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“तू ना हो निराश कभी मन से” – (KMSRAJ51, KMSRAJ, KMS)

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2021-KMSRAJ51 की कलम से

मैं धीर भरी सुख की बदली।

Kmsraj51 की कलम से…..

♦ मैं धीर भरी सुख की बदली। ♦

मैं धीर भरी सुख की बदली।
बदली दुनिया मैं भी बदली।

हो पीर भले चाहे जितनी।
जीना अब मैंने सीख लिया।
जो शूल बिछे पथ में मेरे,
वो शूल हटाना सीख लिया।

कंटक पथ पर, उर साहस भर।
मासूम कली मैं चल निकली।
मैं धीर भरी सुख ………
बदली दुनिया मैं ………

नैनों से चाहे नीर बहे।
हिय से अनुराग बहाती हूँ।
यूँ ही नहीं मैं इस सृष्टि की,
अनुपम रचना कहलाती हूँ।

असुरों का वध करने को अब,
खुद आयुध लेकर चल निकली।
मैं धीर भरी सुख ……..
बदली दुनिया मैं ……..

नीरव नीरस गृह को मैं ही,
मधुर सुरों से भर देती हूँ।
निर्जीव खड़ी दीवारों की,
जड़ता सारी हर लेती हूँ।

कण – कण घर का महके ऐसे,
मानो सुवासित बयार चली।
मैं धीर भरी सुख ……..
बदली दुनिया मैं ………

केवल भीतों के आयत से,
होता है निर्मित सदन नहीं।
गृहलक्ष्मी बन कर आ जाऊँ।
बस जाता है फिर भवन वहीं।

मंगल गायन उत्सव पूजा,
लगती हैं सको बहुत भली।
मैं धीर भरी सुख की ……..
बदली दुनिया मैं ………..

हो जाऊँ मैं पल भर ओझल।
अनुपस्थिति मेरी बहुत खले।
दृष्टि पड़े जब भी मुझ पर तो,
मुख पर सबके मुस्कान खिले।

केवल मेरे होने से ही।
सूरत सबकी है खिली – खिली।
मैं धीर भरी सुख की बदली।
दुनिया बदली मैं भी बदली।

औरों की गलती पर मैंने,
अब नीर बहाना छोड़ दिया।
नभ तक परचम फहराया है।
धारा का रुख़ ही मोड़ दिया।

निज सक्षमता के बल पर ही,
लाचारी पीछे छोड़ चली।
मैं धीर भरी सुख की बदली।
दुनिया बदली मैं भी बदली।

♦ वेदस्मृति ‘कृती’ जी – पुणे, महाराष्ट्र ♦

—————

  • “वेदस्मृति ‘कृती’ जी“ ने, बिलकुल ही सरल शब्दों में समझाने की कोशिश की हैं – “नारी तू नारायणी” एक नारी से ही घर का रौनक है, वही है जो हरेक हालात, में घर को व घर के सभी सदस्यों का देखभाल करती हैं। “नीरव नीरस गृह को मैं ही मधुर सुरों से भर देती हूँ, निर्जीव खड़ी दीवारों की जड़ता सारी हर लेती हूँ। हो जाऊँ मैं पल भर ओझल, अनुपस्थिति मेरी बहुत खले, दृष्टि पड़े जब भी मुझ पर तो, मुख पर सबके मुस्कान खिले।”

—————

यह कविता (मैं धीर भरी सुख की बदली।) ” वेदस्मृति ‘कृती’ जी “ की रचना है। KMSRAJ51.COM — के पाठकों के लिए। आपकी कवितायें सरल शब्दो में दिल की गहराइयों तक उतर कर जीवन बदलने वाली होती है। मुझे पूर्ण विश्वास है आपकी कविताओं और लेख से जनमानस का कल्याण होगा। आपकी लेखन क्रिया यूँ ही चलती रहे जनमानस के कल्याण के लिए।

साहित्यिक नाम : वेदस्मृति ‘कृती’
शिक्षा : एम. ए. ( अँग्रेजी साहित्य )
बी.एड. ( फ़िज़िकल )
आई आई टी . शिक्षिका ( प्राइवेट कोचिंग क्लासेज़)
लेखिका, कहानीकार, कवियित्री, समीक्षक, ( सभी विधाओं में लेखन ) अनुवादक. समाज सेविका।

अध्यक्ष : “सिद्धि एक उम्मीद महिला साहित्यिक समूह”
प्रदेश अध्यक्ष : अखिल भारतीय साहित्य सदन ( महाराष्ट्र इकाई )
राष्ट्रीय आंचलिक साहित्य संस्थान बिहार प्रान्त की महिला प्रकोष्ठ,
श्री संस्था चैरिटेबल ट्रस्ट : प्रदेश प्रतिनिधि ( महाराष्ट्र )
अंतर्राष्ट्रीय हिंदी परिषद में – सह संगठन मंत्री, मुंबई ज़िला, महाराष्ट्र
हिन्दी और अँग्रेजी दोनों विधाओं में स्वतंत्र लेखन।

अनेक प्रतिष्ठित हिन्दी/अँग्रेजी पत्र – पत्रिकाओं में नियमित रचनाएँ प्रकाशित।

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जैसे शरीर के लिए भोजन जरूरी है वैसे ही मस्तिष्क के लिए भी सकारात्मक ज्ञान और ध्यान रुपी भोजन जरूरी हैं।-KMSRAj51

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“सफलता का सबसे बड़ा सूत्र”(KMSRAJ51)

“स्वयं से वार्तालाप(बातचीत) करके जीवन में आश्चर्यजनक परिवर्तन लाया जा सकता है। ऐसा करके आप अपने भीतर छिपी बुराईयाें(Weakness) काे पहचानते है, और स्वयं काे अच्छा बनने के लिए प्रोत्साहित करते हैं।”

 

“अगर अपने कार्य से आप स्वयं संतुष्ट हैं, ताे फिर अन्य लोग क्या कहते हैं उसकी परवाह ना करें।”~KMSRAj51

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माँ।

Kmsraj51 की कलम से…..

