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“तू ना हो निराश कभी मन से” – (KMSRAJ51, KMSRAJ, KMS)

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short poetry in hindi

सोशल मीडिया – भारत।

Kmsraj51 की कलम से…..

♦ सोशल मीडिया – भारत। ♦

भारत पहले सबको मिलकर समझाता है।
सभ्यता और संस्कृत का उसको ज्ञान कराता है।
भारत की संस्कृति में यही कहा जाता है,
सबको यह पहले बहुत खूब समझाता है।

मनमानी करने वालों को ज्ञान पहले बताता है।
नियम और कानून का ध्यान उसको कराता है।
त्याग और तपस्या का भी पाठ उसे पढ़ाता है।
अहिंसा और शांति का संदेश उसको सिखाता है।

पुरुषोत्तम का देश है भारत उनका मान दिखाता है।
सूर्पनखा रावण की बहना उसको भी समझाता है।
श्रीराम द्वारा लक्ष्मण की तरफ ध्यान दिया जाता है।
इधर उधर जाकर भी जब नहीं मानती शूर्पणखा है।

अंत कोप भाजन से नाक अपनी कटवा दी है।
जबकि श्रीराम द्वारा उसको समझाया जाता है।
एक कथा और सुनाने का मन कर जाता है।
बालकृष्ण के पास कंस की बहन को भेजा जाता है।

उसका भी अंत श्री कृष्ण द्वारा किया जाता है।
कहने का तात्पर्य ही है जो भारत में आया है,
भारत के बने कानून का पालन उसको करना है।
मनमानी इस देश में कहीं नहीं चलने वाला है।
एक समय तक ही उसको छूट दिया जाता है।

इसलिए नियम कानून के अंदर काम करने हैं।
शांति और विश्व बंधुत्व से यहां पर आने हैं।

♦ सुखमंगल सिंह जी – अवध निवासी ♦

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  • “सुखमंगल सिंह जी“ ने, बहुत ही सरल शब्दों में सुंदर तरीके से, कविता के माध्यम से बखूबी समझाने की कोशिश की है – यह आर्यावर्त – हमारा भारत देश है, हम सभी का दिल से सम्मान करते है यहाँ। लेकिन यहाँ पर रहना है तो – भारत के बने कानून का पालन उसको करना है। मनमानी इस देश में कहीं नहीं चलने वाला है, एक समय तक ही उसको छूट दिया जाता है। इसलिए नियम कानून के अंदर काम करने हैं। शांति और विश्व बंधुत्व से यहां पर आने हैं।

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यह कविता (सोशल मीडिया – भारत।) “सुखमंगल सिंह जी” की रचना है। KMSRAJ51.COM — के पाठकों के लिए। आपकी कवितायें सरल शब्दो में दिल की गहराइयों तक उतर कर जीवन बदलने वाली होती है। मुझे पूर्ण विश्वास है आपकी कविताओं और लेख से जनमानस का कल्याण होगा। आपकी कविताओं और लेख से आने वाली पीढ़ी के दिलो दिमाग में हिंदी साहित्य के प्रति प्रेम बना रहेगा। आपकी लेखन क्रिया यूं ही चलती रहे, बाबा विश्वनाथ की कृपा से।

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जैसे शरीर के लिए भोजन जरूरी है वैसे ही मस्तिष्क के लिए भी सकारात्मक ज्ञान और ध्यान रुपी भोजन जरूरी हैं।-KMSRAj51

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“सफलता का सबसे बड़ा सूत्र”(KMSRAJ51)

“स्वयं से वार्तालाप(बातचीत) करके जीवन में आश्चर्यजनक परिवर्तन लाया जा सकता है। ऐसा करके आप अपने भीतर छिपी बुराईयाें(Weakness) काे पहचानते है, और स्वयं काे अच्छा बनने के लिए प्रोत्साहित करते हैं।”

 

“अगर अपने कार्य से आप स्वयं संतुष्ट हैं, ताे फिर अन्य लोग क्या कहते हैं उसकी परवाह ना करें।”~KMSRAj51

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श्री कृष्ण द्वारा वसुदेव को ब्रह्म ज्ञान।

Kmsraj51 की कलम से…..

