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KMSRAJ51-Always Positive Thinker

“तू ना हो निराश कभी मन से” – (KMSRAJ51, KMSRAJ, KMS)

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कविता

शारदा प्राकट्य – बसंत पंचमी।

Kmsraj51 की कलम से…..

♦ शारदा प्राकट्य – बसंत पंचमी। ♦

हाथ में वीणा और पुस्तक,
माँ के दर सिर झुकाया जाए।
बागेश्वरी की जयंती तिथि,
शारदा माँ को मनाया जाए॥

पांच तत्व व बसंत पंचमी,
जभी एक जगह मिल आते ही।
ज्ञान तत्व और अमृत तत्व,
अमृत – ज्ञान बरसातें हैं॥

विद्या तत्व औ बुद्धि तत्व मिल,
सारे जहां सद्भाव लाते हैं।
प्रकृति तत्व भी जब मिलता,
आदिशक्ति सामने आती है॥

उनके हाथों में जप माला,
कमल – पुस्तक धारण करती।
तरुण चंद से शोभित मोती,
अभीष्ठ इच्छा प्रदान करती॥

कुंद – पुष्प सी कांति चमकती,
प्रकाशित शारदा प्रकट होती।
शारदा कुंडलिनी कहलाती,
सदा ज्ञान की ज्योति जगाती॥

माता के हाथ की वह पुस्तक,
सूक्ष्म ज्ञान की सूचक है।
एकाग्रता, मातृ शक्ति सूचक,
हाथों में माँ की माला है॥

कमलासन है सृष्टि प्रतीक,
ज्ञान मुद्रा सर्व व्यापकता है।
माघ शुक्ल पक्ष की पंचमी,
बसंत पंचमी कहलाती है॥

पाप मोचनी तिथि पञ्चमी,
बागेश्वरी जयंती तिथि तय!
ध्यान पूर्वक जो पूजन करता,
जीवन उसका सुखदायी है॥

विशुद्ध वस्त्र धारण करती,
चंद्रप्रभा उनसे तुच्छ जैसे।
सदा सुंदरी हंसती रहती,
देवताओं से सुशोभित हैं॥

♦ सुखमंगल सिंह जी – अवध निवासी ♦

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— Conclusion —

  • “सुखमंगल सिंह जी“ ने, बहुत ही सरल शब्दों में सुंदर तरीके से इस कविता में समझाने की कोशिश की है — माँ शारदा देवी के प्राकट्य से लेकर उनके रूप गुणों और शक्तियों का बखूबी वर्णन किया है। कमलासन पर विराजित माँ का ज्ञान मुद्रा वाला रूप सर्व व्यापकता, सर्व सुख देने वाली। पाप मोचनी तिथि पञ्चमी को बागेश्वरी जयंती तिथि तय! ध्यान पूर्वक जो भी पूजन करता माँ शारदा देवी का जीवन उसका सुखदायी हो जाता। माँ शारदा देवी है बहुत ही दयालु अपने भक्तों पर सदैव ही माँ बलिहारी। सच्चे मन से जो भी इंसान माँ के इस रूप का पूजन व भजन करता उसे जल्द ही ज्ञान-शक्ति भरपूर मिलता। आओ हम सब सच्चे मन से माँ शारदा देवी का पूजन व भजन करे।

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यह कविता (शारदा प्राकट्य – बसंत पंचमी।) “सुखमंगल सिंह जी” की रचना है। KMSRAJ51.COM — के पाठकों के लिए। आपकी कवितायें / लेख सरल शब्दो में दिल की गहराइयों तक उतर कर जीवन बदलने वाली होती है। मुझे पूर्ण विश्वास है आपकी कविताओं और लेख से जनमानस का कल्याण होगा। आपकी कविताओं और लेख से आने वाली पीढ़ी के दिलो दिमाग में हिंदी साहित्य के प्रति प्रेम बना रहेगा। आपकी लेखन क्रिया यूं ही चलती रहे, बाबा विश्वनाथ की कृपा से।

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जैसे शरीर के लिए भोजन जरूरी है वैसे ही मस्तिष्क के लिए भी सकारात्मक ज्ञान और ध्यान रुपी भोजन जरूरी हैं।-KMSRAj51

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“सफलता का सबसे बड़ा सूत्र”(KMSRAJ51)

“स्वयं से वार्तालाप(बातचीत) करके जीवन में आश्चर्यजनक परिवर्तन लाया जा सकता है। ऐसा करके आप अपने भीतर छिपी बुराईयाें(Weakness) काे पहचानते है, और स्वयं काे अच्छा बनने के लिए प्रोत्साहित करते हैं।”

 

“अगर अपने कार्य से आप स्वयं संतुष्ट हैं, ताे फिर अन्य लोग क्या कहते हैं उसकी परवाह ना करें।”~KMSRAj51

 

 

 

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राष्ट्रभाषा हिन्दी।

Kmsraj51 की कलम से…..

