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KMSRAJ51-Always Positive Thinker

“तू ना हो निराश कभी मन से” – (KMSRAJ51, KMSRAJ, KMS)

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kavi sukhmangal singh

अफगानी – दुर्दशा।

Kmsraj51 की कलम से…..

♦ अफगानी – दुर्दशा। ♦

दुनिया सारी मौन खड़ी,
तालिबानी – अफ़गान चढे!
माता – बच्चे – बहना सारी,
दहशत के माहौल में है पड़े।

अफरा-तफरी चारों तरफ,
अफगान के नागरिकों काे,
बुरे समय में नामी हस्तियां,
काबुल छोड़कर भाग रही।

महिला मेकर सारा करीमी,
फिल्मी मेकर जान बचाने की,
दुनिया से गुहार लगाने लगी,
कौन करेगा मदद दुखी सभी।

अफगानी है, के साथ वहां,
दुर्व्यवहार किया जा रहा!
मदद करो – मदद करो मेरी,
चारों तरफ हाहाकार मचा।

मानवता सारी नो – नो चुकी,
अफगानी लड़कियां दिखी।
तालिबानी सेना लडाके उनको,
उठा, उठा कर लेकर जा रहे।

मनमानी करते हैं उनके साथ,
बच्चियां बिल्कुल यही कह रहीं।
विरोध गर उनका कोई करता,
उनकी आंखे वह सब नोच रहे।

नन्हें – नन्नी बच्चे भूखे – प्यासे,
दूध पीने के लिए वह नहीं पा रहे।
उनकी जान बचेगी अथवा नहीं,
आगे बढ़कर कोई नहीं आ रहा।

अफ़गानी बैंक में भारी खड़ी,
पैसा आया था अपना पाने को!
हाथ खड़ा कर दिए बैंक सभी,
दिल थाम सारी जनता खड़ी।

भाग रहा था सारा समाज हित,
अपनी अपनी जान बचाने को!
कुछ अमरीकी विमान पर चढ़े,
लापरवाही, से गिर धरा मर गए।

नागरिकों को नहीं बचाने वाला है?
अफगानी सेना नतमस्तक वाली।
पहले ही तालीबानी अवस्था देखी,
उनका अत्याचार जनता थी सहती।

♦ सुखमंगल सिंह जी – अवध निवासी ♦

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  • “सुखमंगल सिंह जी“ ने, बहुत ही सरल शब्दों में सुंदर तरीके से इस कविता में — वर्तमान समय में तालिबान के लड़ाकों या यूँ कहे इंसानियत के दुश्मन आतंकवादियों द्वारा अफगानिस्तान पर कब्जा और उनकी बर्बरता लूट, बलात्कार, हत्या, और खून खराबा को दर्शाया है।

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यह कविता (अफगानी – दुर्दशा।) “सुखमंगल सिंह जी” की रचना है। KMSRAJ51.COM — के पाठकों के लिए। आपकी कवितायें / लेख सरल शब्दो में दिल की गहराइयों तक उतर कर जीवन बदलने वाली होती है। मुझे पूर्ण विश्वास है आपकी कविताओं और लेख से जनमानस का कल्याण होगा। आपकी कविताओं और लेख से आने वाली पीढ़ी के दिलो दिमाग में हिंदी साहित्य के प्रति प्रेम बना रहेगा। आपकी लेखन क्रिया यूं ही चलती रहे, बाबा विश्वनाथ की कृपा से।

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ज़रूर पढ़ें: अफगान में तालीबानी।

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जैसे शरीर के लिए भोजन जरूरी है वैसे ही मस्तिष्क के लिए भी सकारात्मक ज्ञान और ध्यान रुपी भोजन जरूरी हैं।-KMSRAj51

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“सफलता का सबसे बड़ा सूत्र”(KMSRAJ51)

“स्वयं से वार्तालाप(बातचीत) करके जीवन में आश्चर्यजनक परिवर्तन लाया जा सकता है। ऐसा करके आप अपने भीतर छिपी बुराईयाें(Weakness) काे पहचानते है, और स्वयं काे अच्छा बनने के लिए प्रोत्साहित करते हैं।”

 

“अगर अपने कार्य से आप स्वयं संतुष्ट हैं, ताे फिर अन्य लोग क्या कहते हैं उसकी परवाह ना करें।”~KMSRAj51

 

 

 

 

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प्रातः उठ हरि हर को भज।

Kmsraj51 की कलम से…..

♦ प्रातः उठ हरि हर को भज। ♦

प्रातः उठ हरि हर को भज लो,
धरती का अभिनंदन कर लो।
उल्लसत मनसे बंदन कर लो,
मुक्त कंठ में चंदन धर लो॥

निर्मल पानी गुनगुन पी लो,
चाय की चुस्की रुक कर ले लो।
लिखनी ले साहित्य लिख लो,
प्रातः उठ हरि हर भज लो॥

नित्य – क्रिया में निवृत्ति हो,
गंगा जल ले काया धो लो।
धूप – दीप ले प्रभु से बोलो,
प्रातः उठकर आंखें खोलो॥

पेपर आया उसको पढ़ लो,
देश दुनिया की खबर ले लो।
दूरदर्शन से – मेल कर लो,
प्रातः उठ हरि विनती कर लो॥

भूखा – नंगा जो भी भेजा,
झोली सबकी भर के दे दो।
कोई खाली हाथ न जाये,
प्रातः उठकर प्रभु से बोलो॥

कभी न गलती हरि करने दो,
स्वच्छ हृदय मन भरने को।
अपना हमको प्रभु बना लो,
प्रातः उठ हरिहर को जप लो॥

