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KMSRAJ51-Always Positive Thinker

“तू ना हो निराश कभी मन से” – (KMSRAJ51, KMSRAJ, KMS)

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Hindi Kavita

पृथु का प्रादुर्भाव।

Kmsraj51 की कलम से…..

♦ पृथु का प्रादुर्भाव। ♦

कवि हूं मैं सरयू – तट का।
समय चक्र के उलट पलट का।

मानव मर्यादा की खातिर,
मेरी अयोध्या खड़ी हुई।
कालचक्र के चक्कर से ही,
विश्व की आंखें गड़ी हुई।

हाल ये जाने है घट घट का।
कवि मैं सरयू – तट का।

प्रादुर्भाव हुआ पृथु – अर्ती का,
अंग – वंश वेन- भुजा मंथन से।
विदुर – मैत्रेय का हुआ संवाद,
गंधर्व ने सुमधुर गान किया मन से।

मन भर गया हर – पनघट का।
भाग्यशाली घूंघट का।

मनमोहक हरियाली छाई।
सकल अवध खुशियाली आई।
राजा पृथु का आना सुनकर।
ऋषियों की वाणी हरसाई।

मगन हुआ मन घट – पनघट का।
कवि हूं मैं सरयू तट का।

पृथु के पृथ्वी पर प्रादुर्भाव से,
दोस्तों को लगा बड़ा झटका।
माया – मोह को उसी ने पटका,
काबिल हूं मैं सारी घूंघट का।

विवेकी पुरुष कहीं ना भटका।
कवि हूं मैं सरयू – तट का।

♦ सुखमंगल सिंह जी – अवध निवासी ♦

—————

  • “सुखमंगल सिंह जी“ ने, बहुत ही सरल शब्दों में सुंदर तरीके से, कविता के माध्यम से बखूबी समझाने की कोशिश की है – इस कविता में कवि ने राजा पृथु के प्रादुर्भाव का, अवध के मनोरम सुन्दर दृश्य का वर्णन किया है। ऋषियों के वाणी हरसाई, सकल अवध खुशियाली आई।

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यह कविता (पृथु का प्रादुर्भाव।) “सुखमंगल सिंह जी” की रचना है। KMSRAJ51.COM — के पाठकों के लिए। आपकी कवितायें सरल शब्दो में दिल की गहराइयों तक उतर कर जीवन बदलने वाली होती है। मुझे पूर्ण विश्वास है आपकी कविताओं और लेख से जनमानस का कल्याण होगा। आपकी कविताओं और लेख से आने वाली पीढ़ी के दिलो दिमाग में हिंदी साहित्य के प्रति प्रेम बना रहेगा। आपकी लेखन क्रिया यूं ही चलती रहे, बाबा विश्वनाथ की कृपा से।

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जैसे शरीर के लिए भोजन जरूरी है वैसे ही मस्तिष्क के लिए भी सकारात्मक ज्ञान और ध्यान रुपी भोजन जरूरी हैं।-KMSRAj51

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“सफलता का सबसे बड़ा सूत्र”(KMSRAJ51)

“स्वयं से वार्तालाप(बातचीत) करके जीवन में आश्चर्यजनक परिवर्तन लाया जा सकता है। ऐसा करके आप अपने भीतर छिपी बुराईयाें(Weakness) काे पहचानते है, और स्वयं काे अच्छा बनने के लिए प्रोत्साहित करते हैं।”

 

“अगर अपने कार्य से आप स्वयं संतुष्ट हैं, ताे फिर अन्य लोग क्या कहते हैं उसकी परवाह ना करें।”~KMSRAj51

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अपने घर में मगन।

Kmsraj51 की कलम से…..

♦ अपने घर में मगन। ♦

रच – रच कर रचनाएं,
कालिख पन्नों पर घोली।
अपनी ही गति में मगन,
प्रतिबिंब कही नहीं खोली।

मन – मजीरा चौरस खापें,
चौखट – चौखट पे खांचा।
धरा की संरचना ऐसी की,
जाकर चारों तरफ से भागा।

आस – पास में खतरे सारे,
भीड़ भरी सड़कों को नापा।
उबड़ खाबड़ गिरी बस्ती में,
गीत गांव – गांव नया गाता।

चिकने – चिकने रंग रूप से,
लिख पढ़ कर सभी लुभाता।
राग – रंग व्यापारिक सपना,
दुनिया को अपना ही भाता।

