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KMSRAJ51-Always Positive Thinker

“तू ना हो निराश कभी मन से” – (KMSRAJ51, KMSRAJ, KMS)

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Sukhmangal Singh

दिग-दिगंत सौरभ से भरता।

Kmsraj51 की कलम से…..

♦ दिग-दिगंत सौरभ से भरता। ♦

भावनाओं में बहकर वह हर धाम में चलता खोजता।
सुख के साथ दुख की भी करुण कथा दुनिया में कहता।
कामना में भटकते हुए रिद्धि सिद्धि आप चलता खोजता।
बहन निशा के अंधकार को दिग दिगंत सौरभ से भरता।

आज शहर खामोश है तो कल फिर वह मुस्कुराएगा।
किरण झा मासूम और तूफान का दौर चला जाएगा।
जहां आठों पहर सरयू नदी लहर – लहर लहराती।
स्तुति राम भगवान की ध्वजा पताका बजरंगी फहराते।

हंसता शहर गुमान दिख रहा उसमें फिर बहार आएगी।
तीनों लोकों में निराली अनुपम छटा निराली दिखलायेगी।
अयोध्या नगरी कोरोना काल में भी सुन्दर अवसर लायेगी।
उन्हीं सरयू की लहरों से राम लखन सीता सहित छवि पाएंगे।

नावें अठखेलियां करती हैं उत्सव घाट पर भी मनाएंगे।
ऋषि मुनियों का समूह देखने स्वर्ग लोक से आएंगे।
दुनियां के पापियों का पाप कर्म सरयू हर जायेगी।
मंगल कामनाएं सकारात्मक ऊर्जा से।
‘ मंगल ‘ गीत गाएंगे।

♦ सुखमंगल सिंह जी – अवध निवासी ♦

—————

  • “सुखमंगल सिंह जी“ ने, बहुत ही सरल शब्दों में सुंदर तरीके से, कविता के माध्यम से बखूबी समझाने की कोशिश की है – श्री राम मंदिर का वर्षों से अदृश्य रौनक पुनः वापस आएगी। अयोध्या नगरी में पुनः बहार आएगी, जहां आठों पहर सरयू नदी लहर – लहर लहराती। स्तुति राम भगवान की ध्वजा पताका बजरंगी फहराते। नावें अठखेलियां करती हैं उत्सव घाट पर भी मनाएंगे। ऋषि मुनियों का समूह देखने स्वर्ग लोक से आएंगे। दुनियां के पापियों का पाप कर्म सरयू हर जायेगी। मंगल कामनाएं सकारात्मक ऊर्जा से।

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यह कविता (दिग-दिगंत सौरभ से भरता।) “सुखमंगल सिंह जी” की रचना है। KMSRAJ51.COM — के पाठकों के लिए। आपकी कवितायें सरल शब्दो में दिल की गहराइयों तक उतर कर जीवन बदलने वाली होती है। मुझे पूर्ण विश्वास है आपकी कविताओं और लेख से जनमानस का कल्याण होगा। आपकी कविताओं और लेख से आने वाली पीढ़ी के दिलो दिमाग में हिंदी साहित्य के प्रति प्रेम बना रहेगा। आपकी लेखन क्रिया यूं ही चलती रहे, बाबा विश्वनाथ की कृपा से।

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जैसे शरीर के लिए भोजन जरूरी है वैसे ही मस्तिष्क के लिए भी सकारात्मक ज्ञान और ध्यान रुपी भोजन जरूरी हैं।-KMSRAj51

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“सफलता का सबसे बड़ा सूत्र”(KMSRAJ51)

“स्वयं से वार्तालाप(बातचीत) करके जीवन में आश्चर्यजनक परिवर्तन लाया जा सकता है। ऐसा करके आप अपने भीतर छिपी बुराईयाें(Weakness) काे पहचानते है, और स्वयं काे अच्छा बनने के लिए प्रोत्साहित करते हैं।”

 

“अगर अपने कार्य से आप स्वयं संतुष्ट हैं, ताे फिर अन्य लोग क्या कहते हैं उसकी परवाह ना करें।”~KMSRAj51

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त्रिभाग पर भरोसा करूं।

Kmsraj51 की कलम से…..

