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“तू ना हो निराश कभी मन से” – (KMSRAJ51, KMSRAJ, KMS)

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2021-KMSRAJ51 की कलम से

राष्ट्र भक्त बनाना होगा।

Kmsraj51 की कलम से…..

♦ राष्ट्र भक्त बनाना होगा। ♦

रक्षा सुरक्षा का साजो सामान,
सुरक्षित शस्त्र आगामी रखना।
देश के रक्षक नौजवान हो को,
महत्वपूर्ण सहयोग करना होगा।

अस्त्र – शस्त्र विद्या की बरसा से,
बचने के लिए वंकर बनाना होगा।
आडंबर के भंवरे झाल का भी,
समूल रूप से नष्ट करना होगा।

महा पराक्रमी हिरण्याक्ष का सा,
फिर – फिर बध करना ही होगा।
जयद्रथ जैसी झूठ बोलने वाले,
को भी वैसा ही वध करना होगा।

भूखे प्यासे व्याकुल हो तो उसका,
हमें भरण – पोषण करना होगा।
कोई न भूखा नंगा रहे अपने राष्ट्र में,
विधि पूर्वक व्यवस्था करनी होगी।

देवी – देवताओं की पराक्रम गाथा,
शरणागत वत्सल को सुहाना होगा।
गृहस्थ आश्रम में रहकर सभी को,
गृहस्थ – धर्म अनुसार रहना होगा।

बुद्धिमानों को आवश्यकता अनुसार,
घर और राष्ट्र की सेवा करनी होगी।
सारी समाज को भी आगे आकर,
राष्ट्र भक्ति में योगदान करनी होगी।

गुरुकुल के नियमों में ही अब,
सत्संगी तुमको भी चलना होगा।
शास्त्र विद्या की यादें साथ – साथ,
शस्त्र विद्या का ध्यान करना होगा।

अर्जुन सा श्री कृष्ण का उपदेश,
प्रजाओं ने प्रचार करना होगा।
एकलव्य के धनुर्विद्या का ज्ञान,
शिक्षा साधारण को देनी होगी।

धर्म के अनुसार करता का ध्यान,
सारी समाज को करना होगा।
धर्म के अंदर अनादर करता का,
त्याग समाज को करना होगा।

तीर्थ का सेवन कराकर उसका,
अंतकरण से शुद्ध कराना होगा।
तत्व ज्ञानियों से शिक्षा का ज्ञान,
पास उनके जाकर लेना होगा।

पवित्र कथाओं का चरण बद्ध,
प्रचार – प्रसार भी करना होगा।
प्राकृतिक कोसी बचने के उपाय,
यज्ञ अनुष्ठान सब करना होगा।

♦ सुखमंगल सिंह जी – अवध निवासी ♦

—————

  • “सुखमंगल सिंह जी“ ने, बहुत ही सरल शब्दों में सुंदर तरीके से, कविता के माध्यम से बखूबी समझाने की कोशिश की है – इस कविता में कवि ने बताया है हम सभी को मिलकर ये प्रयास करना है की जो भूखे प्यासे व्याकुल हो तो उसका हमें भरण – पोषण करना होगा। कोई न भूखा नंगा रहे अपने राष्ट्र में विधि पूर्वक व्यवस्था करनी होगी। गृहस्थ आश्रम में रहकर सभी को गृहस्थ – धर्म अनुसार रहना होगा। शास्त्र विद्या के साथ-साथ शस्त्र विद्या का ध्यान करना होगा।

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sukhmangal-singh-ji-kmsraj51.png

यह कविता (राष्ट्र भक्त बनाना होगा।) “सुखमंगल सिंह जी” की रचना है। KMSRAJ51.COM — के पाठकों के लिए। आपकी कवितायें / लेख सरल शब्दो में दिल की गहराइयों तक उतर कर जीवन बदलने वाली होती है। मुझे पूर्ण विश्वास है आपकी कविताओं और लेख से जनमानस का कल्याण होगा। आपकी कविताओं और लेख से आने वाली पीढ़ी के दिलो दिमाग में हिंदी साहित्य के प्रति प्रेम बना रहेगा। आपकी लेखन क्रिया यूं ही चलती रहे, बाबा विश्वनाथ की कृपा से।

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ज़रूर पढ़ें: पृथु का प्रादुर्भाव।

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जैसे शरीर के लिए भोजन जरूरी है वैसे ही मस्तिष्क के लिए भी सकारात्मक ज्ञान और ध्यान रुपी भोजन जरूरी हैं।-KMSRAj51

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“सफलता का सबसे बड़ा सूत्र”(KMSRAJ51)

“स्वयं से वार्तालाप(बातचीत) करके जीवन में आश्चर्यजनक परिवर्तन लाया जा सकता है। ऐसा करके आप अपने भीतर छिपी बुराईयाें(Weakness) काे पहचानते है, और स्वयं काे अच्छा बनने के लिए प्रोत्साहित करते हैं।”

 

“अगर अपने कार्य से आप स्वयं संतुष्ट हैं, ताे फिर अन्य लोग क्या कहते हैं उसकी परवाह ना करें।”~KMSRAj51

 

 

 

 

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पावन माह सावन।

Kmsraj51 की कलम से…..

♦ पावन माह सावन। ♦

पावन माह सावन में, देव शिव भी चले आयें।
इंद्रदेव भी उनके स्वागत में, मेघों से जल बरसाये।
मंगल ही मंगल होगा, अब तो सब।
सारे संकट संसार के, भोले भंडारी हर लेगें अब॥

इस पावन श्रावण मास में जप से ही,
त्रिलोकी नाथ ने सबको भव से उतार दिया।
माता पार्वती की भक्ति से प्रसन्न हो,
उनको वर का उपहार दिया॥

श्रावण मास में ही शिव ने,
समुन्द्र मंथन का विष-पान कर डाला।
समस्त ब्रह्मांड के कष्टों को,
इस भोले ने पल में हर डाला॥

ऋषि मार्कण्डेय की भी भक्ति से,
प्रसन्न हो, दिया ऐसा वरदान।
यमदेव भी नतमस्तक हो सम्मुख इसके,
इसकी भक्ति को दिया मान॥

आओं इस सावन मास, हम सब
इस अमरनाथ को रिझाएँगे।
कर अर्पण दूध-जल शिवलिंग पर,
संसार की खुशियाँ ये त्रिलोकी दे जायेंगे॥

कष्टों का जो फैला दिया इस महामारी ने,
अपना प्रकोप, इस जग में।
शिव-शक्ति कर देगी कल्याण, इसकी श्रद्धा,
आस्था, भक्ति बसा लो, अपने रग-रग में॥

♦ सुशीला देवी जी – करनाल, हरियाणा ♦

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  • “श्रीमती सुशीला देवी जी“ ने, बहुत ही सरल शब्दों में सुंदर तरीके से, कविता के माध्यम से इस कविता में कवयित्री ने सावन का पवित्र महीना जो की, वर्षा, हरियाली, खेतों में रौनक, और शिव की भक्ति से सराबोर होता है, भोले शिव के गुणों और शक्तियों व उनका संसार के प्रति कल्याणकारी कार्यों का अच्छे से वर्णन किया है।

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यह कविता (पावन माह सावन।) “श्रीमती सुशीला देवी जी” की रचना है। KMSRAJ51.COM — के पाठकों के लिए। आपकी कवितायें सरल शब्दो में दिल की गहराइयों तक उतर कर जीवन बदलने वाली होती है। मुझे पूर्ण विश्वास है आपकी कविताओं और लेख से जनमानस का कल्याण होगा। आपकी लेखन क्रिया यूं ही चलती रहे।

आपका परिचय आप ही के शब्दों में:—

मेरा नाम श्रीमती सुशीला देवी है। मैं राजकीय प्राथमिक पाठशाला, ब्लॉक – घरौंडा, जिला – करनाल, में J.B.T.tr. के पद पर कार्यरत हूँ। मैं “विश्व कविता पाठ“ के पटल की सदस्य हूँ। मेरी कुछ रचनाओं ने टीम मंथन गुजरात के पटल पर भी स्थान पाया है। मेरी रचनाओं में प्रकृति, माँ अम्बे, दिल की पुकार, हिंदी दिवस, वो पुराने दिन, डिजिटल जमाना, नारी, वक्त, नया जमाना, मित्रता दिवस, सोच रे मानव, इन सभी की झलक है।

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“सफलता का सबसे बड़ा सूत्र”(KMSRAJ51)

“स्वयं से वार्तालाप(बातचीत) करके जीवन में आश्चर्यजनक परिवर्तन लाया जा सकता है। ऐसा करके आप अपने भीतर छिपी बुराईयाें(Weakness) काे पहचानते है, और स्वयं काे अच्छा बनने के लिए प्रोत्साहित करते हैं।”

 

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साहित्य समाज और संस्कृति।

Kmsraj51 की कलम से…..