दूर-दूर अपरिचित सब जैसे,
कैसे कहां कौन हंसा पाता।
रोशनी में बंधा हुआ अंधरा,
कोई कैसे किसे समझा पाता।

मोहित होता है अपना मन,
पढ़-पढ़ कर रचना की पक्ति।
ज्ञात नहीं पीतल की उत्पत्ति,
करता रहता सुवरण पर गर्व।

ओ कुशल लेखनी का संभल,
निश्चित जगत में तेरा है पथ।
पवन घन को जैसे है हांकता,
दिनकर की किरणों सा चल।

वाह्य जगत में जीवन मेरा,
हो अंतर जीवन प्रतिबिंवित।
सुख की अभिलाषा में कवि,
रचते रहें वह रचना उत्कृष्ट।

♦ सुखमंगल सिंह जी – अवध निवासी ♦

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  • “सुखमंगल सिंह जी“ ने, बहुत ही सरल शब्दों में सुंदर तरीके से, कविता के माध्यम से बखूबी समझाने की कोशिश की है – इस कविता में कवि ने एक लेखक / कवि के मन में चलने वाले विचारों के प्रवाह में बसने वाले एक-एक शब्द को जोड़ कर उसे सही तरीके से संजोने को बहुत ही अच्छी तरह से कई सारे उदहारण देकर बताया हैं।

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यह कविता (अपने घर में मगन।) “सुखमंगल सिंह जी” की रचना है। KMSRAJ51.COM — के पाठकों के लिए। आपकी कवितायें सरल शब्दो में दिल की गहराइयों तक उतर कर जीवन बदलने वाली होती है। मुझे पूर्ण विश्वास है आपकी कविताओं और लेख से जनमानस का कल्याण होगा। आपकी कविताओं और लेख से आने वाली पीढ़ी के दिलो दिमाग में हिंदी साहित्य के प्रति प्रेम बना रहेगा। आपकी लेखन क्रिया यूं ही चलती रहे, बाबा विश्वनाथ की कृपा से।

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“सफलता का सबसे बड़ा सूत्र”(KMSRAJ51)

“स्वयं से वार्तालाप(बातचीत) करके जीवन में आश्चर्यजनक परिवर्तन लाया जा सकता है। ऐसा करके आप अपने भीतर छिपी बुराईयाें(Weakness) काे पहचानते है, और स्वयं काे अच्छा बनने के लिए प्रोत्साहित करते हैं।”

 

“अगर अपने कार्य से आप स्वयं संतुष्ट हैं, ताे फिर अन्य लोग क्या कहते हैं उसकी परवाह ना करें।”~KMSRAj51

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जगत जननी का परित्याग।

Kmsraj51 की कलम से…..

♦ जगत जननी का परित्याग। ♦

पता क्या जगत जननी सीता को,
फिर जंगल में जाना होगा।
घनी पश्चिम की पहाड़ी के जंगल में,
जीवन उन्हें बिताना होगा।

श्रीराम के निर्मल देह पर,
मृग – चर्म जूट जटाएं फाहरेंगी।
हवन चंदन गंध व दहकते,
गुगल से ऋचाएं होंगी।

रथ साथ सारथी पुत्रवत लखन,
घने जंगल में छोड़ेंगे।
जिसने अपने जीवन में,
सीता के मुख नहीं देखे होंगे।

पर विधाता का लिखा लिखनी,
कौन मिटा सकता है यहां।
वहीं विश्व विख्यात विधाता,
सीता को जंगल पहुंचा सकता जहां।

धैर्य – धर्म की मूर्ति मई कल्याणी तुम,
खंडित व्यक्तित्व लिए विलख रही।
सच कहूं प्रिय! मेरी सीते!
मैं राम तत्वों का आदर्श लिए थक रहा।

विवश हूं प्रजा की बात पर,
धर्म की मर्यादा और राज पाठ पर।
स्वयं दंड दूंगा मैं अपने आप को,
धर्म की धात्री तुम अयोध्या राज की।

लोका पवाद में घिरा अवध की,
शाम मंत्रणा राज लखन से बोले राम।
राजा का राज्य पर निष्ठा निर्विवाद,
विधि के विधान पर किसका अधिकार।

संकल्पों का विकल्प नहीं होता,
वैराग्य धर्म बन वासी मेरी नियति।
विकल्प केवल सीता का परित्याग,
प्रिये मेरी अभिन्न अंग हो, ना होना खिन्न।

मेरी निर्णय को कहना ना तू कठोर,
सीता कल निर्वासन का है भोर।
अभिषेक करेगी तेरी वन्य भोर,
संदेशवाहक दिल से निकलेगा चोर।