♦ राष्ट्रभाषा हिन्दी। ♦

ऊसर होती जमीन को, पुनः जीवन देना चाहिये;
जाती हुई भाषा को, पुनः स्थापित करना चाहिये।

आज के परिवेश में, हिन्दी का होता अपमान;
अंग्रेजियत का हो रहा बोलबाला, हिंदी को कर दरकिनार।

मिठास भरी जिसमें, जहर का नाम दे रहे;
मधुरता जिसके शब्दों में, कड़वाहट उसमें घोल रहे।

पृष्ठिभूमि जिसने बनाई, उसकी नींव हिला रहे;
सम्पूर्ण जगत में, सभ्यता संस्कृति को रखा है।

आज तक जन – जन तक, हृदय की गहराई तक बसी;
पर निगाहों से उतारी गई, भाषा हिन्दुस्तान की।

हिन्दी सम्मान है, हिन्दी अभिमान है;
हिन्दी स्वाभिमान है, भारत की जान है।

भरतखण्ड की संस्कृति है, संस्कारों की जननी है;
आत्मा जग की, विश्व भाषा की माँ है।

विश्वास जगत जनार्दन की, एक डोर में सबको है बांधती;
हर भाषा को सगी बहन समझे, भरी-पूरी हों सभी बोलियां।

यही कामना हिंदी है, यही साधना हिंदी है;
सौतन विदेशी भाषा न बने, महारानी हमारी हिन्दी ही रहे।

आन हमारी है, शान हमारी है हिन्दी;
चेतना हमारी है हिन्दी, वाणी का शुभ वरदान है हिन्दी।

वर्तनी हमारी है हिंदी, व्याकरण हमारी है हिन्दी;
संस्कृति हमारी है हिंदी, आचरण हमारी है हिन्दी।

वेदना हमारी है हिंदी, गान हमारी है हिन्दी;
आत्मा हमारी है हिन्दी, भावना का साज़ है हिन्दी।

♦ सतीश शेखर श्रीवास्तव `परिमल` जी — जिला–सिंगरौली , मध्य प्रदेश ♦

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ज़रूर पढ़ें — शिक्षक की महानता।

  • “सतीश शेखर श्रीवास्तव `परिमल`“ ने, बहुत ही सरल शब्दों में सुंदर तरीके से समझाने की कोशिश की है — अंग्रेजो से आजादी के इतने वर्षों बाद भी हिंदी भाषा को राष्ट्रभाषा की मान्यता आधिकारिक रूप से क्यों दर्ज नही हुआ, हिंदी को उसका सम्मान क्यों नहीं मिला? हिन्दी राष्ट्रभाषा के महत्व, गुणों और प्रभाव को बताया है। हिन्दी हर भारतीय के दिल से निकलने वाली भाषा हैं। हिन्दी भाषा दिल को दिल से जोड़ने का कार्य करती है। एकलौती हिन्दी भाषा ही है जिसमे अपनापन है दुनिया की किसी भी अन्य भाषा अपनापन का स्थान नहीं।

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यह कविता (राष्ट्रभाषा हिन्दी।) “सतीश शेखर श्रीवास्तव `परिमल` जी” की रचना है। KMSRAJ51.COM — के पाठकों के लिए। आपकी कवितायें/लेख सरल शब्दो में दिल की गहराइयों तक उतर कर जीवन बदलने वाली होती है। मुझे पूर्ण विश्वास है आपकी कविताओं और लेख से जनमानस का कल्याण होगा।

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“सफलता का सबसे बड़ा सूत्र”(KMSRAJ51)

“स्वयं से वार्तालाप(बातचीत) करके जीवन में आश्चर्यजनक परिवर्तन लाया जा सकता है। ऐसा करके आप अपने भीतर छिपी बुराईयाें(Weakness) काे पहचानते है, और स्वयं काे अच्छा बनने के लिए प्रोत्साहित करते हैं।”

 

“अगर अपने कार्य से आप स्वयं संतुष्ट हैं, ताे फिर अन्य लोग क्या कहते हैं उसकी परवाह ना करें।”~KMSRAj51

 

 

 

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दुनिया हिंदी को राष्ट्रभाषा जानती।

Kmsraj51 की कलम से…..