♦ साहित्य समाज और संस्कृति। ♦

शोध सारांश —

साहित्य समाज का दर्पण है और समाज का निर्माण संस्कृति से होता है। वास्तव में साहित्य समाज और संस्कृति तीनो ही एक दूसरे के अनुपूरक कहे जा सकते हैं, क्योंकि किसी एक का भी अस्तित्व दूसरे के बिना संभव हो ही नहीं सकता।

इतिहास इस बात का साक्षी है कि मानव ने किस प्रकार आदिम युग से लेकर आज तक के वैज्ञानिक युग का सफर तय किया है। वह जंगल और गुफाओं से होता हुआ आज अंतरिक्ष तक पहुंच गया है।

विज्ञान की उपलब्धि में जहां उसका मस्तिष्क, अभिप्रेरणा, प्रयास उसका आधार बने हैं वही अपनी मानव सुलभ भावनाओं को संतुष्ट करने के लिए, हृदय में उठने वाले भावों को अभिव्यक्ति प्रदान करने के लिए उसे अनेक साहित्यिक विधाओं का आश्रय भी लेना पड़ा है। यहीं से आरंभ होता है “सृजन”। जिसमें प्रत्यक्ष या परोक्ष रुप से झलक होती है उसकी भाषा (मातृभाषा) की। यह अटल सत्य है।

आप किसी भी देश का साहित्य उठाकर देख लीजिए, उसमें जो विशेषता होगी, वह वहां की मिट्टी की सुगंध लिए होगी, मातृभाषा की झंकार उस में व्याप्त होगी। क्योंकि बिना मातृभाषा के साहित्यिक रचनाओं में मौलिकता का गुण आ ही नहीं सकता। किसी भी साहित्यिक रचना में वो भाव, वो प्रेरणा, वो समर्पण, वो सच्चाई, वो मौलिक चिंतन, अपनी मातृभाषा के प्रति प्रेम यह सब कुछ साहित्यिक रचना के प्राण होते हैं।

प्रस्तुत शोध पत्र में हम यह सार्थक प्रयास करने का यत्न करेंगे कि “साहित्य समाज और संस्कृति” के अंतर्संबंधों का पूर्णतया सारगर्भित विश्लेषण किया जा सके तथा संगोष्ठी के अन्य उपविषयों से भी प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से प्रस्तुत शोध पत्र की परस्पर निर्भरता सिद्ध की जा सके।

परिचय —

“भाषा समाज और संस्कृति” संगोष्ठी का एक ऐसा विषय है जो समग्रता लिए हुए है। वास्तविक अर्थों में आजकल के समाज, साहित्य और भाषा की जो स्थिति है वह सही नहीं है। संस्कारों से भाषा में अपेक्षित सुधार हो सकता है, भाषा से संस्कृति का सुधार संभव है और संस्कृति से समाज में अपेक्षित परिवर्तन हो सकता है।

और जब इन तीनों में ही अवश्यमेव सुधार होंगे तो उससे हमारा देश सुधर सकता है, विश्व सुधर सकता है, आने वाली पीढ़ियों का भविष्य, उनकी मानसिकता, उनके मूल्य, उनकी नैतिकता, उनका चारित्रिक बल, धार्मिकता, सामाजिकता संबंधी आचरण सुधर सकते हैं और हम सब का यही तो कर्तव्य है और प्रबुद्ध वर्ग की यही तो चिंता है कि किन उपायों से इन सब में सार्थक सुधार लाया जा सके।

आज जिस तरह हिंदी सिनेमा और सोशल मीडिया की भाषा और संस्कृति हमारे समाज को दिन – प्रतिदिन विकृत किए जा रहे हैं, हमारी युवा पीढ़ी को पथभ्रष्ट कर रहे हैं वह चिन्तनीय है। वर्तमान में हमारे समाज की यह स्थिति है कि —

“आज दिवस में तिमिर बहुत है, जैसे हो सावन की भोर,
मानव तो आकाश की ओर, मानवता पाताल की ओर”।

हम सभी को यह सार्थक प्रयास करने होंगे, इस प्रकार उपाय किए जाएं कि “समाज और संस्कृति के बीच अंत: संबंध” स्थापित हो सके। और वह ऐसे कौन से यत्न किये जाने चाहिए, कौन से ऐसे प्रबंध होने चाहिए कि जिन्हें “समाज और संस्कृति के अंत: सूत्रों” की संज्ञा दी जा सके।

समय – समय पर सरकार द्वारा, सामाजिक, मनोवैज्ञानिक विशेषज्ञों द्वारा इस बात पर निरंतर चिन्तन किया जाता रहा है कि “सत्ता, भाषा और समाज’ में टकराव की स्थिति उत्पन्न होने के स्थान पर ऐसी व्यवस्था की जाए, जिससे सत्ता भाषा और समाज के मिलन की एकरूपता, समरसता की स्थिति कायम की जा सके।

इन्हीं सब उपायों को अपनाकर ही हम “भाषा, समाज और संस्कृति के द्वारा राष्ट्रीय एकता” कायम करने में कामयाब सिद्ध हो सकते हैं।

इस प्रकार हमने देखा कि संगोष्ठी का मुख्य विषय तथा उसके सारे उप विषय किस प्रकार एक दूसरे पर आश्रित हैं, अंतर संबंधित हैं, और अंत में सभी का एक ही लक्ष्य है “राष्ट्रीय एकता”।

साहित्य का स्वरूप, भाषा, समाज और संस्कृति —

भाषा, समाज, सभ्यता और संस्कृति के संबंध में पाश्चात्य विद्वान “ग्रीन” का मत दर्शनीय है —

“एक संस्कृति तभी सभ्यता बनती है जबकि उसके पास एक लिखित भाषा, दर्शन विशेषीकरण युक्त श्रम विभाजन, एक जटिल विधि और राजनीतिक प्रणाली हो”।

इस संदर्भ में एक और विद्वान का मत।

“जिसबर्ट” के अनुसार, सभ्यता बताती है कि, ‘हमारे पास क्या है’, और संस्कृति यह बताती है कि, ‘हम क्या हैं’।

साहित्य क्या है? इसका स्वरूप क्या है? यह समाज से किस प्रकार संबंधित है? और यह संस्कृति को किस प्रकार अपने अंदर समेटे हुए है? तथा किस प्रकार संस्कृति को प्रभावित करता है? एवम किस प्रकार यह संस्कृति से प्रभावित होता है? यह सब महत्वपूर्ण बिंदु है।

किसी भी प्रकार के साहित्य की मूल चेतना या भावना, मुख्य आधार, मानव समाज की चहुँमुखी उन्नति ही होती है। प्रत्येक प्रकार के साहित्य का यह उद्देश्य होता है कि मानव हर प्रकार के राग, द्वेष, घृणा, ईर्ष्या, शोषण, कलुषित विचार आदि दुर्भावनाओं को त्याग कर, उस परमपिता परमेश्वर, सर्वशक्तिमान ईश्वर की सत्ता को, उसकी शक्ति को जानने का प्रयास करता हुआ, “आत्मवत सर्व भूतेषु” यानी सभी को अपने समान समझने का प्रयास करे तथा “सर्वे भवंतु सुखिन:” का भाव लेकर “परमार्थ” “बहुजन हिताय, बहुजन सुखाय” के सिद्धान्त को अपने जीवन में उतार ले।

