसके,
इसकी भक्ति को दिया मान॥

आओं इस सावन मास, हम सब
इस अमरनाथ को रिझाएँगे।
कर अर्पण दूध-जल शिवलिंग पर,
संसार की खुशियाँ ये त्रिलोकी दे जायेंगे॥

कष्टों का जो फैला दिया इस महामारी ने,
अपना प्रकोप, इस जग में।
शिव-शक्ति कर देगी कल्याण, इसकी श्रद्धा,
आस्था, भक्ति बसा लो, अपने रग-रग में॥

♦ सुशीला देवी जी – करनाल, हरियाणा ♦

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  • “श्रीमती सुशीला देवी जी“ ने, बहुत ही सरल शब्दों में सुंदर तरीके से, कविता के माध्यम से इस कविता में कवयित्री ने सावन का पवित्र महीना जो की, वर्षा, हरियाली, खेतों में रौनक, और शिव की भक्ति से सराबोर होता है, भोले शिव के गुणों और शक्तियों व उनका संसार के प्रति कल्याणकारी कार्यों का अच्छे से वर्णन किया है।

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यह कविता (पावन माह सावन।) “श्रीमती सुशीला देवी जी” की रचना है। KMSRAJ51.COM — के पाठकों के लिए। आपकी कवितायें सरल शब्दो में दिल की गहराइयों तक उतर कर जीवन बदलने वाली होती है। मुझे पूर्ण विश्वास है आपकी कविताओं और लेख से जनमानस का कल्याण होगा। आपकी लेखन क्रिया यूं ही चलती रहे।

आपका परिचय आप ही के शब्दों में:—

मेरा नाम श्रीमती सुशीला देवी है। मैं राजकीय प्राथमिक पाठशाला, ब्लॉक – घरौंडा, जिला – करनाल, में J.B.T.tr. के पद पर कार्यरत हूँ। मैं “विश्व कविता पाठ“ के पटल की सदस्य हूँ। मेरी कुछ रचनाओं ने टीम मंथन गुजरात के पटल पर भी स्थान पाया है। मेरी रचनाओं में प्रकृति, माँ अम्बे, दिल की पुकार, हिंदी दिवस, वो पुराने दिन, डिजिटल जमाना, नारी, वक्त, नया जमाना, मित्रता दिवस, सोच रे मानव, इन सभी की झलक है।

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साहित्य समाज और संस्कृति।

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♦ साहित्य समाज और संस्कृति। ♦

शोध सारांश —

साहित्य समाज का दर्पण है और समाज का निर्माण संस्कृति से होता है। वास्तव में साहित्य समाज और संस्कृति तीनो ही एक दूसरे के अनुपूरक कहे जा सकते हैं, क्योंकि किसी एक का भी अस्तित्व दूसरे के बिना संभव हो ही नहीं सकता।

इतिहास इस बात का साक्षी है कि मानव ने किस प्रकार आदिम युग से लेकर आज तक के वैज्ञानिक युग का सफर तय किया है। वह जंगल और गुफाओं से होता हुआ आज अंतरिक्ष तक पहुंच गया है।

विज्ञान की उपलब्धि में जहां उसका मस्तिष्क, अभिप्रेरणा, प्रयास उसका आधार बने हैं वही अपनी मानव सुलभ भावनाओं को संतुष्ट करने के लिए, हृदय में उठने वाले भावों को अभिव्यक्ति प्रदान करने के लिए उसे अनेक साहित्यिक विधाओं का आश्रय भी लेना पड़ा है। यहीं से आरंभ होता है “सृजन”। जिसमें प्रत्यक्ष या परोक्ष रुप से झलक होती है उसकी भाषा (मातृभाषा) की। यह अटल सत्य है।

आप किसी भी देश का साहित्य उठाकर देख लीजिए, उसमें जो विशेषता होगी, वह वहां की मिट्टी की सुगंध लिए होगी, मातृभाषा की झंकार उस में व्याप्त होगी। क्योंकि बिना मातृभाषा के साहित्यिक रचनाओं में मौलिकता का गुण आ ही नहीं सकता। किसी भी साहित्यिक रचना में वो भाव, वो प्रेरणा, वो समर्पण, वो सच्चाई, वो मौलिक चिंतन, अपनी मातृभाषा के प्रति प्रेम यह सब कुछ साहित्यिक रचना के प्राण होते हैं।