♦ त्रिभाग पर भरोसा करूं। ♦

बंट चुका त्रिभाग में
किससे कहूं।
हो गया अवसाद माना
कैसे लिखूं।

हृदय शरीर दिमाग जाना
क्या कहूं।
पहले शरीर से अलग
किससे कहूं।

शरीर से अलग है हृदय
अलग दिखा दिमाग,
कहां पलूं।
देती शरीर जवाब
कैसे चलूं।

खुश रहता हूं फिर भी,
ब्रह्मा विष्णु महेश में,
यादों से कहता।

जैसे चलाएं।
चलता चलूं।
मचलता चलूं।

♦ सुखमंगल सिंह जी – अवध निवासी ♦

—————

  • “सुखमंगल सिंह जी“ ने, बहुत ही सरल शब्दों में सुंदर तरीके से, कविता के माध्यम से बखूबी समझाने की कोशिश की है – कौन हूँ मैं, शरीर, हृदय, या दिमाग। कौन शरीर से अलग है, भगवान चलाते जैसे चलाएं, चलता चलूं, मचलता चलूं। आत्मा, शरीर, हृदय, व दिमाग के बीच तालमेल।

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यह कविता (त्रिभाग पर भरोसा करूं।) “सुखमंगल सिंह जी” की रचना है। KMSRAJ51.COM — के पाठकों के लिए। आपकी कवितायें सरल शब्दो में दिल की गहराइयों तक उतर कर जीवन बदलने वाली होती है। मुझे पूर्ण विश्वास है आपकी कविताओं और लेख से जनमानस का कल्याण होगा। आपकी कविताओं और लेख से आने वाली पीढ़ी के दिलो दिमाग में हिंदी साहित्य के प्रति प्रेम बना रहेगा। आपकी लेखन क्रिया यूं ही चलती रहे, बाबा विश्वनाथ की कृपा से।

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“सफलता का सबसे बड़ा सूत्र”(KMSRAJ51)

“स्वयं से वार्तालाप(बातचीत) करके जीवन में आश्चर्यजनक परिवर्तन लाया जा सकता है। ऐसा करके आप अपने भीतर छिपी बुराईयाें(Weakness) काे पहचानते है, और स्वयं काे अच्छा बनने के लिए प्रोत्साहित करते हैं।”

 

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सोशल मीडिया – भारत।

Kmsraj51 की कलम से…..

♦ सोशल मीडिया – भारत। ♦

भारत पहले सबको मिलकर समझाता है।
सभ्यता और संस्कृत का उसको ज्ञान कराता है।
भारत की संस्कृति में यही कहा जाता है,
सबको यह पहले बहुत खूब समझाता है।

मनमानी करने वालों को ज्ञान पहले बताता है।
नियम और कानून का ध्यान उसको कराता है।
त्याग और तपस्या का भी पाठ उसे पढ़ाता है।
अहिंसा और शांति का संदेश उसको सिखाता है।

पुरुषोत्तम का देश है भारत उनका मान दिखाता है।
सूर्पनखा रावण की बहना उसको भी समझाता है।
श्रीराम द्वारा लक्ष्मण की तरफ ध्यान दिया जाता है।
इधर उधर जाकर भी जब नहीं मानती शूर्पणखा है।

अंत कोप भाजन से नाक अपनी कटवा दी है।
जबकि श्रीराम द्वारा उसको समझाया जाता है।
एक कथा और सुनाने का मन कर जाता है।
बालकृष्ण के पास कंस की बहन को भेजा जाता है।