यह अकाट्य सत्य है कि जितना साहित्य हमारे भारत में है, जितना विषय वैविध्य हमारे साहित्य में है, उतना किसी भी अन्य देश के साहित्य में हो ही नहीं सकता। हमारा तो एक-एक ग्रंथ ही सर्वकालिक Timeless है कि जिसके सिद्धांत आज से हजारों वर्ष पूर्व भी उतने ही प्रासंगिक थे, जितने आज है।

सिर्फ एक ग्रंथ “श्रीमद्भगवद्गीता” को ही लीजिए जो विश्व प्रसिद्ध है। सिर्फ यदि इसी एक ग्रंथ को ही आत्मसात कर लिया जाए तो मानव मात्र का जीवन सुधर सकता है, तो फिर अन्य साहित्य की तो बात ही क्या है।

हमारा साहित्य हमें धार्मिकता, नैतिकता, सामाजिकता, नीति राजनीति, आर्थिकता आदि सभी गुण सिखाता हैं। हमारे साहित्य में ज्ञान है, वैराग्य है, नीति है, श्रृंगार है, भक्ति है, प्रेम है, वात्सल्य है, करुणा है, ओज है, वीरता है, प्रकृति प्रेम है, जीव प्रेम है।

हिंदी साहित्य के इतिहास को इन्हीं गुणों के आधार पर विभक्त किया गया है, जैसे —

वीरगाथा काल, भक्तिकाल, रीतिकाल और आधुनिक काल।

जिस काल में जिस भाव, जिस प्रकार के साहित्य की प्रधानता रही, उसे उसी के नाम से संबोधित किया गया है। यही साहित्य, स्वस्थ सभ्यता एवं संस्कृति का निर्माण करने में सहायक है, जो हमारी पहचान है, भारतीयता की पहचान है।

इस प्रकार हम देखते हैं कि हमारे साहित्य में एक और जहां विष्णु शर्मा जी ने पंचतंत्र के माध्यम से ज्ञान, जीव प्रेम, प्रकृति प्रेम, पारिस्थितिकीय संतुलन आदि का संप्रेषण किया जो सभी के लिए हर युग में प्रासंगिक है तथा पर्यावरण संरक्षण, शाकाहार की भावना को पोषण प्रदान करता है जो कि वर्तमान की एक समस्या तथा आवश्यकता बन चुकी है।

साहित्य, साहित्यकार, समाज और संस्कृति —

साहित्य समाज का दर्पण है, यह हम सब जानते हैं। आत्मा और शरीर का जो संबंध है वही संबंध साहित्य और समाज का है। यह शाश्वत सत्य है कि साहित्य की अपेक्षा समाज पहले जन्म लेता है। समाज से ही साहित्यकार जन्म लेते हैं।

साहित्यकार के व्यक्तित्व की पहचान अलग होती है। सच्चे साहित्यकार गंभीर, चिंतनशील, संवेदनशील, दूरदृष्टा, व्यापक दृष्टिकोण रखते हुए भावना और सम्वेदनाओं से परिपूर्ण होते हैं। क्योंकि अपनी लेखनी से वो जिस साहित्य का निर्माण करते हैं, सृजन करते हैं, वह भविष्य में समाज का, संस्कृति का निर्माण करता है।

इसलिए प्रत्येक साहित्यकार यह प्रयास करता है कि वह जिस विषय पर साहित्य का सृजन करे, उसकी जड़ें समाज से, उसकी समस्याओं से गहराई से जुड़ी हुई हों।ज्वलंत मुद्दों पर भी अपनी बात कहने से पूर्व उक्त सामाजिक विषय से संबंधित पूर्ण जानकारी प्राप्त करना अनिवार्य है, क्योंकि साहित्यकार की कलम से निकला एक-एक शब्द समाज में परिवर्तन लाने में सक्षम है।

‘कलम के सिपाही’ सामाजिक जन चेतना लाने का कार्य करते रहे हैं। अतः लेखक अथवा कवि (साहित्यकार) अपने समाज की हर गतिविधि, हर परिस्थिति में ही जीता है, उनसे प्रभावित होता रहा है। वह किसी भी रुप से समाज से अलग नहीं हो सकता। वह इसी समाज में ही रहकर इसके प्रभावों को, इन परिवर्तनों को, इन समस्याओं को जानता है, क्योंकि वह भी तो एक सामाजिक प्राणी ही है।

साहित्य, समाज और संस्कृति अन्योन्याश्रित —

प्रत्येक समाज का एक सांस्कृतिक आधार भी होता है। प्रत्येक संस्कृति, उस समाज की आत्मा, उसकी पहचान होती है, जिस प्रकार किसी भी प्रकार की सभ्यता एवं संस्कृति में व्याप्त अच्छाई और बुराई को हम सब देखते हैं, महसूस करते हैं कि यह हमारे समाज में किस प्रकार फैल रही है, समाज को दूषित कर रही है, संस्कारों का हनन कर रही है।

उसी प्रकार साहित्यकार इन सब को देखते हुए, इन सब पर अपनी व्याख्या प्रदान करते हुए, समाज में परिवर्तन लाने का प्रयास करते हैं, और यह कार्य करना अपना कर्तव्य समझते हैं, क्योंकि —

“केवल मनोरंजन ही न कवि का कर्म होना चाहिए ,
उसमें उचित उपदेश का भी मर्म होना चाहिए”।

इतिहास साक्षी है कि मानव सभ्यता के विकास में साहित्य का महत्वपूर्ण योगदान रहा है। नवीन विचारों ने साहित्य को जन्म दिया तथा साहित्य ने मानव की विचारधाराओं में गतिशीलता प्रदान करते हुए उसे सभ्य बनाने का कार्य किया है।किसी भी राष्ट्र या समाज में आज तक जितने भी परिवर्तन आए हैं, वो सब साहित्य और संस्कृति के माध्यम से ही आए हैं।

साहित्यकार समाज में फैली कुरीतियों, विकृतियों, विसंगतियों, अभावों, विषमताओं व असमानताओं आदि के बारे में अपने विचार, सुझाव, उपाय आदि प्रस्तुत करता है। इन सब के प्रति जनसाधारण को जागरुक करने का प्रयास करता है।

वर्तमान में साहित्य को ज्ञानवर्धक, मूल्यवर्धन, मनोरंजक बनाने के लिए सोशल मीडिया, सिनेमा का आश्रय लिया जा रहा है जो कुछ – कुछ हद तक उचित भी है, क्योंकि लिखित साहित्य में ज्ञान, मूल्य, नीति, संस्कार आदि सब कुछ तो है परंतु मनोरंजक तत्व नहीं।

अतः साहित्य को दृश्य, श्रव्य भाव के साथ मनोरंजक भी बनाते हुए जनमानस तक पहुंचाने का कार्य एक अनूठा प्रयास रहा है। इससे समाज में गहरा परिवर्तन देखने को मिला है। 80 के दशक में रामानंद सागर द्वारा लिखित और निर्देशित धारावाहिक “रामायण” तथा बी आर चोपड़ा द्वारा निर्देशित धारावाहिक “महाभारत” का नाम इस श्रेणी में लिया जा सकता है जिन्होंने समाज में सकारात्मक परिवर्तन किए, जनमानस को भारतीय सभ्यता एवं संस्कृति का दर्शन कराया, मानवीय मूल्यों से अवगत कराया तथा वर्तमान पीढ़ी को सामाजिक, नैतिक, मानवीय मूल्यों को परोक्ष भाव में ही सिखा दिया।

साहित्य के विकास की कहानी उतनी ही पुरानी है जितनी कि मानव सभ्यता। अतः यह नितांत आवश्यक है कि साहित्य लेखन, संशोधन, परिवर्द्धन निरंतर जारी रहना चाहिए। अन्यथा सभ्यता का विकास ही अवरुद्ध हो जाएगा।

भारत की अपनी विशिष्ट सभ्यता एवं संस्कृति रही है। “भा” का अर्थ हुआ प्रकाश। “रत” का अर्थ है संलिप्तता। यानि “भारत” का अर्थ हुआ प्रकाश में दत्तचित्त होकर अनुष्ठान करने से संप्राप्त संस्कार, और संपन्नता। यही भारतीय संस्कृति है। यही संस्कृति समाज से, साहित्य से अनादि काल संपोषित होती चली आ रही है और आगे भी इसी तरह संपोषित, संवर्धित होती रहेगी।