♦ श्री कृष्ण द्वारा वसुदेव को ब्रह्म ज्ञान। ♦

श्री कृष्ण बलराम जी वसुदेव जी को,
प्रातः दोनों आकर किया प्रणाम।
दोनों भाइयों का उन्होंने किया अभिनंदन,
ऋषियों के श्री मुख से सुना था जैसा वंदन।

हृदय से वसुदेव जी करने लगे दोनों से आलिंगन,
सच्चिदानंद स्वरूप का होने लगा उन्हें दर्शन।
वसुदेव बोले सच्चिदानंद स्वरूप श्री कृष्ण,
और मेरे महायोगेश्वर संकर्षण।

तुम दोनों ही जगत के हो प्रधान,
पुरुष के भी नियामक परमेश्वर।
तुम ही इस मायावी जगत के आधार हो,
तुम ही निर्माता और निर्माण सामग्री हो।

तुम दोनों जगत के स्वामी हो।
सब कुछ धारक तुम ही हो।
तुम भोग्य और भोक्ता से परे।
साक्षात भगवान तुम ही हो।

जगत की वस्तुओं के सृष्टिकर्ता,
पालन पोषण करता तुम ही हो।
विनाश वान सभी पदार्थों में तुम,
कारण रूप अविनाशी तत्व हो।

हो रहस्य ज्ञान योग माया का,
तुम्हारी कीर्ति गान लोग करते हैं।
भजन सुनकर श्री वासुदेव जी के,
भक्तवत्सल कृष्ण मुस्कुराने लगे।

विनय पूर्वक झुककर पिताजी को,
सु-मधुर वाणी में सुनाने लगे।

हम तो आपके पुत्र ही हैं पिता जी।
हमें लक्ष्य कर आपने ब्रह्म ज्ञान का,
उपदेश आप ही हमें सुनाने लगे।
मैं हूं! वही! सब आप ही बताने लगे।

जैसे छिति जल पावक गगन समीरा,
एक होते हुए अलग-अलग कहलाने लगे।
पंचमहाभूत अप्रकट – प्रकट होकर,
बड़े छोटे अधिक थोड़े दिखने लगे।

वैसे ही मैं! और बलराम जी भी,
भेद से ही दो पहचाने जाने लगे।

धरा पर जन्म – मृत्यु चक्कर रूप,
भटकते हुए जीव निमित्त आने लगे।
हम दोनों अन्याय के खिलाफ अपना,
आकर यहां शस्त्र उठाने लगे।

शरणागत उनके संसार भय को मिटाने लगे,
इस धरा को भार से मुक्ति दिलाने लगे।
मंगल प्रभु के श्री – चरण में जाने लगा,
अमृत तत्व सुख सागर सबको सुनाने लगा।

♦ सुखमंगल सिंह जी – अवध निवासी ♦

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  • “सुखमंगल सिंह जी“ ने, बहुत ही सरल शब्दों में सुंदर तरीके से, कविता के माध्यम से बखूबी समझाने की कोशिश की है – श्री कृष्ण और वासुदेव जी के मिलन और संवाद का सुर मधुर वर्णन किया है। जहाँ एक तरफ पिता – पुत्र पर प्रेम वात्सल्य बर्षा रहा है तो, वहीं दूसरी तरफ श्री कृष्ण जी, वासुदेव जी को ब्रह्म ज्ञान दे रहे है। इस मधुर मिलन के साक्षी बलराम जी है।

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यह कविता (श्री कृष्ण द्वारा वसुदेव को ब्रह्म ज्ञान।) “सुखमंगल सिंह जी” की रचना है। KMSRAJ51.COM — के पाठकों के लिए। आपकी कवितायें सरल शब्दो में दिल की गहराइयों तक उतर कर जीवन बदलने वाली होती है। मुझे पूर्ण विश्वास है आपकी कविताओं और लेख से जनमानस का कल्याण होगा। आपकी कविताओं और लेख से आने वाली पीढ़ी के दिलो दिमाग में हिंदी साहित्य के प्रति प्रेम बना रहेगा। आपकी लेखन क्रिया यूं ही चलती रहे, बाबा विश्वनाथ की कृपा से।

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“सफलता का सबसे बड़ा सूत्र”(KMSRAJ51)

“स्वयं से वार्तालाप(बातचीत) करके जीवन में आश्चर्यजनक परिवर्तन लाया जा सकता है। ऐसा करके आप अपने भीतर छिपी बुराईयाें(Weakness) काे पहचानते है, और स्वयं काे अच्छा बनने के लिए प्रोत्साहित करते हैं।”

 

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भारत की वीरांगनाएँ।

Kmsraj51 की कलम से…..