♦ माँ। ♦

माँ अपने बच्चों को अपने,
आँचल में छिपा ले इस कदर।

काला टीका भी लगाती है,
कहीं लग न जाये नज़र।

माँ का जब बालक रोता है,
तब माँ का दिल भी रोता है।

इतना विशाल ह्रदय दिया है,
मालिक ने माँ को।

खुद अपने मुख से जो चाहे कह दे,
पर कुछ न कहने दे जहाँ को।

कुछ भरे ऐसे प्यार भरे मोती,
खुदा ने इसकी सीरत में।

जिनका स्वाद होता ऐसा,
जैसा अमृत में।

माँ जैसा इस जहां में कोई,
नही मिलेगा कभी तुम्हें।

देव भी इच्छा रखते है,
माँ के आँचल की पनाह पाने की।

मत भूलों माँ के वंदन को,
शक्ति रखती है, ये इतनी,
हर भूल माफ़ कर दे ज़माने की।

♦ सुशीला देवी जी – करनाल, हरियाणा ♦

—————

  • “श्रीमती सुशीला देवी जी“ ने, बहुत ही सरल शब्दों में सुंदर तरीके से, कविता के माध्यम से बखूबी समझाने की कोशिश की है – माँ के गुणों को, प्यार को, निस्वार्थ स्नेह को, कैसी भी विपरीत हालात हो, माँ ने तुम्हारा ख्याल रखा है। माँ का प्यार ऐसा है की माँ की आँचल के लिए देवी – देवता भी तरसते हैं। इसलिए सदैव ही माँ के सेवा व आदर सम्मान और वंदन करो। माँ का प्यार उनसे पूछो जिनके माँ नही है।

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यह कविता (माँ।) “श्रीमती सुशीला देवी जी” की रचना है। KMSRAJ51.COM — के पाठकों के लिए। आपकी कवितायें सरल शब्दो में दिल की गहराइयों तक उतर कर जीवन बदलने वाली होती है। मुझे पूर्ण विश्वास है आपकी कविताओं और लेख से जनमानस का कल्याण होगा। आपकी लेखन क्रिया यूं ही चलती रहे।

आपका परिचय आप ही के शब्दों में:—

मेरा नाम श्रीमती सुशीला देवी है। मैं राजकीय प्राथमिक पाठशाला, ब्लॉक – घरौंडा, जिला – करनाल, में J.B.T.tr. के पद पर कार्यरत हूँ। मैं “विश्व कविता पाठ“ के पटल की सदस्य हूँ। मेरी कुछ रचनाओं ने टीम मंथन गुजरात के पटल पर भी स्थान पाया है। मेरी रचनाओं में प्रकृति, माँ अम्बे, दिल की पुकार, हिंदी दिवस, वो पुराने दिन, डिजिटल जमाना, नारी, वक्त, नया जमाना, मित्रता दिवस, सोच रे मानव, इन सभी की झलक है।

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“सफलता का सबसे बड़ा सूत्र”(KMSRAJ51)

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श्री कृष्ण द्वारा वसुदेव को ब्रह्म ज्ञान।

Kmsraj51 की कलम से…..

♦ श्री कृष्ण द्वारा वसुदेव को ब्रह्म ज्ञान। ♦

श्री कृष्ण बलराम जी वसुदेव जी को,
प्रातः दोनों आकर किया प्रणाम।
दोनों भाइयों का उन्होंने किया अभिनंदन,
ऋषियों के श्री मुख से सुना था जैसा वंदन।

हृदय से वसुदेव जी करने लगे दोनों से आलिंगन,
सच्चिदानंद स्वरूप का होने लगा उन्हें दर्शन।
वसुदेव बोले सच्चिदानंद स्वरूप श्री कृष्ण,
और मेरे महायोगेश्वर संकर्षण।

तुम दोनों ही जगत के हो प्रधान,
पुरुष के भी नियामक परमेश्वर।
तुम ही इस मायावी जगत के आधार हो,
तुम ही निर्माता और निर्माण सामग्री हो।

तुम दोनों जगत के स्वामी हो।
सब कुछ धारक तुम ही हो।
तुम भोग्य और भोक्ता से परे।
साक्षात भगवान तुम ही हो।

जगत की वस्तुओं के सृष्टिकर्ता,
पालन पोषण करता तुम ही हो।
विनाश वान सभी पदार्थों में तुम,
कारण रूप अविनाशी तत्व हो।

हो रहस्य ज्ञान योग माया का,
तुम्हारी कीर्ति गान लोग करते हैं।
भजन सुनकर श्री वासुदेव जी के,
भक्तवत्सल कृष्ण मुस्कुराने लगे।

विनय पूर्वक झुककर पिताजी को,
सु-मधुर वाणी में सुनाने लगे।

हम तो आपके पुत्र ही हैं पिता जी।
हमें लक्ष्य कर आपने ब्रह्म ज्ञान का,
उपदेश आप ही हमें सुनाने लगे।
मैं हूं! वही! सब आप ही बताने लगे।

जैसे छिति जल पावक गगन समीरा,
एक होते हुए अलग-अलग कहलाने लगे।
पंचमहाभूत अप्रकट – प्रकट होकर,
बड़े छोटे अधिक थोड़े दिखने लगे।