उसका भी अंत श्री कृष्ण द्वारा किया जाता है।
कहने का तात्पर्य ही है जो भारत में आया है,
भारत के बने कानून का पालन उसको करना है।
मनमानी इस देश में कहीं नहीं चलने वाला है।
एक समय तक ही उसको छूट दिया जाता है।

इसलिए नियम कानून के अंदर काम करने हैं।
शांति और विश्व बंधुत्व से यहां पर आने हैं।

♦ सुखमंगल सिंह जी – अवध निवासी ♦

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  • “सुखमंगल सिंह जी“ ने, बहुत ही सरल शब्दों में सुंदर तरीके से, कविता के माध्यम से बखूबी समझाने की कोशिश की है – यह आर्यावर्त – हमारा भारत देश है, हम सभी का दिल से सम्मान करते है यहाँ। लेकिन यहाँ पर रहना है तो – भारत के बने कानून का पालन उसको करना है। मनमानी इस देश में कहीं नहीं चलने वाला है, एक समय तक ही उसको छूट दिया जाता है। इसलिए नियम कानून के अंदर काम करने हैं। शांति और विश्व बंधुत्व से यहां पर आने हैं।

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यह कविता (सोशल मीडिया – भारत।) “सुखमंगल सिंह जी” की रचना है। KMSRAJ51.COM — के पाठकों के लिए। आपकी कवितायें सरल शब्दो में दिल की गहराइयों तक उतर कर जीवन बदलने वाली होती है। मुझे पूर्ण विश्वास है आपकी कविताओं और लेख से जनमानस का कल्याण होगा। आपकी कविताओं और लेख से आने वाली पीढ़ी के दिलो दिमाग में हिंदी साहित्य के प्रति प्रेम बना रहेगा। आपकी लेखन क्रिया यूं ही चलती रहे, बाबा विश्वनाथ की कृपा से।

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श्री कृष्ण द्वारा वसुदेव को ब्रह्म ज्ञान।

Kmsraj51 की कलम से…..

♦ श्री कृष्ण द्वारा वसुदेव को ब्रह्म ज्ञान। ♦

श्री कृष्ण बलराम जी वसुदेव जी को,
प्रातः दोनों आकर किया प्रणाम।
दोनों भाइयों का उन्होंने किया अभिनंदन,
ऋषियों के श्री मुख से सुना था जैसा वंदन।

हृदय से वसुदेव जी करने लगे दोनों से आलिंगन,
सच्चिदानंद स्वरूप का होने लगा उन्हें दर्शन।
वसुदेव बोले सच्चिदानंद स्वरूप श्री कृष्ण,
और मेरे महायोगेश्वर संकर्षण।

तुम दोनों ही जगत के हो प्रधान,
पुरुष के भी नियामक परमेश्वर।
तुम ही इस मायावी जगत के आधार हो,
तुम ही निर्माता और निर्माण सामग्री हो।

तुम दोनों जगत के स्वामी हो।
सब कुछ धारक तुम ही हो।
तुम भोग्य और भोक्ता से परे।
साक्षात भगवान तुम ही हो।

जगत की वस्तुओं के सृष्टिकर्ता,
पालन पोषण करता तुम ही हो।
विनाश वान सभी पदार्थों में तुम,
कारण रूप अविनाशी तत्व हो।

हो रहस्य ज्ञान योग माया का,
तुम्हारी कीर्ति गान लोग करते हैं।
भजन सुनकर श्री वासुदेव जी के,
भक्तवत्सल कृष्ण मुस्कुराने लगे।

विनय पूर्वक झुककर पिताजी को,
सु-मधुर वाणी में सुनाने लगे।

हम तो आपके पुत्र ही हैं पिता जी।
हमें लक्ष्य कर आपने ब्रह्म ज्ञान का,
उपदेश आप ही हमें सुनाने लगे।
मैं हूं! वही! सब आप ही बताने लगे।