♦ सुखमंगल सिंह जी – अवध निवासी ♦

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  • “सुखमंगल सिंह जी“ ने, बहुत ही सरल शब्दों में सुंदर तरीके से इस कविता में बताया है, सुबह उठकर आपका नित्य क्रिया कर्म, का क्या क्रम होना चाहिए। जिससे आपका हर एक कार्य शांति पूर्वक, सही समय पर पूर्ण हो जाये।

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यह कविता (प्रातः उठ हरि हर को भज।) “सुखमंगल सिंह जी” की रचना है। KMSRAJ51.COM — के पाठकों के लिए। आपकी कवितायें / लेख सरल शब्दो में दिल की गहराइयों तक उतर कर जीवन बदलने वाली होती है। मुझे पूर्ण विश्वास है आपकी कविताओं और लेख से जनमानस का कल्याण होगा। आपकी कविताओं और लेख से आने वाली पीढ़ी के दिलो दिमाग में हिंदी साहित्य के प्रति प्रेम बना रहेगा। आपकी लेखन क्रिया यूं ही चलती रहे, बाबा विश्वनाथ की कृपा से।

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ज़रूर पढ़ें: पृथु का प्रादुर्भाव।

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“सफलता का सबसे बड़ा सूत्र”(KMSRAJ51)

“स्वयं से वार्तालाप(बातचीत) करके जीवन में आश्चर्यजनक परिवर्तन लाया जा सकता है। ऐसा करके आप अपने भीतर छिपी बुराईयाें(Weakness) काे पहचानते है, और स्वयं काे अच्छा बनने के लिए प्रोत्साहित करते हैं।”

 

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भारत में भूतहा जगह कहां और कौन?

Kmsraj51 की कलम से…..

♦ भारत में भूतहा जगह कहां और कौन? ♦

भारत में भूत-ही जगह देखने जब जाइए,
नियम और कानून का पालन करते हुए जाइए।
आप जब स्थानीय आदेश पर चलोगे अगर,
तो पर्यटन का आनंद मिलता रहेगा मंगल॥

पुणे का शनिवार बाड़ा किला है पुराना महान,
बाजीराव पेशवा से जुड़ा हुआ है यह स्थान।
हॉन्टेड माना जाने वाला इस किले के अंदर,
मना किया जाता है सूरज डूबने के बाद जाना॥

राजस्थान के अलवर में स्थित भानगढ़ का किला,
बहुत ही सुंदर सुहाना लेकिन किला है डरावना।
कहते 17 वीं सदी में इसका निर्माण हुआ था,
भूतिया गतविधियों से विद्यमान यह किला है।
सूरज डूबने के बाद शाम से यहां इंट्री बंद रहती,
यहां चाहे कोई राजनीतिक जाए या आए विद्वान॥

मुंबई के कोलाबा में स्थित है मुकेश मिल्स,
देश की 10 हॉन्टेड जगहों में यह शामिल हिल।
फिल्मों की शूटिंग के लिए मशहूर है मिल,
भूतों की कहानियां से भरपूर है सबका दिल॥

राजस्थान से 18 किलोमीटर दूरी पर स्थित गांव,
कुलधरा गांव में कभी 600 परिवार रहते थे।
सुना था रसोई के बाद यहां भी कोई नहीं रहता,
रातों रात गांव छोड़ कर लोग कहीं चले गये॥

हैदराबाद का गोलकुंडा फोर्ट का 13 वीं सदी में निर्माण हुआ,
इस फोर्ट में रानी तारामती की आत्मा रात में चलती है।
जिसको पति के साथ यहां दफनाया गया था,
डांस करती और डांस करने की आवाज आती॥

बृज राजभवन पैलेस कोटा राजस्थान में स्थित,
लगभग 180 वर्ष पुराना बताया जाता रहा है।
पैलेस को 18 सौ अस्सी में हेरिटेज होटल बना दिया गया,
हेरिटेज होटल में एक ब्रिटिश मेजर बर्टन का भूत रहता है।
ब्रिटिश मेजर बर्टन को सन 1857 में ही मारा गया था,
मेजर को भारतीय सिपाहियों ने हीं मारा था॥

दार्जिलिंग का डाव हिल, कुर्सियांग इलाका,
प्राकृतिक खूबसूरती में बहुत ही मशहूर है।
स्थानीय लकड़ हारो का कहना है कि यहां,
बिना सिर वाला एक लड़का टहलता रहता है।
यह इलाका भुतहा अनुभव से भरा हुआ है,
जंगल में लकड़ी काटने वालों ने सिर विहीन लड़का देखा॥

♦ सुखमंगल सिंह जी – अवध निवासी ♦

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  • “सुखमंगल सिंह जी“ ने, बहुत ही सरल शब्दों में सुंदर तरीके से इस कविता में भारत के सभी मुख्य भूतहा जगह के बारे में बताने की कोशिश की है जो काबिले तारीफ है। भारत में भूत-ही जगह देखने जब जाइए, नियम और कानून का पालन करते हुए जाइए। आप जब स्थानीय आदेश पर चलोगे अगर, तो पर्यटन का आनंद मिलता रहेगा मंगल॥

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यह कविता (भारत में भूतहा जगह कहां और कौन?) “सुखमंगल सिंह जी” की रचना है। KMSRAJ51.COM — के पाठकों के लिए। आपकी कवितायें / लेख सरल शब्दो में दिल की गहराइयों तक उतर कर जीवन बदलने वाली होती है। मुझे पूर्ण विश्वास है आपकी कविताओं और लेख से जनमानस का कल्याण होगा। आपकी कविताओं और लेख से आने वाली पीढ़ी के दिलो दिमाग में हिंदी साहित्य के प्रति प्रेम बना रहेगा। आपकी लेखन क्रिया यूं ही चलती रहे, बाबा विश्वनाथ की कृपा से।

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हस्तिनापुर नरेश परीक्षित।

Kmsraj51 की कलम से…..