वैसे ही मैं! और बलराम जी भी,
भेद से ही दो पहचाने जाने लगे।

धरा पर जन्म – मृत्यु चक्कर रूप,
भटकते हुए जीव निमित्त आने लगे।
हम दोनों अन्याय के खिलाफ अपना,
आकर यहां शस्त्र उठाने लगे।

शरणागत उनके संसार भय को मिटाने लगे,
इस धरा को भार से मुक्ति दिलाने लगे।
मंगल प्रभु के श्री – चरण में जाने लगा,
अमृत तत्व सुख सागर सबको सुनाने लगा।

♦ सुखमंगल सिंह जी – अवध निवासी ♦

—————

  • “सुखमंगल सिंह जी“ ने, बहुत ही सरल शब्दों में सुंदर तरीके से, कविता के माध्यम से बखूबी समझाने की कोशिश की है – श्री कृष्ण और वासुदेव जी के मिलन और संवाद का सुर मधुर वर्णन किया है। जहाँ एक तरफ पिता – पुत्र पर प्रेम वात्सल्य बर्षा रहा है तो, वहीं दूसरी तरफ श्री कृष्ण जी, वासुदेव जी को ब्रह्म ज्ञान दे रहे है। इस मधुर मिलन के साक्षी बलराम जी है।

—————

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यह कविता (श्री कृष्ण द्वारा वसुदेव को ब्रह्म ज्ञान।) “सुखमंगल सिंह जी” की रचना है। KMSRAJ51.COM — के पाठकों के लिए। आपकी कवितायें सरल शब्दो में दिल की गहराइयों तक उतर कर जीवन बदलने वाली होती है। मुझे पूर्ण विश्वास है आपकी कविताओं और लेख से जनमानस का कल्याण होगा। आपकी कविताओं और लेख से आने वाली पीढ़ी के दिलो दिमाग में हिंदी साहित्य के प्रति प्रेम बना रहेगा। आपकी लेखन क्रिया यूं ही चलती रहे, बाबा विश्वनाथ की कृपा से।

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सोच रे मानव।

Kmsraj51 की कलम से…..

♦ सोच रे मानव। ♦

हे मूर्ख इंसान, तू सत्य की खोज कर।
जग में असत्य बढ़ाने पर मत शोर कर।

कौन है तू,क्या हस्ती तेरी, क्या वजूद तेरा।
जब विचारों का इंकलाब आएगा,
कहाँ होगा, अस्तित्व महफूज तेरा।

क्यों डूबा है, खुद को भगवान बनाने में।
इस शक्ति को एक क्षण भी,
नही लगेगा तुझें मिटाने में।

तुझें मालिक ने बार-बार इशारा देकर,
कोई कसर न छोड़ी, तुझें चेताने में।
कोई कमी बाकी न रही तुझें समझाने में।

जिस कर्म से जग में हताशा और निराशा हो।
उस कर्म को तज दे मनुष्य,
जिससे कलयुगी इंसान की परिभाषा हो।

युगों से देखी नही क्या तुमनें,
इस रब की लाठी तो, बेआवाज होती है।

तू देखता रह जायेगा, ये इंसाफ कर देगी,
क्योंकि इसकी हर बात राज होती हैं।

♦ सुशीला देवी जी – करनाल, हरियाणा ♦

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  • “श्रीमती सुशीला देवी जी“ ने, बहुत ही सरल शब्दों में सुंदर तरीके से, कविता के माध्यम से बखूबी समझाने की कोशिश की है – किस तरह से आज का इंसान सत्य से दूर, नाना प्रकार के विकर्म कर रहा है। अहंकार-वश स्वयं को भगवान् बनाने में लगा है। वह भूल गया है जब इस रब की लाठी पड़ती है, तो उसमे आवाज़ नही होती। अभी भी समय है तू सुधर जा इंसान, वर्ना तेरे पास पछताने के अलावा कुछ नहीं बचेगा।

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यह कविता (सोच रे मानव।) “श्रीमती सुशीला देवी जी” की रचना है। KMSRAJ51.COM — के पाठकों के लिए। आपकी कवितायें सरल शब्दो में दिल की गहराइयों तक उतर कर जीवन बदलने वाली होती है। मुझे पूर्ण विश्वास है आपकी कविताओं और लेख से जनमानस का कल्याण होगा। आपकी लेखन क्रिया यूं ही चलती रहे।

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मेरा नाम श्रीमती सुशीला देवी है। मैं राजकीय प्राथमिक पाठशाला, ब्लॉक – घरौंडा, जिला – करनाल, में J.B.T.tr. के पद पर कार्यरत हूँ। मैं “विश्व कविता पाठ“ के पटल की सदस्य हूँ। मेरी कुछ रचनाओं ने टीम मंथन गुजरात के पटल पर भी स्थान पाया है। मेरी रचनाओं में प्रकृति, माँ अम्बे, दिल की पुकार, हिंदी दिवस, वो पुराने दिन, डिजिटल जमाना, नारी, वक्त, नया जमाना, मित्रता दिवस, सोच रे मानव, इन सभी की झलक है।

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That Very Week

Kmsraj51 की कलम से…..

♦ That Very Week ♦

Just for a week or so
I was bound to stay at home.
As I was sick and on medication,
had no freedom to roam.

That very week I felt
so sad, bored and helpless
and realised how important
the freedom is, It’s priceless.

As a human being I had,
options like reading, watching TV
talking to my friends on phone
and other things to keep myself busy.

But all those options proved futile
to compensate the joy of freedom.
All indoor activities couldn’t
erase the feelings of boredom.

That very moment I got
connected with the plight
of my poor bird, captive
in a small cage day and night.

