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hindi poem

कोमल कँवल।

Kmsraj51 की कलम से…..

♦ कोमल कँवल। ♦

काव्य : इक नजर।

कुसुमित हुई कँवल जब रश्मि पड़ी केश की,
खिल – खिल गई पंखुड़ी उस घड़ी पड़ी जब।

रचती डली पर डली में स्वच्छ सुथरी-सुथरी,
बड़े – बड़े पल्लव कोमल वो भी भरे – भरे।

सुवासमयी सुगंध से गले – गले तक सँवरे,
तिलस्म की शंस में जैसे आँखें खुली – खुली।

सितारों में अपने जीवन की मालिकाओं के,
हार बनाये उपवन में सुघड़ – सुघड़।

सुमन मयूख के बदन पर बिखरी पड़ी,
यौवन की मदमाती रसभरी अमर कड़ी।

वियोग से भरी चितवन सारी,
चिन्मय दु:खद् मधुर भास कांति निपात।

शीर्ण हृदय अलक्ष्य रचन,
खुली आँखें हैं नयननीर भरी बड़ी-बड़ी।

♦ सतीश शेखर श्रीवास्तव ‘परिमल‘ जी — जिला–सिंगरौली, मध्य प्रदेश ♦

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यह कविता (कोमल कँवल।) “सतीश शेखर श्रीवास्तव ‘परिमल’ जी“ की रचना है। KMSRAJ51.COM — के पाठकों के लिए। आपकी कवितायें/लेख सरल शब्दो में दिल की गहराइयों तक उतर कर जीवन बदलने वाली होती है। मुझे पूर्ण विश्वास है आपकी कविताओं और लेख से जनमानस का कल्याण होगा।

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जैसे शरीर के लिए भोजन जरूरी है वैसे ही मस्तिष्क के लिए भी सकारात्मक ज्ञान और ध्यान रुपी भोजन जरूरी हैं।-KMSRAj51

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“सफलता का सबसे बड़ा सूत्र”(KMSRAJ51)

“स्वयं से वार्तालाप(बातचीत) करके जीवन में आश्चर्यजनक परिवर्तन लाया जा सकता है। ऐसा करके आप अपने भीतर छिपी बुराईयाें(Weakness) काे पहचानते है, और स्वयं काे अच्छा बनने के लिए प्रोत्साहित करते हैं।”

 

“अगर अपने कार्य से आप स्वयं संतुष्ट हैं, ताे फिर अन्य लोग क्या कहते हैं उसकी परवाह ना करें।”~KMSRAj51

 

 

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शिक्षक और समाज।

Kmsraj51 की कलम से…..

♦ शिक्षक और समाज। ♦

विधा: शिक्षक दिवस।

कच्ची मिट्टी को अपने हाथों से सोना बनाते हो आप,
बुद्धि विवेक से सींच कर हमको आसमानों की ऊंचाईयों पर पहुंचाते हो आप।

करते नहीं हो किसी से भेदभाव सबको ज्ञान का पाठ पढ़ाते हो आप,
जाति-धर्म पर लड़े न कोई सबको एकता का पाठ पढ़ाते हो आप।

आदर्शों की मिसाल बनकर बाल जीवन को निखारते हो आप,
सदाबहार के फूल खिलाकर प्रेरक आयामों से भव्य संसार बनाते हो आप।

संचित ज्ञान का धन देकर हमें खुशियां खूब मनाते हो आप,
डूबती कश्तियों के नाविक बन कच्ची ईंटों से चांद पर ताज बनाते हो आप।

ढूंढ कर मजहब किताबों में गीता और कुरान पढ़ाते हो आप,
अपनी मेहनत की कलम से आने वाले कल को आज बनाते हो आप।

कलम हाथ में लिए विजयलक्ष्मी शिक्षक की भूमिका सोचती हैं आज,
एक शिक्षक को शिक्षक की भूमिका से हटाकर सर्व भू-पर सर्वे सर्वा बना दिया है आज।

जिन अधिकारियों को गरिमामयी पद पर पहुंचाया आपने,
वो भूलाकर गुरुजनों का सम्मान नित नए सरकारी कार्यों के फरमान पहुंचाते हैं आप।

आइए आज हम सभी मिलकर अपने गुरुजनों को शीश नवाएं,
जो खोती जा रही है गुरु की महिमा उसको वापस लाए आज।
जय हिन्द! जय भारत!