♦ हस्तिनापुर नरेश परीक्षित। ♦

युधिष्ठिर द्रोपदी आदि से अनुमति लेकर,
श्री कृष्ण ने द्वारिका पुरी का किया प्रस्थान।
आंखों से ओझल हो जाने पर श्री कृष्ण के,
प्रेम जनित उत्कंठा के पर बस अर्जुन गुणवान॥

अभिन्न निर्दयता और प्रेम व्यवहार लिए,
याद पर याद आती रही वहीं बारंबार उन्हें।
शरीर प्राण से रहित होती तो मृत्यु होती सुने,
परंतु श्री कृष्ण वियोग में संसार अप्रिय दिखता उन्हें॥

उन्हीं के सानिध्य में देवताओं और इंद्र को भी,
जीत कर अग्नि देव को खांडव वन दान किया।
अनु जय भीम सेना ने उन्हें की शक्ति सेवा कर,
अभिमानी जरासंध का भी वध था किया॥

जिन राजाओं को जरासंध ने बंदी था बनाया,
उन्हीं बहुत राजाओं को भगवान ने मुक्त कराया।
जिन – जिन दुष्टों ने भरी सभा में महारानी,
द्रोपदी को छूने का साहस रहा किया॥

आंखों में बिखरे आंसू भरकर तब द्रोपदी,
श्री कृष्ण के चरणों में जा गिरी पड़ी।
उस घोर अपमान का बदला लेने को,
भगवान श्री कृष्ण ने प्रण तब था ठाना॥

मन खडयंती दुर्योधन में आकर वन वास में,
ऋषि दुर्वासा ने हमें दुष्कर संकट में डाला था।
बचे पात्र की शाक की एक पत्ती के भोग,
लगाकर श्री कृष्ण ने हम सबको पता उबारा॥

भगवान के प्रताप से युद्ध में भी हमने आकर,
पार्वती सहित शंकर को आश्चर्य में डाला।
युद्धभूमि खुश होकर शंकर ने अस्त्र पशुपति प्रदान किया,
तरह-तरह के अस्त्र-शस्त्र लोक पालों ने हमें दिया॥

श्रेष्ठ पुरुष मुक्ति पाने को जिन चरणों का सेवन करते!
उन्होंने दुर्लभ और दुस्तर कार्यों को भी सरल बना डाला॥

युद्ध क्षेत्र में वही हमारे रथी बने रहे,
गांडीव धनुष और बाण बहुतेरे पर,
जबकि अस्त्र – शस्त्र सब सधे हैं मेरे,
फिर भी आज रथी मैं अर्जुन हूं॥

बड़े-बड़े राजा कल तक जो सिर झुकाते थे,
श्री कृष्ण के बिना वही सब सार शून्य हो गये।
युद्ध क्षेत्र में उनकी दी गई शिक्षाएं सभी हमको,
तब – तक शांति करने वाली होती थी॥

श्री कृष्ण के चरण कमलों का चिंतन करने से,
अर्जुन की चित्तवृत्ति जब निर्मल होने लगी,
भक्ति में गण के प्रवाह, प्रबल प्रवाह मंथन ने,
अर्जुन के सारे विकारों को बाहर कर डाला॥

बुद्ध क्षेत्र के भगवान श्री कृष्ण का उपदेश,
गीता – ज्ञान पुण्यस्मरण के साथ आया पाले।
जन्म मृत्यु रूपी संसार से मुख्य मुड़ता गया,
अपने को श्रीकृष्ण में लगाते हुए चला, लगाते हुए चला॥

लोक सृष्टि के भगवान श्री कृष्ण ने,
यादव शरीर से पृथ्वी का भार उतारा।
उसी मनुष्य के शरीर का उन्होंने,
पृथ्वी से परित्याग कर डाला॥

इधर पृथ्वी पर कलयुग ने आकर पांव पसारा,
देख महाराज युधिष्ठिर ने महाप्रस्थान का निश्चय कर डाला।
सहित समान गुणों से युक्त पौत्र परीक्षित को,
समुद्री से गिरी हस्तिनापुर का राजा बना डाला॥

♦ सुखमंगल सिंह जी – अवध निवासी ♦

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  • “सुखमंगल सिंह जी“ ने, बहुत ही सरल शब्दों में सुंदर तरीके से इस कविता में बताया हैं की — किस तरह सभी देवी देवताओं ने महाराजा परीक्षित को तरह-तरह के अस्त्र-शस्त्र प्रदान किया। हस्तिनापुर नरेश परीक्षित के जीवन पर सटीक प्रकाश डाला है। अर्जुन का श्रीकृष्ण के प्रति भक्ति और प्रेम को दर्शाया हैं।

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यह कविता (हस्तिनापुर नरेश परीक्षित।) “सुखमंगल सिंह जी” की रचना है। KMSRAJ51.COM — के पाठकों के लिए। आपकी कवितायें / लेख सरल शब्दो में दिल की गहराइयों तक उतर कर जीवन बदलने वाली होती है। मुझे पूर्ण विश्वास है आपकी कविताओं और लेख से जनमानस का कल्याण होगा। आपकी कविताओं और लेख से आने वाली पीढ़ी के दिलो दिमाग में हिंदी साहित्य के प्रति प्रेम बना रहेगा। आपकी लेखन क्रिया यूं ही चलती रहे, बाबा विश्वनाथ की कृपा से।

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जीवंत भाषा में ग्राही शक्ति।

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♦ जीवंत भाषा में ग्राही शक्ति। ♦