Unable to express his pain
sad, sorrowful, as if forced to die.
I felt guilty why could I never feel
or noticed his silent cry.

With a heavy heart I got up
and freed him from the cage.
I’ll never keep any creature
imprisoned, I took the pledge.

For the first time I heard
his melodious chirping voice.
Gleefully he fluttered his wings
and merrily made the noise.

His joyful gesture gave me
immense pleasure, “Go away and fly high”
I said with a big smile – “You are
born to touch the sky.”

♦ Vedsmriti ‘Kritee’ Ji – Pune, Maharashtra ♦

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  • ” Vedsmriti ‘Kritee’ Ji “ Describe In very simple words – During Covid-19 Pandemic, had no freedom to roam. Realised how important the freedom is, It’s priceless. As a human being I had, options like reading, watching TV talking to my friends on phone and other things to keep myself busy. But all those options proved futile to compensate the joy of freedom……….. His joyful gesture gave me immense pleasure, “Go away and fly high” I said with a big smile – “You are born to touch the sky.”

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This poem (That Very Week) is Written by ” Vedsmriti ‘Kritee’ Ji “ for – KMSRAJ51.COM readers. Your poems are life-changing by getting down to the depths of the heart in simple words. I have full faith that your poems and articles will benefit the public. May your writing activity continue like this for the welfare of the people.

Brief introduction of Poet
__________________
Name : Vedsmriti Gour
Name for publication : Vedsmriti ‘Kritee’
Education : M. A. English litrature
B. Ed. ( Physical )
Diploma in Information Technology
Teacher : Private coaching classes, Freelance writer, poet, critic, translator, lyricist, social – worker.
Adhyaksh : ‘Siddhi Ek Sahityik Samooh’
State Head : ‘Akhil Bhartiya Sahitya Sadan’ ( Maharashtra )
Mahila Prakoshtth : ‘Rashtriya Aanchalik Sahitya Sansthan Bihar Prant’.
Sah Sangthan Mantri : ‘Antarrashtriya Hindi Parishad Mahila Prakoshtth, Mumbai, Maharashtra.
Representative ( Maharashtra ) : Shri Sanstha Charitable Trust
Write in both the languages – Hindi & English

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If We Wish We Can

Kmsraj51 की कलम से…..

♦ If We Wish We Can ♦

If we wish we can use our tongue
instead of our fingers
for conversation.
To do something unique
let us give wings to
our imagination.

Who can stop us from
reading, writing, music
and meditation.
Being little innovative
we can knock – down
the lock down.

Nobody can lockdown
our creativity.
From dawn to dusk
enough time to indulge
in a new activity.

It’s time to realise
the difference between
need and greed in reality.
Being little productive
we can nock – down
the lock – down.

Who can lock – down
love and care.
To work on relationships
it’s an perfect opportunity.
It’s time to do self – introspection.

Time to come out of
rigid shell of community.
Let us be human and show
kindness and humanity.
Being little human
we can knock – down
the lock – down.

♦ Vedsmriti ‘Kritee’ Ji – Pune, Maharashtra ♦

—————

  • ” Vedsmriti ‘Kritee’ Ji “ Describe In very simple words – If we wish we can, who can stop us from reading, writing, music and meditation. Being little innovative. It’s time to realise the difference between need and greed in reality. Being little productive during Covid-19 Pandemic Lock Down. Let us be human and show kindness and humanity.

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This poem (If We Wish We Can) is Written by ” Vedsmriti ‘Kritee’ Ji “ for – KMSRAJ51.COM readers. Your poems are life-changing by getting down to the depths of the heart in simple words. I have full faith that your poems and articles will benefit the public. May your writing activity continue like this for the welfare of the people.

Brief introduction of Poet
__________________
Name : Vedsmriti Gour
Name for publication : Vedsmriti ‘Kritee’
Education : M. A. English litrature
B. Ed. ( Physical )
Diploma in Information Technology
Teacher : Private coaching classes, Freelance writer, poet, critic, translator, lyricist, social – worker.
Adhyaksh : ‘Siddhi Ek Sahityik Samooh’
State Head : ‘Akhil Bhartiya Sahitya Sadan’ ( Maharashtra )
Mahila Prakoshtth : ‘Rashtriya Aanchalik Sahitya Sansthan Bihar Prant’.
Sah Sangthan Mantri : ‘Antarrashtriya Hindi Parishad Mahila Prakoshtth, Mumbai, Maharashtra.
Representative ( Maharashtra ) : Shri Sanstha Charitable Trust
Write in both the languages – Hindi & English

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जैसे शरीर के लिए भोजन जरूरी है वैसे ही मस्तिष्क के लिए भी सकारात्मक ज्ञान और ध्यान रुपी भोजन जरूरी हैं।-KMSRAj51

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“सफलता का सबसे बड़ा सूत्र”(KMSRAJ51)

“स्वयं से वार्तालाप(बातचीत) करके जीवन में आश्चर्यजनक परिवर्तन लाया जा सकता है। ऐसा करके आप अपने भीतर छिपी बुराईयाें(Weakness) काे पहचानते है, और स्वयं काे अच्छा बनने के लिए प्रोत्साहित करते हैं।”

 

“अगर अपने कार्य से आप स्वयं संतुष्ट हैं, ताे फिर अन्य लोग क्या कहते हैं उसकी परवाह ना करें।”~KMSRAj51

 

 

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जनता सकपकाई है।

Kmsraj51 की कलम से…..