जैसे छिति जल पावक गगन समीरा,
एक होते हुए अलग-अलग कहलाने लगे।
पंचमहाभूत अप्रकट – प्रकट होकर,
बड़े छोटे अधिक थोड़े दिखने लगे।

वैसे ही मैं! और बलराम जी भी,
भेद से ही दो पहचाने जाने लगे।

धरा पर जन्म – मृत्यु चक्कर रूप,
भटकते हुए जीव निमित्त आने लगे।
हम दोनों अन्याय के खिलाफ अपना,
आकर यहां शस्त्र उठाने लगे।

शरणागत उनके संसार भय को मिटाने लगे,
इस धरा को भार से मुक्ति दिलाने लगे।
मंगल प्रभु के श्री – चरण में जाने लगा,
अमृत तत्व सुख सागर सबको सुनाने लगा।

♦ सुखमंगल सिंह जी – अवध निवासी ♦

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  • “सुखमंगल सिंह जी“ ने, बहुत ही सरल शब्दों में सुंदर तरीके से, कविता के माध्यम से बखूबी समझाने की कोशिश की है – श्री कृष्ण और वासुदेव जी के मिलन और संवाद का सुर मधुर वर्णन किया है। जहाँ एक तरफ पिता – पुत्र पर प्रेम वात्सल्य बर्षा रहा है तो, वहीं दूसरी तरफ श्री कृष्ण जी, वासुदेव जी को ब्रह्म ज्ञान दे रहे है। इस मधुर मिलन के साक्षी बलराम जी है।

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यह कविता (श्री कृष्ण द्वारा वसुदेव को ब्रह्म ज्ञान।) “सुखमंगल सिंह जी” की रचना है। KMSRAJ51.COM — के पाठकों के लिए। आपकी कवितायें सरल शब्दो में दिल की गहराइयों तक उतर कर जीवन बदलने वाली होती है। मुझे पूर्ण विश्वास है आपकी कविताओं और लेख से जनमानस का कल्याण होगा। आपकी कविताओं और लेख से आने वाली पीढ़ी के दिलो दिमाग में हिंदी साहित्य के प्रति प्रेम बना रहेगा। आपकी लेखन क्रिया यूं ही चलती रहे, बाबा विश्वनाथ की कृपा से।

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ऐसा सोचा न था।

Kmsraj51 की कलम से…..

♦ ऐसा सोचा न था। ♦

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स्वतंत्रता की 73 वर्ष बीत जाने पर,
लोग मनमानी करने लगेंगे।
जीवन में सोचा नहीं था।

पढ़े लिखे भी अज्ञानी बने रहेंगे।
शिक्षा की इतनी व्यवस्था के बाद भी,
ऐसा कोई सोचा न था।

नाश विनाश सामने आया खड़ा हो।
स्वभाव के कारण जागरूक नहीं है।
कभी ऐसा सोचा न था।

बुढ़ापे तक वही सोच पुरानी रहेगी।
दुखी अज्ञानी मानव आगे नहीं आएगा।
अब तक ऐसा सोचा न था।

जीवन बचाने स्वास्थ्य कर्मी घर पहुंचे।
उन्हें देख दूर लोग भाग जाते हों।
ऐसा अब तक देखा ना था।

मानव का धर्म आचरण क्षीन हो जाएगा।
तमोगुण उसका बढ़ जाएगा।
ऐसा होगा सोचा ना था।

अधिकारों की केवल मांग करेगा।
कर्तव्य परायणता नहीं रखेगा।
ऐसा भी सोचा न था।

हठ पूर्वक उद्योग से वह कतराता।
मेल से होने वाली प्रवृत्ति अपनाता।
तमोगुण की अकर्मण्यता ने पाता।

गर सतगुण की ओर प्रवृत्ति बढ़ाता।
स्मृति सरलता विनम्र श्रद्धा लाता।
घमंड अकड़ रजोगुण न पाता।