जीवंत भाषा का उत्तम लक्षण,
उसकी ग्राही का शक्ति होती है।
विशेषता के अनुरूप औरों से,
जितना अधिक ग्रहण कर लेते।

दूरगामी प्रभाव उसका प्रांजल।
हिंदी ने ग्रहण करने की दिशा में,
उदासीनता कभी नहीं दिखाई।
जब भी जैसे जरूरत पड़ी उसने,
अपनी भाषा शक्ति समृद्धि बढ़ाई।

विभिन्न भाषाओं की शब्द शैली,
यात्रा लंबी चलकर कदम बढाई।
ज्यों ज्ञान – विज्ञान विस्तृत होता,
हिंदी की शक्ति यदि और बढ़ती।

ग्रहण शीलता से संपन्नता आती,
हिंदी साहित्य के और काम बाकी।
चिंतन मनन में कमी न हो उदासी,
ज्ञान दर्पण के क्षेत्र में बढ़े देश वासी।

हिंदी साहित्य का बढ़ाया ज्ञान,
संस्कृत का अधिकांश ही दान।
शब्द शैली पद रचना व व्याकरण,
हिंदी अलंकार से अलंकृत होती।

भाषा संस्कृत संकुचित सीमा से पार,
जनता के विशाल क्षेत्र में जब आई!
भाषा की सहजता का प्रयोग प्रश्न,
जनता के अनरूप करने की पाई।

माना कि शासन प्रशासन शिक्षा का,
हिंदी करण तेजी से आगे बढ़ रहा है।
विस्तार के अनुकूल शब्द भंडार भरे
अनिवार्यता का अभाव भी खल रहा।

दुनियां ने ज्ञान विज्ञान की दौड़ में,
तेजी से विस्तार की रफ्तार बढ़ाया।
हिंदी शब्द भंडार में बहुलता मूल्य,
विरासत में पैतृक सम्पत्ति से पाया।

♦ सुखमंगल सिंह जी – अवध निवासी ♦

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  • “सुखमंगल सिंह जी“ ने, बहुत ही सरल शब्दों में सुंदर तरीके से इस कविता में — हिंदी भाषा के गुणों और महत्व को बताते हुए अन्य भाषाओं में इसकी उपयोगिता को बताया है, चाहे वो संस्कृत की भाषा को निखारने की बात हो या अन्य भाषा की। हिंदी भाषा में जो अपनापन है वो दुनिया के किसी भी अन्य भाषा में नही है।

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यह कविता (जीवंत भाषा में ग्राही शक्ति।) “सुखमंगल सिंह जी” की रचना है। KMSRAJ51.COM — के पाठकों के लिए। आपकी कवितायें / लेख सरल शब्दो में दिल की गहराइयों तक उतर कर जीवन बदलने वाली होती है। मुझे पूर्ण विश्वास है आपकी कविताओं और लेख से जनमानस का कल्याण होगा। आपकी कविताओं और लेख से आने वाली पीढ़ी के दिलो दिमाग में हिंदी साहित्य के प्रति प्रेम बना रहेगा। आपकी लेखन क्रिया यूं ही चलती रहे, बाबा विश्वनाथ की कृपा से।

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गुरु की महत्ता और गुरु पूर्णिमा।

Kmsraj51 की कलम से…..

♦ गुरु की महत्ता और गुरु पूर्णिमा। ♦

भारतीय समाज में मनाए जाने वाले पूज्यनीय पुण्य देने वाले भारत के सभी त्योहार होते हैं। भारत के अलग-अलग राज्यों में यह त्यौहार अलग-अलग रूप में भी मनाए जाते हैं।

जो किसी न किसी रूप में हमारे ईश्वर से साक्षात्कार कराने वाले होते हैं। जो हमारे आसपास की दुनिया में फैल ज्ञान की शक्ति को संतुलित रखने में मददगार होते हैं। विविध सभ्यताओं का ज्ञान कराते हैं। मानव जीवन को शुभम रूप से चलाने के लिए उमंग और उत्साह भरते हैं। सत्य की खोज, शोध – खोज का अवसर प्रदान करते हैं।

उन्हें आने वाले त्यौहारों में से एक आषाढ शुक्ल पक्ष की पूर्णिमा को गुरु पूर्णिमा के रूप में मनाया जाता है। गुरु पूर्णिमा के दिन जनमानस अलग-अलग समूहों में अपने – अपने लौकिक जगत में व्याप्त गुरुओं के शरण में जाकर आशीर्वाद प्राप्त करते हैं।

आशीर्वाद प्राप्त करने के उपरांत वह अपने को धन्य मानते हैं। सच में अलौकिक जगत की उत्पत्ति करता संरक्षक रक्षक भगवान भोलेनाथ, भगवान विष्णु और ब्रह्मा जी हैं जो हमारे सच्चे सर्वसंपन्न परिपूर्ण गुरु हैं।

सब के मालिक हैं और जगत के, जगत को चलाने वाले हैं। फिर भी मानव लौकिक जगत में मनुष्य तात्कालिक लाभ की कामना से गुरु की खोज में लगा रहता है।

जिस ईश्वर ने ही जगत में भेजा है, जो हमारे आप जैसे हैं उन्होंने तब और तपस्या के बल पर अपने को सिद्ध करने का प्रयत्न किया है। उन्हें परम उत्तम मानकर गुरु मान लेता है। मनुष्य अपने कर्मों के अनुसार सुख – दु :ख प्राप्त करता है।

गुरु माता है और गुरु पिता है।
गुरु आचार्य महान ज्ञान वान है।
अध्यापक ब हु तेरी जगत में,
सद्गुरु शकल जहां विद्वान है।