♦ जनता सकपकाई है। ♦

बक्सर के गंगा घाट में बहती, लाशें देती गवाही है।
भारत में कोरोना द्वितीय ने, घनी मचाई तबाही है।

यह दुष्ट बीमारी दुनियां में, जाने कहां से आई है?
बेगुनाहों की जिन्दगियां, इसके आगोश में समाई है।

शमशानों में जगह नहीं, बिन जले ही लाशें बहाई है।
पानी में बहती लाशों को देख, जनता सकपकाई है।

गांव – गांव में है घुमा कोरोना, नंगा नाच नचाया है।
चुन चुन बदला ले रहा है, हमने इसका क्या खाया है?

जाति धर्म का भेद नहीं, ऊंच नीच का न कोई ख्याल।
बिन एस ओ पी के इससे बचे, किसकी ऐसी मजाल ?

सत्ता पक्ष के नथुने है फूले, विपक्ष ने मचाई धमाल है।
पक्ष – विपक्ष के इस झगड़े में, बेचारी जनता बेहाल है।

हस्पतालों में बिस्तर न, ऑक्सीजन की किल्लत भारी है।
हल्के में न लो इसको कोई भईया, यह खूनी महामारी है।

सौ सालों के अंतरालों में, सुना ऐसा कुछ न कुछ होता है।
काटता इन्सान फसले वही है, जैसा वह खेतों में बोता है।

भ्रष्टाचार और फरेबी, मकारी, जब नस नस में समाई है।
कुदरती तिलसम वाजिव है, बबुल में आमें तो न आई है।

खुद को खुदा की पदवियां, नेता – धर्मनेता जब जब देते हैं।
इतिहास गवाह है कुदरत के मालिक, सजा तब तब देते हैं।

आदमी ने खोई अदमियत सारी, इंसानियत का गला है रेता।
शैतानी फितरत में जी रहा है, यूं ही खुदा यह सिला न देता।

यूं ही न बहती लाशें गंगा घाट में, इंसानों की बेबस ढोरों सी।
काले जो लगे हैं करने अब करतूतें, आज फिरंगी गोरों सी।

अपनों का बैरी अपना बने, दुश्मनों की दुश्मनी तब बौनी है।
दौर -ए -नाजुक में हालात को समझो, राजनीति घिनौनी है।

उससे पहले कि कातिल हो जाए पवने, सावधानी जरूरी है।
इस गर्दिशे माहौल में, सेनेटाइजर, मास्क, दूरियां मजबूरी है।

♦ हेमराज ठाकुर जी – जिला मण्डी, हिमाचल प्रदेश ♦

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  • “हेमराज ठाकुर जी“ ने, बहुत ही सरल शब्दों में सुंदर तरीके से बखूबी समझाने की कोशिश की है – कोरोना काल में आम जनता किस तरह से मर रही है, चारो तरफ सभी परेशान है इस कोरोना से, न जाने अभी क्या – क्या गुल खिलायेगा ये कोरोना। वर्तमान सरकार अपनी तरफ से हर संभव कोशिश कर रही है कोरोना को काबू करने के लिए। लेकिन सभी विरोधी पार्टी गन्दी राजनीती कर रही है, कोरोना पर और वैक्सीन पर। इनके गन्दी राजनीती से आम जनता मर रही है।

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यह लेख (भारतीय संस्कृति और पाश्चात्य संस्कृति का तुलनात्मक अध्ययन।) “हेमराज ठाकुर जी” की रचना है। KMSRAJ51.COM — के पाठकों के लिए। आपकी कवितायें/लेख सरल शब्दो में दिल की गहराइयों तक उतर कर जीवन बदलने वाली होती है। मुझे पूर्ण विश्वास है आपकी कविताओं और लेख से जनमानस का कल्याण होगा।

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“सफलता का सबसे बड़ा सूत्र”(KMSRAJ51)

“स्वयं से वार्तालाप(बातचीत) करके जीवन में आश्चर्यजनक परिवर्तन लाया जा सकता है। ऐसा करके आप अपने भीतर छिपी बुराईयाें(Weakness) काे पहचानते है, और स्वयं काे अच्छा बनने के लिए प्रोत्साहित करते हैं।”

 

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ऐसा सोचा न था।

Kmsraj51 की कलम से…..

♦ ऐसा सोचा न था। ♦

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स्वतंत्रता की 73 वर्ष बीत जाने पर,
लोग मनमानी करने लगेंगे।
जीवन में सोचा नहीं था।

पढ़े लिखे भी अज्ञानी बने रहेंगे।
शिक्षा की इतनी व्यवस्था के बाद भी,
ऐसा कोई सोचा न था।

नाश विनाश सामने आया खड़ा हो।
स्वभाव के कारण जागरूक नहीं है।
कभी ऐसा सोचा न था।

बुढ़ापे तक वही सोच पुरानी रहेगी।
दुखी अज्ञानी मानव आगे नहीं आएगा।
अब तक ऐसा सोचा न था।

जीवन बचाने स्वास्थ्य कर्मी घर पहुंचे।
उन्हें देख दूर लोग भाग जाते हों।
ऐसा अब तक देखा ना था।

मानव का धर्म आचरण क्षीन हो जाएगा।
तमोगुण उसका बढ़ जाएगा।
ऐसा होगा सोचा ना था।

अधिकारों की केवल मांग करेगा।
कर्तव्य परायणता नहीं रखेगा।
ऐसा भी सोचा न था।

हठ पूर्वक उद्योग से वह कतराता।
मेल से होने वाली प्रवृत्ति अपनाता।
तमोगुण की अकर्मण्यता ने पाता।

गर सतगुण की ओर प्रवृत्ति बढ़ाता।
स्मृति सरलता विनम्र श्रद्धा लाता।
घमंड अकड़ रजोगुण न पाता।

मनुष्य यदि विवेकी निपुण हो जाता।
प्रलय काल में अपनी सोच बढाता।
कोरोना की वैक्सीन लगवाता।