♦ दुनिया हिंदी को राष्ट्रभाषा जानती। ♦

हिंदी भाषी राज्यों की आबादी,
46 करोड़ से अधिक बताई जाती।
जनगणना के हिसाब से भारत में,
1.2 अरब (2011) की है पूरी आबादी।

जिसमें 48.3 फीसदी मातृभाषा,
हिंदी ही माध्यम से बोली जाती।
80 करोड़ से अधिक लोग दुनिया में,
25 देशों में हिंदी बोली जाती।

विश्व में हिंदी भाषा धाक जमाई,
तीसरी ज्यादा बोली भाषा कहलाती।
हिंदी भाषा की पूरी शक्ति संपन्न सूची,
1298617995 गूगल हमें बताइए।

सन 1900 ई. में हिंदी को मिला,
कचहरियों में भी सफल स्थान।
सन 1905 ई. में बंग विच्छेद विरोध,
में स्वदेशी आंदोलन छिड़ गया।

धीरे धीरे यह आंदोलन बड़ा शक्तिशाली,
अखिल भारतीय रूप लेता गया।
स्वदेशी आंदोलन के फलस्वरुप,
हिंदी की ओर लोगों का ध्यान गया।

आगे चलकर काशी में ही 1910 में,
आखिर भारतीय हिंदी साहित्य सम्मेलन की स्थापना हुई।
हिंदी के भावी विकास में मददगार,
इस संस्था का सबसे बड़ा हाथ रहा।

विभिन्न क्षेत्र में विभिन्न भाषा फिर भी,
रूचि के लोगों ने हिंदी को अपनाया।
जिसने भी चाहा, हिंदी को उसने अपने,
ढंग से बोलना और लिखना आरंभ किया।

शब्दों की मनमानी के साथ वाक्य रचना,
और शैली भी भिन्न – भिन्न प्रयुक्त होने लगी।
इस विविधता में भाषा की आंतरिक,
शक्ति को बढ़ाने में क्षति नहीं पहुंची।

मातृभाषा के लिए अनुराग और सेवा का,
कर्तव्य बोध अवश्य लोगों में जागा।
हिंदी की पुस्तकें ज्यादा आने लगी,
हिंदी पत्रों के पढ़ने वाले ग्राहक बढ़ने लगे।

स्कूल कालेजों में हिंदी पढ़ने वाले छात्रों,
की संख्या बढ़ने और पढ़ने लगी।
सन 1891 ई. हिंदी पत्रों की संख्या,
कुल ग्राहक संख्या 8000 ही थी।

और सन 1936 में हिंदी पत्रों की संख्या,
324880 तक की लोगों में पहुंच गई।
तत्कालीन मुसलमानों ने अस्तित्व की ,
उनमें बड़ी आशंका होनी लगी।

धर्म की दुहाई देकर भाषा का,
खुल्लम खुल्ला विरोध करने लगे।
कुछ ने कहा हिंदी नाम की कोई भाषा ही नहीं,
इस विवाद के कारण हिंदी और आगे बढ़ी।

जीवंत भाषा का सबसे बड़ा लक्षण,
उसकी ग्राहीका शक्ति होती।
जीवंत भाषा का लक्षण हिंदी में,
बौद्धिक मानसिक स्तर को उठाता।

विश्व मानता हिंदी को राष्ट्रभाषा,
साहित्यकारों बतलाओ अपनी आशा।
( साभार हिं. साहित्य का वृ. इतिहास, गूगल वर्तमान )

♦ सुखमंगल सिंह जी – अवध निवासी ♦

नोट: इस कविता/लेख में जनसंख्या का आंकड़ा भारतीय जनगणना 2011 के अनुसार है। भारत की वर्तमान जनसंख्या 136.64 crores (2019) है। बहु भाषी भारत के हिन्दी भाषी राज्यों की आबादी 46 करोड़ से अधिक है। 2011 की जनगणना के मुताबिक भारत की 1.2 अरब आबादी में से 41.03 फीसदी की मातृभाषा हिंदी है। हिन्दी को दूसरी भाषा के तौर पर इस्तेमाल करने वाले अन्य भारतीयों को मिला लिया जाए तो देश के लगभग 75 प्रतिशत लोग हिन्दी बोल सकते हैं।