•» ब्रह्मा गुरु है! जो जगत वासियों का व्यक्तित्व निर्माण करने वाले हैं। संसार की स्थित उत्पत्ति और प्रलय के हेतु हैं।

•» विष्णु जी गुरु हैं! वह शिष्य की रक्षा करते हैं उसके अंदर की नकारात्मकता को दूर करते हैं और उसके अवगुणों को दूर करके भगाते हैं। भगवान विष्णु किसी कारण बस भूले भटके शिष्य को भी सत मार्ग पर लाकर सहज रूप से स्वीकार कर लेते हैं। भगवान विष्णु के प्रति प्रेम रखने वाला मनुष्य बैकुंठधाम को जाता है। वह जन्म – मृत्यु के भय से दूर रहता है क्योंकि भगवान जन्म मृत्यु के भय का नाश करने वाले हैं! भगवान विष्णु के भक्त का भक्ति प्रवाह बढ़ने लगता है।

•» शंकर जी यानी महादेव गुरु! महादेव जी चराचर के जगतगुरु है। वैर रहित, शांति मूर्ति, आत्माराम और जगत के परम आराध्य देव हैं। घमंडी धर्म की मर्यादा को तोड़ने वाले का विनाश करने वाले हैं। श्री शंकर जी की घटक जटाओं में गंगा जी सुशोभित होती हैं –

गंगा – यमुना के संगम में,
करता जो अज्ञात स्नान!
प्रसन्नता से परिपूर्ण होकर
पहुंचता अपनी-अपनी धाम।

गुरु पूर्णिमा के दिन से वर्षा ऋतु का काल प्रारंभ माना जाता है वर्षा काल में साधु संत 4 माह तक भ्रमण करके जगत उत्थान के लिए संस्कृति रक्षा और सभ्यता के लिए, धर्म, ज्ञान का प्रचार – प्रसार करते हैं। ज्ञानार्जन के लिए यह चातुर्मास उपयुक्त माना जाता है।

गर्मी और उमस से भरी जिंदगी को शीतलता प्रदान होती है। चारों तरफ हरियाली का वातावरण रहता है मानव मन जो, मानव मन को आह्लादित कर लेता है।

आषाढ़ की पूर्णिमा के ही दिन कृष्ण द्वैपायन व्यास जी का जन्म हुआ था। जिन्होंने महाभारत की रचना की थी। कृष्ण द्वैपायन वेद व्यास जी महाभारत के साथ – साथ वेद – पुराण वेदांत – दर्शन ( ब्रह्म सूत्र) शारीरिक सूत्र, योग शास्त्र सहित अनेक उत्कृष्ट कृतियों की रचना की है।

आज ही के दिन भगवान बुद्ध ने काशी में आकर काशी के प्रमुख संस्थान सारनाथ में यहां सारंग नाथ जी, जो भगवान शंकर के साले कहे जाते हैं उनका मंदिर है उसी के पास में अपने पांच शिष्यों को प्रथम उपदेश दिया था।

शंकर जी ने आज ही के दिन आषाढ़ मास की पूर्णिमा को सप्त ऋषियों को योग और तत्वज्ञान की दीक्षा दी थी। सप्त ऋषियों ने भारत सहित दुनिया में फैल कर विश्व कल्याण के लिए योग दर्शन का बयान संसार को दिया।

गुरु का अर्थ होता है कि वह अंधकार से प्रकाश की तरफ ले जाए, आत्म ज्योति जगाने का काम करें, भक्तों के अंदर आत्मज्योति का बोध कराए।

गुरु की महत्ता को सभी ने स्वीकारा है सभी शास्त्र गुरु तत्व की प्रशंसा करते हैं। गुरु प्रशंसा के योग्य होता है।

स्वामी विवेकानंद जी महाराज के गुरु रामकृष्ण परमहंस जी थे। जिन्होंने एक साधारण बालक को दुनिया का सबसे महान दार्शनिक ज्ञाता और बुद्धिमान बना दिया।

अयोध्या नरेश चक्रवर्ती महाराजा दशरथ के गुरु वशिष्ठ जी के जिनकी सलाह के बिना अयोध्या के दरबार का कोई भी कार्य नहीं होता था। कोई भी कार्य करने के पहले अयोध्या में गुरु वशिष्ठ से आज्ञा लेकर ही किया जाता था।

गुरु का योग्य होना बहुत आवश्यक है। गुरु अपने शिष्य को उपदेश आत्मक वाणी से लक्ष्य की लालसा को निर्मल करने का मार्गदर्शक होता है। गुरु का कर्तव्य है कि वह अपने शिष्य में सद्विद्या का संचार, संचारित करने का तन – मन से प्रयत्न करें।

महाराज मनु ने भी गुरु को महान कहा है उन्होंने गुरु की सेवा करने से ब्रह्म लोक की प्राप्ति होती है बताया। आचार्य को देवता मानने को उन्होंने कहा।

भक्ति काल में भक्त और संत एक स्वर से मुक्त कंठ से गुरु की महिमा और प्रशंसा के गीत गान करते रहते थे।

हिंदी साहित्य गौरव प्रदान करने वाले श्रृंगार रस के कवि सूरदास जी को उनके गुरु वल्लभाचार्य जी के द्वारा यह कहा जाना कि तुम जगत में, घिघियाते ही रहोगे? कवि सूरदास जी गुरु के आशीर्वाद को लेकर श्रृंगार रस के महान कवि हुए आज तक श्रृंगार रस का ऐसा कोई कवि शायद ही धरती पर आया हो।

गुरु की आवश्यकता अलौकिक जगत में हमेशा होती रहती है। अलग-अलग चीजों के ज्ञान के लिए अलग-अलग गुरु की आवश्यकता होती है, जो जीवन में उस वस्तु से संबंधित ज्ञान दे सके सारा जीवन सीखने के लिए ही होता है।