♦ भारत की वीरांगनाएँ। ♦

आओ सुनाऊँ गाथा तुमको भारत की ललनाओं की।
रण कौशल में माहिर थीं ऐसी वीरांगनाओं की।
हरगिज़ भूल नहीं सकते हम चेनम्मा के बलिदान को।
ठुकरा दिया था पल में उसने अंग्रेज़ों के फरमान को।

स्वाभिमानी चेनम्मा से फ़ौज ब्रिटिश की चिढ़ गयी थी।
दुर्गा सम कित्तूर की रानी अंग्रेज़ों से भिड़ गयी थी।
रणभूमि कितने अंग्रेज़ों का में उसने काम तमाम किया।
शूरता से लड़ते – लड़ते निज जीवन का बलिदान दिया।
आओ सुनाऊँ गाथा………

याद करो तुम सन सत्तावन की उस भीषण चिंगारी को।
गोरे भी कायल थे जिसके उस तलवार दुधारी को,
दुर्गा सम थी वो समरभूमि में लक्ष्मीबाई नाम था।
शूरवीरता देख के जिसकी दुश्मन भी हैरान था।

दोनों हाथों में लीं तलवारें बच्चे को भी साथ लिया।
टूट पड़ी शत्रु सेना पर दुश्मन को हाथों हाथ लिया।
आओ सुनाऊँ गाथा………

एक था शासक अलाउद्दीन जो चाचा का हत्यारा था।
उत्तर से दक्षिण तक उसने आतंक खूब मचाया था।
निर्मम, निर्दयी, अत्याचारी क्रूरता का पर्याय था।
उसके सैन्य बल के आगे हर कोई असहाय था।

नीच इरादे लेकर अपने वो चित्तौड़ में आया फिर,
राजपूत पद्मिनियों ने उसे अच्छा मज़ा चखाया फिर,
आओ सुनाऊँ गाथा तुमको………

युद्ध कला नहीं आती थी पुण्यमयी वो नारी थी।
देशभक्ति और स्वामिभक्ति उसकी जग से न्यारी थी।
शोणित तलवार लिये हाथ में बलबीर कक्ष में आया जब,
उदय सिंह की शय्या पर उसने अपना लाल सुलाया तब,

ऋणी रहेगा इतिहास सदा पन्ना ने जो काम किया।
राजधर्म की रक्षा हेतु अपना ही सुत वार दिया।
आओ सुनाऊँ गाथा तुमको भारत की ललनाओं की।
रण कौशल में माहिर थीं ऐसी वीरांगनाओं की।

♦ वेदस्मृति ‘कृती’ जी – पुणे, महाराष्ट्र ♦

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  • “वेदस्मृति ‘कृती’ जी“ ने, बिलकुल ही सरल शब्दों में – वीरांगनाओं के शौर्य और वीरता से भरे जीवन गाथा को कविता के रूप में प्रस्तुत किया है। हमारा भारत देश वीरांगनाओं की भूमि है। इस कविता के माध्यम से आने वाली पीढ़ियों को वीरांगनाओं के शौर्य और वीरता से भरे जीवन गाथा को समझने में आसानी होगी। अपनी वीर माता रानी चेनम्मा, लक्ष्मीबाई, पद्मिनि, पन्ना जी के शौर्य और वीरता को जान और समझ पाएंगे।

—————

यह कविता (भारत की वीरांगनाएँ।) ” वेदस्मृति ‘कृती’ जी “ की रचना है। KMSRAJ51.COM — के पाठकों के लिए। आपकी कवितायें सरल शब्दो में दिल की गहराइयों तक उतर कर जीवन बदलने वाली होती है। मुझे पूर्ण विश्वास है आपकी कविताओं और लेख से जनमानस का कल्याण होगा। आपकी लेखन क्रिया यूँ ही चलती रहे जनमानस के कल्याण के लिए।