निष्कर्ष —

निष्कर्षत: यही कहा जा सकता है कि वास्तव में हर देश का साहित्य उस देश की लौकिक सभ्यता एवं संस्कृति, मातृभाषा, लोक गीत, लोक भाषाओं, (जन भाषाओं) तथा तत्कालीन परिस्थितियों (सामाजिक, आर्थिक, नैतिक, राजनीतिक) को भी उजागर करता है। साहित्य एक राष्ट्र की धरोहर है, उसका अभिमान है, गौरव है, पहचान है।

प्रत्येक युग का साहित्य उस युग की पहचान, उस युग का वैशिष्टय बताता है। अब इससे अधिक और क्या कहा जाए कि प्राचीन वैदिक साहित्य भारत के उन्नत और गौरवशाली समाज का प्रमाण है। इस साहित्य में “विश्व मानव” (वैश्विक एकता) और “वसुधैव कुटुंबकम” की जो भावना है, वह विशुद्ध भारतीय संस्कृति की महानता, विशालता, नि: स्वार्थपरता, लोक कल्याणकारी भावनाओं की परिचायक है।

हमारा साहित्य समाज को न केवल ज्ञान, बोध और मूल्य प्रदान करता है अपितु एक चिंतन की दिशा भी प्रदान करता है ताकि हम सभी यथासंभव प्रयास कर सके जिससे कि भारतीय मूल्य, भारतीय सभ्यता एवम संस्कृति, भारतीय साहित्य का विश्व में सदैव उच्चस्थ स्थान बना रहे तथा भारत पुन: “जगदगुरु” (विश्वगुरु) की उपाधि ग्रहण करे वो भी अपने अक्षय साहित्य, विशुद्ध सभ्यता एवं अलौकिक संस्कृति के बल पर।

इन्ही शुभकामनाओं के साथ — शुभमस्तु।

ज़रूर पढ़ें — नारी : इच्छा शक्ति ज्ञान शक्ति कर्म शक्ति।

♦ डॉ विदुषी शर्मा जी – नई दिल्ली ♦

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  • ” लेखिका डॉ विदुषी शर्मा जी“ ने अपने इस शोध लेख से, बहुत ही सरल शब्दों में सुंदर तरीके से बखूबी समझाने की कोशिश की है – वास्तव में हर देश का साहित्य उस देश की लौकिक सभ्यता एवं संस्कृति, मातृभाषा, लोक गीत, लोक भाषाओं, (जन भाषाओं) तथा तत्कालीन परिस्थितियों (सामाजिक, आर्थिक, नैतिक, राजनीतिक) को भी उजागर करता है। साहित्य एक राष्ट्र की धरोहर है, उसका अभिमान है, गौरव है, पहचान है।

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यह शोध लेख (साहित्य समाज और संस्कृति।) “डॉ विदुषी शर्मा जी” की रचना है। KMSRAJ51.COM — के पाठकों के लिए। आपकी लेख / कवितायें सरल शब्दो में दिल की गहराइयों तक उतर कर जीवन बदलने वाली होती है। मुझे पूर्ण विश्वास है आपकी कविताओं और लेख से जनमानस का कल्याण होगा। आपकी लेखन क्रिया यूं ही चलती रहे।

आपका परिचय आप ही के शब्दों में:—

मेरा नाम डॉ विदुषी शर्मा, (वर्ल्ड रिकॉर्ड होल्डर) है। अकादमिक काउंसलर, IGNOU OSD (Officer on Special Duty), NIOS (National Institute of Open Schooling) विशेषज्ञ, केंद्रीय हिंदी निदेशालय, उच्चतर शिक्षा विभाग, शिक्षा मंत्रालय, भारत सरकार।

ग्रंथानुक्रमणिका —

  1. डॉ राधेश्याम द्विवेदी — भारतीय संस्कृति।
  2. प्राचीन भारत की सभ्यता और संस्कृति — दामोदर धर्मानंद कोसांबी।
  3. आधुनिक भारत — सुमित सरकार।
  4. प्राचीन भारत — प्रशांत गौरव।
  5. प्राचीन भारत — राधा कुमुद मुखर्जी।
  6. सभ्यता, संस्कृति, विज्ञान और आध्यात्मिक प्रगति — श्री आनंदमूर्ति।
  7. भारतीय मूल्य एवं सभ्यता तथा संस्कृति — स्वामी अवधेशानंद गिरी (प्रवचन)।
  8. नवभारत टाइम्स — स्पीकिंग ट्री।
  9. इंटरनेट साइट्स।

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“सफलता का सबसे बड़ा सूत्र”(KMSRAJ51)

“स्वयं से वार्तालाप(बातचीत) करके जीवन में आश्चर्यजनक परिवर्तन लाया जा सकता है। ऐसा करके आप अपने भीतर छिपी बुराईयाें(Weakness) काे पहचानते है, और स्वयं काे अच्छा बनने के लिए प्रोत्साहित करते हैं।”

 

“अगर अपने कार्य से आप स्वयं संतुष्ट हैं, ताे फिर अन्य लोग क्या कहते हैं उसकी परवाह ना करें।”~KMSRAj51

 

 

 

 

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गुरु की महत्ता और गुरु पूर्णिमा।

Kmsraj51 की कलम से…..

♦ गुरु की महत्ता और गुरु पूर्णिमा। ♦

भारतीय समाज में मनाए जाने वाले पूज्यनीय पुण्य देने वाले भारत के सभी त्योहार होते हैं। भारत के अलग-अलग राज्यों में यह त्यौहार अलग-अलग रूप में भी मनाए जाते हैं।

जो किसी न किसी रूप में हमारे ईश्वर से साक्षात्कार कराने वाले होते हैं। जो हमारे आसपास की दुनिया में फैल ज्ञान की शक्ति को संतुलित रखने में मददगार होते हैं। विविध सभ्यताओं का ज्ञान कराते हैं। मानव जीवन को शुभम रूप से चलाने के लिए उमंग और उत्साह भरते हैं। सत्य की खोज, शोध – खोज का अवसर प्रदान करते हैं।

उन्हें आने वाले त्यौहारों में से एक आषाढ शुक्ल पक्ष की पूर्णिमा को गुरु पूर्णिमा के रूप में मनाया जाता है। गुरु पूर्णिमा के दिन जनमानस अलग-अलग समूहों में अपने – अपने लौकिक जगत में व्याप्त गुरुओं के शरण में जाकर आशीर्वाद प्राप्त करते हैं।

आशीर्वाद प्राप्त करने के उपरांत वह अपने को धन्य मानते हैं। सच में अलौकिक जगत की उत्पत्ति करता संरक्षक रक्षक भगवान भोलेनाथ, भगवान विष्णु और ब्रह्मा जी हैं जो हमारे सच्चे सर्वसंपन्न परिपूर्ण गुरु हैं।

सब के मालिक हैं और जगत के, जगत को चलाने वाले हैं। फिर भी मानव लौकिक जगत में मनुष्य तात्कालिक लाभ की कामना से गुरु की खोज में लगा रहता है।

जिस ईश्वर ने ही जगत में भेजा है, जो हमारे आप जैसे हैं उन्होंने तब और तपस्या के बल पर अपने को सिद्ध करने का प्रयत्न किया है। उन्हें परम उत्तम मानकर गुरु मान लेता है। मनुष्य अपने कर्मों के अनुसार सुख – दु :ख प्राप्त करता है।

गुरु माता है और गुरु पिता है।
गुरु आचार्य महान ज्ञान वान है।
अध्यापक ब हु तेरी जगत में,
सद्गुरु शकल जहां विद्वान है।

•» ब्रह्मा गुरु है! जो जगत वासियों का व्यक्तित्व निर्माण करने वाले हैं। संसार की स्थित उत्पत्ति और प्रलय के हेतु हैं।