रथारूढ़ जाना गंगा तट पर लेकिन,
उद्घाटित अभी करना ना भेद गूढ़।
लक्ष्मण राम के मंत्रणा परिपूर्ण,
आरण्य निकट सीते को छोड़ना तुम।

देना धो आंचल का उभरा कालुष्य,
रूधने लगा कहते कंठ राम।
बिकट लगा उस संध्या का गुंजा शूल,
कर प्रणाम अस्ताचल ढल गया सूर्य।

छलक उठे लक्ष्मण के भरे नैन,
थरथर कांप उठा धरती का स्वर्ग मौन।
देख रहा मौन रहकर राजमहल,
धार सरयू की हुई स्तब्ध अंतर्मन।

♦ सुखमंगल सिंह जी – अवध निवासी ♦

—————

  • “सुखमंगल सिंह जी“ ने, बहुत ही सरल शब्दों में सुंदर तरीके से, कविता के माध्यम से बखूबी समझाने की कोशिश की है – जगत जननी माता सीता जी का परित्याग, करते समय श्री राम जी के मनःस्थिति का खूबसूरत वर्णन किया है। माता सीता जी से श्री राम जी कहते है “धैर्य – धर्म की मूर्ति मई कल्याणी तुम खंडित व्यक्तित्व लिए विलख रही। सच कहूं प्रिय! मेरी सीते! मैं राम तत्वों का आदर्श लिए थक रहा। विवश हूं प्रजा की बात पर धर्म की मर्यादा और राज पाठ पर। स्वयं दंड दूंगा मैं अपने आप को धर्म की धात्री तुम अयोध्या राज की।”

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यह कविता (जगत जननी का परित्याग।) “सुखमंगल सिंह जी” की रचना है। KMSRAJ51.COM — के पाठकों के लिए। आपकी कवितायें सरल शब्दो में दिल की गहराइयों तक उतर कर जीवन बदलने वाली होती है। मुझे पूर्ण विश्वास है आपकी कविताओं और लेख से जनमानस का कल्याण होगा। आपकी कविताओं और लेख से आने वाली पीढ़ी के दिलो दिमाग में हिंदी साहित्य के प्रति प्रेम बना रहेगा। आपकी लेखन क्रिया यूं ही चलती रहे, बाबा विश्वनाथ की कृपा से।

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“स्वयं से वार्तालाप(बातचीत) करके जीवन में आश्चर्यजनक परिवर्तन लाया जा सकता है। ऐसा करके आप अपने भीतर छिपी बुराईयाें(Weakness) काे पहचानते है, और स्वयं काे अच्छा बनने के लिए प्रोत्साहित करते हैं।”

 

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मैं धीर भरी सुख की बदली।

Kmsraj51 की कलम से…..

♦ मैं धीर भरी सुख की बदली। ♦

मैं धीर भरी सुख की बदली।
बदली दुनिया मैं भी बदली।

हो पीर भले चाहे जितनी।
जीना अब मैंने सीख लिया।
जो शूल बिछे पथ में मेरे,
वो शूल हटाना सीख लिया।

कंटक पथ पर, उर साहस भर।
मासूम कली मैं चल निकली।
मैं धीर भरी सुख ………
बदली दुनिया मैं ………

नैनों से चाहे नीर बहे।
हिय से अनुराग बहाती हूँ।
यूँ ही नहीं मैं इस सृष्टि की,
अनुपम रचना कहलाती हूँ।

असुरों का वध करने को अब,
खुद आयुध लेकर चल निकली।
मैं धीर भरी सुख ……..
बदली दुनिया मैं ……..

नीरव नीरस गृह को मैं ही,
मधुर सुरों से भर देती हूँ।
निर्जीव खड़ी दीवारों की,
जड़ता सारी हर लेती हूँ।

कण – कण घर का महके ऐसे,
मानो सुवासित बयार चली।
मैं धीर भरी सुख ……..
बदली दुनिया मैं ………

केवल भीतों के आयत से,
होता है निर्मित सदन नहीं।
गृहलक्ष्मी बन कर आ जाऊँ।
बस जाता है फिर भवन वहीं।

मंगल गायन उत्सव पूजा,
लगती हैं सको बहुत भली।
मैं धीर भरी सुख की ……..
बदली दुनिया मैं ………..