मनुष्य यदि विवेकी निपुण हो जाता।
प्रलय काल में अपनी सोच बढाता।
कोरोना की वैक्सीन लगवाता।

पेट भर भोजन यहां से ही खाता।
कोरोना की वैक्सीन देख घबराता।
सुविधा के लिए आगे आ जाता।

जनता को अभी भी जगाना होगा।
नैतिकता का पाठ पढ़ाना होगा।
नियम का पालन करना होगा।

♦ सुखमंगल सिंह जी – अवध निवासी ♦

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  • “सुखमंगल सिंह जी“ ने, बहुत ही सरल शब्दों में सुंदर तरीके से, कविता के माध्यम से बखूबी समझाने की कोशिश की है – क्या कभी किसी ने सोचा था की ऐसा भी ख़राब / बुरा समय आएगा, पढ़े लिखे भी अज्ञानी बने रहेंगे, लोग मनमानी करने लगेंगे। विनाश सामने आया खड़ा हो, स्वभाव के कारण जागरूक नहीं है। मानव का धर्म आचरण क्षीन हो जाएगा, तमोगुण उसका बढ़ जाएगा। कर्तव्य परायणता नहीं रखेगा अपने आप में, तमोगुण बढ़ता जायेगा। इंसान के अंदर इंसानियत नही बचेगा किसने ऐसा सोचा था।

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यह कविता (ऐसा सोचा न था।) “सुखमंगल सिंह जी” की रचना है। KMSRAJ51.COM — के पाठकों के लिए। आपकी कवितायें सरल शब्दो में दिल की गहराइयों तक उतर कर जीवन बदलने वाली होती है। मुझे पूर्ण विश्वास है आपकी कविताओं और लेख से जनमानस का कल्याण होगा।

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शनि की साढ़ेसाती।

Kmsraj51 की कलम से…..

♦ शनि की साढ़ेसाती। ♦

साढ़ेसाती जब भी आती है।
शारीरिक कष्ट बढ़ाती है।
जीवन में कई बार यह आती है।
आर्थिक कष्ट दे जाती है।
अवसाद जीवन में ले आती है।
दुर्घटना देकर जाती है।

मानसिक संताप इसने दिखाती है।
हिम्मत दिल से दूर भगाती है।
कल क्लेश बढ़ा मनुष्य भरमाती है।
घर – घर का खर्च बढ़ाती है।
व्यक्ति को दूर बेसन ले जाती है।
तबाही परिवार में आती है।

आपस मैं ही कलह – कलह कराती है।
पराया अपने को बनाती है।
मन बुद्धि को भ्रमित करने आती है।
घबराहट मन में जगा जाती है।
ढाई – ढाई बरस का तीन चरण होता है।
इसका मकसद इस तरह होता है।

प्रथम ढाई वर्ष में यह सीख सिखाती।
मानसिक परेशानी जीवन में आती।
दूसरे भाग में आर्थिक क्षति पहुंचाती।
शारीरिक कष्ट देने आती।
विश्वास को भी भ्रमित करते जाती।
सारे डगर में अगर फैलाती।

आखरी ढाई वर्ष में भरपाई करती।
अंत समय व्यक्ति को ज्ञान कराती।
शनि सत्य का मर्यादा कहलाता।
सत्कर्म की मर्यादा बतलाता है।
राहत के लिए ‘मंगल’ उपाय बताता।
सनी इससे प्रसन्ना हो जाता।

पीपल वृक्ष की पूजा से लाभ मिलता।
पीपल में देवताओं का वास होता है।
मानव के मन और बुद्धि को शांत देता।
ऑक्सीजन यहां पर्याप्त होता है।
पीपल के वृक्ष की पूजा सार्थक होती।
व्यक्ति को भी राहत पहुंचाती है।