समस्त 12 बारीकियों के, उसको सीखने के लिए मनुष्य को अच्छे गुरु की आवश्यकता होती है। अच्छा गुरु वह होता है जो उस विषय में पारंगत होता है। गुरु शिष्य के बीच बहुत गहरा संबंध होता है। गुरु को कभी भी कच्चा नहीं होना चाहिए और यह गुरु कच्चा है तो उसे शिष्य को गुरु नहीं बनाना चाहिए, इसीलिए शास्त्र सद्गुरु बनाने का उपदेश देता है।

मनुष्य को हमेशा सच्चे गुरु की तलाश करते रहना चाहिए। आंख मूंद कर किसी को अपना गुरु नहीं बनाना चाहिए। मानव जीवन में पग – पग पर गुरु की आवश्यकता होती है। जिससे हम थोड़ा सा भी ज्ञान प्राप्त करते हैं, वह भी गुरु ही होता है। स्कूल कॉलेज में हमें पढ़ाने वाला अध्यापक ही गुरु होता है।

किसी वस्तु की विशेष जानकारी देने वाला व्यक्ति भी गुरु होता है। भारतीय हाउस गुरु की हो रही है जो जीवन के चौथे पल में आवश्यकता होती है। आध्यात्मिक ज्ञान और ईश्वर को प्राप्त कराने वाले गुरु की आवश्यकता पर यहां बल दिया जा रहा है। कहा गया है-

गुरु करिए जांच,
पानी पीजिए छान।

विशुद्ध परंपरा का पालन करते हुए सभ्यता – संस्कृति और समाज का ध्यान रखते हुए गुरु दीक्षा ग्रहण करनी चाहिए।

♦ सुखमंगल सिंह जी – अवध निवासी ♦

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  • “सुखमंगल सिंह जी“ ने, बहुत ही सरल शब्दों में सुंदर तरीके से लेख के माध्यम से बखूबी समझाने की कोशिश की है – इस लेख में बहुत सारे उदाहरण के माध्यम से लेखक ने विस्तार से बताया है की, समय – समय पर हर युग में गुरु के महत्व और भूमिका को उच्च स्थान प्राप्त है। जीवन में गुरु की आवश्यकता को सभी ने स्वीकार किया है। “गुरु का अर्थ होता है कि वह अंधकार से प्रकाश की तरफ ले जाए, आत्म ज्योति जगाने का काम करें, भक्तों के अंदर आत्मज्योति का बोध कराए।”

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यह लेख (गुरु की महत्ता और गुरु पूर्णिमा।) “सुखमंगल सिंह जी” की रचना है। KMSRAJ51.COM — के पाठकों के लिए। आपकी कवितायें / लेख सरल शब्दो में दिल की गहराइयों तक उतर कर जीवन बदलने वाली होती है। मुझे पूर्ण विश्वास है आपकी कविताओं और लेख से जनमानस का कल्याण होगा। आपकी कविताओं और लेख से आने वाली पीढ़ी के दिलो दिमाग में हिंदी साहित्य के प्रति प्रेम बना रहेगा। आपकी लेखन क्रिया यूं ही चलती रहे, बाबा विश्वनाथ की कृपा से।

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विश्व विख्यात प्राचीन पुरी अयोध्या।

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♦ विश्व विख्यात प्राचीन पुरी अयोध्या। ♦

सरयू नदी के तट पर स्थित प्राचीन काल की अयोध्या,
उत्तर प्रदेश राज्य का एक प्रमुख विख्यात धाम अयोध्या।
राजा मनु के दौरान बसाई गई परम पूज्य प्रसिद्ध अयोध्या,
युद्ध के माध्यम से प्राप्त न होने वाली, पुनीत नगरी अयोध्या॥

योग प्रतीक के रूप में है अथर्ववेद कहता है अयोध्या,
रामायण के कहे अनुसार मनु जी द्वारा स्थापित है अयोध्या।
स्कन्द पुराण कथा कहती अमरावती के रूप में है अयोध्या,
हिंदू मठ मंदिर से सजी-धजी मूल रूप से अविनाशी अयोध्या॥

तीर्थकर ऋषभ नाथ जी की जन्म स्थली भी रही अयोध्या,
अजित नाथ जी दूसरे तीर्थकर का जन्म स्थान रही अयोध्या।
चौथे तीर्थकर अभिनन्दन नाथ जी की भी सम्मानित अयोध्या,
सुमित नाथ जी का जन्म बनारस धर्म कर्म प्रेरित अयोध्या॥

जैन वैदिक मतो के प्रवर्तक भगवान राम की जन्मभूमि अयोध्या,
चौदहवें तीर्थकर अनंत नाथ जी की आराध्य देव अयोध्या।
कोशल जनपद की पहले राजधानी रही यह थी अयोध्या,
सूर्यवंशी प्रतापी क्षत्रपों की प्रसिद्ध राजधानी रही अयोध्या॥

भगवान की जन्म स्थली विश्व विदित कल्याणकारी अयोध्या,
मानव सभ्यता की पहली पौराणिक काल की पूरी अयोध्या।
ऋषि मुनियों की तपोस्थली धुनि रमी है सदा सुखी अयोध्या,
कवि लेखक और पत्रकार की रचना करती रही अयोध्या॥

हनुमान गढ़ी के निकट भविष्य खिंच कनक भवन अयोध्या,
कनक भवन के सामने अवस्थित है दसरथ दरबार अयोध्या।
महावीर हनुमान जी रहते हैं यहीं गुफा में एक अयोध्या,
करते हैं जगत विदित रामजन्म भूमि – राम कोटि रक्षा अयोध्या॥