•» विष्णु जी गुरु हैं! वह शिष्य की रक्षा करते हैं उसके अंदर की नकारात्मकता को दूर करते हैं और उसके अवगुणों को दूर करके भगाते हैं। भगवान विष्णु किसी कारण बस भूले भटके शिष्य को भी सत मार्ग पर लाकर सहज रूप से स्वीकार कर लेते हैं। भगवान विष्णु के प्रति प्रेम रखने वाला मनुष्य बैकुंठधाम को जाता है। वह जन्म – मृत्यु के भय से दूर रहता है क्योंकि भगवान जन्म मृत्यु के भय का नाश करने वाले हैं! भगवान विष्णु के भक्त का भक्ति प्रवाह बढ़ने लगता है।

•» शंकर जी यानी महादेव गुरु! महादेव जी चराचर के जगतगुरु है। वैर रहित, शांति मूर्ति, आत्माराम और जगत के परम आराध्य देव हैं। घमंडी धर्म की मर्यादा को तोड़ने वाले का विनाश करने वाले हैं। श्री शंकर जी की घटक जटाओं में गंगा जी सुशोभित होती हैं –

गंगा – यमुना के संगम में,
करता जो अज्ञात स्नान!
प्रसन्नता से परिपूर्ण होकर
पहुंचता अपनी-अपनी धाम।

गुरु पूर्णिमा के दिन से वर्षा ऋतु का काल प्रारंभ माना जाता है वर्षा काल में साधु संत 4 माह तक भ्रमण करके जगत उत्थान के लिए संस्कृति रक्षा और सभ्यता के लिए, धर्म, ज्ञान का प्रचार – प्रसार करते हैं। ज्ञानार्जन के लिए यह चातुर्मास उपयुक्त माना जाता है।

गर्मी और उमस से भरी जिंदगी को शीतलता प्रदान होती है। चारों तरफ हरियाली का वातावरण रहता है मानव मन जो, मानव मन को आह्लादित कर लेता है।

आषाढ़ की पूर्णिमा के ही दिन कृष्ण द्वैपायन व्यास जी का जन्म हुआ था। जिन्होंने महाभारत की रचना की थी। कृष्ण द्वैपायन वेद व्यास जी महाभारत के साथ – साथ वेद – पुराण वेदांत – दर्शन ( ब्रह्म सूत्र) शारीरिक सूत्र, योग शास्त्र सहित अनेक उत्कृष्ट कृतियों की रचना की है।

आज ही के दिन भगवान बुद्ध ने काशी में आकर काशी के प्रमुख संस्थान सारनाथ में यहां सारंग नाथ जी, जो भगवान शंकर के साले कहे जाते हैं उनका मंदिर है उसी के पास में अपने पांच शिष्यों को प्रथम उपदेश दिया था।

शंकर जी ने आज ही के दिन आषाढ़ मास की पूर्णिमा को सप्त ऋषियों को योग और तत्वज्ञान की दीक्षा दी थी। सप्त ऋषियों ने भारत सहित दुनिया में फैल कर विश्व कल्याण के लिए योग दर्शन का बयान संसार को दिया।

गुरु का अर्थ होता है कि वह अंधकार से प्रकाश की तरफ ले जाए, आत्म ज्योति जगाने का काम करें, भक्तों के अंदर आत्मज्योति का बोध कराए।

गुरु की महत्ता को सभी ने स्वीकारा है सभी शास्त्र गुरु तत्व की प्रशंसा करते हैं। गुरु प्रशंसा के योग्य होता है।

स्वामी विवेकानंद जी महाराज के गुरु रामकृष्ण परमहंस जी थे। जिन्होंने एक साधारण बालक को दुनिया का सबसे महान दार्शनिक ज्ञाता और बुद्धिमान बना दिया।

अयोध्या नरेश चक्रवर्ती महाराजा दशरथ के गुरु वशिष्ठ जी के जिनकी सलाह के बिना अयोध्या के दरबार का कोई भी कार्य नहीं होता था। कोई भी कार्य करने के पहले अयोध्या में गुरु वशिष्ठ से आज्ञा लेकर ही किया जाता था।

गुरु का योग्य होना बहुत आवश्यक है। गुरु अपने शिष्य को उपदेश आत्मक वाणी से लक्ष्य की लालसा को निर्मल करने का मार्गदर्शक होता है। गुरु का कर्तव्य है कि वह अपने शिष्य में सद्विद्या का संचार, संचारित करने का तन – मन से प्रयत्न करें।

महाराज मनु ने भी गुरु को महान कहा है उन्होंने गुरु की सेवा करने से ब्रह्म लोक की प्राप्ति होती है बताया। आचार्य को देवता मानने को उन्होंने कहा।

भक्ति काल में भक्त और संत एक स्वर से मुक्त कंठ से गुरु की महिमा और प्रशंसा के गीत गान करते रहते थे।

हिंदी साहित्य गौरव प्रदान करने वाले श्रृंगार रस के कवि सूरदास जी को उनके गुरु वल्लभाचार्य जी के द्वारा यह कहा जाना कि तुम जगत में, घिघियाते ही रहोगे? कवि सूरदास जी गुरु के आशीर्वाद को लेकर श्रृंगार रस के महान कवि हुए आज तक श्रृंगार रस का ऐसा कोई कवि शायद ही धरती पर आया हो।

गुरु की आवश्यकता अलौकिक जगत में हमेशा होती रहती है। अलग-अलग चीजों के ज्ञान के लिए अलग-अलग गुरु की आवश्यकता होती है, जो जीवन में उस वस्तु से संबंधित ज्ञान दे सके सारा जीवन सीखने के लिए ही होता है।

समस्त 12 बारीकियों के, उसको सीखने के लिए मनुष्य को अच्छे गुरु की आवश्यकता होती है। अच्छा गुरु वह होता है जो उस विषय में पारंगत होता है। गुरु शिष्य के बीच बहुत गहरा संबंध होता है। गुरु को कभी भी कच्चा नहीं होना चाहिए और यह गुरु कच्चा है तो उसे शिष्य को गुरु नहीं बनाना चाहिए, इसीलिए शास्त्र सद्गुरु बनाने का उपदेश देता है।

मनुष्य को हमेशा सच्चे गुरु की तलाश करते रहना चाहिए। आंख मूंद कर किसी को अपना गुरु नहीं बनाना चाहिए। मानव जीवन में पग – पग पर गुरु की आवश्यकता होती है। जिससे हम थोड़ा सा भी ज्ञान प्राप्त करते हैं, वह भी गुरु ही होता है। स्कूल कॉलेज में हमें पढ़ाने वाला अध्यापक ही गुरु होता है।

किसी वस्तु की विशेष जानकारी देने वाला व्यक्ति भी गुरु होता है। भारतीय हाउस गुरु की हो रही है जो जीवन के चौथे पल में आवश्यकता होती है। आध्यात्मिक ज्ञान और ईश्वर को प्राप्त कराने वाले गुरु की आवश्यकता पर यहां बल दिया जा रहा है। कहा गया है-

गुरु करिए जांच,
पानी पीजिए छान।

विशुद्ध परंपरा का पालन करते हुए सभ्यता – संस्कृति और समाज का ध्यान रखते हुए गुरु दीक्षा ग्रहण करनी चाहिए।

♦ सुखमंगल सिंह जी – अवध निवासी ♦

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  • “सुखमंगल सिंह जी“ ने, बहुत ही सरल शब्दों में सुंदर तरीके से लेख के माध्यम से बखूबी समझाने की कोशिश की है – इस लेख में बहुत सारे उदाहरण के माध्यम से लेखक ने विस्तार से बताया है की, समय – समय पर हर युग में गुरु के महत्व और भूमिका को उच्च स्थान प्राप्त है। जीवन में गुरु की आवश्यकता को सभी ने स्वीकार किया है। “गुरु का अर्थ होता है कि वह अंधकार से प्रकाश की तरफ ले जाए, आत्म ज्योति जगाने का काम करें, भक्तों के अंदर आत्मज्योति का बोध कराए।”

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यह लेख (गुरु की महत्ता और गुरु पूर्णिमा।) “सुखमंगल सिंह जी” की रचना है। KMSRAJ51.COM — के पाठकों के लिए। आपकी कवितायें / लेख सरल शब्दो में दिल की गहराइयों तक उतर कर जीवन बदलने वाली होती है। मुझे पूर्ण विश्वास है आपकी कविताओं और लेख से जनमानस का कल्याण होगा। आपकी कविताओं और लेख से आने वाली पीढ़ी के दिलो दिमाग में हिंदी साहित्य के प्रति प्रेम बना रहेगा। आपकी लेखन क्रिया यूं ही चलती रहे, बाबा विश्वनाथ की कृपा से।

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माँ।

Kmsraj51 की कलम से…..