शिक्षक दिवस पर हार्दिक शुभकामनाएं!
शिक्षक करता देश का उद्धार है,
पैदा करता ये हर तरह के कलाकार हैं।

♦ विजयलक्ष्मी जी – झज्जर, हरियाणा ♦

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  • “विजयलक्ष्मी जी“ ने, बिलकुल ही सरल शब्दों का प्रयोग करते हुए; इस कविता के माध्यम से समझाने की कोशिश की हैं — एक शिक्षक ही होते है जो हमे अच्छी और बुरी आदतों का पहचान करवाते है और वो हमारी बुरी आदतों को छोड़वाने का दिल से पूर्ण प्रयास भी करते हैं। हमें अच्छी आदतों को अपनाने के लिए प्रेरित करते है, सदैव ही आगे बढ़ने का सही ज्ञान देते है। वो शिक्षक ही होते है जो हमें ईर्ष्या, हिंसा, अधर्म, चोरी जैसी बुरी आदतों से दूर रखते है। शिक्षक ही, सही आचरण, नैतिकता का पाठ पढ़ाते है, कर्तव्य, संयम और धैर्य से सही पथ पर चलना सिखाते है। भारत में पूर्व राष्ट्रपति डॉ. सर्वपल्ली राधाकृष्ण के जन्म दिवस अर्थात 5 सितंबर को शिक्षक दिवस मनाया जाता है। उन्होंने अपने छात्रों से अपने जन्म दिवस पर शिक्षक दिवस मनाने की इच्छा जताई थी। पूर्व राष्‍ट्रपति डॉ राधाकृष्‍णन का जन्म 5 सितंबर, 1888 को तमिलनाडु के तिरुमनी गांव में एक ब्राह्मण परिवार में हुआ था।

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यह कविता (शिक्षक और समाज।) “विजयलक्ष्मी जी“ की रचना है। KMSRAJ51.COM — के पाठकों के लिए। आपकी कवितायें सरल शब्दो में दिल की गहराइयों तक उतर कर जीवन बदलने वाली होती है। मुझे पूर्ण विश्वास है आपकी कविताओं और लेख से जनमानस का कल्याण होगा। आपकी लेखन क्रिया यूं ही चलती रहे।

आपका परिचय आप ही के शब्दों में:—

मेरा नाम विजयलक्ष्मी है। मैं राजकीय प्राथमिक कन्या विद्यालय, छारा – 2, ब्लॉक – बहादुरगढ़, जिला – झज्जर, हरियाणा में मुख्य शिक्षिका पद पर कार्यरत हूँ। मैं पढ़ाने के साथ-साथ समाज सेवा, व समय-समय पर “बेटी बचाओ – बेटी पढ़ाओ” और भ्रूण हत्या पर Parents मीटिंग लेकर उनको समझाती हूँ। स्कूल शिक्षा में सुधार करते हुए बच्चों में मानसिक मजबूती को बढ़ावा देना। कोविड – 19 महामारी में भी बच्चों को व्हाट्सएप ग्रुप से पढ़ाना, वीडियो और वर्क शीट बनाकर भेजना, प्रश्नोत्तरी कराना, बच्चों को साप्ताहिक प्रतियोगिता कराकर सर्टिफिकेट देना। Dance Classes प्रतियोगिता का Online आयोजन कराना। स्वच्छ भारत अभियान के तहत विद्यालय स्तर पर कार्य करना। इन सभी कार्यों के लिए शिक्षा विभाग और प्रशासनिक अधिकारी द्वारा और कई Society द्वारा बार-बार सम्मानित किया गया।

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“स्वयं से वार्तालाप(बातचीत) करके जीवन में आश्चर्यजनक परिवर्तन लाया जा सकता है। ऐसा करके आप अपने भीतर छिपी बुराईयाें(Weakness) काे पहचानते है, और स्वयं काे अच्छा बनने के लिए प्रोत्साहित करते हैं।”

 

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शिक्षक दिवस।

Kmsraj51 की कलम से…..