पीपल में अर्घ देने से बहुत लाभ होता।
शिव की उपासना से राहत मिलती है।
शनि की उपासना के लिए शनि स्तोत्र पढ़ें।
रूद्र अवतार हनुमान जी का जप करें।
महामृत्युंजय मंत्र से शिव का अभिषेक करें।

शनिवार को पीपल के वृक्ष में जलदान करें।
तेल, तिल तेल, काला तिल, काला कपड़ा भेंट करें।
गुड, लोहा, काला कपड़ा, गरीब को दान करें।
शनिवार को खिचड़ी का भोग लगाने से लाभ होता है।

♦ सुखमंगल सिंह जी – अवध निवासी ♦

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  • “सुखमंगल सिंह जी“ ने, बहुत ही सरल शब्दों में सुंदर तरीके से, कविता के माध्यम से बखूबी समझाने की कोशिश की है – शनि की साढ़ेसाती, जब जीवन में आती है तो, क्या – क्या परेशानी होती है। इन परेशानियों को कम करने के लिए क्या करें, शनि देव को कैसे प्रसन्न करें, जिससे परेशानिया कम हो। शनि देव की उपासना कैसे करें।

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यह कविता (शनि की साढ़ेसाती।) “सुखमंगल सिंह जी” की रचना है। KMSRAJ51.COM — के पाठकों के लिए। आपकी कवितायें सरल शब्दो में दिल की गहराइयों तक उतर कर जीवन बदलने वाली होती है। मुझे पूर्ण विश्वास है आपकी कविताओं और लेख से जनमानस का कल्याण होगा।

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“सफलता का सबसे बड़ा सूत्र”(KMSRAJ51)

“स्वयं से वार्तालाप(बातचीत) करके जीवन में आश्चर्यजनक परिवर्तन लाया जा सकता है। ऐसा करके आप अपने भीतर छिपी बुराईयाें(Weakness) काे पहचानते है, और स्वयं काे अच्छा बनने के लिए प्रोत्साहित करते हैं।”

 

“अगर अपने कार्य से आप स्वयं संतुष्ट हैं, ताे फिर अन्य लोग क्या कहते हैं उसकी परवाह ना करें।”~KMSRAj51

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चपला अपने आंगन।

Kmsraj51 की कलम से…..

♦ चपला अपने आंगन। ♦

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तम मलिक अंचल में घना।
कलपना मेघा चपला चंचला।

संवेदना अभिव्यक्ति सब मौन।
बेर कदली संग निभाता कौन।

निर्वाधित अधिकार उसमें सना।
कातर स्वरों के राग से जो बना।

शिष्टता सम गामिनी मैं कौन ?
‘मंगल’ स्वर लहरी बजती मौत।

जग – क्रंदन नव वंदन।
मन नभ पुलकित आंगन।

समता सुंदर अभिनंदन।
स्मृतियां करती अंकन।

मधु समीर मलाई चंदन।
उपवन किसलय आलिंगन।

सौरभ प्रदेश में परिवर्तन।
चपला चमकी घर आंगन।

♦ सुखमंगल सिंह जी – अवध निवासी ♦

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  • “सुखमंगल सिंह जी“ ने, बहुत ही सरल शब्दों में सुंदर तरीके से, कविता के माध्यम से बखूबी समझाने की कोशिश की है – मेघाच्छादित वर्षा, बिजली कड़कने की आवाज हो, वर्षा का पृथ्वी से आलिंगन हो। कितना खूबसूरत मनोरम दृश्य हैं। हर तरफ खुशिया ही खुशिया।

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जिंदगी।

Kmsraj51 की कलम से…..