प्रस्तुत शोध पत्र में हम यह सार्थक प्रयास करने का यत्न करेंगे कि “साहित्य समाज और संस्कृति” के अंतर्संबंधों का पूर्णतया सारगर्भित विश्लेषण किया जा सके तथा संगोष्ठी के अन्य उपविषयों से भी प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से प्रस्तुत शोध पत्र की परस्पर निर्भरता सिद्ध की जा सके।

परिचय —

“भाषा समाज और संस्कृति” संगोष्ठी का एक ऐसा विषय है जो समग्रता लिए हुए है। वास्तविक अर्थों में आजकल के समाज, साहित्य और भाषा की जो स्थिति है वह सही नहीं है। संस्कारों से भाषा में अपेक्षित सुधार हो सकता है, भाषा से संस्कृति का सुधार संभव है और संस्कृति से समाज में अपेक्षित परिवर्तन हो सकता है।

और जब इन तीनों में ही अवश्यमेव सुधार होंगे तो उससे हमारा देश सुधर सकता है, विश्व सुधर सकता है, आने वाली पीढ़ियों का भविष्य, उनकी मानसिकता, उनके मूल्य, उनकी नैतिकता, उनका चारित्रिक बल, धार्मिकता, सामाजिकता संबंधी आचरण सुधर सकते हैं और हम सब का यही तो कर्तव्य है और प्रबुद्ध वर्ग की यही तो चिंता है कि किन उपायों से इन सब में सार्थक सुधार लाया जा सके।

आज जिस तरह हिंदी सिनेमा और सोशल मीडिया की भाषा और संस्कृति हमारे समाज को दिन – प्रतिदिन विकृत किए जा रहे हैं, हमारी युवा पीढ़ी को पथभ्रष्ट कर रहे हैं वह चिन्तनीय है। वर्तमान में हमारे समाज की यह स्थिति है कि —

“आज दिवस में तिमिर बहुत है, जैसे हो सावन की भोर,
मानव तो आकाश की ओर, मानवता पाताल की ओर”।

हम सभी को यह सार्थक प्रयास करने होंगे, इस प्रकार उपाय किए जाएं कि “समाज और संस्कृति के बीच अंत: संबंध” स्थापित हो सके। और वह ऐसे कौन से यत्न किये जाने चाहिए, कौन से ऐसे प्रबंध होने चाहिए कि जिन्हें “समाज और संस्कृति के अंत: सूत्रों” की संज्ञा दी जा सके।

समय – समय पर सरकार द्वारा, सामाजिक, मनोवैज्ञानिक विशेषज्ञों द्वारा इस बात पर निरंतर चिन्तन किया जाता रहा है कि “सत्ता, भाषा और समाज’ में टकराव की स्थिति उत्पन्न होने के स्थान पर ऐसी व्यवस्था की जाए, जिससे सत्ता भाषा और समाज के मिलन की एकरूपता, समरसता की स्थिति कायम की जा सके।

इन्हीं सब उपायों को अपनाकर ही हम “भाषा, समाज और संस्कृति के द्वारा राष्ट्रीय एकता” कायम करने में कामयाब सिद्ध हो सकते हैं।

इस प्रकार हमने देखा कि संगोष्ठी का मुख्य विषय तथा उसके सारे उप विषय किस प्रकार एक दूसरे पर आश्रित हैं, अंतर संबंधित हैं, और अंत में सभी का एक ही लक्ष्य है “राष्ट्रीय एकता”।

साहित्य का स्वरूप, भाषा, समाज और संस्कृति —

भाषा, समाज, सभ्यता और संस्कृति के संबंध में पाश्चात्य विद्वान “ग्रीन” का मत दर्शनीय है —

“एक संस्कृति तभी सभ्यता बनती है जबकि उसके पास एक लिखित भाषा, दर्शन विशेषीकरण युक्त श्रम विभाजन, एक जटिल विधि और राजनीतिक प्रणाली हो”।

इस संदर्भ में एक और विद्वान का मत।

“जिसबर्ट” के अनुसार, सभ्यता बताती है कि, ‘हमारे पास क्या है’, और संस्कृति यह बताती है कि, ‘हम क्या हैं’।

साहित्य क्या है? इसका स्वरूप क्या है? यह समाज से किस प्रकार संबंधित है? और यह संस्कृति को किस प्रकार अपने अंदर समेटे हुए है? तथा किस प्रकार संस्कृति को प्रभावित करता है? एवम किस प्रकार यह संस्कृति से प्रभावित होता है? यह सब महत्वपूर्ण बिंदु है।