♦ शिक्षक दिवस। ♦

प्रथम माँ होती शिक्षक जो हमें सिखाती संस्कार है,
पिता और गुरु से मिलता बालक को विद्या अपार है।

शिक्षक जीवन का आधार अंधकार में दीपक का प्रकाश है,
मावन जीवन का मानसिक विकास का होता गुरु आधार है।

ऋषि, मुनि ने भी शिक्षक की महिमा का गुणगान किया है,
उच्च शिक्षक का जीवन में होना, ईश्वर का वरदान है।

गुरु विद्या और गुणों का सागर, करते जीवन प्रकाशवान है,
व्यक्तित्व को निखारें संस्कारित जीवन का शिक्षक आधार है।

आचरण, सही, गलत, नैतिकता का पाठ पढ़ाते है,
कर्तव्य, संयम और धैर्य से सही पथ पर चलना सिखाते है।

अंतर्मन का तम हरने को ज्ञान का दीप जलाते है,
भले बुरे का भेद बताकर सबका मार्ग प्रशस्त करते है।

संस्कृति, इतिहास विग्रह साहित्य का देते सबको ज्ञान है,
सत्य, धर्म, सदाचार का पाठ पढ़ाते सच्चाई की राह पर चलना सिखाते है।

जीवन में सफलता हासिल होती देते ऐसे मूल मंत्र है,
देशभक्ति की भावना का करते विकास, जिससे बनता राष्ट्र खुशहाल है।

शिक्षक का जीवन में विशेष महत्व देते वो सभी को ज्ञान है,
शिक्षक की महिमा का हम गुणगान करते है।

शिक्षक ही मजबूत नींव की आधारशिला है,
शिक्षक के चरणों में करते नमन बारम्बार है।

♦ पूनम गुप्ता जी – भोपाल, मध्य प्रदेश ♦

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  • “पूनम गुप्ता जी“ ने, बहुत ही सरल शब्दों में सुंदर तरीके से इस कविता के माध्यम से समझाने की कोशिश की है — एक शिक्षक ही होते है जो हमे अच्छी और बुरी आदतों का पहचान करवाते है और वो हमारी बुरी आदतों को छोड़वाने का दिल से पूर्ण प्रयास भी करते हैं। हमें अच्छी आदतों को अपनाने के लिए प्रेरित करते है, सदैव ही आगे बढ़ने का सही ज्ञान देते है। वो शिक्षक ही होते है जो हमें ईर्ष्या, हिंसा, अधर्म, चोरी जैसी बुरी आदतों से दूर रखते है। शिक्षक ही, सही आचरण, नैतिकता का पाठ पढ़ाते है, कर्तव्य, संयम और धैर्य से सही पथ पर चलना सिखाते है। भारत में पूर्व राष्ट्रपति डॉ. सर्वपल्ली राधाकृष्ण के जन्म दिवस अर्थात 5 सितंबर को शिक्षक दिवस मनाया जाता है। उन्होंने अपने छात्रों से अपने जन्म दिवस पर शिक्षक दिवस मनाने की इच्छा जताई थी। पूर्व राष्‍ट्रपति डॉ राधाकृष्‍णन का जन्म 5 सितंबर, 1888 को तमिलनाडु के तिरुमनी गांव में एक ब्राह्मण परिवार में हुआ था।

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यह कविता (शिक्षक दिवस।) “पूनम गुप्ता जी” की रचना है। KMSRAJ51.COM — के पाठकों के लिए। आपकी लेख/कवितायें सरल शब्दो में दिल की गहराइयों तक उतर कर जीवन बदलने वाली होती है। मुझे पूर्ण विश्वास है आपकी कविताओं और लेख से जनमानस का कल्याण होगा। आपकी लेखन क्रिया यूं ही चलती रहे।

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गुरु हमारे।

Kmsraj51 की कलम से…..