साहित्यिक नाम : वेदस्मृति ‘कृती’
शिक्षा : एम. ए. ( अँग्रेजी साहित्य )
बी.एड. ( फ़िज़िकल )
आई आई टी . शिक्षिका ( प्राइवेट कोचिंग क्लासेज़)
लेखिका, कहानीकार, कवियित्री, समीक्षक, ( सभी विधाओं में लेखन ) अनुवादक. समाज सेविका।

अध्यक्ष : “सिद्धि एक उम्मीद महिला साहित्यिक समूह”
प्रदेश अध्यक्ष : अखिल भारतीय साहित्य सदन ( महाराष्ट्र इकाई )
राष्ट्रीय आंचलिक साहित्य संस्थान बिहार प्रान्त की महिला प्रकोष्ठ,
श्री संस्था चैरिटेबल ट्रस्ट : प्रदेश प्रतिनिधि ( महाराष्ट्र )
अंतर्राष्ट्रीय हिंदी परिषद में – सह संगठन मंत्री, मुंबई ज़िला, महाराष्ट्र
हिन्दी और अँग्रेजी दोनों विधाओं में स्वतंत्र लेखन।

अनेक प्रतिष्ठित हिन्दी/अँग्रेजी पत्र – पत्रिकाओं में नियमित रचनाएँ प्रकाशित।

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रानी दुर्गावती।

Kmsraj51 की कलम से…..

♦ रानी दुर्गावती। ♦

पंद्रह सौ चौबीस में जन्मी, वो चन्देलों की शान थी।
कालिंजर राजा की बेटी, वो इकलौती संतान थी।

दुर्गाष्टमी अवतरण दिवस, दुर्गा का ही अवतार थी।
थर्रायी मुग़लों की सेना ऐसी भीषण ललकार थी।

बचपन से ही दुर्गावती ने सीखीं सारी युद्ध कलाएँ।
तलवारबाज़ी, तीरंदाज़ी, घुड़सवारी आदि विद्याएँ।

संग्राम शाह की थी पुत्र वधू , गढ़ मंडला की रानी थी।
झुकी नहीं वो मुग़लों के आगे, राजपूत स्वाभिमानी थी।

युवावस्था में खोया पति को, बेटा केवल पाँच साल का,
दलपत शाह के स्वर्गवास से गढ़ मंडला का बुरा हाल था।

ऐसी संकट की बेला में भी, धैर्य नहीं खोया अपना।
मंडला पर कब्ज़ा करने का किया चूर मुग़लों का सपना।

गोंडवाना पर हमला करने सुलतान मालवा से आया।
दुर्गावती ने किया पराजित, सेना सहित उसे भगाया।

सोलह वर्षों के सुशासन में, प्रजा हित के ही काम किये।
कुँए, बावड़ी, मठ इत्यादि के खूब उन्होंने निर्माण किये।

जाना उन्हें साधारण नारी, असफ खान ने हमला बोला।
शौर्य पराक्रम देख के उनका दुश्मन का मनोबल डोला।

ह्रदय से ममतामयी रानी, रण में चंडी सी हुंकार।
शत्रु सेना भय से काँपी सुनी जब तलवारों की टंकार।

रण कौशल देख के उनका शत्रु ऐसे चकित हैरान हुए।
अबुल फज़ल के अकबरनामा में, खूब उनके गुणगान हुए।

♦ वेदस्मृति ‘कृती’ जी – पुणे, महाराष्ट्र ♦

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साहित्यिक नाम : वेदस्मृति ‘कृती’
शिक्षा : एम. ए. ( अँग्रेजी साहित्य )
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लेखिका, कहानीकार, कवियित्री, समीक्षक, ( सभी विधाओं में लेखन ) अनुवादक. समाज सेविका।

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हंसिया।

Kmsraj51 की कलम से…..