यहां न्याय प्रक्रिया से गुजरना पड़ा स्वाभाविक ही अयोध्या,
सिक्ख धर्म के लिए महत्व पूर्ण स्थान है पूज्य प्रसिद्ध अयोध्या।
यात्रा सलाहकार यहां पर गुरुनानक देव जी आए अयोध्या,
राजा रानी का संबंध कोरिया ने रहा है मूल रूप अयोध्या॥

रूस – भारत का प्राचीतम संबंध स्थापित किया अयोध्या,
भगवान बुद्ध के पूर्वजों की रचना हुई थी वही यह अयोध्या।
श्री राम नवमी, श्री जानकी नवमी, गुरूपूर्णिमा सावन झूला अयोध्या॥

चौरासी कोसी परिक्रमा क्षेत्र की प्रमुख विशेषताएं अयोध्या,
चौदह भुवन चारों दिशाओं में पूज्य प्रसिद्ध अयोध्या।
नागेश्वर ज्योतिर्लिंग त्रिपुरारी की बनवाया कुश ने अयोध्या,
धूम मचाने शिव रात्रि को शिव जी आते राम की अयोध्या॥

सरयू नदी के तट पर स्थित प्राचीन काल से बसी अयोध्या,
अमरावतीपुरी सी दुनिया को अपनाती, भक्ति भाव में स्थित अयोध्या॥

♦ सुखमंगल सिंह जी – अवध निवासी ♦

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  • “सुखमंगल सिंह जी“ ने, बहुत ही सरल शब्दों में सुंदर तरीके से, कविता के माध्यम से बखूबी समझाने की कोशिश की है – इस कविता में कवि ने प्राचीन पुरी अयोध्या के गुणों और विशेषताओं का वर्णन किया है। महापुरुषों की पावन भूमि का मनोरम वर्णन किया है, जहाँ से पूरी दुनिया को ज्ञान, ध्यान, धर्म का बोध सदैव ही होता रहा। जिस भूमि पर प्राचीन समय से ही महापुरुष तपस्या करते आये है, निष्काम उपासकों की पुण्य गाथा से कण – कण सुशोभित है प्राचीन पुरी अयोध्या धाम। महाबली हनुमान जी के आराध्य की नगरी अयोध्या धाम।

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यह कविता (विश्व विख्यात प्राचीन पुरी अयोध्या।) “सुखमंगल सिंह जी” की रचना है। KMSRAJ51.COM — के पाठकों के लिए। आपकी कवितायें / लेख सरल शब्दो में दिल की गहराइयों तक उतर कर जीवन बदलने वाली होती है। मुझे पूर्ण विश्वास है आपकी कविताओं और लेख से जनमानस का कल्याण होगा। आपकी कविताओं और लेख से आने वाली पीढ़ी के दिलो दिमाग में हिंदी साहित्य के प्रति प्रेम बना रहेगा। आपकी लेखन क्रिया यूं ही चलती रहे, बाबा विश्वनाथ की कृपा से।

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आता है अकेला – चार कंधे से जाता।

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♦ आता है अकेला – चार कंधे से जाता। ♦

इंसान आता है इस धरा पर अकेला — चार कंधे से जाता।

मनुष्य धरा पर अकेला आता,
रोता हुआ खुद जन्म पाता।
जन्म जिस घर में वह लेता,
गीत गवनई वहां गाया जाता।

छठी बरही भी किया जाता,
पालन करने वाला पिता होता।
वहां ढोल मजीरा बजता पाता,
गांव में मुंह मीठा किया जाता।

बच्चे – बच्ची खुशहाली आती,
कालिया आंगन की खुल जाती।
माता उसी की दुखहर्ता होती,
चारों तरफ से बधायां मिलती।

क्रिया – कर्म समझ नहीं पाता,
कुछ दिन बाद खुद उलझ जाता।
मोह – माया में मनुष्य बध जाता,
जन्म – मरण चक्कर फंसा पाता।

आप पाप पुण्य में फंस जाता,
कंचन चक्कर, धरा में घस जाता।
जो भी मंशा लेकर मानव आता,
ठगा हुआ दुनिया में खुद पाता।

कर्म धर्म सारे समझ नहीं पाता,
उसके संग कुछ भी नहीं जाता।
जबकि मनुष्य जीवन सुंदर पाता,
यश कीर्ति धरा पर ही रह जाती।

जिस जीवन हेतु देवता तरस जाता,
उसी पाकर मनुष्य दुख लेकर आता।
जीवन चक्र में वह सुख कहां पाता,
शरण में देवताओं के जब नहीं जाता।

मुक्ति पाने की अभिलाषा लाता,
सत्कार मुंह से जाने क्यों कराता।
अपनी भूल पर अंत छटपटाता,
पाप – पुण्य कर्म समझ नहीं पाता।

झटपट अर्थार्जन में ध्यान बटाता,
पितृ – ऋण भी चुका नहीं पाता।
मृत्यु के समय सबको रुला जाता,
चार कंधों से श्मशान घाट जाता।

♦ सुखमंगल सिंह जी – अवध निवासी ♦

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  • “सुखमंगल सिंह जी“ ने, बहुत ही सरल शब्दों में सुंदर तरीके से, कविता के माध्यम से बखूबी समझाने की कोशिश की है – बहुत भाग्य से मानव जीवन मिला है जिसके लिए देवता भी तरशते है। अपने इस अनमोल जीवन को यूँ ही नष्ट ना कर दो। अपने इस अनमोल जीवन का सार्थक प्रयोग करो। जीवन के खट्टे- मीठे उतार चढ़ाव का मधुर वर्णन किया है। अच्छे कर्म कर, जीवन का सदुपयोग कर, मानव जन्म को आनंदमय बनाएं।