♦ गुरु हमारे। ♦

शिक्षक के पर्याय गुरु पर, आज इस कलम को लिखना है।
पर सच मानों, एक आदर्श शिक्षक की से भी, हमें सीखना है॥

इस शब्द की महानता तो, आज तक तो कोई सुना न पाया।
बस इनके गुणों के आगे, सबने शीश झुकाया॥

जितने गुणों को समाहित किया, वो सब इन्होंने दिया जिंदगी में।
बहुत कुछ नायाब मिला, सिर्फ इनकी बन्दगी में॥

जब ये पत्थर को भी तराशने पर आये, तो हीरा बन जाये कोहिनूर।
इनके जब आदर्शों पर चल पाए, तो जिंदगी में आये एक सरूर॥

ये तो वटवृक्ष है, जो जीवन में आदर्शों की छाया दे जाए।
ये वो अथाह सागर है, जहाँ बस प्रीत के मोती पाए॥

ये तो सितारा उस बुलंदी का, जिस पर आसमाँ भी हर्षाये।
ये तो जीवन की हरियाली है, जिस पर ये धरा भी इतराये॥

ये वो जौहरी है, जो परख – परख कर, खोटे को भी खरा बना जाए।
ये है वो कलाकार जो, पत्थर को भी तराश भगवान ले आये॥

कितनी ही उपाधियों से नवाजू इनको, ये भी नतमस्तक होती है इनके आगें।
जो एक सच्चे शिक्षक की उँगली भी थामे, उसके तो भाग्य जागें॥

मैं कौन हूँ, क्या हस्ती मेरी, सिर्फ इनके सजदे में ही शीश झुकाना।
इनके गुणों की रोशनी में, रहकर बस इस जिंदगी को जगमगाना है॥

♦ सुशीला देवी जी – करनाल, हरियाणा ♦

—————

  • “श्रीमती सुशीला देवी जी“ ने, बहुत ही सरल शब्दों में सुंदर तरीके से समझाने की कोशिश की है — कहते है की एक सच्चा शिक्षक जब अपने छात्र को तराशने पर आये तो पत्थर से हीरा बन जाये कोहिनूर। इस शब्द की महानता इतनी है की आज तक तो कोई सुना न पाया। बस इनके गुणों के आगे, सबने शीश झुकाया। ये तो वह वटवृक्ष है, जो जीवन में आदर्शों की छाया दे जाए। ये वो अथाह सागर है, जहाँ बस प्रीत ही प्रीत के मोती पाए सभी ने सदैव।

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यह कविता (गुरु हमारे।) “श्रीमती सुशीला देवी जी” की रचना है। KMSRAJ51.COM — के पाठकों के लिए। आपकी कवितायें सरल शब्दो में दिल की गहराइयों तक उतर कर जीवन बदलने वाली होती है। मुझे पूर्ण विश्वास है आपकी कविताओं और लेख से जनमानस का कल्याण होगा। आपकी लेखन क्रिया यूं ही चलती रहे।

आपका परिचय आप ही के शब्दों में:—

मेरा नाम श्रीमती सुशीला देवी है। मैं राजकीय प्राथमिक पाठशाला, ब्लॉक – घरौंडा, जिला – करनाल, में J.B.T.tr. के पद पर कार्यरत हूँ। मैं “विश्व कविता पाठ“ के पटल की सदस्य हूँ। मेरी कुछ रचनाओं ने टीम मंथन गुजरात के पटल पर भी स्थान पाया है। मेरी रचनाओं में प्रकृति, माँ अम्बे, दिल की पुकार, हिंदी दिवस, वो पुराने दिन, डिजिटल जमाना, नारी, वक्त, नया जमाना, मित्रता दिवस, सोच रे मानव, इन सभी की झलक है।

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आज न जाने क्यों?

Kmsraj51 की कलम से…..

♦ आज न जाने क्यों? ♦

आज न जाने क्यों मेरे हर हौसले है, यूं बेबजह पस्त हुए?
इस दुनियां में हर आदमी, क्यों बेपरवाह और व्यस्त हुए?