CYMT-KMSRAJ51-4

♦ हंसिया। ♦

हंसिया हल्के हाथ की,
मालिक से लड़ जाए।
खटर पटर करके चली।
गटर – गटर घर खाए।

हरीयर चारा चटक – चटक,
लपक – लपक नर लाए।
झटक – झटक उस चेहरे को,
मालिक द्वार पर लाए।

पटर पटर चारा मशीन से,
हरीअर चारा बाला जाए।
खेती गहबार अरहर की,
हच हच हंसिया काट गिराए।

धार प्रक्षालन रेती पर कर।
अरहर मालिक घर लाए।
धीराता वीरता के गुण सदा,
मनुष्य में मालिक बताए।

हसिया हाथ हिलाते जाती।
योग साधना बताने आती।
मन मौसम बनाने आती।
नारायण कोठीला भर आती।

अपनों को अपनापन सिखाती।
वह बार-बार लड़ने को जाती।
भूखे भक्तों की भूख मिटाती।
विश्व क भाव का पाठ पढ़ाती।

हंसकर हंसिया हाथ आती।
फंसरी काट मुक्ति दिलाती।
हंसिया हाथ हिलाते जाती।
विविध तरह का रूप दिखाती।

मदुआ सांवा खूब काटती।
उड़द टामुन से घर भारती।
चना चबैना गंगाजल अमृत।
हंसिया के मुठिया में रहता।

♦ सुखमंगल सिंह जी – अवध निवासी ♦

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  • “सुखमंगल सिंह जी“ ने, बहुत ही सरल शब्दों में सुंदर तरीके से बखूबी समझाने की कोशिश की है – बहुत सारे उदाहरण देकर हंसिया के महत्व और हंसिया के कार्य व गुणों को कवि ने बखूबी अक्षरस वर्णित किया हैं। हंसिया किस तरह से एक किसान का महत्वपूर्ण औजार हैं, मुख्य रूप से चारा काटना हो, गेहूँ, जौ, धान, बाजरा या कोई अन्य फसल काटना हो हंसिया का ही मुख्य रोल होता हैं।

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यह कविता (हंसिया।) “सुखमंगल सिंह जी” की रचना है। KMSRAJ51.COM — के पाठकों के लिए। आपकी कवितायें सरल शब्दो में दिल की गहराइयों तक उतर कर जीवन बदलने वाली होती है। मुझे पूर्ण विश्वास है आपकी कविताओं और लेख से जनमानस का कल्याण होगा।

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“अगर अपने कार्य से आप स्वयं संतुष्ट हैं, ताे फिर अन्य लोग क्या कहते हैं उसकी परवाह ना करें।”~KMSRAj51

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एक दिन फोन आया।

Kmsraj51 की कलम से…..

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♦ एक दिन फोन आया। ♦

विश्व गाथा प्रकाशन से,
मुझे फोन आया।

अ हिंदी क्षेत्र गुजरात,
से भी विश्व गाथा का,
प्रकाशन होता बताया।

लखनऊ में आफिस को,
एक है गाथा का बताया।

हमने उनसे जब नाम,
श्रीमान का जानना चाहा।
उन्होंने प्यार से नाम अपना,
पंकज त्रिवेदी हमें बताया।

हमने कहा श्रीमान आपकी,
पारदर्शिता ही विश्व गाथा,
को ऊंचाई प्रदान किया है।

आगे बढ़कर हिम्मत जुटाया।
अवध निवासी सुख मंगल सिंह।
अपना नाम उन्हें दर्ज कराया।

सोमवंशी क्षत्री कुल मेरा फरमाया।
काशी में प्रवासी हुकुम मैं बताया।
मां भगवती और गंगा को मनाया।
बाबा विश्वनाथ में दिल लगाया।

त्रिवेदी जी के दीर्घायु की कामना।
हमने फोन पर ही उन्हें सुनाया।
नमस्कार बंदगी के दरमियान।
काशी से अपना नाता है सन पाया।

हां जहां तक मुझे याद आता है।
सितंबर 2017 की यह बात है।
बड़े लोगों से बात कभी होती है।
हृदय में उमंग विशेष होती है।

♦ सुखमंगल सिंह जी – अवध निवासी ♦

—————

  • “सुखमंगल सिंह जी“ ने, बहुत ही सरल शब्दों में सुंदर तरीके से बखूबी समझाने की कोशिश की है – विश्व गाथा प्रकाशन से, फ़ोन कॉल आया, कवि ने कविता के माध्यम से प्रशंसा करना बताया। कैसे किसी की प्रशंसा करें, और शॉर्ट में अपना परिचय दिया। फोन कॉल के दौरान आपको कैसा व्यवहार करना चाहिए ये समझाया।