किसी भी प्रकार के साहित्य की मूल चेतना या भावना, मुख्य आधार, मानव समाज की चहुँमुखी उन्नति ही होती है। प्रत्येक प्रकार के साहित्य का यह उद्देश्य होता है कि मानव हर प्रकार के राग, द्वेष, घृणा, ईर्ष्या, शोषण, कलुषित विचार आदि दुर्भावनाओं को त्याग कर, उस परमपिता परमेश्वर, सर्वशक्तिमान ईश्वर की सत्ता को, उसकी शक्ति को जानने का प्रयास करता हुआ, “आत्मवत सर्व भूतेषु” यानी सभी को अपने समान समझने का प्रयास करे तथा “सर्वे भवंतु सुखिन:” का भाव लेकर “परमार्थ” “बहुजन हिताय, बहुजन सुखाय” के सिद्धान्त को अपने जीवन में उतार ले।

यह अकाट्य सत्य है कि जितना साहित्य हमारे भारत में है, जितना विषय वैविध्य हमारे साहित्य में है, उतना किसी भी अन्य देश के साहित्य में हो ही नहीं सकता। हमारा तो एक-एक ग्रंथ ही सर्वकालिक Timeless है कि जिसके सिद्धांत आज से हजारों वर्ष पूर्व भी उतने ही प्रासंगिक थे, जितने आज है।

सिर्फ एक ग्रंथ “श्रीमद्भगवद्गीता” को ही लीजिए जो विश्व प्रसिद्ध है। सिर्फ यदि इसी एक ग्रंथ को ही आत्मसात कर लिया जाए तो मानव मात्र का जीवन सुधर सकता है, तो फिर अन्य साहित्य की तो बात ही क्या है।

हमारा साहित्य हमें धार्मिकता, नैतिकता, सामाजिकता, नीति राजनीति, आर्थिकता आदि सभी गुण सिखाता हैं। हमारे साहित्य में ज्ञान है, वैराग्य है, नीति है, श्रृंगार है, भक्ति है, प्रेम है, वात्सल्य है, करुणा है, ओज है, वीरता है, प्रकृति प्रेम है, जीव प्रेम है।

हिंदी साहित्य के इतिहास को इन्हीं गुणों के आधार पर विभक्त किया गया है, जैसे —

वीरगाथा काल, भक्तिकाल, रीतिकाल और आधुनिक काल।

जिस काल में जिस भाव, जिस प्रकार के साहित्य की प्रधानता रही, उसे उसी के नाम से संबोधित किया गया है। यही साहित्य, स्वस्थ सभ्यता एवं संस्कृति का निर्माण करने में सहायक है, जो हमारी पहचान है, भारतीयता की पहचान है।

इस प्रकार हम देखते हैं कि हमारे साहित्य में एक और जहां विष्णु शर्मा जी ने पंचतंत्र के माध्यम से ज्ञान, जीव प्रेम, प्रकृति प्रेम, पारिस्थितिकीय संतुलन आदि का संप्रेषण किया जो सभी के लिए हर युग में प्रासंगिक है तथा पर्यावरण संरक्षण, शाकाहार की भावना को पोषण प्रदान करता है जो कि वर्तमान की एक समस्या तथा आवश्यकता बन चुकी है।

साहित्य, साहित्यकार, समाज और संस्कृति —

साहित्य समाज का दर्पण है, यह हम सब जानते हैं। आत्मा और शरीर का जो संबंध है वही संबंध साहित्य और समाज का है। यह शाश्वत सत्य है कि साहित्य की अपेक्षा समाज पहले जन्म लेता है। समाज से ही साहित्यकार जन्म लेते हैं।

साहित्यकार के व्यक्तित्व की पहचान अलग होती है। सच्चे साहित्यकार गंभीर, चिंतनशील, संवेदनशील, दूरदृष्टा, व्यापक दृष्टिकोण रखते हुए भावना और सम्वेदनाओं से परिपूर्ण होते हैं। क्योंकि अपनी लेखनी से वो जिस साहित्य का निर्माण करते हैं, सृजन करते हैं, वह भविष्य में समाज का, संस्कृति का निर्माण करता है।

इसलिए प्रत्येक साहित्यकार यह प्रयास करता है कि वह जिस विषय पर साहित्य का सृजन करे, उसकी जड़ें समाज से, उसकी समस्याओं से गहराई से जुड़ी हुई हों।ज्वलंत मुद्दों पर भी अपनी बात कहने से पूर्व उक्त सामाजिक विषय से संबंधित पूर्ण जानकारी प्राप्त करना अनिवार्य है, क्योंकि साहित्यकार की कलम से निकला एक-एक शब्द समाज में परिवर्तन लाने में सक्षम है।