आज है फुरसत नहीं यहां, किसी को किसी से बतियाने की।
रही तहजीब नहीं है शेष अब, किसी में किसी को मनाने की।

जो रूठ गया सो रूठ गया, फिर करता ही कोई बात नहीं।
अरे भाई सुलह भी तो रास्ता है, हर बात का हल तलाक नहीं।

नेमत है यह जिन्दगी खुदा की, यूं ही तो कोई इतेफाक नहीं।
सौदे जिन्दगी के हैं ये दोस्त, कोई सड़कों पर बिछी खाक नहीं।

बुजुर्गों की अब सुनता ही कौन है? युवा नशों में है खो गए।
चोर – उचक्के घूम रहे हैं खुले आम आज, कोतवाल है सो रहे।

ऊपर से नीचे तक है फैल गया, देखो तो आज भ्रष्टाचार यहां।
आदमी से आदमी का रिश्ता है स्वार्थ का, रहा कहां अब प्यार यहां?

खौलता है देख के खून तो अपना, यह लूटपाट होती खुले आम, में।
चाहकर भी न कर पाता हूं इच्छित कुछ, फंस जाता हूं बने विधान में।

♦ हेमराज ठाकुर जी – जिला मण्डी, हिमाचल प्रदेश ♦

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  • “हेमराज ठाकुर जी“ ने, बहुत ही सरल शब्दों में सुंदर तरीके से बताया है की “आजकल के युवाओं का जीवन किस राह पर भटक रहा है, उनको खुद ही नही मालूम। उनके अनियंत्रित भटकते हुए जीवन का कोई किनारा नहीं।” ये कैसा समय चल रहा है जहां खुले आम लूटपाट होती है। चोर – उचक्के घूम रहे हैं खुले आम आजकल, कोतवाल है सो रहे।

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यह कविता (आज न जाने क्यों?) “हेमराज ठाकुर जी” की रचना है। KMSRAJ51.COM — के पाठकों के लिए। आपकी कवितायें/लेख सरल शब्दो में दिल की गहराइयों तक उतर कर जीवन बदलने वाली होती है। मुझे पूर्ण विश्वास है आपकी कविताओं और लेख से जनमानस का कल्याण होगा।

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“स्वयं से वार्तालाप(बातचीत) करके जीवन में आश्चर्यजनक परिवर्तन लाया जा सकता है। ऐसा करके आप अपने भीतर छिपी बुराईयाें(Weakness) काे पहचानते है, और स्वयं काे अच्छा बनने के लिए प्रोत्साहित करते हैं।”

 

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Filed Under: 2021-KMSRAJ51 की कलम से, हिंदी कविता, हिन्दी-कविता, हेमराज ठाकुर जी की कविताये। Tagged With: author hemraj thakur, hemraj tahkur poems, hemraj thakur, hemraj thakur poems, hindi poem, hindi poem on life, kavi hemraj thakur poems, short kavita in hindi, short poem about youth today, short poem on youth in hindi, today youth lifestyle, today's youth lifestyle poem, आज न जाने क्यों?, दिशाहीन युवा पीढ़ी पर कविता, भटकती युवा पीढ़ी पर कविता, युवा जोश पर कविता, युवा पर स्लोगन, युवाओं को प्रेरित करने वाली कविता, विद्यार्थियों के लिए प्रेरक कविता, हिंदी कविता, हिंदी पोयम, हेमराज ठाकुर जी की कविताये

त्रासदी।

Kmsraj51 की कलम से…..

♦ त्रासदी। ♦

इस सदी की सुनकर त्रासदी,
नई नस्लें तो थरथर कांपेगी।
यह भी सच है, वे व्याधि की,
हर घटना का राज भी जांचेगी।

विश्व पटल पर जो है घटित हुआ आज,
कल को इतिहास वही तो बन जाएगा।
एक दूसरे देश का परदा फाश कर कर,
हर छुपाया राज भी तब सामने आएगा।

लोथ पे गिरती लोथों को देख देख,
मुलायम मोम सी जलती छाती है।
दारुण दंश देख दिल द्रवित न होवे,
वह इंसान नहीं खूनी खुराफाती है।

भव्य भवनों में ओ रहने वालो,
ये झुग्गियों के लोग भी अपने हैं।
जीने दो इत्मीनान से इनको भी,
इनके भी तो अपने कुछ सपने हैं।