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  • “सुखमंगल सिंह जी“ ने, बहुत ही सरल शब्दों में सुंदर तरीके से इस कविता में समझाने की कोशिश की है — अंग्रेजो से आजादी के इतने वर्षों बाद भी हिंदी भाषा को राष्ट्रभाषा की मान्यता आधिकारिक रूप से क्यों दर्ज नही हुआ, हिंदी को उसका सम्मान क्यों नहीं मिला? हिन्दी राष्ट्रभाषा के महत्व, गुणों और प्रभाव को बताया है। हिन्दी हर भारतीय के दिल से निकलने वाली भाषा हैं। हिन्दी भाषा दिल को दिल से जोड़ने का कार्य करती है। एकलौती हिन्दी भाषा ही है जिसमे अपनापन है दुनिया की किसी भी अन्य भाषा अपनापन का स्थान नहीं।

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यह कविता (दुनिया हिंदी को राष्ट्रभाषा जानती।) “सुखमंगल सिंह जी” की रचना है। KMSRAJ51.COM — के पाठकों के लिए। आपकी कवितायें / लेख सरल शब्दो में दिल की गहराइयों तक उतर कर जीवन बदलने वाली होती है। मुझे पूर्ण विश्वास है आपकी कविताओं और लेख से जनमानस का कल्याण होगा। आपकी कविताओं और लेख से आने वाली पीढ़ी के दिलो दिमाग में हिंदी साहित्य के प्रति प्रेम बना रहेगा। आपकी लेखन क्रिया यूं ही चलती रहे, बाबा विश्वनाथ की कृपा से।

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हिंदी हमारी शान है।

Kmsraj51 की कलम से…..

♦ हिंदी हमारी शान है। ♦

आओ 14 सितंबर 1953 का वो दिन याद करें हम,
जब हिंदी दिवस मनाया था सबका उत्साह बढ़ाया था॥

आओ इस दिन को स्कूल, कालेजों, शिक्षण संस्थाओं में मनाएं हम,
नवयुवाओं में चेतना भर जश्न के साथ त्यौहारों की तरह मनाया था॥

आज भी हम नए – नए आयामों से हिन्दी दिवस मनाते हैं,
अपने और अपनों के लिए शुभ संदेश पहुंचाते हैं॥

हिन्दी है हमारी राष्ट्रभाषा लगती सुरीली बड़ी प्यारी है,
हिन्दी भाषा नहीं है भावों की अभिव्यक्ति, ये तो बड़ी निराली है॥

मातृभूमि पर मर मिटने की ये है भक्ति इससे हमारी पहचान है,
आओ हिन्दी का मान बढ़ाकर विश्व में करानी पहचान है॥

आज हमने अपनेपन को झुठला दिया, बाहरी चमक धमक पर फिदा हुए हम,
कर दिया खड़ा हाशिए पर अब सबने मुझे झुठला दिया॥

सोचती है आज विजयलक्ष्मी दूसरी को घर में ला कर बिठा दिया,
अपनी तहजीब और संस्कृति को क्यों हम लोगों ने गुमा दिया॥

सोचती है आज विजयलक्ष्मी दूसरी को घर में ला कर बिठा दिया,
अपनी तहजीब और संस्कृति को क्यों हम लोगों ने गुमा दिया॥

हिन्दी हमारी शान है, पहचान है, हम सबका स्वाभिमान है,
इसका हमें परचम लहराना है नवयुवाओं में उत्साह जगाना है॥

आओ हम सब मिलकर अपनी पहचान को वापस लाए,
हिन्दी दिवस मनाना तभी होगा सफल विश्व में फिर से हिन्दी का डंका बजाएं॥
जय हिन्द – जय भारत!

♦ विजयलक्ष्मी जी – झज्जर, हरियाणा ♦

मेरे सभी प्रिय पाठकों आप सभी को — KMSRAJ51.COM — की तरफ से तहे दिल से हिन्दी दिवस की शुभकामनाएं।

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  • “विजयलक्ष्मी जी“ ने, बहुत ही सरल शब्दों में सुंदर तरीके से — हिन्दी राष्ट्रभाषा के महत्व, गुणों और प्रभाव को बताया है। हिन्दी हर भारतीय के दिल से निकलने वाली भाषा हैं। हिन्दी भाषा दिल को दिल से जोड़ने का कार्य करती है। एकलौती हिन्दी भाषा ही है जिसमे अपनापन है दुनिया की किसी भी अन्य भाषा अपनापन का स्थान नहीं। आओ हम सब मिलकर अपनी राष्ट्रभाषा हिन्दी को जन जन तक पहुचाये, हर बच्चा – बच्चा हिन्दी भाषा के महत्व को समझते हुए पढ़े, पढ़ाये, लिखे और अपनी भावनाओं को प्रकट करें।