हो जाऊँ मैं पल भर ओझल।
अनुपस्थिति मेरी बहुत खले।
दृष्टि पड़े जब भी मुझ पर तो,
मुख पर सबके मुस्कान खिले।

केवल मेरे होने से ही।
सूरत सबकी है खिली – खिली।
मैं धीर भरी सुख की बदली।
दुनिया बदली मैं भी बदली।

औरों की गलती पर मैंने,
अब नीर बहाना छोड़ दिया।
नभ तक परचम फहराया है।
धारा का रुख़ ही मोड़ दिया।

निज सक्षमता के बल पर ही,
लाचारी पीछे छोड़ चली।
मैं धीर भरी सुख की बदली।
दुनिया बदली मैं भी बदली।

♦ वेदस्मृति ‘कृती’ जी – पुणे, महाराष्ट्र ♦

—————

  • “वेदस्मृति ‘कृती’ जी“ ने, बिलकुल ही सरल शब्दों में समझाने की कोशिश की हैं – “नारी तू नारायणी” एक नारी से ही घर का रौनक है, वही है जो हरेक हालात, में घर को व घर के सभी सदस्यों का देखभाल करती हैं। “नीरव नीरस गृह को मैं ही मधुर सुरों से भर देती हूँ, निर्जीव खड़ी दीवारों की जड़ता सारी हर लेती हूँ। हो जाऊँ मैं पल भर ओझल, अनुपस्थिति मेरी बहुत खले, दृष्टि पड़े जब भी मुझ पर तो, मुख पर सबके मुस्कान खिले।”

—————

यह कविता (मैं धीर भरी सुख की बदली।) ” वेदस्मृति ‘कृती’ जी “ की रचना है। KMSRAJ51.COM — के पाठकों के लिए। आपकी कवितायें सरल शब्दो में दिल की गहराइयों तक उतर कर जीवन बदलने वाली होती है। मुझे पूर्ण विश्वास है आपकी कविताओं और लेख से जनमानस का कल्याण होगा। आपकी लेखन क्रिया यूँ ही चलती रहे जनमानस के कल्याण के लिए।

साहित्यिक नाम : वेदस्मृति ‘कृती’
शिक्षा : एम. ए. ( अँग्रेजी साहित्य )
बी.एड. ( फ़िज़िकल )
आई आई टी . शिक्षिका ( प्राइवेट कोचिंग क्लासेज़)
लेखिका, कहानीकार, कवियित्री, समीक्षक, ( सभी विधाओं में लेखन ) अनुवादक. समाज सेविका।

अध्यक्ष : “सिद्धि एक उम्मीद महिला साहित्यिक समूह”
प्रदेश अध्यक्ष : अखिल भारतीय साहित्य सदन ( महाराष्ट्र इकाई )
राष्ट्रीय आंचलिक साहित्य संस्थान बिहार प्रान्त की महिला प्रकोष्ठ,
श्री संस्था चैरिटेबल ट्रस्ट : प्रदेश प्रतिनिधि ( महाराष्ट्र )
अंतर्राष्ट्रीय हिंदी परिषद में – सह संगठन मंत्री, मुंबई ज़िला, महाराष्ट्र
हिन्दी और अँग्रेजी दोनों विधाओं में स्वतंत्र लेखन।

अनेक प्रतिष्ठित हिन्दी/अँग्रेजी पत्र – पत्रिकाओं में नियमित रचनाएँ प्रकाशित।

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चपला अपने आंगन।

Kmsraj51 की कलम से…..

♦ चपला अपने आंगन। ♦

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तम मलिक अंचल में घना।
कलपना मेघा चपला चंचला।

संवेदना अभिव्यक्ति सब मौन।
बेर कदली संग निभाता कौन।

निर्वाधित अधिकार उसमें सना।
कातर स्वरों के राग से जो बना।

शिष्टता सम गामिनी मैं कौन ?
‘मंगल’ स्वर लहरी बजती मौत।

जग – क्रंदन नव वंदन।
मन नभ पुलकित आंगन।

समता सुंदर अभिनंदन।
स्मृतियां करती अंकन।

मधु समीर मलाई चंदन।
उपवन किसलय आलिंगन।

सौरभ प्रदेश में परिवर्तन।
चपला चमकी घर आंगन।

♦ सुखमंगल सिंह जी – अवध निवासी ♦

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  • “सुखमंगल सिंह जी“ ने, बहुत ही सरल शब्दों में सुंदर तरीके से, कविता के माध्यम से बखूबी समझाने की कोशिश की है – मेघाच्छादित वर्षा, बिजली कड़कने की आवाज हो, वर्षा का पृथ्वी से आलिंगन हो। कितना खूबसूरत मनोरम दृश्य हैं। हर तरफ खुशिया ही खुशिया।

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यह कविता (चपला अपने आंगन।) “सुखमंगल सिंह जी” की रचना है। KMSRAJ51.COM — के पाठकों के लिए। आपकी कवितायें सरल शब्दो में दिल की गहराइयों तक उतर कर जीवन बदलने वाली होती है। मुझे पूर्ण विश्वास है आपकी कविताओं और लेख से जनमानस का कल्याण होगा।

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भारत की वीरांगनाएँ।

Kmsraj51 की कलम से…..