जैविक युद्ध की सुगबुगाहट है या कि,
फिर कुदरत ने ही मचाई तबाही है?
शोध – चर्चाएं हैं विश्व में नित बड़ी बड़ी,
बन सकी न रोग की पक्की दवाई है।

पसीना चू – चू पड़ता है देखो तो,
भयभीत हो, होकर हर भालों से।
एक तो गुप्त यह व्याधि है व्यापी,
ऊपर से परेशानी दुगनी नकालों से।

श्वेत – ब्लैक और दो फंगस है आए अब,
कोरोना से कहां कोई कसर रही थी?
मानी कितनी वे बातें हमने अब तक, जो,
विश्व स्वास्थ्य संगठन ने हमसे कही थी।

♦ हेमराज ठाकुर जी – जिला मण्डी, हिमाचल प्रदेश ♦

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  • “हेमराज ठाकुर जी“ ने, बहुत ही सरल शब्दों में सुंदर तरीके से बखूबी समझाने की कोशिश की है – कोरोना काल के दौरान दुनिया भर में होने वाले उथल – पुथल, जान-माल की हानि को बखूबी दर्शाया है कविता के रूप में। विश्व पटल पर जो है घटित हुआ आज, कल को इतिहास वही तो बन जाएगा।। एक दूसरे देश का परदा फाश कर कर, हर छुपाया राज भी तब सामने आएगा।

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आप सभी का प्रिय दोस्त

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जैसे शरीर के लिए भोजन जरूरी है वैसे ही मस्तिष्क के लिए भी सकारात्मक ज्ञान और ध्यान रुपी भोजन जरूरी हैं।-KMSRAj51

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“सफलता का सबसे बड़ा सूत्र”(KMSRAJ51)

“स्वयं से वार्तालाप(बातचीत) करके जीवन में आश्चर्यजनक परिवर्तन लाया जा सकता है। ऐसा करके आप अपने भीतर छिपी बुराईयाें(Weakness) काे पहचानते है, और स्वयं काे अच्छा बनने के लिए प्रोत्साहित करते हैं।”

 

“अगर अपने कार्य से आप स्वयं संतुष्ट हैं, ताे फिर अन्य लोग क्या कहते हैं उसकी परवाह ना करें।”~KMSRAj51

 

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जगत जननी का परित्याग।

Kmsraj51 की कलम से…..

♦ जगत जननी का परित्याग। ♦

पता क्या जगत जननी सीता को,
फिर जंगल में जाना होगा।
घनी पश्चिम की पहाड़ी के जंगल में,
जीवन उन्हें बिताना होगा।

श्रीराम के निर्मल देह पर,
मृग – चर्म जूट जटाएं फाहरेंगी।
हवन चंदन गंध व दहकते,
गुगल से ऋचाएं होंगी।

रथ साथ सारथी पुत्रवत लखन,
घने जंगल में छोड़ेंगे।
जिसने अपने जीवन में,
सीता के मुख नहीं देखे होंगे।

पर विधाता का लिखा लिखनी,
कौन मिटा सकता है यहां।
वहीं विश्व विख्यात विधाता,
सीता को जंगल पहुंचा सकता जहां।

धैर्य – धर्म की मूर्ति मई कल्याणी तुम,
खंडित व्यक्तित्व लिए विलख रही।
सच कहूं प्रिय! मेरी सीते!
मैं राम तत्वों का आदर्श लिए थक रहा।

विवश हूं प्रजा की बात पर,
धर्म की मर्यादा और राज पाठ पर।
स्वयं दंड दूंगा मैं अपने आप को,
धर्म की धात्री तुम अयोध्या राज की।

लोका पवाद में घिरा अवध की,
शाम मंत्रणा राज लखन से बोले राम।
राजा का राज्य पर निष्ठा निर्विवाद,
विधि के विधान पर किसका अधिकार।

संकल्पों का विकल्प नहीं होता,
वैराग्य धर्म बन वासी मेरी नियति।
विकल्प केवल सीता का परित्याग,
प्रिये मेरी अभिन्न अंग हो, ना होना खिन्न।