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यह कविता (हिंदी हमारी शान है।) “विजयलक्ष्मी जी” की रचना है। KMSRAJ51.COM — के पाठकों के लिए। आपकी कवितायें सरल शब्दो में दिल की गहराइयों तक उतर कर जीवन बदलने वाली होती है। मुझे पूर्ण विश्वास है आपकी कविताओं और लेख से जनमानस का कल्याण होगा। आपकी लेखन क्रिया यूं ही चलती रहे।

आपका परिचय आप ही के शब्दों में:—

मेरा नाम विजयलक्ष्मी है। मैं राजकीय प्राथमिक कन्या विद्यालय, छारा – 2, ब्लॉक – बहादुरगढ़, जिला – झज्जर, हरियाणा में मुख्य शिक्षिका पद पर कार्यरत हूँ। मैं पढ़ाने के साथ-साथ समाज सेवा, व समय-समय पर “बेटी बचाओ – बेटी पढ़ाओ” और भ्रूण हत्या पर Parents मीटिंग लेकर उनको समझाती हूँ। स्कूल शिक्षा में सुधार करते हुए बच्चों में मानसिक मजबूती को बढ़ावा देना। कोविड – 19 महामारी में भी बच्चों को व्हाट्सएप ग्रुप से पढ़ाना, वीडियो और वर्क शीट बनाकर भेजना, प्रश्नोत्तरी कराना, बच्चों को साप्ताहिक प्रतियोगिता कराकर सर्टिफिकेट देना। Dance Classes प्रतियोगिता का Online आयोजन कराना। स्वच्छ भारत अभियान के तहत विद्यालय स्तर पर कार्य करना। इन सभी कार्यों के लिए शिक्षा विभाग और प्रशासनिक अधिकारी द्वारा और कई Society द्वारा बार-बार सम्मानित किया गया।

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जनक शहीदों के…

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♦ जनक शहीदों के… ♦

समन्दर बनकर आंसू बहते, हमने उन माँओं के देखे हैं।
शहीद हो कर सरहदों से जब, लौटते बलिदानी बेटे हैं।

पत्थर दिल बापों को हमने, पीटते छाती अपनी देखा है।
जब तिरंगे में लिपट लौटता, शहिद हो उनका बेटा है।

विधवा बहू की मांग को सूनी, देख के दोनो जब रोते हैं।
मृत प्राय से पड़ जाते हैं दोनो, सुध – बुद्ध अपनी खोते हैं।

जाना था जब हमको पहले, क्यों लल्ला को भिजवा दिया?
उल्टी गंगा बहाकर रब्बा, यह तुमने आखिर क्या किया?

नेह के आंसू सावन से झरते, बरसात को भी शर्मिंदा किया।
रुग्ण – रूष्ट इस मीच निगोडी ने, मुर्दों को कब जिंदा किया?

बूढ़ी आंखे बस रोती रही, बेटा धूं – धूं कर तब जलता गया।
मां सिसकियां भरती रह गई, बाप दोनों हाथ ही मलता गया।

अंतिम सत्य है मौत जीवन का, यह सबको इक दिन आनी है।
बेटा क्यों गया हमसे पहले? बूढ़ी आंखों में इसलिए पानी है।

♦ हेमराज ठाकुर जी – जिला मण्डी, हिमाचल प्रदेश ♦

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ज़रूर पढ़ें — शिक्षक की महानता।

  • “हेमराज ठाकुर जी“ ने, बहुत ही सरल शब्दों में सुंदर तरीके से समझाने की कोशिश की है — जब जवान सैनिक बेटा शहीद होकर घर आता है उस समय उसके माता – पिता की क्या मनोस्थिति होती है। उनके कलेजे का टुकड़ा उनसे पहले इस दुनिया से विदा होता है यही गम सबसे बड़ा होता है उनके लिए, मृत्यु एक अटल सत्य है इस जीवन का लेकिन समय से पहले दर्द दे जाता है। विधवा बहू की मांग को सूनी, देख के दोनो जब रोते हैं, मृत प्राय से पड़ जाते हैं दोनो, सुध – बुद्ध अपनी खोते हैं।

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यह कविता (जनक शहीदों के…) “हेमराज ठाकुर जी” की रचना है। KMSRAJ51.COM — के पाठकों के लिए। आपकी कवितायें/लेख सरल शब्दो में दिल की गहराइयों तक उतर कर जीवन बदलने वाली होती है। मुझे पूर्ण विश्वास है आपकी कविताओं और लेख से जनमानस का कल्याण होगा।

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“स्वयं से वार्तालाप(बातचीत) करके जीवन में आश्चर्यजनक परिवर्तन लाया जा सकता है। ऐसा करके आप अपने भीतर छिपी बुराईयाें(Weakness) काे पहचानते है, और स्वयं काे अच्छा बनने के लिए प्रोत्साहित करते हैं।”

 

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गुरु ही गोविंद है।

Kmsraj51 की कलम से…..