♦ भारत की वीरांगनाएँ। ♦

आओ सुनाऊँ गाथा तुमको भारत की ललनाओं की।
रण कौशल में माहिर थीं ऐसी वीरांगनाओं की।
हरगिज़ भूल नहीं सकते हम चेनम्मा के बलिदान को।
ठुकरा दिया था पल में उसने अंग्रेज़ों के फरमान को।

स्वाभिमानी चेनम्मा से फ़ौज ब्रिटिश की चिढ़ गयी थी।
दुर्गा सम कित्तूर की रानी अंग्रेज़ों से भिड़ गयी थी।
रणभूमि कितने अंग्रेज़ों का में उसने काम तमाम किया।
शूरता से लड़ते – लड़ते निज जीवन का बलिदान दिया।
आओ सुनाऊँ गाथा………

याद करो तुम सन सत्तावन की उस भीषण चिंगारी को।
गोरे भी कायल थे जिसके उस तलवार दुधारी को,
दुर्गा सम थी वो समरभूमि में लक्ष्मीबाई नाम था।
शूरवीरता देख के जिसकी दुश्मन भी हैरान था।

दोनों हाथों में लीं तलवारें बच्चे को भी साथ लिया।
टूट पड़ी शत्रु सेना पर दुश्मन को हाथों हाथ लिया।
आओ सुनाऊँ गाथा………

एक था शासक अलाउद्दीन जो चाचा का हत्यारा था।
उत्तर से दक्षिण तक उसने आतंक खूब मचाया था।
निर्मम, निर्दयी, अत्याचारी क्रूरता का पर्याय था।
उसके सैन्य बल के आगे हर कोई असहाय था।

नीच इरादे लेकर अपने वो चित्तौड़ में आया फिर,
राजपूत पद्मिनियों ने उसे अच्छा मज़ा चखाया फिर,
आओ सुनाऊँ गाथा तुमको………

युद्ध कला नहीं आती थी पुण्यमयी वो नारी थी।
देशभक्ति और स्वामिभक्ति उसकी जग से न्यारी थी।
शोणित तलवार लिये हाथ में बलबीर कक्ष में आया जब,
उदय सिंह की शय्या पर उसने अपना लाल सुलाया तब,

ऋणी रहेगा इतिहास सदा पन्ना ने जो काम किया।
राजधर्म की रक्षा हेतु अपना ही सुत वार दिया।
आओ सुनाऊँ गाथा तुमको भारत की ललनाओं की।
रण कौशल में माहिर थीं ऐसी वीरांगनाओं की।

♦ वेदस्मृति ‘कृती’ जी – पुणे, महाराष्ट्र ♦

—————

  • “वेदस्मृति ‘कृती’ जी“ ने, बिलकुल ही सरल शब्दों में – वीरांगनाओं के शौर्य और वीरता से भरे जीवन गाथा को कविता के रूप में प्रस्तुत किया है। हमारा भारत देश वीरांगनाओं की भूमि है। इस कविता के माध्यम से आने वाली पीढ़ियों को वीरांगनाओं के शौर्य और वीरता से भरे जीवन गाथा को समझने में आसानी होगी। अपनी वीर माता रानी चेनम्मा, लक्ष्मीबाई, पद्मिनि, पन्ना जी के शौर्य और वीरता को जान और समझ पाएंगे।

—————

यह कविता (भारत की वीरांगनाएँ।) ” वेदस्मृति ‘कृती’ जी “ की रचना है। KMSRAJ51.COM — के पाठकों के लिए। आपकी कवितायें सरल शब्दो में दिल की गहराइयों तक उतर कर जीवन बदलने वाली होती है। मुझे पूर्ण विश्वास है आपकी कविताओं और लेख से जनमानस का कल्याण होगा। आपकी लेखन क्रिया यूँ ही चलती रहे जनमानस के कल्याण के लिए।