♦ माँ। ♦

माँ, तेरे हर रूप की महिमा ने,
सम्पूर्ण ब्रह्मांड को हर्षाया।
तेरी चाैखट पर,
सब देवगणों ने शीश झुकाया।

जगदम्बे, तू सबकी माँ,
वरदाती कहलायें।
सर्वस्व
सब तुझ में ही समाये।

सिंघवाहिनी तेरे शेर की गर्जना,
जब-जब हो जाये ।
तब-तब सुन,
महाकाल भी थर्राए।

तेरे आलाैकिक, अद्भुत,
रूपों की त्रिलोक महिमा गाये।
तेरे हर रूप की महिमा,
जग का कल्याण कर जाए।

हे विश्व विनोदिनी, वरदाती
तेरी एक मधुर मुस्कान से,
विश्व का कल्याण हो जायें।
हे! माँ स्वीकार करो बारम्बार नमन,
पड़े तेरे चरणों में ये सिर झुकाए।

♦ सुशीला देवी जी – करनाल, हरियाणा ♦

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  • “श्रीमती सुशीला देवी जी“ ने, बहुत ही सरल शब्दों में सुंदर तरीके से, कविता के माध्यम से बखूबी समझाने की कोशिश की है – इस कविता में कवयित्री ने माता रानी के गुणों और शक्तियों का महत्व बयां किया है। माता रानी से प्रार्थना: किया है इंसानियत के सुख और खुशियों के लिए, प्रकृति का सुन्दर मनोहर उपहार मिला।

—————

यह कविता (माँ।) “श्रीमती सुशीला देवी जी” की रचना है। KMSRAJ51.COM — के पाठकों के लिए। आपकी कवितायें सरल शब्दो में दिल की गहराइयों तक उतर कर जीवन बदलने वाली होती है। मुझे पूर्ण विश्वास है आपकी कविताओं और लेख से जनमानस का कल्याण होगा। आपकी लेखन क्रिया यूं ही चलती रहे।

आपका परिचय आप ही के शब्दों में:—

मेरा नाम श्रीमती सुशीला देवी है। मैं राजकीय प्राथमिक पाठशाला, ब्लॉक – घरौंडा, जिला – करनाल, में J.B.T.tr. के पद पर कार्यरत हूँ। मैं “विश्व कविता पाठ“ के पटल की सदस्य हूँ। मेरी कुछ रचनाओं ने टीम मंथन गुजरात के पटल पर भी स्थान पाया है। मेरी रचनाओं में प्रकृति, माँ अम्बे, दिल की पुकार, हिंदी दिवस, वो पुराने दिन, डिजिटल जमाना, नारी, वक्त, नया जमाना, मित्रता दिवस, सोच रे मानव, इन सभी की झलक है।

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विश्व विख्यात प्राचीन पुरी अयोध्या।

Kmsraj51 की कलम से…..

♦ विश्व विख्यात प्राचीन पुरी अयोध्या। ♦

सरयू नदी के तट पर स्थित प्राचीन काल की अयोध्या,
उत्तर प्रदेश राज्य का एक प्रमुख विख्यात धाम अयोध्या।
राजा मनु के दौरान बसाई गई परम पूज्य प्रसिद्ध अयोध्या,
युद्ध के माध्यम से प्राप्त न होने वाली, पुनीत नगरी अयोध्या॥

योग प्रतीक के रूप में है अथर्ववेद कहता है अयोध्या,
रामायण के कहे अनुसार मनु जी द्वारा स्थापित है अयोध्या।
स्कन्द पुराण कथा कहती अमरावती के रूप में है अयोध्या,
हिंदू मठ मंदिर से सजी-धजी मूल रूप से अविनाशी अयोध्या॥

तीर्थकर ऋषभ नाथ जी की जन्म स्थली भी रही अयोध्या,
अजित नाथ जी दूसरे तीर्थकर का जन्म स्थान रही अयोध्या।
चौथे तीर्थकर अभिनन्दन नाथ जी की भी सम्मानित अयोध्या,
सुमित नाथ जी का जन्म बनारस धर्म कर्म प्रेरित अयोध्या॥

जैन वैदिक मतो के प्रवर्तक भगवान राम की जन्मभूमि अयोध्या,
चौदहवें तीर्थकर अनंत नाथ जी की आराध्य देव अयोध्या।
कोशल जनपद की पहले राजधानी रही यह थी अयोध्या,
सूर्यवंशी प्रतापी क्षत्रपों की प्रसिद्ध राजधानी रही अयोध्या॥

भगवान की जन्म स्थली विश्व विदित कल्याणकारी अयोध्या,
मानव सभ्यता की पहली पौराणिक काल की पूरी अयोध्या।
ऋषि मुनियों की तपोस्थली धुनि रमी है सदा सुखी अयोध्या,
कवि लेखक और पत्रकार की रचना करती रही अयोध्या॥

हनुमान गढ़ी के निकट भविष्य खिंच कनक भवन अयोध्या,
कनक भवन के सामने अवस्थित है दसरथ दरबार अयोध्या।
महावीर हनुमान जी रहते हैं यहीं गुफा में एक अयोध्या,
करते हैं जगत विदित रामजन्म भूमि – राम कोटि रक्षा अयोध्या॥

यहां न्याय प्रक्रिया से गुजरना पड़ा स्वाभाविक ही अयोध्या,
सिक्ख धर्म के लिए महत्व पूर्ण स्थान है पूज्य प्रसिद्ध अयोध्या।
यात्रा सलाहकार यहां पर गुरुनानक देव जी आए अयोध्या,
राजा रानी का संबंध कोरिया ने रहा है मूल रूप अयोध्या॥

रूस – भारत का प्राचीतम संबंध स्थापित किया अयोध्या,
भगवान बुद्ध के पूर्वजों की रचना हुई थी वही यह अयोध्या।
श्री राम नवमी, श्री जानकी नवमी, गुरूपूर्णिमा सावन झूला अयोध्या॥

चौरासी कोसी परिक्रमा क्षेत्र की प्रमुख विशेषताएं अयोध्या,
चौदह भुवन चारों दिशाओं में पूज्य प्रसिद्ध अयोध्या।
नागेश्वर ज्योतिर्लिंग त्रिपुरारी की बनवाया कुश ने अयोध्या,
धूम मचाने शिव रात्रि को शिव जी आते राम की अयोध्या॥

सरयू नदी के तट पर स्थित प्राचीन काल से बसी अयोध्या,
अमरावतीपुरी सी दुनिया को अपनाती, भक्ति भाव में स्थित अयोध्या॥

♦ सुखमंगल सिंह जी – अवध निवासी ♦

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  • “सुखमंगल सिंह जी“ ने, बहुत ही सरल शब्दों में सुंदर तरीके से, कविता के माध्यम से बखूबी समझाने की कोशिश की है – इस कविता में कवि ने प्राचीन पुरी अयोध्या के गुणों और विशेषताओं का वर्णन किया है। महापुरुषों की पावन भूमि का मनोरम वर्णन किया है, जहाँ से पूरी दुनिया को ज्ञान, ध्यान, धर्म का बोध सदैव ही होता रहा। जिस भूमि पर प्राचीन समय से ही महापुरुष तपस्या करते आये है, निष्काम उपासकों की पुण्य गाथा से कण – कण सुशोभित है प्राचीन पुरी अयोध्या धाम। महाबली हनुमान जी के आराध्य की नगरी अयोध्या धाम।

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यह कविता (विश्व विख्यात प्राचीन पुरी अयोध्या।) “सुखमंगल सिंह जी” की रचना है। KMSRAJ51.COM — के पाठकों के लिए। आपकी कवितायें / लेख सरल शब्दो में दिल की गहराइयों तक उतर कर जीवन बदलने वाली होती है। मुझे पूर्ण विश्वास है आपकी कविताओं और लेख से जनमानस का कल्याण होगा। आपकी कविताओं और लेख से आने वाली पीढ़ी के दिलो दिमाग में हिंदी साहित्य के प्रति प्रेम बना रहेगा। आपकी लेखन क्रिया यूं ही चलती रहे, बाबा विश्वनाथ की कृपा से।