♦ गुरु ही गोविंद है। ♦

पिता का सा बृहद प्यार है जिसमें,
है मां की सी जिसमें कोमल ममता।
उसी गुरुदेव के दिए ज्ञान में ही तो है,
गोविन्द से जीव को मिलाने की क्षमता।

तुतलाती सी इस जुबान को जिसने,
निज शब्द स्नेह का अमृत पिलाया।
गुरुदेव ही तो है वह दुनियां में अपना,
जो उंगली पकड़ कर लिखना सिखाया।

हां हम भूल गए आज सब ज्ञानी होकर,
प्राप्त ज्ञान को अपनी उपलब्धि बताया।
स्वार्थपरता के इस धुंधलके अंधे युग में,
गुरु उपकारों को उसका फर्ज ठहराया।

ओ नादान मानुष! क्या औकात है तेरी?
कबीर सरीखों ने गुरु को गोविन्द बताया।
ज्ञान सागर से बूंद भर लेकर तू इतराता है,
तेरी फितरत का यह रंग कुछ समझ न आया।

गुरु ही गोविन्द है, सन्तों, ऋषि, मुनियो ने,
पीढ़ी दर पीढ़ी सदियों से बहुत समझाया।
नादान मानुष की फितरत तो देखो, हैरत है,
उसकी समझ में आज तक कुछ न आया।

तथाकथित आधुनिकता के नशे में चूर होकर,
अपनी चिर परिचित सभ्यता को है भुलाया।
गुरु – गुड़ व चेला शक्कर, कहावत के बल पर,
नादान ने खुद को गुरु से बढ़कर है बताया।

गुरु चरण कमल की धूली के बिन,
कभी खुलते नहीं है बुद्धि के दरवाजे।
गुरु की दी शब्दशक्ति के बल से ही,
गूंजती है भीतर में कल्पना, आवाजे।

♦ हेमराज ठाकुर जी – जिला मण्डी, हिमाचल प्रदेश ♦

—————

ज़रूर पढ़ें — शिक्षक की महानता।

  • “हेमराज ठाकुर जी“ ने, बहुत ही सरल शब्दों में सुंदर तरीके से समझाने की कोशिश की है — प्राचीन काल से ही गुरु ही गोविन्द है, सन्तों, ऋषि, मुनियो ने, पीढ़ी दर पीढ़ी सदियों से बहुत समझाया। नादान मानुष की फितरत तो देखो, हैरत है, उसकी समझ में आज तक कुछ न आया। तथाकथित आधुनिकता के नशे में चूर होकर, अपनी चिर परिचित सभ्यता को है भुलाया। गुरु – गुड़ व चेला शक्कर, कहावत के बल पर, नादान ने खुद को गुरु से बढ़कर है बताया।

—————

यह कविता (गुरु ही गोविंद है।) “हेमराज ठाकुर जी” की रचना है। KMSRAJ51.COM — के पाठकों के लिए। आपकी कवितायें/लेख सरल शब्दो में दिल की गहराइयों तक उतर कर जीवन बदलने वाली होती है। मुझे पूर्ण विश्वास है आपकी कविताओं और लेख से जनमानस का कल्याण होगा।

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जैसे शरीर के लिए भोजन जरूरी है वैसे ही मस्तिष्क के लिए भी सकारात्मक ज्ञान और ध्यान रुपी भोजन जरूरी हैं।-KMSRAj51

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“सफलता का सबसे बड़ा सूत्र”(KMSRAJ51)

“स्वयं से वार्तालाप(बातचीत) करके जीवन में आश्चर्यजनक परिवर्तन लाया जा सकता है। ऐसा करके आप अपने भीतर छिपी बुराईयाें(Weakness) काे पहचानते है, और स्वयं काे अच्छा बनने के लिए प्रोत्साहित करते हैं।”

 

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प्रातः उठ हरि हर को भज।

Kmsraj51 की कलम से…..