—————

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यह कविता (एक दिन फोन आया।) “सुखमंगल सिंह जी” की रचना है। KMSRAJ51.COM — के पाठकों के लिए। आपकी कवितायें सरल शब्दो में दिल की गहराइयों तक उतर कर जीवन बदलने वाली होती है। मुझे पूर्ण विश्वास है आपकी कविताओं और लेख से जनमानस का कल्याण होगा।

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कागद पे आखर आओ अंकित करें।

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♦ कागद पे आखर आओ अंकित करें। ♦

दुस्साहस करने वालों की खोज खबर लें।
कोरे कागद पे आखर आओ अंकित करें।

•••

स्कन्द पुराण में उल्लिखित है श्री राम जन्म स्थान।
कितनी दूरी है और कहाँ अमुक स्थान।

जिला जज ने दिया फैसला वर्ष था अट्ठारह सौ छियासी।
हिंदुओं को पूजा करने की मिली इजाजत विधि सम्मत अविनाशी।

जन्म स्थान राम चबूतरा मुस्लिम पक्ष ने किया स्वीकार।
जब उन्होने कर लिया खूब गहन विचार।

जिलानी ने कहा उन्नीस सौ उनचास से पहले पूजा का नहीं है सबूत।
जस्टिस बोबरे ने पूछा वहाँ नमाज का कब रहा वजूद।

बाबर विध्वंसक था उसे न्याय संगत कैसे मानें।
मस्जिद खाली स्थान पर बनी, इसे कैसे जानें।

सिया वक्फ बोर्ड ने, नहीं दी कोई चुनौती।
सुन्नी वक्फ बोर्ड से विवाद हो गई एकलौती।

ब्रिटिस काल में था मिला पूजा करने का अधिकार।
सन उन्नीस सौ उनचास में, जैन के अनुसार।

जैन ने कहा हवाई अड्डे पर नमाज हो तो वहाँ कब्जा होगा।
विवादित स्थल पर नमाज के लिए जाना कब अच्छा होगा।

सुप्रीम कोर्ट में मुस्लिम पक्ष का आया यही बयान।
उसने मान लिया ‘राम चबूतरा ही है राम जन्म स्थान’।

सबकी दलील सुनकर सर्वोच्च न्यायालय ने दिया अपना निर्णय।
कि ‘राम जन्म भूमि वही है यह बात है तय’।

पाँच एकड़ अलग जमीन मुस्लिमों को सरकार दे।
और सरकार से वह जमीन मुस्लिम पक्ष पा ले।

इस तरह हुआ पाँच सौ साल के विवाद का समापन।
क्योंकि एक मत से पांचों जजों ने बनाया अपना मन।

♦ सुखमंगल सिंह जी – अवध निवासी ♦

—————

  • “सुखमंगल सिंह जी“ ने, बहुत ही सरल शब्दों में सुंदर तरीके से बखूबी समझाने की कोशिश की है – “श्री राम जन्म भूमि” विवाद में समय – समय पर होने वाले विवाद और उतार चढ़ाव, उसके बाद सुप्रीम कोर्ट के सुप्रीम फैसले को क्रमबद्ध तरीके से कम शब्दों में कविता के रूप में पिरोकर सब कुछ समझाया है। इस कविता के माध्यम से आने वाली पीढ़िया “श्री राम जन्म भूमि” विवाद और सुप्रीम कोर्ट के सुप्रीम फैसले को समझ पाएंगे।

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यह कविता (कागद पे आखर आओ अंकित करें।) “सुखमंगल सिंह जी” की रचना है। KMSRAJ51.COM — के पाठकों के लिए। आपकी कवितायें सरल शब्दो में दिल की गहराइयों तक उतर कर जीवन बदलने वाली होती है। मुझे पूर्ण विश्वास है आपकी कविताओं और लेख से जनमानस का कल्याण होगा।

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इतिहास को जीना होगा।

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♦ इतिहास को जीना होगा। ♦

हमें इतिहास को फिर-फिर से जीना होगा।
तस्वीर बजरंग लॉकअप में ही सीना होगा।
आदिकालीन इतिहास पर फोकस करना होगा।
उन घटनाओं के विषय में धारणा पहचानना होगा।

यूं तो इतिहास को दो अर्थों में जाना जाता है।
कुछ लोगों द्वारा इसे कथानक रूप में माना जाता है।
एक को आदिकालीन इतिहास के रूप में पहचाना जाता है।
दूसरा उन घटनाओं के विषय में धारणाएं जानी जाती है।