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आता है अकेला – चार कंधे से जाता।

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♦ आता है अकेला – चार कंधे से जाता। ♦

इंसान आता है इस धरा पर अकेला — चार कंधे से जाता।

मनुष्य धरा पर अकेला आता,
रोता हुआ खुद जन्म पाता।
जन्म जिस घर में वह लेता,
गीत गवनई वहां गाया जाता।

छठी बरही भी किया जाता,
पालन करने वाला पिता होता।
वहां ढोल मजीरा बजता पाता,
गांव में मुंह मीठा किया जाता।

बच्चे – बच्ची खुशहाली आती,
कालिया आंगन की खुल जाती।
माता उसी की दुखहर्ता होती,
चारों तरफ से बधायां मिलती।

क्रिया – कर्म समझ नहीं पाता,
कुछ दिन बाद खुद उलझ जाता।
मोह – माया में मनुष्य बध जाता,
जन्म – मरण चक्कर फंसा पाता।

आप पाप पुण्य में फंस जाता,
कंचन चक्कर, धरा में घस जाता।
जो भी मंशा लेकर मानव आता,
ठगा हुआ दुनिया में खुद पाता।

कर्म धर्म सारे समझ नहीं पाता,
उसके संग कुछ भी नहीं जाता।
जबकि मनुष्य जीवन सुंदर पाता,
यश कीर्ति धरा पर ही रह जाती।

जिस जीवन हेतु देवता तरस जाता,
उसी पाकर मनुष्य दुख लेकर आता।
जीवन चक्र में वह सुख कहां पाता,
शरण में देवताओं के जब नहीं जाता।

मुक्ति पाने की अभिलाषा लाता,
सत्कार मुंह से जाने क्यों कराता।
अपनी भूल पर अंत छटपटाता,
पाप – पुण्य कर्म समझ नहीं पाता।

झटपट अर्थार्जन में ध्यान बटाता,
पितृ – ऋण भी चुका नहीं पाता।
मृत्यु के समय सबको रुला जाता,
चार कंधों से श्मशान घाट जाता।

♦ सुखमंगल सिंह जी – अवध निवासी ♦

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  • “सुखमंगल सिंह जी“ ने, बहुत ही सरल शब्दों में सुंदर तरीके से, कविता के माध्यम से बखूबी समझाने की कोशिश की है – बहुत भाग्य से मानव जीवन मिला है जिसके लिए देवता भी तरशते है। अपने इस अनमोल जीवन को यूँ ही नष्ट ना कर दो। अपने इस अनमोल जीवन का सार्थक प्रयोग करो। जीवन के खट्टे- मीठे उतार चढ़ाव का मधुर वर्णन किया है। अच्छे कर्म कर, जीवन का सदुपयोग कर, मानव जन्म को आनंदमय बनाएं।

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यह कविता (आता है अकेला – चार कंधा से जाता।) “सुखमंगल सिंह जी” की रचना है। KMSRAJ51.COM — के पाठकों के लिए। आपकी कवितायें / लेख सरल शब्दो में दिल की गहराइयों तक उतर कर जीवन बदलने वाली होती है। मुझे पूर्ण विश्वास है आपकी कविताओं और लेख से जनमानस का कल्याण होगा। आपकी कविताओं और लेख से आने वाली पीढ़ी के दिलो दिमाग में हिंदी साहित्य के प्रति प्रेम बना रहेगा। आपकी लेखन क्रिया यूं ही चलती रहे, बाबा विश्वनाथ की कृपा से।

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ज़रूर पढ़ें: पृथु का प्रादुर्भाव।

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“सफलता का सबसे बड़ा सूत्र”(KMSRAJ51)

“स्वयं से वार्तालाप(बातचीत) करके जीवन में आश्चर्यजनक परिवर्तन लाया जा सकता है। ऐसा करके आप अपने भीतर छिपी बुराईयाें(Weakness) काे पहचानते है, और स्वयं काे अच्छा बनने के लिए प्रोत्साहित करते हैं।”

 

“अगर अपने कार्य से आप स्वयं संतुष्ट हैं, ताे फिर अन्य लोग क्या कहते हैं उसकी परवाह ना करें।”~KMSRAj51

 

 

 

 

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देहातन।

Kmsraj51 की कलम से…..

♦ देहातन। ♦

वे गोबर से मटमैले हाथ, पसीने की बूंदों से तर वह चेहरा।
गौ सेवा में रत ओ री देहातन ! कितना सुन्दर रूप वह तेरा?

आठों याम तू लगी रहती है, गौ सेवा में ही चारा कभी पानी।
दूध पिलाते, घी खिलाते, तेरी यूं ही गुजर जाती है जिंदगानी।

बचपन – बुढ़ापा यूं ही गुजरे तेरा, तेरी यूं ही गुजरे ये जवानी।
शालीन, सभ्य ओ नारी रत्न तेरी! कौन समझेगा यह कहानी?

जो भी किया वह, दूसरों के लिए, किया तूने ओ महादानी!
देहात से शहर तक मेहर तेरी पर, किसी ने ये कब है मानी?

जब जूझती है नित नई उलझन से, लगती है झांसी की रानी ।
खेत खलिहानो में उगाती फसलें, खिलाती सबको है महारानी।

दिन व दिन की मेहनत के चलते, ढल जाती तेरी जवानी।
हाड़ मांस सब सुखा देती है तू, सुखा देती है चेहरे का पानी।

झुर्रियों से भरपूर तेरा चेहरा, बताता है मेहनत की कहानी।
बुढ़ापे का वह नूर तेरा, है तेरे मेहनतकश जीवन की निशानी।

वह सुख सन्तोष उन झुर्रियों से झरता, बस काया हुई पुरानी।
बूढ़ी धमनियों में अभी भी शेष है, लहू में वही स्फूर्ति रवानी।

♦ हेमराज ठाकुर जी – जिला मण्डी, हिमाचल प्रदेश ♦

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  • “हेमराज ठाकुर जी“ ने, बहुत ही सरल शब्दों में सुंदर तरीके से बखूबी समझाने की कोशिश की है – गांव के पवित्र और शुद्ध वातावरण में सुन्दर जीवन यापन। आठों पहर तू लगी रहती है, गौ सेवा में ही चारा कभी पानी। दूध पिलाते, घी खिलाते, तेरी यूं ही गुजर जाती है जिंदगानी। झुर्रियों से भरपूर तेरा चेहरा, बताता है मेहनत की कहानी। बुढ़ापे का वह नूर तेरा, है तेरे मेहनतकश जीवन की निशानी।

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यह कविता (देहातन।) “हेमराज ठाकुर जी” की रचना है। KMSRAJ51.COM — के पाठकों के लिए। आपकी कवितायें/लेख सरल शब्दो में दिल की गहराइयों तक उतर कर जीवन बदलने वाली होती है। मुझे पूर्ण विश्वास है आपकी कविताओं और लेख से जनमानस का कल्याण होगा।

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“सफलता का सबसे बड़ा सूत्र”(KMSRAJ51)

“स्वयं से वार्तालाप(बातचीत) करके जीवन में आश्चर्यजनक परिवर्तन लाया जा सकता है। ऐसा करके आप अपने भीतर छिपी बुराईयाें(Weakness) काे पहचानते है, और स्वयं काे अच्छा बनने के लिए प्रोत्साहित करते हैं।”

 

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संसार ही स्वर्ग बन जाता।

Kmsraj51 की कलम से…..