♦ प्रातः उठ हरि हर को भज। ♦

प्रातः उठ हरि हर को भज लो,
धरती का अभिनंदन कर लो।
उल्लसत मनसे बंदन कर लो,
मुक्त कंठ में चंदन धर लो॥

निर्मल पानी गुनगुन पी लो,
चाय की चुस्की रुक कर ले लो।
लिखनी ले साहित्य लिख लो,
प्रातः उठ हरि हर भज लो॥

नित्य – क्रिया में निवृत्ति हो,
गंगा जल ले काया धो लो।
धूप – दीप ले प्रभु से बोलो,
प्रातः उठकर आंखें खोलो॥

पेपर आया उसको पढ़ लो,
देश दुनिया की खबर ले लो।
दूरदर्शन से – मेल कर लो,
प्रातः उठ हरि विनती कर लो॥

भूखा – नंगा जो भी भेजा,
झोली सबकी भर के दे दो।
कोई खाली हाथ न जाये,
प्रातः उठकर प्रभु से बोलो॥

कभी न गलती हरि करने दो,
स्वच्छ हृदय मन भरने को।
अपना हमको प्रभु बना लो,
प्रातः उठ हरिहर को जप लो॥

♦ सुखमंगल सिंह जी – अवध निवासी ♦

—————

  • “सुखमंगल सिंह जी“ ने, बहुत ही सरल शब्दों में सुंदर तरीके से इस कविता में बताया है, सुबह उठकर आपका नित्य क्रिया कर्म, का क्या क्रम होना चाहिए। जिससे आपका हर एक कार्य शांति पूर्वक, सही समय पर पूर्ण हो जाये।

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यह कविता (प्रातः उठ हरि हर को भज।) “सुखमंगल सिंह जी” की रचना है। KMSRAJ51.COM — के पाठकों के लिए। आपकी कवितायें / लेख सरल शब्दो में दिल की गहराइयों तक उतर कर जीवन बदलने वाली होती है। मुझे पूर्ण विश्वास है आपकी कविताओं और लेख से जनमानस का कल्याण होगा। आपकी कविताओं और लेख से आने वाली पीढ़ी के दिलो दिमाग में हिंदी साहित्य के प्रति प्रेम बना रहेगा। आपकी लेखन क्रिया यूं ही चलती रहे, बाबा विश्वनाथ की कृपा से।

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ज़रूर पढ़ें: पृथु का प्रादुर्भाव।

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ग़ाफ़िल दीवाना इतना।

Kmsraj51 की कलम से…..

CYMT-KMSRAJ51-4

ϒ ग़ाफ़िल दीवाना इतना। ϒ

ग़म में ग़ाफ़िल दीवाना इतना, कि
ग़म की अंधेरी रात में।
ग़म ही चिराग़ हो गया।
जलती रही उसकी चिता रात भर…

बिना किसी के आग दिए ही।
अपने ग़म कि गर्मी से राख हो गया।
सहर की हवाओं ने उड़ा दी।
उसकी चिता की राख।

फ़िज़ा में दूर कही वो खो गया।
सर्द हवाओं ने हमें बताया।
बदनसीब दीवानों का…
क़िस्सा और एक ख़ाक हो गया।

डॉ. रूपेश जैन ‘राहत’ – हैदराबाद, तेलंगाना ®

हम दिलसे आभारी है – डॉ. रूपेश जैन ‘राहत’ जी के, हिंदी में कविता शेयर करने के लिए।

डॉ. रूपेश जैन ‘राहत’ जी के लिए मेरे विचार:

♣ “डॉ. रूपेश जैन ‘राहत’ जी” ने “ग़ाफ़िल दीवाना इतना।…“ काे कविता के माध्यम से बखूबी समझाने की कोशिश की है – इक – इक शब्द दिल की गहराइयों तक उतरते है। आपके लेखन की खासियत है की बिलकुल खुले मन से लिखते है, आपके लेख के हर एक शब्द दिल को छूने वाले होते है। हर एक शब्द अपने आप में एक पूर्ण सुझाव देता है, फिर चाहे वो नज़्म, गज़ल हो या कवितायें हो या अन्य लेख। जो भी इंसान इनके लेख को दिल से समझकर आत्मसात करेगा उसका जीवन धन्य हो जायेगा।

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कैसी हो गयी है जिन्दगी।

Kmsraj51 की कलम से…..