ज्यादातर लोग इसे श्रुति स्मृति से आना – माना है।
जिस राजा – राज्य में कवि निर्धन है राजा अयोग्य कहाता है।
विद्वान और कवि निर्धनता के बावजूद समाज में पूजा जाता है।
ऐसी विद्वानों के अपमान की बात सोचना निरर्थक कहलाता है।

सच्चे सेनानियों को दुनिया से श्रद्धांजलि दिया जाता है।
काल काेठरी में भ्रष्टाचारियों को सर्वत्र धकेला जाता है।
समसामयिकी इतिहास रचने के लिए मेहनत करनी होती है।
आदिकालीन इतिहास का संरक्षण और संवर्धन करना होता है।

बेसिक शिक्षा का स्तर ऊंचा करने के लिए आगे चलना होता है।
जूता मोजा बस्ता पोशाक बच्चों को पहन चलना पड़ता है।
सभी बच्चे स्कूल जाएं सरकार को योजना करनी पड़ती है।
अभिभावक के खाते में आवश्यकता पूर्ति में रुपया देना होता है।

घूम रहे उठा जासूस एप, पर शक्ति करनी होती है।
बच्चों पर पड़े ना बुरा प्रभाव, ऐप बंद करना होता है।
पुलिस के चाल चेहरा और चरित्र को भी समझना होता है।
अनुभवहीन अधिकारियों को बदल ना होता है।

देश की योजना को कड़ाई से पालन करवाना पड़ता है।
जन औषधि केंद्र पर, केंद्रों पर भी निगरानी रखनी होती है।
हमें प्राचीन इतिहास को अपने फिर-फिर जीना होता है।
समय के साथ भारतीयता का इतिहास लिखना होता है।

♦ सुखमंगल सिंह जी – अवध निवासी ♦

—————

  • “सुखमंगल सिंह जी“ ने, बहुत ही सरल शब्दों में सुंदर तरीके से बखूबी समझाने की कोशिश की है – हम सभी को अपने इतिहास को फिर से जीना होगा, अपने वीरों को याद कर अपने उमंग उत्साह को कायम रखना होगा। आजकल के बच्चे जो अपने इतिहास से दूर होते जा रहे है उन्हें भी अपने इतिहास से सभी माता-पिता को अवगत कराना चाहिए। आदिकालीन इतिहास का संरक्षण और संवर्धन करना होगा, तभी आने वाली पीढ़ी को प्राचीन इतिहास से प्रैक्टिकली जोड़ पाएंगे।

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यह कविता (इतिहास को जीना होगा।) “सुखमंगल सिंह जी” की रचना है। KMSRAJ51.COM — के पाठकों के लिए। आपकी कवितायें सरल शब्दो में दिल की गहराइयों तक उतर कर जीवन बदलने वाली होती है। मुझे पूर्ण विश्वास है आपकी कविताओं और लेख से जनमानस का कल्याण होगा।

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भाव पुराना नहीं होता।

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♦ भाव पुराना नहीं होता। ♦

कवि का निरव होना स्वाभाविक नहीं।
वह अपने लिए लिखे यह भाता नहीं।
नए आविष्कार पुराने को दबाते हैं सही।
हृदय शब्द भाव पुरानी कभी होते नहीं।

ज्ञान से उपजे भाव का प्रचार करना पड़ता है।
ज्ञान में सदा परिवर्तन आता जाता रहता है।
साहित्य सामाजिक आवश्यकता की पूर्ति करता है।
सर्व कालीन साहित्य सदा अक्षुण्ण रहता है।

जो उच्च प्रकाश दे साहित्य कहलाता है।
अपने लिए लिखें भाव निरर्थक कहा जाता है।
हृदय की भाषा अपनी रचना कहलाती है।
विस्तृत सीमा तक वह फाइल दी जाती है।

दुनिया को अधिक अनुभव कविता कराती है।
भाओं के भीतर वह छुपी प्रेरणा जगाती है।
अनंत काल तक अनंत हृदय को छू जाती है।
विविध चित्रण के लिए कविता कलम चलाती है।

शब्द जो भी आते हैं असंख्य साथ आते हैं।
पर समय के साथ वे भी शब्द मिट जाते हैं।
शब्द संधान के लिए आते – जाते रहते हैं।
भाव दुनिया में अपना बिखेरते जाते रहते हैं।