♦ जिंदगी। ♦

जिंदगी जीने की कला है।
कर्ज चुकाने की अदा है।

देश को इससे आशा है।
मां की यही अभिलाषा है।

जिंदगी केवल खेल नहीं।
यह देवों की परिभाषा है।

कितना कहूं जीवन को,
मानवता की यह रक्षक है।

सफर जिंदगी का गुजर जाता।
कोई पल – पल याद आता है।

लोग आते-जाते रहते जिंदगी में,
पल-पल बिछड़ता जाता है।

जीवन शैली मानवता की रक्षक,
संतों सा लगत संरक्षक है।

♦ सुखमंगल सिंह जी – अवध निवासी ♦

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  • “सुखमंगल सिंह जी“ ने, बहुत ही सरल शब्दों में सुंदर तरीके से, कविता के माध्यम से बखूबी समझाने की कोशिश की है – बहुत सारे उदाहरण के माध्यम से बताया है, ज़िंदगी क्या है, “कितना कहूं जीवन को, मानवता की यह रक्षक है।” मानव जीवन मिला है लोगो का और स्वयं का कल्याण करने के लिए। यूँ ही जीवन को नष्ट ना करें, समय फालतू न गवाए, अपने इस जीवन को अच्छे कार्यों में लगाए।

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“स्वयं से वार्तालाप(बातचीत) करके जीवन में आश्चर्यजनक परिवर्तन लाया जा सकता है। ऐसा करके आप अपने भीतर छिपी बुराईयाें(Weakness) काे पहचानते है, और स्वयं काे अच्छा बनने के लिए प्रोत्साहित करते हैं।”

 

“अगर अपने कार्य से आप स्वयं संतुष्ट हैं, ताे फिर अन्य लोग क्या कहते हैं उसकी परवाह ना करें।”~KMSRAj51

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खाने में शामिल न करें।

Kmsraj51 की कलम से…..

♦ खाने में शामिल न करें। ♦

आम खाने में लगता मजेदार।
स्वास्थ्य वर्धक और लाजवाब।
आम में अच्छे तत्व पाए जाते।
इसी लिए तरह तरह से खाते।

सबके मन भाते तथा लुभाते।
शरीर को पुष्ट निरोग बनाते।
साल भर में पेड़ पर लटकते।
चाव से इसको लोग मिल खाते।

एक बात याद आई उस कराते,
आम खाने के बाद में करेला,
को कभी भी नहीं लोग खाते।
खाने से हानि शरीर में आते।

रायता और छाछ भी बराते।
यह काया में जहर पिला देते।
भिन्डी की सब्जी लगे लाजवाब।
पौष्टिक आहारों का यह संसार।

विविध रूपों में इसका प्रयोग।
खाने में बहुत लगती है मजेदार।
भोजन में सलाद का हो साथ।
कहते होता इससे बहुत लाभ।

पर कुछ वस्तु में होता बरताव।
साथ मिलकर लेने से करें इंकार।
वरना हो जाएंगे तंग और लाचार।
शरीर को कर देगा वह बेकार।

लीबर भी हो जाएगा कमजोर।
पर नहीं चलेगा किसी का जोर।
शरीर आप में करती रहेगी शोर।
भूल नहीं पाएंगे कभी यह रोग।

करेला खाने से हो होते निरोग।
भिंडी साथ खाएंगे होगा रोग।
दोनों को अलग-अलग खाइए।
सुखमय जीवन अपना बनाइए।

बड़े कष्ट से शरीर को बताइए।
करेला भिंडी को न मिलाइए।
यद्यपि शुगर में इसे खूब खाइए।
दोनों एक साथ नहीं लीजिए।

आजकल लोग खिचड़ी पकाते,
एक में सब कुछ मिला कर लेते?
वैज्ञानिक प्रभाव नहीं समझते।
मनमर्जी पे सब कुछ वे खाते।

निरोगी काया होती रोग बुलाते।
राष्ट्र विरोधी, मिल जस गाते।
वे कभी कभी स्टोरी सुनाते।
भ्रम में डालकर गरम हो जाते।

ठंडी-ठंडी मूली खाना में खाते।
अकड़ मूवी मसाला लगाये लाते।
मूली के बहुत फायदे हम बतला दे।
जड़ पत्ता पीने से अनेक फायदे।