‘कलम के सिपाही’ सामाजिक जन चेतना लाने का कार्य करते रहे हैं। अतः लेखक अथवा कवि (साहित्यकार) अपने समाज की हर गतिविधि, हर परिस्थिति में ही जीता है, उनसे प्रभावित होता रहा है। वह किसी भी रुप से समाज से अलग नहीं हो सकता। वह इसी समाज में ही रहकर इसके प्रभावों को, इन परिवर्तनों को, इन समस्याओं को जानता है, क्योंकि वह भी तो एक सामाजिक प्राणी ही है।

साहित्य, समाज और संस्कृति अन्योन्याश्रित —

प्रत्येक समाज का एक सांस्कृतिक आधार भी होता है। प्रत्येक संस्कृति, उस समाज की आत्मा, उसकी पहचान होती है, जिस प्रकार किसी भी प्रकार की सभ्यता एवं संस्कृति में व्याप्त अच्छाई और बुराई को हम सब देखते हैं, महसूस करते हैं कि यह हमारे समाज में किस प्रकार फैल रही है, समाज को दूषित कर रही है, संस्कारों का हनन कर रही है।

उसी प्रकार साहित्यकार इन सब को देखते हुए, इन सब पर अपनी व्याख्या प्रदान करते हुए, समाज में परिवर्तन लाने का प्रयास करते हैं, और यह कार्य करना अपना कर्तव्य समझते हैं, क्योंकि —

“केवल मनोरंजन ही न कवि का कर्म होना चाहिए ,
उसमें उचित उपदेश का भी मर्म होना चाहिए”।

इतिहास साक्षी है कि मानव सभ्यता के विकास में साहित्य का महत्वपूर्ण योगदान रहा है। नवीन विचारों ने साहित्य को जन्म दिया तथा साहित्य ने मानव की विचारधाराओं में गतिशीलता प्रदान करते हुए उसे सभ्य बनाने का कार्य किया है।किसी भी राष्ट्र या समाज में आज तक जितने भी परिवर्तन आए हैं, वो सब साहित्य और संस्कृति के माध्यम से ही आए हैं।

साहित्यकार समाज में फैली कुरीतियों, विकृतियों, विसंगतियों, अभावों, विषमताओं व असमानताओं आदि के बारे में अपने विचार, सुझाव, उपाय आदि प्रस्तुत करता है। इन सब के प्रति जनसाधारण को जागरुक करने का प्रयास करता है।

वर्तमान में साहित्य को ज्ञानवर्धक, मूल्यवर्धन, मनोरंजक बनाने के लिए सोशल मीडिया, सिनेमा का आश्रय लिया जा रहा है जो कुछ – कुछ हद तक उचित भी है, क्योंकि लिखित साहित्य में ज्ञान, मूल्य, नीति, संस्कार आदि सब कुछ तो है परंतु मनोरंजक तत्व नहीं।

अतः साहित्य को दृश्य, श्रव्य भाव के साथ मनोरंजक भी बनाते हुए जनमानस तक पहुंचाने का कार्य एक अनूठा प्रयास रहा है। इससे समाज में गहरा परिवर्तन देखने को मिला है। 80 के दशक में रामानंद सागर द्वारा लिखित और निर्देशित धारावाहिक “रामायण” तथा बी आर चोपड़ा द्वारा निर्देशित धारावाहिक “महाभारत” का नाम इस श्रेणी में लिया जा सकता है जिन्होंने समाज में सकारात्मक परिवर्तन किए, जनमानस को भारतीय सभ्यता एवं संस्कृति का दर्शन कराया, मानवीय मूल्यों से अवगत कराया तथा वर्तमान पीढ़ी को सामाजिक, नैतिक, मानवीय मूल्यों को परोक्ष भाव में ही सिखा दिया।

साहित्य के विकास की कहानी उतनी ही पुरानी है जितनी कि मानव सभ्यता। अतः यह नितांत आवश्यक है कि साहित्य लेखन, संशोधन, परिवर्द्धन निरंतर जारी रहना चाहिए। अन्यथा सभ्यता का विकास ही अवरुद्ध हो जाएगा।

भारत की अपनी विशिष्ट सभ्यता एवं संस्कृति रही है। “भा” का अर्थ हुआ प्रकाश। “रत” का अर्थ है संलिप्तता। यानि “भारत” का अर्थ हुआ प्रकाश में दत्तचित्त होकर अनुष्ठान करने से संप्राप्त संस्कार, और संपन्नता। यही भारतीय संस्कृति है। यही संस्कृति समाज से, साहित्य से अनादि काल संपोषित होती चली आ रही है और आगे भी इसी तरह संपोषित, संवर्धित होती रहेगी।