CYMT-KMSRAJ51-4

ϒ कैसी हो गयी हैं जिन्दगी। ϒ

ना कुछ सोचो ना कुछ करो, क्योंकि…
चाय के प्यालों से होंठों का फासला हो गयी है जिंदगी।

भूख से बिलखती रूहों को मत देखो।
शान-औ-शौकत के भोजों१ में खो गयी है जिंदगी।

बस सहारा ढूढ़ते, सड़क पे फट गए जूतों से क्या-
सुबह शाम बदलती गाड़ियों का कारवाँ हो गयी है जिंदगी।

तन पे फटे हुए कपडे मत देखो-
नए तंग मिनी स्कर्ट सी छोटी हो गयी है जिंदगी।

पानी की तड़प भूल कर-
महगीं शराब की बोतलों में खो गयी है जिंदगी।

फुटपाथ पे सोती हजारों निगाहों की कसक छोड़ के,
इक तन्हा बदन लिए, हजारों कमरों में सो गयी है जिंदगी।

हजारों सवाल खामोश खड़े; बस।
सुलगती सिगरेट के धुएं सी हो गयी है जिंदगी।

शब्दार्थ:
१. भोजों = दावतों

डॉ. रूपेश जैन ‘राहत’ – हैदराबाद, तेलंगाना ®

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सुलगती हवा में…।

Kmsraj51 की कलम से…..

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ϒ सुलगती हवा में…। ϒ

⇒ कुछ कड़वी सच्ची बातें, कुछ सुझाव।

Simmering in the air ?
Some bitter truths, some suggestions.

🙂 सुलगती हवा में…।

गर्म झांझ से झंखाड़ बन गयी लताएं।
विदा हुए महावर में भीगें मधुमास।
मार्च में जो दहके थे गेरूए “पलाश” ।
बदरंग जुदा हो चुके टहनियों से उदास आज।
गर्म लपट सहती मुरझा गई –
गुलाब की पँखुरियाँ।
रुई से उड़ते नही अब खेतों में चिट्टे कास …॥

आग उगलते आसमा से –
कुम्हलाई चम्पई कलियाँ सारी।
अकुला गयी सिंदूरी गेंदे की क्यारी-क्यारी।
तवा सी सड़कों पर न झरे हरसिंगार।
सहमे गुड़हल झाँकते अब तो कभी कभार।
सिगड़ी सी सुलगती इस मई में-
पीली सरसों भी बनी धूसर गुबार …॥

शोले बरसते या भट्टियों से चली हवा।
दिखती नही हरी कोपलें दो चार।
धू धू लपट जेठ की सिकी दोपहर।
आग जैसे उगलती या की अंगार …॥

सुलगती हवा में भी मगर झूमता लहर लहर।
चिलचिलाती धूप के थपेड़ों से जो बेअसर,
भीषण लू में खिलकर मुस्कुराता –
हुआ वो पीला पीला “अमलतास” ।
हौले हौले झूलती शोख लम्बी कड़ियाँ,
या जर्द अंगूरी गुच्छे है या …
रौशन झूमर की लट्टू लड़ियाँ,
ढलती साँझ में मंथर डोलती रहती –
नन्हें गुब्बारों से लरजी लदी टहनियाँ …॥

विपरीत समय और विषम दशा में –
पल्लवन का नाम है “अमलतास” ।
सूरज की आँच से निडर डोलता।
दम टूटते मौसम में ताज़ी साँस।
विपरीत समय में पल्लवन –
का नाम “अमलतास” ।
जीने का सलीका सिखा रहा,
चुपचाप यही कि देखो तुम भी –
जीवन के झंझावतों में अडिग,
अकेले ही लहलहाना बनकर,
“अमलतास” …॥

© …(Madhu Chaturvedi Ji) _ Writer at film association Mumbai ®

हम दिल से आभारी हैं मधु जी के “सुलगती हवा में…।“ हिन्दी में कविता साझा करने के लिए।

FB Page Link : https://www.facebook.com/madhuchaturvediwriter/

मधु जी के लिए मेरे विचार:

♣ “मधु जी” ने “सुलगती हवा में…।“ कविता के माध्यम से “प्रकृति, सूर्य की किरणों और वृक्षाें के बीच हाेने वाले खट्टे मीठे संबंधों” पर विशेष दिल को छूने वाला कितना सरल सुंदर-शिक्षाप्रद व अनुकरणीय वर्णन किया हैं। “अमलतास” के वृक्षाें और प्रकृति, सूर्य की किरणों के बीच हाेने वाले खट्टे-मीठे नोच झोक का बहुत ही सरल शब्दों में अति सुन्दर वर्णन किया हैं। मधु जी – की लेखनी की खासियत है की बिलकुल खुले मन से लिखती है, इनके लेख के हर एक शब्द दिल को छूने वाले होते है। हर एक शब्द अपने आप में एक पूर्ण सुझाव देता है, फिर चाहे वो कवितायें हो या अन्य लेख। जो भी इंसान इनके लेख को दिल से समझकर आत्मसात करेगा उसका जीवन धन्य हो जायेगा।

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