मेरी निर्णय को कहना ना तू कठोर,
सीता कल निर्वासन का है भोर।
अभिषेक करेगी तेरी वन्य भोर,
संदेशवाहक दिल से निकलेगा चोर।

रथारूढ़ जाना गंगा तट पर लेकिन,
उद्घाटित अभी करना ना भेद गूढ़।
लक्ष्मण राम के मंत्रणा परिपूर्ण,
आरण्य निकट सीते को छोड़ना तुम।

देना धो आंचल का उभरा कालुष्य,
रूधने लगा कहते कंठ राम।
बिकट लगा उस संध्या का गुंजा शूल,
कर प्रणाम अस्ताचल ढल गया सूर्य।

छलक उठे लक्ष्मण के भरे नैन,
थरथर कांप उठा धरती का स्वर्ग मौन।
देख रहा मौन रहकर राजमहल,
धार सरयू की हुई स्तब्ध अंतर्मन।

♦ सुखमंगल सिंह जी – अवध निवासी ♦

—————

  • “सुखमंगल सिंह जी“ ने, बहुत ही सरल शब्दों में सुंदर तरीके से, कविता के माध्यम से बखूबी समझाने की कोशिश की है – जगत जननी माता सीता जी का परित्याग, करते समय श्री राम जी के मनःस्थिति का खूबसूरत वर्णन किया है। माता सीता जी से श्री राम जी कहते है “धैर्य – धर्म की मूर्ति मई कल्याणी तुम खंडित व्यक्तित्व लिए विलख रही। सच कहूं प्रिय! मेरी सीते! मैं राम तत्वों का आदर्श लिए थक रहा। विवश हूं प्रजा की बात पर धर्म की मर्यादा और राज पाठ पर। स्वयं दंड दूंगा मैं अपने आप को धर्म की धात्री तुम अयोध्या राज की।”

—————

sukhmangal-singh-ji-kmsraj51.png

यह कविता (जगत जननी का परित्याग।) “सुखमंगल सिंह जी” की रचना है। KMSRAJ51.COM — के पाठकों के लिए। आपकी कवितायें सरल शब्दो में दिल की गहराइयों तक उतर कर जीवन बदलने वाली होती है। मुझे पूर्ण विश्वास है आपकी कविताओं और लेख से जनमानस का कल्याण होगा। आपकी कविताओं और लेख से आने वाली पीढ़ी के दिलो दिमाग में हिंदी साहित्य के प्रति प्रेम बना रहेगा। आपकी लेखन क्रिया यूं ही चलती रहे, बाबा विश्वनाथ की कृपा से।

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आखिरी खत

Kmsraj51 की कलम से…..

CYMT-KMS

आखिरी खत-

Last latter-kmsraj51

 

 

 

यह खत है
एसएमएस के युग में
इसीलिए संभवत: अंतिम हो/

खत
उस पागल हवा के नाम
जो तुम्‍हारे नगमे सुनाती थी
और कहती थी
ख़तों जितनी हो
इस दुनिया की उम्र/
उस खुशबू के नाम
जो अब तक कहती है मैं हूं/
लगता है गलत था कि खत कभी
मरते नहीं
भटकते नहीं
उलझते नहीं
अटकते नहीं/

मैं हैरत लिए पूछ रहा हूं
कोई मुझे
एसएमएस की उम्र बताए
जो छोटा होकर भी खतों को निगल गया/
खतरे हैं कई
कुछ बौनों ने आदमकदों को नेपथ्‍य में धकेल दिया
कुछ बहरों ने सुरों को किया है तसदीक/

कहना हवाओं से
मैं फिर आऊंगा
इस बार नहीं कहा जा सका सबसे सब कुछ/
नदिया से कहना बहती रहे/
समंदर से कहना
पहाड़ याद करता है/
बादलों को देना
धूप में तपती भाषा का पता/

बावड़ी से कहना
अगली बार ऐसे नहीं आऊंगा
साथ होंगे मजबूत हाथ
तब झाडि़यां नहीं बावड़ी होगी/