निष्कर्ष —

निष्कर्षत: यही कहा जा सकता है कि वास्तव में हर देश का साहित्य उस देश की लौकिक सभ्यता एवं संस्कृति, मातृभाषा, लोक गीत, लोक भाषाओं, (जन भाषाओं) तथा तत्कालीन परिस्थितियों (सामाजिक, आर्थिक, नैतिक, राजनीतिक) को भी उजागर करता है। साहित्य एक राष्ट्र की धरोहर है, उसका अभिमान है, गौरव है, पहचान है।

प्रत्येक युग का साहित्य उस युग की पहचान, उस युग का वैशिष्टय बताता है। अब इससे अधिक और क्या कहा जाए कि प्राचीन वैदिक साहित्य भारत के उन्नत और गौरवशाली समाज का प्रमाण है। इस साहित्य में “विश्व मानव” (वैश्विक एकता) और “वसुधैव कुटुंबकम” की जो भावना है, वह विशुद्ध भारतीय संस्कृति की महानता, विशालता, नि: स्वार्थपरता, लोक कल्याणकारी भावनाओं की परिचायक है।

हमारा साहित्य समाज को न केवल ज्ञान, बोध और मूल्य प्रदान करता है अपितु एक चिंतन की दिशा भी प्रदान करता है ताकि हम सभी यथासंभव प्रयास कर सके जिससे कि भारतीय मूल्य, भारतीय सभ्यता एवम संस्कृति, भारतीय साहित्य का विश्व में सदैव उच्चस्थ स्थान बना रहे तथा भारत पुन: “जगदगुरु” (विश्वगुरु) की उपाधि ग्रहण करे वो भी अपने अक्षय साहित्य, विशुद्ध सभ्यता एवं अलौकिक संस्कृति के बल पर।

इन्ही शुभकामनाओं के साथ — शुभमस्तु।

ज़रूर पढ़ें — नारी : इच्छा शक्ति ज्ञान शक्ति कर्म शक्ति।

♦ डॉ विदुषी शर्मा जी – नई दिल्ली ♦

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  • ” लेखिका डॉ विदुषी शर्मा जी“ ने अपने इस शोध लेख से, बहुत ही सरल शब्दों में सुंदर तरीके से बखूबी समझाने की कोशिश की है – वास्तव में हर देश का साहित्य उस देश की लौकिक सभ्यता एवं संस्कृति, मातृभाषा, लोक गीत, लोक भाषाओं, (जन भाषाओं) तथा तत्कालीन परिस्थितियों (सामाजिक, आर्थिक, नैतिक, राजनीतिक) को भी उजागर करता है। साहित्य एक राष्ट्र की धरोहर है, उसका अभिमान है, गौरव है, पहचान है।

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यह शोध लेख (साहित्य समाज और संस्कृति।) “डॉ विदुषी शर्मा जी” की रचना है। KMSRAJ51.COM — के पाठकों के लिए। आपकी लेख / कवितायें सरल शब्दो में दिल की गहराइयों तक उतर कर जीवन बदलने वाली होती है। मुझे पूर्ण विश्वास है आपकी कविताओं और लेख से जनमानस का कल्याण होगा। आपकी लेखन क्रिया यूं ही चलती रहे।

आपका परिचय आप ही के शब्दों में:—

मेरा नाम डॉ विदुषी शर्मा, (वर्ल्ड रिकॉर्ड होल्डर) है। अकादमिक काउंसलर, IGNOU OSD (Officer on Special Duty), NIOS (National Institute of Open Schooling) विशेषज्ञ, केंद्रीय हिंदी निदेशालय, उच्चतर शिक्षा विभाग, शिक्षा मंत्रालय, भारत सरकार।

ग्रंथानुक्रमणिका —

  1. डॉ राधेश्याम द्विवेदी — भारतीय संस्कृति।
  2. प्राचीन भारत की सभ्यता और संस्कृति — दामोदर धर्मानंद कोसांबी।
  3. आधुनिक भारत — सुमित सरकार।
  4. प्राचीन भारत — प्रशांत गौरव।
  5. प्राचीन भारत — राधा कुमुद मुखर्जी।
  6. सभ्यता, संस्कृति, विज्ञान और आध्यात्मिक प्रगति — श्री आनंदमूर्ति।
  7. भारतीय मूल्य एवं सभ्यता तथा संस्कृति — स्वामी अवधेशानंद गिरी (प्रवचन)।
  8. नवभारत टाइम्स — स्पीकिंग ट्री।
  9. इंटरनेट साइट्स।

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