पेट भर भोजन यहां से ही खाता।
कोरोना की वैक्सीन देख घबराता।
सुविधा के लिए आगे आ जाता।

जनता को अभी भी जगाना होगा।
नैतिकता का पाठ पढ़ाना होगा।
नियम का पालन करना होगा।

♦ सुखमंगल सिंह जी – अवध निवासी ♦

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  • “सुखमंगल सिंह जी“ ने, बहुत ही सरल शब्दों में सुंदर तरीके से, कविता के माध्यम से बखूबी समझाने की कोशिश की है – क्या कभी किसी ने सोचा था की ऐसा भी ख़राब / बुरा समय आएगा, पढ़े लिखे भी अज्ञानी बने रहेंगे, लोग मनमानी करने लगेंगे। विनाश सामने आया खड़ा हो, स्वभाव के कारण जागरूक नहीं है। मानव का धर्म आचरण क्षीन हो जाएगा, तमोगुण उसका बढ़ जाएगा। कर्तव्य परायणता नहीं रखेगा अपने आप में, तमोगुण बढ़ता जायेगा। इंसान के अंदर इंसानियत नही बचेगा किसने ऐसा सोचा था।

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यह कविता (ऐसा सोचा न था।) “सुखमंगल सिंह जी” की रचना है। KMSRAJ51.COM — के पाठकों के लिए। आपकी कवितायें सरल शब्दो में दिल की गहराइयों तक उतर कर जीवन बदलने वाली होती है। मुझे पूर्ण विश्वास है आपकी कविताओं और लेख से जनमानस का कल्याण होगा।

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जैसे शरीर के लिए भोजन जरूरी है वैसे ही मस्तिष्क के लिए भी सकारात्मक ज्ञान और ध्यान रुपी भोजन जरूरी हैं।-KMSRAj51

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“सफलता का सबसे बड़ा सूत्र”(KMSRAJ51)

“स्वयं से वार्तालाप(बातचीत) करके जीवन में आश्चर्यजनक परिवर्तन लाया जा सकता है। ऐसा करके आप अपने भीतर छिपी बुराईयाें(Weakness) काे पहचानते है, और स्वयं काे अच्छा बनने के लिए प्रोत्साहित करते हैं।”

 

“अगर अपने कार्य से आप स्वयं संतुष्ट हैं, ताे फिर अन्य लोग क्या कहते हैं उसकी परवाह ना करें।”~KMSRAj51

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शनि की साढ़ेसाती।

Kmsraj51 की कलम से…..

♦ शनि की साढ़ेसाती। ♦

साढ़ेसाती जब भी आती है।
शारीरिक कष्ट बढ़ाती है।
जीवन में कई बार यह आती है।
आर्थिक कष्ट दे जाती है।
अवसाद जीवन में ले आती है।
दुर्घटना देकर जाती है।

मानसिक संताप इसने दिखाती है।
हिम्मत दिल से दूर भगाती है।
कल क्लेश बढ़ा मनुष्य भरमाती है।
घर – घर का खर्च बढ़ाती है।
व्यक्ति को दूर बेसन ले जाती है।
तबाही परिवार में आती है।

आपस मैं ही कलह – कलह कराती है।
पराया अपने को बनाती है।
मन बुद्धि को भ्रमित करने आती है।
घबराहट मन में जगा जाती है।
ढाई – ढाई बरस का तीन चरण होता है।
इसका मकसद इस तरह होता है।

प्रथम ढाई वर्ष में यह सीख सिखाती।
मानसिक परेशानी जीवन में आती।
दूसरे भाग में आर्थिक क्षति पहुंचाती।
शारीरिक कष्ट देने आती।
विश्वास को भी भ्रमित करते जाती।
सारे डगर में अगर फैलाती।

आखरी ढाई वर्ष में भरपाई करती।
अंत समय व्यक्ति को ज्ञान कराती।
शनि सत्य का मर्यादा कहलाता।
सत्कर्म की मर्यादा बतलाता है।
राहत के लिए ‘मंगल’ उपाय बताता।
सनी इससे प्रसन्ना हो जाता।

पीपल वृक्ष की पूजा से लाभ मिलता।
पीपल में देवताओं का वास होता है।
मानव के मन और बुद्धि को शांत देता।
ऑक्सीजन यहां पर्याप्त होता है।
पीपल के वृक्ष की पूजा सार्थक होती।
व्यक्ति को भी राहत पहुंचाती है।

पीपल में अर्घ देने से बहुत लाभ होता।
शिव की उपासना से राहत मिलती है।
शनि की उपासना के लिए शनि स्तोत्र पढ़ें।
रूद्र अवतार हनुमान जी का जप करें।
महामृत्युंजय मंत्र से शिव का अभिषेक करें।

शनिवार को पीपल के वृक्ष में जलदान करें।
तेल, तिल तेल, काला तिल, काला कपड़ा भेंट करें।
गुड, लोहा, काला कपड़ा, गरीब को दान करें।
शनिवार को खिचड़ी का भोग लगाने से लाभ होता है।

♦ सुखमंगल सिंह जी – अवध निवासी ♦

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  • “सुखमंगल सिंह जी“ ने, बहुत ही सरल शब्दों में सुंदर तरीके से, कविता के माध्यम से बखूबी समझाने की कोशिश की है – शनि की साढ़ेसाती, जब जीवन में आती है तो, क्या – क्या परेशानी होती है। इन परेशानियों को कम करने के लिए क्या करें, शनि देव को कैसे प्रसन्न करें, जिससे परेशानिया कम हो। शनि देव की उपासना कैसे करें।

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यह कविता (शनि की साढ़ेसाती।) “सुखमंगल सिंह जी” की रचना है। KMSRAJ51.COM — के पाठकों के लिए। आपकी कवितायें सरल शब्दो में दिल की गहराइयों तक उतर कर जीवन बदलने वाली होती है। मुझे पूर्ण विश्वास है आपकी कविताओं और लेख से जनमानस का कल्याण होगा।

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भारतीय संस्कृति और पाश्चात्य संस्कृति का तुलनात्मक अध्ययन।

Kmsraj51 की कलम से…..