मूली को खाने से गैस भाग जाते।
सलाद में मूली जो लोग मिला दे।
औषधीय गुण इसमें पाए जाते।
वैद्य ही लोग इसका गुण बताते।

भिंडी के साथ करेला नहीं खाते।
इसके खाने से पेट में रोग बढ़ाते।
सोच समझकर जो भोजन खाते।
निरोगी काया वे अपना बनाते।

स्वस्थ समाज वही लोग बनाते।
जो लोग निरोगी काया हैं पाते।
जो कुछ भी हम सब कभी खाते।
सोच समझकर उसे अपना बनाते।

♦ सुखमंगल सिंह जी – अवध निवासी ♦

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  • “सुखमंगल सिंह जी“ ने, बहुत ही सरल शब्दों में सुंदर तरीके से, कविता के माध्यम से बखूबी समझाने की कोशिश की है – बहुत सारे उदाहरण के माध्यम से बताया है, किसके साथ क्या खाये और किसके साथ क्या न खाये। किसके साथ क्या-क्या खाने से लाभ होता है, और क्या-क्या खाने से नुकसान भी होता है शरीर को। इसलिए जो भी खाये बहुत सोच समझकर ही खाये, किसी भी खाने के साथ कुछ भी न खाये । जिसके साथ जो उपयुक्त हो, जिसके खाने से शरीर को नुकसान न हो वही साथ-साथ खाये केवल।

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योग साधना।

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♦ योग साधना। ♦

पढ़ो लिखो बनो महान।
जिससे बढ़े कुल की शान।

पूरा हो मंगल का गान।
है देश में सबका सम्मान।

योग से मानव की पहचान।
योग है भरता सबमें जान।

काया बनी निरोगी महान।
योग करें जीवन का कल्याण।

जब तक सूरज चांद रहे।
योग मानव का साथ धरे।

अंधियारे में नव प्रात खिले।
शांति सुप्रीम का हाथ रहे।

सुंदर विचार मन में आते रहे।
नई दिशा को दिखाते रहे।

योग से बल बुद्धि ज्ञान बढ़े।
काया का यह कल्याण करें।

विश्व जगत को खुशहाल करें।
सत्य अहिंसा बढ़ाते के चले।

धैर्य का दीपक जलाते चले।
संकट में योग सिखाते चले।

टन – टन घंटा बजाते चले।
ज्ञान की सीख सिखाते चले।

चाव चमक चेहरे पर लाते रहे।
मेरे चमन में अमन आते रहे।

योग रोग का सर्व नाश करें।
अनुलोम विलोम का साथ दे।

योग करता सबका कल्याण।
योग सिखाया बनें गुणवान।

♦ सुखमंगल सिंह जी – अवध निवासी ♦

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  • “सुखमंगल सिंह जी“ ने, बहुत ही सरल शब्दों में सुंदर तरीके से, कविता के माध्यम से बखूबी समझाने की कोशिश की है – किसी भी मनुष्य के लिए योग और साधना क्यों जरूरी है। योग व साधना कितने प्रकार के होते है तथा योग व साधना से क्या – क्या लाभ होते है। क्यों हर एक मनुष्य को प्रतिदिन योग जरूर करना चाहिए। योग व साधना से तन व मन पवित्र और निरोगी होता है। योग व साधना करें, आरोग्य, सुखमय, पवित्र तथा शांतिमय जीवन जिए।

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यह कविता (योग साधना।) “सुखमंगल सिंह जी” की रचना है। KMSRAJ51.COM — के पाठकों के लिए। आपकी कवितायें सरल शब्दो में दिल की गहराइयों तक उतर कर जीवन बदलने वाली होती है। मुझे पूर्ण विश्वास है आपकी कविताओं और लेख से जनमानस का कल्याण होगा।

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