साहित्यिक नाम : वेदस्मृति ‘कृती’
शिक्षा : एम. ए. ( अँग्रेजी साहित्य )
बी.एड. ( फ़िज़िकल )
आई आई टी . शिक्षिका ( प्राइवेट कोचिंग क्लासेज़)
लेखिका, कहानीकार, कवियित्री, समीक्षक, ( सभी विधाओं में लेखन ) अनुवादक. समाज सेविका।

अध्यक्ष : “सिद्धि एक उम्मीद महिला साहित्यिक समूह”
प्रदेश अध्यक्ष : अखिल भारतीय साहित्य सदन ( महाराष्ट्र इकाई )
राष्ट्रीय आंचलिक साहित्य संस्थान बिहार प्रान्त की महिला प्रकोष्ठ,
श्री संस्था चैरिटेबल ट्रस्ट : प्रदेश प्रतिनिधि ( महाराष्ट्र )
अंतर्राष्ट्रीय हिंदी परिषद में – सह संगठन मंत्री, मुंबई ज़िला, महाराष्ट्र
हिन्दी और अँग्रेजी दोनों विधाओं में स्वतंत्र लेखन।

अनेक प्रतिष्ठित हिन्दी/अँग्रेजी पत्र – पत्रिकाओं में नियमित रचनाएँ प्रकाशित।

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“स्वयं से वार्तालाप(बातचीत) करके जीवन में आश्चर्यजनक परिवर्तन लाया जा सकता है। ऐसा करके आप अपने भीतर छिपी बुराईयाें(Weakness) काे पहचानते है, और स्वयं काे अच्छा बनने के लिए प्रोत्साहित करते हैं।”

 

“अगर अपने कार्य से आप स्वयं संतुष्ट हैं, ताे फिर अन्य लोग क्या कहते हैं उसकी परवाह ना करें।”~KMSRAj51

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अस्तित्व।

Kmsraj51 की कलम से…..

♦ अस्तित्व। ♦

पीड़ा और शोक की कहानी,
आरोप-प्रत्यारोप की कहानी,
से बड़ी होती है।

संतोष और विवेक पूर्ण धरोहरों,
सुख शांति का एकमात्र साधन है।
अस्तित्व का कभी अंत नहीं होता।
वस्तु का ही सदा अंत होता है।

आत्मा न जन्म लेती है ना मरती।
जिसका जन्म नहीं होता,
उसकी मृत्यु नहीं होती है।
आत्मा का प्रारंभ ना और ना अंत।

इसलिए आत्मा की अमरता है।
जिसका कोई नहीं होता है।
उसकी मृत्यु नहीं होती है।

ब्रह्मांड में प्रकाशित होने वाला,
ब्रह्मांड के बगीचे का अंग है मनुष्य।

सब कुछ उसके अंदर होने के बावजूद।
प्रकृति और समाज पर निर्भर होता है मनुष्य।
मनुष्य एक सामाजिक प्राणी है।
इसलिए वह समाज में रहता है।

अपने अस्तित्व के लिए,
वह समाज पर निर्भर है।
मनुष्य समाज से अलग हो जाता है,
तो उसका विनाश संभव है।

अपने बारे में केवल विचार करके,
मनुष्य खुशहाल नहीं जि सकता।
व्यक्ति समाज से अलग,
रह कर सुखी नहीं होता।

संत पुरुष समाज से अलग,
रह कर ईश्वर से लगन लगाते हैं।
ईश्वर और ऋषि जब साथ होते हैं,
तो वह आनंदा की अनुभूति होती हैं।

मनुष्य को समाज के,
अनुसार चलना पड़ता है।
व्यक्तिगत सोच समाज के,
अनुसार ही रखनी पड़ती है।

सभी व्यक्ति अपनी सोच के अनुसार,
के लोगों के साथ रहना चाहते हैं।
जबकि सब के विचारों में विविधता होती है।

आत्मा का अर्थ होता है अस्तित्व,
अस्तित्व तो कभी मरता नहीं है।
यह पंच तत्वों से निर्मित,
शरीर भी अपनी नहीं है।

आत्मा जब शरीर को छोड़ देती है,
तब शरीर पंचतत्व में ही मिल जाती है।
विद्वान पुरुष आत्मा और शरीर में अंतर जानते हैं।
आत्मा न जन्म लेती है और न हीं मरती है।