♦ भारतीय संस्कृति और पाश्चात्य संस्कृति का तुलनात्मक अध्ययन। ♦

उपरोक्त दोनों संस्कृतियों के तुलनात्मक अध्ययन से पहले यह जानना बहुत जरूरी है कि संस्कृति होती क्या है? आदरणीय भदंत आनंद कौसल्यायन के लेख “संस्कृति” के सार के आधार पर कहा जा सकता है कि संस्कृति शब्द अपने आप में इतना विशाल शब्द है, जिसका व्याख्यान करना आसान नहीं है। उसको सूक्ष्म शब्दों में बस इतना ही कहा जा सकता है कि मनुष्य को पीढ़ी दर पीढ़ी जो परंपरागत आंतरिक संस्कार, मानसिक उदगार और मनोभाव तथा भावात्मक एवं संकल्पनात्मक आयाम उत्तरोत्तर मिलते जाते हैं, उन्हें ही संस्कृति कहा जाता है।

यानी संस्कृति किसी समाज विशेष के मानव समुदाय का आंतरिक भावों से युक्त वह व्यवहार है, जो उसके बाह्य अचार व्यवहार में स्पष्ट नज़र आती है। इसे बाहरी तौर पर पुष्ट करने के तरीके व प्रसाधन सभ्यता है। पर जो सेवा, सत्कार और सामाजिक शिष्टत्व तथा मेजबानी के साथ-साथ लोकाचार के तौर तरीके होते हैं, वहीं संस्कृति है।

यानी संस्कृति मानव प्राणी का अन्तःकरण है और सभ्यता उसकी बाहरी जीवन शैली व प्रसाधन। ये आंतरिक संस्कार ये भाव किसी समाज विशेष के अपने होते हैं। इनके यूं एक समाज विशेष का लहदा-सा होने के कारण, यह उस समाज विशेष की संस्कृति को अपना नाम देते हैं। इसी सन्दर्भ में भारतीय और पाश्चात्य संस्कृति के तुलनात्मक अध्ययन को निम्नलिखित बिंदुओं के आधार पर स्पष्ट किया जा सकता है:—

भारतीय संस्कृति ज्ञानधर्मी है तो पाश्चात्य संस्कृति विज्ञानधर्मी।

भारत की संस्कृति सनातनी संस्कृति रही है। यह ऋषि – मुनि परंपराओं से उद्भासित और विकसित होने के साथ – साथ अनेकों आततायियों के अक्रमणों और कब्जों से भी लम्बे समय तक प्रभावित रही। यहां तक कि पश्चिम के देशों के कब्जे में भी रही।

परंतु इस संस्कृति की प्रधान बात यह रही कि इतना कुछ होने के बाबजूद भी इसने विश्वभर में अपना अस्तित्व अभी तक नहीं खोया। यह इस संस्कृति का ज्ञानधर्मी होने का नतीजा है। यहां जो भी अक्रांता आया, वह इस संस्कृति को नष्ट करने की हर सम्भव कोशिश करता गया पर इस संस्कृति ने अक्रांताओं की संस्कृति के आवश्यक गुणों को उल्टा अपने संस्कारों में समेट कर खुद की संस्कार सृजनाता में इज़फा ही किया। अपना कुछ नहीं खोया। अपना ज्ञान बढ़ाया ही है घटाया नहीं है।

मैकाले जैसे लोगों ने तो इस संस्कृति को नष्ट करने के लिए 1936 ई. में भारत की शिक्षा नीति तक बदल डाली। परन्तु इतना कुछ होने के बाबजूद भी भारतीय संस्कृति का वे कुछ नहीं बिगड़ पाए। इसके पीछे असलियत यह है कि संस्कृति आंतरिक विषय है यह कोई बाह्य विषय नहीं है, जिसे अपनी मर्जी से हम ढाल सके।

यह एक बार जिस तरह से जिस सांचे में ढल जाता है फिर उसी ढांचे में ही तब तक रहता है, जब तक उसी आचार व्यवहार के लोगों को छोड़ कर व्यक्ति कहीं दूर सदा के लिए नहीं चला जाता।

उधर पश्चिम की संस्कृति विज्ञानधर्मी है। उसे तो बात – बात पर प्रयोग चाहिए। बिना प्रयोग के वह किसी बात को मानने को तैयार ही नहीं है। परन्तु यह एक शाश्वत सत्य है कि दुनियां की कई बाते ऐसी है, जो मात्र ज्ञान से ही समझ में आती है। वे विज्ञान के प्रयोगवाद का हिस्सा न कभी थी, न आज है और न ही तो कभी होगी।

भारतीय संस्कृति योगधर्मी और पाश्चात्य संस्कृति प्रयोगधर्मी।

यह पूरी दुनियां जानती है कि भारत की भूमि तप और त्याग की भूमि रही है। विश्वभर की प्राच्य विद्याओं का उद्गम स्थल यही आर्य क्षेत्र ही इतिहास में भी बताया जाता है। यहां की संस्कृति योगधर्मी रही है। यहां मनुष्यता को जांचने और मापने का पैमाना तो सदियों से योग रहा ही रहा है पर समृद्ध और खुशहाल जीवनयापन का सशक्त साधन भी यही योग माना जाता आ रहा है। इतना ही नहीं यह एक सटीक और कारगर सूत्र भी सिद्ध हो चुका है। वरना पूरी दुनियां आज भारत की इस विद्या का अनुसरण क्यों करती?