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यह कविता (आता है अकेला – चार कंधा से जाता।) “सुखमंगल सिंह जी” की रचना है। KMSRAJ51.COM — के पाठकों के लिए। आपकी कवितायें / लेख सरल शब्दो में दिल की गहराइयों तक उतर कर जीवन बदलने वाली होती है। मुझे पूर्ण विश्वास है आपकी कविताओं और लेख से जनमानस का कल्याण होगा। आपकी कविताओं और लेख से आने वाली पीढ़ी के दिलो दिमाग में हिंदी साहित्य के प्रति प्रेम बना रहेगा। आपकी लेखन क्रिया यूं ही चलती रहे, बाबा विश्वनाथ की कृपा से।

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त्रिभाग पर भरोसा करूं।

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♦ त्रिभाग पर भरोसा करूं। ♦

बंट चुका त्रिभाग में
किससे कहूं।
हो गया अवसाद माना
कैसे लिखूं।

हृदय शरीर दिमाग जाना
क्या कहूं।
पहले शरीर से अलग
किससे कहूं।

शरीर से अलग है हृदय
अलग दिखा दिमाग,
कहां पलूं।
देती शरीर जवाब
कैसे चलूं।

खुश रहता हूं फिर भी,
ब्रह्मा विष्णु महेश में,
यादों से कहता।

जैसे चलाएं।
चलता चलूं।
मचलता चलूं।

♦ सुखमंगल सिंह जी – अवध निवासी ♦

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  • “सुखमंगल सिंह जी“ ने, बहुत ही सरल शब्दों में सुंदर तरीके से, कविता के माध्यम से बखूबी समझाने की कोशिश की है – कौन हूँ मैं, शरीर, हृदय, या दिमाग। कौन शरीर से अलग है, भगवान चलाते जैसे चलाएं, चलता चलूं, मचलता चलूं। आत्मा, शरीर, हृदय, व दिमाग के बीच तालमेल।

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यह कविता (त्रिभाग पर भरोसा करूं।) “सुखमंगल सिंह जी” की रचना है। KMSRAJ51.COM — के पाठकों के लिए। आपकी कवितायें सरल शब्दो में दिल की गहराइयों तक उतर कर जीवन बदलने वाली होती है। मुझे पूर्ण विश्वास है आपकी कविताओं और लेख से जनमानस का कल्याण होगा। आपकी कविताओं और लेख से आने वाली पीढ़ी के दिलो दिमाग में हिंदी साहित्य के प्रति प्रेम बना रहेगा। आपकी लेखन क्रिया यूं ही चलती रहे, बाबा विश्वनाथ की कृपा से।

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सोशल मीडिया – भारत।

Kmsraj51 की कलम से…..

♦ सोशल मीडिया – भारत। ♦

भारत पहले सबको मिलकर समझाता है।
सभ्यता और संस्कृत का उसको ज्ञान कराता है।
भारत की संस्कृति में यही कहा जाता है,
सबको यह पहले बहुत खूब समझाता है।

मनमानी करने वालों को ज्ञान पहले बताता है।
नियम और कानून का ध्यान उसको कराता है।
त्याग और तपस्या का भी पाठ उसे पढ़ाता है।
अहिंसा और शांति का संदेश उसको सिखाता है।

पुरुषोत्तम का देश है भारत उनका मान दिखाता है।
सूर्पनखा रावण की बहना उसको भी समझाता है।
श्रीराम द्वारा लक्ष्मण की तरफ ध्यान दिया जाता है।
इधर उधर जाकर भी जब नहीं मानती शूर्पणखा है।

अंत कोप भाजन से नाक अपनी कटवा दी है।
जबकि श्रीराम द्वारा उसको समझाया जाता है।
एक कथा और सुनाने का मन कर जाता है।
बालकृष्ण के पास कंस की बहन को भेजा जाता है।

उसका भी अंत श्री कृष्ण द्वारा किया जाता है।
कहने का तात्पर्य ही है जो भारत में आया है,
भारत के बने कानून का पालन उसको करना है।
मनमानी इस देश में कहीं नहीं चलने वाला है।
एक समय तक ही उसको छूट दिया जाता है।

इसलिए नियम कानून के अंदर काम करने हैं।
शांति और विश्व बंधुत्व से यहां पर आने हैं।

♦ सुखमंगल सिंह जी – अवध निवासी ♦

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  • “सुखमंगल सिंह जी“ ने, बहुत ही सरल शब्दों में सुंदर तरीके से, कविता के माध्यम से बखूबी समझाने की कोशिश की है – यह आर्यावर्त – हमारा भारत देश है, हम सभी का दिल से सम्मान करते है यहाँ। लेकिन यहाँ पर रहना है तो – भारत के बने कानून का पालन उसको करना है। मनमानी इस देश में कहीं नहीं चलने वाला है, एक समय तक ही उसको छूट दिया जाता है। इसलिए नियम कानून के अंदर काम करने हैं। शांति और विश्व बंधुत्व से यहां पर आने हैं।

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यह कविता (सोशल मीडिया – भारत।) “सुखमंगल सिंह जी” की रचना है। KMSRAJ51.COM — के पाठकों के लिए। आपकी कवितायें सरल शब्दो में दिल की गहराइयों तक उतर कर जीवन बदलने वाली होती है। मुझे पूर्ण विश्वास है आपकी कविताओं और लेख से जनमानस का कल्याण होगा। आपकी कविताओं और लेख से आने वाली पीढ़ी के दिलो दिमाग में हिंदी साहित्य के प्रति प्रेम बना रहेगा। आपकी लेखन क्रिया यूं ही चलती रहे, बाबा विश्वनाथ की कृपा से।

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