♦ सुखमंगल सिंह जी – अवध निवासी ♦

—————

  • “सुखमंगल सिंह जी“ ने, बहुत ही सरल शब्दों में सुंदर तरीके से, कविता के माध्यम से बखूबी समझाने की कोशिश की है – आत्मा का अर्थ होता है अस्तित्व, यह पंच तत्वों से निर्मित शरीर भी अपनी नहीं है। आत्मा के सभी गुणों का महत्व और रियलिटी को बताया हैं। मनुष्य क्या है और मनुष्य समाज में क्यों रहता है, इसे भी समझाया हैं।

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यह कविता (अस्तित्व।) “सुखमंगल सिंह जी” की रचना है। KMSRAJ51.COM — के पाठकों के लिए। आपकी कवितायें सरल शब्दो में दिल की गहराइयों तक उतर कर जीवन बदलने वाली होती है। मुझे पूर्ण विश्वास है आपकी कविताओं और लेख से जनमानस का कल्याण होगा।

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“स्वयं से वार्तालाप(बातचीत) करके जीवन में आश्चर्यजनक परिवर्तन लाया जा सकता है। ऐसा करके आप अपने भीतर छिपी बुराईयाें(Weakness) काे पहचानते है, और स्वयं काे अच्छा बनने के लिए प्रोत्साहित करते हैं।”

 

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माँ सरयू बहुत महान।

Kmsraj51 की कलम से…..

♦ माँ सरयू बहुत महान। ♦

माँ सरयू बहुत महान।
यहां घूमते थके ना राम।
जिह्वा पर बस एक ही नाम,
राम राम बस राम ही राम।

तीनो लोक करें गुणगान।
हे माँ सरयू तुझे प्रणाम।

राम – कथा सरयू के तीर,
कहता – सुनता होता वीर।
सुखमय उसका जीवन होता।
वह होता धीर – गंभीर।

पीता सदा वह राम मैं जाम,
हे माँ ! सरजू तुझे प्रणाम।

भोले बाबा औघड़ दानी।
सृष्टि में कोई नहीं है शानी।
शिव भक्तों से जो भी उलझे।
हो जाती उसकी खत्म कहानी।

शिव भक्ति मिले बिन मोल औ दाम।
हे माँ ! सरजू तुझे प्रणाम।

शिव – संग शक्ति, शक्ति से किरपा,
प्रतिपल हो सुलभ आशीष।
सभी का शुभ चाहता चले जो,
रण में होता वही है बीस।

नाम न होवे कभी नाम।
हे माँ ! सरयू तुझे प्रणाम।

♦ सुखमंगल सिंह जी – अवध निवासी ♦

—————

  • “सुखमंगल सिंह जी“ ने, बहुत ही सरल शब्दों में सुंदर तरीके से, कविता के माध्यम से बखूबी समझाने की कोशिश की है – माँ सरयू नदी के महत्व को बताया है, प्रभु श्री राम से माँ सरयू के जुड़ाव का वर्णन किया हैं। शिव और शक्ति के महत्व को समझाया है। प्रभु श्री राम के जीवन में शिव और शक्ति का क्या महत्व था यह भी बताया है।

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रानी दुर्गावती।

Kmsraj51 की कलम से…..

♦ रानी दुर्गावती। ♦

पंद्रह सौ चौबीस में जन्मी, वो चन्देलों की शान थी।
कालिंजर राजा की बेटी, वो इकलौती संतान थी।

दुर्गाष्टमी अवतरण दिवस, दुर्गा का ही अवतार थी।
थर्रायी मुग़लों की सेना ऐसी भीषण ललकार थी।

बचपन से ही दुर्गावती ने सीखीं सारी युद्ध कलाएँ।
तलवारबाज़ी, तीरंदाज़ी, घुड़सवारी आदि विद्याएँ।

संग्राम शाह की थी पुत्र वधू , गढ़ मंडला की रानी थी।
झुकी नहीं वो मुग़लों के आगे, राजपूत स्वाभिमानी थी।

युवावस्था में खोया पति को, बेटा केवल पाँच साल का,
दलपत शाह के स्वर्गवास से गढ़ मंडला का बुरा हाल था।

ऐसी संकट की बेला में भी, धैर्य नहीं खोया अपना।
मंडला पर कब्ज़ा करने का किया चूर मुग़लों का सपना।

गोंडवाना पर हमला करने सुलतान मालवा से आया।
दुर्गावती ने किया पराजित, सेना सहित उसे भगाया।

सोलह वर्षों के सुशासन में, प्रजा हित के ही काम किये।
कुँए, बावड़ी, मठ इत्यादि के खूब उन्होंने निर्माण किये।