बुद्धि और भावना इस संसार में रह जाते हैं।
अनंत काल तक वह अपना प्रभाव दिखाते हैं।
ह्रदय भाव कभी दुनिया में पुराना नहीं होता है।
समकालीन साहित्य सभा अक्षुण रहता है।

♦ सुखमंगल सिंह जी – अवध निवासी ♦

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  • “सुखमंगल सिंह जी“ ने, बहुत ही सरल शब्दों में सुंदर तरीके से बखूबी समझाने की कोशिश की है – कवी व लेखक के गुणों को बताया है, इस संसार में सबकुछ पुराना होता है लेकिन “हृदय शब्द व भाव पुरानी कभी होते नहीं।” जो उच्च प्रकाश दे साहित्य कहलाता है, साहित्य सामाजिक आवश्यकता की पूर्ति करता हैं। इंसान के किये गए कर्म लोगों के मन में भावनाओं के रूप में सदैव ही जीवित
    रहते हैं।

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यह कविता (भाव पुराना नहीं होता।) “सुखमंगल सिंह जी” की रचना है। KMSRAJ51.COM — के पाठकों के लिए। आपकी कवितायें सरल शब्दो में दिल की गहराइयों तक उतर कर जीवन बदलने वाली होती है। मुझे पूर्ण विश्वास है आपकी कविताओं और लेख से जनमानस का कल्याण होगा।

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भाऊजी खड़ा हो जा परधानी।

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♦ भाऊजी खड़ा हो जा परधानी। ♦

अबकी सीट भईल महिला बा खड़ा हो जा परधानी।
नारी देश की आजादी दिलाने में बनी थीं दीवानी।

भारी भरकम रकम मिली पगार भी होगा शानी।
सौचालय का जलवा दिखाते करिहा ना मनमानी।

आगे पीछे कुछ लोग बुढ़ापे में भी होंगे दानी।
प्रदूषण नियंत्रण खातिर पेड़-पौधों मिलेंगे दानी।

अपने घर के आस पास उसको लगाया मनमानी।
चौंका विछावे के मिली रुपया बाट खाया रानी।

अबकी सीट भईल महिला की भौजी उठा पराधानी।
गांव में दारू पीने वाले मिल जैहै जानी पहचानी।

गली मोहल्ला दारू बेचवाकर उगाही होगी मनमानी।
सुपर मिली एक गांव में उस पर रखिहा निगरानी।

अपने घर को सजा के राखिहा भाड़ जाय परेशानी।
आधा पैसा कमा लिहा छोड़ दिहा ओका मनमानी।

राशन बांटे के जब आई हो जैहा तब सयानी।
कोटे दारों पर अंकुश लगाया उसमें भी मनमानी।

स्कूल में मिड डे मील खाने से निकली खर्चा खुरानी।
जितनी सुविधा मुहैया होगी उतनी करबू मनमानी।

पहले ही तू सोचत रहलू चुनाव कब परधानी?
पेपर पढ़ कर लिया खबर आई गइल बा सनसनी।

भौजी अबकी सीट भईल महिला की, का बा परेशानी।
उठा खड़ा हो जा, हाली होली में रंग चढ़ी जवानी।

♦ सुखमंगल सिंह जी – अवध निवासी ♦

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  • “सुखमंगल सिंह जी“ ने, बहुत ही सरल शब्दों में सुंदर तरीके से बखूबी समझाने की कोशिश की है – “महिला सीट परधानी हो गयल बा” भौजी खड़ा हो जा परधानी। क्या-क्या करना चाहिए और क्या-क्या नहीं, लेकिन न करिया तू मनमानी, परधानी पर अच्छी सीख़ देने वाली कविता लिखी हैं। प्रधानी के समय होने वाले उथल पुथल को भी समझाया है।

—•—•—•—

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यह कविता (भाऊजी खड़ा हो जा परधानी।) “सुखमंगल सिंह जी” की रचना है। KMSRAJ51.COM — के पाठकों के लिए। आपकी कवितायें सरल शब्दो में दिल की गहराइयों तक उतर कर जीवन बदलने वाली होती है। मुझे पूर्ण विश्वास है आपकी कविताओं और लेख से जनमानस का कल्याण होगा।

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