♦ संसार ही स्वर्ग बन जाता। ♦

काश! सासें बहुओं को बेटी ही मानती,
बहुएं सासों को मानने लग जाए माता।
क्या जरूरत थी तब भिस्त की चाह की?
फिर तो यह संसार ही स्वर्ग बन जाता।

बाप – बेटे, भाइयों को पत्नियां न लड़ाए,
दोस्त सा व्यवहार करने लगे हर भ्राता।
घर की बहुएं – बेटियां बहनों सी रहे सब,
फिर तो यह संसार ही स्वर्ग बन जाता।

बहुओं को न सताए हम और बेटे हमारे,
बेटियों को न सताए ससुराल – जामाता।
हर रिश्तों में प्यार ही प्यार फैल जाए तो,
फिर तो यह संसार ही स्वर्ग बन जाता।

काश! पड़ोसी से कोई पड़ोसी न लड़ता,
ईर्ष्या, राग, द्वेष का भाव खत्म हो जाता।
मोह, ममता, नफरत की दीवारें गिर जाती,
फिर तो यह संसार ही स्वर्ग बन जाता।

रहते न रोग – शोक, दम्भ, आधी और व्याधि,
न रहता झगड़े का हेतु जोरु, जमी और बुढ़ापा।
सबके घरों में रहती बराबर सी सुविधाएं तो,
फिर तो यह संसार ही स्वर्ग बन जाता।

सर्पणी सा न लीलती निज जाए को जननी,
पिता पर नारी के झांसे में सुत को न भुलाता।
बहु – बेटे न ठुकराते अपने ही मां – बाप को तो,
फिर तो यह संसार ही स्वर्ग बन जाता।

रंग भेद, जाति – धर्म के सब झगड़े ही मिट जाते,
आता न आजीवन किसी को इस जग में बुढ़ापा।
दया, करुणा, सहजता, सरलता सब में फैल जाती,
तो फिर तो यह संसार ही स्वर्ग बन जाता।

♦ हेमराज ठाकुर जी – जिला मण्डी, हिमाचल प्रदेश ♦

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  • “हेमराज ठाकुर जी“ ने, बहुत ही सरल शब्दों में सुंदर तरीके से बखूबी समझाने की कोशिश की है – हर सास अपनी बहु को बेटी समझे और वैसा ही व्यवहार करें तथा हर बहु सास को माँ की तरह समझे और वैसा ही व्यवहार करें, तो यह घर संसार शांतिमय स्वर्ग जैसा बन जाये। बाप – बेटे, भाइयों को पत्नियां न लड़ाए। दोस्त सा व्यवहार करने लगे हर भ्राता। घर की बहुएं – बेटियां बहनों सी रहे सब। फिर तो यह संसार ही स्वर्ग बन जाता।

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यह कविता (संसार ही स्वर्ग बन जाता।) “हेमराज ठाकुर जी” की रचना है। KMSRAJ51.COM — के पाठकों के लिए। आपकी कवितायें/लेख सरल शब्दो में दिल की गहराइयों तक उतर कर जीवन बदलने वाली होती है। मुझे पूर्ण विश्वास है आपकी कविताओं और लेख से जनमानस का कल्याण होगा।

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“सफलता का सबसे बड़ा सूत्र”(KMSRAJ51)

“स्वयं से वार्तालाप(बातचीत) करके जीवन में आश्चर्यजनक परिवर्तन लाया जा सकता है। ऐसा करके आप अपने भीतर छिपी बुराईयाें(Weakness) काे पहचानते है, और स्वयं काे अच्छा बनने के लिए प्रोत्साहित करते हैं।”

 

“अगर अपने कार्य से आप स्वयं संतुष्ट हैं, ताे फिर अन्य लोग क्या कहते हैं उसकी परवाह ना करें।”~KMSRAj51

 

 

 

 

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सच्चा गुरु कौन ?

Kmsraj51 की कलम से…..

♦ सच्चा गुरु कौन ? ♦

गुरु पूर्णिमा व सच्चे गुरु पर KMSRAJ51 के विचार।

वास्तविक गुरु वह हाेता है जाे अपने अनुयाइयाें काे परमात्म मिलन का सच्चा मार्ग दिखाये, ना की केवल स्वयं की पूजा-अर्चना करवायें। जाे गुरु केवल स्वयं की पूजा-अर्चना करवाता हैं वह गुरु नहीं राक्षस(दैत्य) है, वह आपकाे परमात्मा से विमुख(दुर) कर रहा हैं। जबकी एक सच्चा गुरु ऐसा कभी नहीं करता।

मनुष्य कभी किसी मनुष्य का उद्धार(निर्वाण या मोक्ष) नहीं कर सकता, यहा तक कि साधु-संताे का भी उद्धार करने के लिए स्वयं परमात्मा काे आना पड़ता हैं। अर्थात: मनुष्य कभी किसी मनुष्य का उद्धार नहीं कर सकता।

सभी मनुष्याें का सच्चा गुरु परमात्मा (GOD) ही हैं।

यह बात “श्रीमद् भागवत गीता” के चौथे अध्याय के श्लोक संख्या “८” से:

परित्राणाय साधूनां विनाशाय च दुष्कृताम्।
धर्मसंस्थापनार्थाय संभवामि युगे युगे॥

अर्थात: साधु पुरुषोंका उद्धार करने के लिये, पापकर्म करने वालाें का विनाश करने के लिये और धर्म की अच्छी तरह से स्थापना करने के लिये मैं युग-युग में (संगमयुग में) प्रकट (किसी सतपुरुष शरीर का माध्यम लेकर) हुआ करता हूँ॥८॥

ध्यान दें,

संगमयुग : वह समय जब कलियुग (कलयुग) का आखिरी कुछ वर्ष शेष रह जाये, जिसके बाद सतयुग आने वाला हाे। यहीं समय संगमयुग कहलाता हैं। – KMSRAJ51

⋅—⋅♦⋅—⋅♦⋅—⋅♦⋅—⋅

कहने का तात्पर्य यह है की – सच्चा गुरु कभी भी खुद की पूजा अर्चना नहीं करवाता। एक सच्चा गुरु सदैव ही आपको परमात्म मिलन का सच्चा मार्ग दिखाता है, जिस पर चलकर आप पूर्ण समर्पित मन से, पूर्ण श्रद्धा से साधना करते है तो अपनी सुषुप्त शक्तियों को जागृत करते है।

जब आत्मा की सुषुप्त शक्तियां जागृत होने लगती है, आपको सत्य का बोध होने लगता है। आपको सर्वोच्च आनंद की अनुभूति होने लगती है, इस आनंद के सामने अन्य आनंद फीकी लगने लगती है।

जो सत्य है, सास्वत है उसका बोध होने लगता है, संसार में रहते हुए भी आप संसार के बंधनो से मुक्त होने की अनुभूति करने लगते है।

सच्चे गुरु का सदैव ही आदर, सत्कार और सम्मान करें, पूर्ण समर्पित मन से! याद रहे मैं यहां बात कर रहा हूं सच्चे गुरु की।

गुरु पूर्णिमा: सच्चे अर्थो में गुरु पूर्णिमा का मतलब है गुरु के द्वारा बताये हुए मार्ग पर पूर्ण समर्पित मन से चलकर साधना करना। जिससे आपको उस सत्य का बोध हो, जिसकी आपको तलाश है।

एक सच्चा गुरु आपसे यही चाहता है की आप उसके बताये हुए मार्ग पर चलते हुए पूर्ण समर्पित मन से साधना करें। जिससे आपको पूर्ण सत्य की पहचान हो, और आप बुरे कर्मो से मुक्त होकर अच्छे कर्मो की तरफ अपना कदम बढ़ाये। आपके अच्छे कर्म से मानवता का कल्याण हो।

इस संसार में आने पर किसी भी इंसान की प्रथम गुरु माँ है।

अपने सच्चे गुरु का पूर्ण समर्पित मन से आदर, सेवा, सत्कार व सम्मान करें। पूर्ण विश्वास और समर्पित मन से सच्चे गुरु के द्वारा बताए हुए मार्ग पर चलकर सच्चे मन से साधना करें। जिससे आपका कल्याण हो। आपका यह मनुष्य जीवन सार्थक हो। सच्चे गुरु के द्वारा बताए हुए मार्ग पर चलकर सच्चे मन से साधना करते है तो आपको सत्य का बोध जरूर होता है।

प्यारे दोस्तों – यहाँ आपको सच्चे आध्यात्मिक गुरु के बारे में बताया है।

यह लेख KMSRAJ51 की स्वयं रचित रचना है।

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