कोयल से कहना
कोई सुने न सुने
गाती रहे
ठीक वैसे
जैसे बांसुरी चुप नहीं बैठती/

भीड़ से घबराई बच्‍ची को कहना
रास्‍ता भीड़ से ही निकलता है/

कहना मां से
बेटे इतने भी बुरे नहीं होते
तपती धरती पर ठिठुर रहे हैं संबंध/

भाइयों से कहना
बाजू मजबूरी नहीं, जरूरी होते हैं/

इस सदी में
बड़ा चाहिए बाजार
लेकिन
परिवार
त्‍योहार
विचार
आहार
व्‍यवहार
सब छोटे हों एसएमएस की तरह/
खतों की तफसील
नहीं है
युग की रफ्तार की मांग/

मरते हुए खतों की आखिरी बात याद रखना
भाषाविदों से कहना
व्‍याकरण को गंगाजी को न सौंप देना
उसकी जरूरत हो्गी फिर एक दिन/
समाजशास्त्रियों से कहना
अभी बैठे रहें
रात बीतते ही
अकेलेपन से ठिठुरे लोग आएंगे
उनके लिए रख लेना
संबंधों का थोड़ा सा ताप
मुक्‍त करने में समय लेता है कोई भी शाप

-नवनीत शर्मा

Post share by: नवनीत शर्मा

I am grateful to नवनीत शर्मा for sharing this inspirational poetry with KMSRAJ51. Thanks a lot for a bright future.

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Kmsraj51 की कलम से …..

Coming soon book (जल्द ही आ रहा किताब) …..

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“तू ना हो निराश कभी मन से”

 

“अपने लक्ष्य को इतना महान बना दो, की व्यर्थ के लीये समय ही ना बचे” –Kmsraj51 

 

 

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“तुम्हारे पास हूँ लेकिन जो दूरी है, समझता हूँ”

kmsraj51 की कलम से…..

Soulword_kmsraj51 - Change Y M T

KR VISHWAS

“तुम्हारे पास हूँ लेकिन जो दूरी है, समझता हूँ ,

तुम्हारे बिन मेरी हस्ती अधूरी है, समझता हूँ ,

तुम्हें मैं भूल जाऊँगा ये मुमकिन है नहीं लेकिन ,

तुम्हीं को भूलना सबसे जरूरी है, समझता हूँ …!”

 

 

 

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रिश्तों के होते हैं दो छोर, एक सहयोग और एक विश्वास !!

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poetryरिश्तों के होते हैं दो छोर, एक सहयोग और एक विश्वास

रिश्तों के होते हैं दो छोर
एक सहयोग और एक विश्वास

रिश्तों में उठती तब भोर
जब हो उसमें प्रेम और अनुराग

रिश्तों में हो तभी मधुरता
ना हो शक और झूठ की दीवार

रिश्तें बनते तभी अनमोल
जब हो समझ और मधुर व्यवहार

रिश्तों में हो तभी मिठास
जब हो उसमें सांच और सोहार्द

रिश्तों में बन जाती दरार
जब हो दौलत की भूख और स्वार्थ

रिश्तों को बढ़ायें ये आधार
एक मधुर वाणी और दूसरा सम्मान

रिश्तों में पड़ जाती गांठ
जब होती उसमें इर्ष्या और जलन

रिश्तों में हो तभी महोब्बत
जब हो उसमें त्याग और समर्पण

ये कविता मैंने इसलिए लिखी-

क्यूंकि आजकल के रिश्तें ताश के पत्तों की तरह है ।
ना जानें कब और कहाँ पे आकर बिखर जाएँ ।
क्यूंकि आज के रिश्तों में सिर्फ स्वार्थ ही नजर आया ।
रिश्तें चलते हैं दो ही कड़ी पे तू मेरा हैं मैं तेरा हूँ ।
पर आज का रिश्ता दौलत की भूख और जलन से भरा पड़ा हैं ।
ना जाने क्यों लोग ख़ुद ही ख़ुद में खो गए है ।
किसी को किसी की ना तो आस है और ना विश्वास हैं ।
बदलते युग में खो गए ये अनमोल रिश्तें,
हर किसी को रोज मधुर-मधुर रिश्तो की तलाश हैं ।



poetry

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