जाना उन्हें साधारण नारी, असफ खान ने हमला बोला।
शौर्य पराक्रम देख के उनका दुश्मन का मनोबल डोला।

ह्रदय से ममतामयी रानी, रण में चंडी सी हुंकार।
शत्रु सेना भय से काँपी सुनी जब तलवारों की टंकार।

रण कौशल देख के उनका शत्रु ऐसे चकित हैरान हुए।
अबुल फज़ल के अकबरनामा में, खूब उनके गुणगान हुए।

♦ वेदस्मृति ‘कृती’ जी – पुणे, महाराष्ट्र ♦

—————

  • “वेदस्मृति ‘कृती’ जी“ ने, बिलकुल ही सरल शब्दों में रानी दुर्गावती जी के शौर्य और वीरता से भरे पूर्ण जीवन गाथा को कविता के रूप में प्रस्तुत किया है। इस कविता के माध्यम से आने वाली पीढ़ियों को रानी दुर्गावती जी के शौर्य और वीरता से भरे पूर्ण जीवन गाथा को समझने में आसानी होगी। अपनी वीर माता रानी दुर्गावती जी के शौर्य और वीरता को जान और समझ पाएंगे।

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साहित्यिक नाम : वेदस्मृति ‘कृती’
शिक्षा : एम. ए. ( अँग्रेजी साहित्य )
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लेखिका, कहानीकार, कवियित्री, समीक्षक, ( सभी विधाओं में लेखन ) अनुवादक. समाज सेविका।

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प्रदेश अध्यक्ष : अखिल भारतीय साहित्य सदन ( महाराष्ट्र इकाई )
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गांव।

Kmsraj51 की कलम से…..

♦ गांव। ♦

जन्म भर की घटनाएं एक – एक कर याद आती है।
सामने आकर घटनाएं अपना रूप दिखाती है।
कभी – कभी कश्मीर की बादी की भी याद आती है।
सद्भावना यात्रा की वह याद दिलवाते हुए आगे बढ़ जाती है।

घूम घुमाकर इधर – उधर मन हमको ले जाता है।
वापस आकर खेलन अहिरौली रानी मऊ आता है।
गांव की दक्षिण में सताई भैया की द्वार पर दिह बाबा स्थान है।
तीन तरफ से उसके जौ – गेहूं का हरा – भरा सिवान है।

गांव की पश्चिम तरफ समय माता का एक स्थान है।
नवरात्र में गांव की औरतें वहां करती धार और जलदान हैं।
माता दरबार की राशि में अगल बगल पिक्चर बंजर वान है।
का बीज हो गई उस पर गांव के ही तथाकथित महान है।

उत्तर दिशा में गांव के कालिका का दिव्य स्थान है।
आसपास उनके पेड़ – पौधों से भरा हुआ बागवान है।
उसके उत्तर में हायर सेकंडरी स्कूल महान है।
जहां से पढ़कर निकले थे, बड़े – बड़े विद्वान है।

हायर सेकेंडरी स्कूल के पास प्राइमरी पाठशाला विद्यमान है।
कक्षा तीन से पांच की पढ़ाई का मेरा यह राजस्थान है।
बाग बगीचे में मिलता है अच्छा खासा महुआ आम है।
सतवा सक्रांति पर वह आता, चटनी बनाने को काम है।

♦ सुखमंगल सिंह जी – अवध निवासी ♦

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  • “सुखमंगल सिंह जी“ ने, बहुत ही सरल शब्दों में सुंदर तरीके से बखूबी समझाने की कोशिश की है – गांव की सादगी सुंदरता व प्रेम को कविता के माध्यम से प्रस्तुत किया है। प्रकृति की सुंदरता हो, मंदिरों की खूबसूरती हो, या पेड़ पौधों का जिक्र हो, स्कूल हो, बाग बगीचे से मिलने वाला अच्छा खासा महुआ आम हो जिससे चटनी मस्त बनती है। वाह कितनी खूबसूरती से एक-एक कर वर्णन किया है। जैसे अभी-अभी की बात हो, जिवंत यूँ ही सबकुछ सामने चित्र रूप में घूमने लगता है।

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यह कविता (गांव।) “सुखमंगल सिंह जी” की रचना है। KMSRAJ51.COM — के पाठकों के लिए। आपकी कवितायें सरल शब्दो में दिल की गहराइयों तक उतर कर जीवन बदलने वाली होती है। मुझे पूर्ण विश्वास है आपकी कविताओं और लेख से जनमानस का कल्याण होगा।

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