उधर पश्चिम में जीवनयापन और मनुष्यता के मूल्यांकन का आधार प्रयोगवाद है। प्रयोगवाद स्वार्थ आधारित होता है। जब तक कोई व्यक्ति या वस्तु हमारे काम की है, तब तक तो उससे हम जुड़े रहते हैं और जब वह हमारे लिए बेकार हो जाती है, उस वक्त हम उसे उसी के हाल पर छोड़ देते हैं। यह व्यवस्था पारिवारिक विघटन, वृद्ध जीवन अव्यवस्था और सामाजिक विघटन की पैरोकार है।

भारतीय संस्कृति संस्कारधर्मी है और पाश्चात्य संस्कृति विकारधर्मी है।

भारत की आद्य संस्कृति में संस्कारों का जो प्रावधान बनाया गया था, वे संस्कार आज भी उतनी ही अहमियत हमारे समाज में रखते हैं। ये संस्कार 16 संस्कारो के नाम से जाने जाते हैं। गर्भाधान से ले कर मृत्यु संस्कार तक इन संस्कारों में एक क्रमिक व्यवस्था है और एक पवित्र प्रावधान है।

जन्म, मुंडन, उपनयन, विवाह, मृत्यु इत्यादि संस्कार विशेष महत्व के हैं। हमारे यहां प्रेम भी विवाह के बाद ही होता है जबकि पश्चिमी संस्कृति विकार के हिसाब से चलती है।

जैसे मानव शरीर में विकार आता है वैसे ही वह सांसारिक सुखों को भोगने की पैरोकारी करती है। कोई संयम साधना नहीं। भले ही फिर चाहे समय से पूर्व ही व्यक्ति इन भौतिक सुख सुविधाओं से विमुख हो कर निराशा और हताशा में ही क्यों न चले जाए।

किसी आयु विशेष में किसी कार्य को करने का कोई उचित क्रम व प्रावधान पश्चिमी संस्कृति में नहीं है, जिसके कारण पश्चिमी संस्कृति के लोग समय से पहले ही जीवन के कई क्षणों का उपभोग करके परेशान होते हैं और भारतीय योग साधना की शरण में आते हैं।

भारतीय संस्कृति अध्यात्मवादी है और पश्चिमी संस्कृति भौतिकतावादी है।

यह सर्वविदित है कि भारत पुरातन काल से ही अध्यात्म का पैरोकार रहा है और उसी लीक पर चल रहा है। भारतीय संस्कृति बाह्य भौतिक संसार की अपेक्षा आंतरिक आध्यात्मिक जगत की ओर ज्यादा ध्यान देती है, जो इस संस्कृति का मुख्य आकर्षण भी है और ताकत भी।

इसी आकर्षण और ताकत को तोड़ने के लिए मैकाले जैसे लोगों ने भी आधुनिक शिक्षा प्रणाली का प्रारम्भ कर के यहां की गुरुकुलीय व्यवस्था को विलुप्त करवाने की योजना बनाई। इसमें वे लोग कामयाब भी हुए। चलो वैश्विक धरातल पर यह व्यवस्था एक अच्छी व्यवस्था है पर इससे भारत की पुरातन कई विद्याएं समाप्त हो गई। हमारे यहां सूक्ष्म शरीरों द्वारा स्थूल शरीर से बाहर निकल कर लोक लोकोतर की यात्रा करने की गुप्त विद्याओं का प्रचलन गुरुकुलों में था।

वह जाता रहा। रही अध्यात्म की बात तो वह तो आस्था का विषय है। उसी का परिणाम है कि भारतीय संस्कृति में झाड़ – झांखड़ में भी देवी देवताओं के प्रतिरूप विद्यमान होते हैं, और उनके प्रति भी लोगों की वही आस्था व विश्वास होता है, जो बड़े मंदिरों में रहने वाले देवी देवताओं के प्रति होता है।

उधर पश्चिमी संस्कृति में अन्तरिक जीवन शैली की अपेक्षा बाह्य सुख सुविधाओं पर अधिक ध्यान दिया जाता है। इस बाह्य जीवन समृद्धि की दौड़ में पश्चिमी संस्कृति का समाज आंतरिक रूप से विद्रुप सा हो गया है, क्योंकि असली सुख बाहर नहीं अंदर मिलता है।

भारतीय संस्कृति अस्थावादी है और पश्चिमी संस्कृति विरास्तवादी।

भारत की संस्कृति आंतरिक भावनाओं से सम्बन्ध रखने वाली एक विशुद्ध संस्कृति है। इसमें जीवन का हर रिश्ता आस्था और विश्वास पर ही टिका है। हमारे आपसी व्यवहार और क्रियाव्यपार आस्था पर आधारित है।

भारतीय समाज में बजुर्गों के पास कुछ हो या नहीं पर फिर भी जीवन की आस्था के आधार पर हम उनके प्रति पूर्ण जबावदेह रहते हैं। पश्चिमी संस्कृति में यह जवाबदेही मात्र विरासत के आधार पर सुनिश्चित होती है।

भारतीय संस्कृति संतोषवादी है और पश्चिमी संस्कृति मदहोशवादी।

भारतीय संस्कृति का जनमानस स्थिरीकरण और संतोष का पक्षधर है। यहां की मानवीय भावना थोड़े में ही गुजर कर संतोष करने वाली है। अनावश्यक भ्रमण के खिलाफ और एक जगह ठहराव करके संतोष करने वाली संस्कृति है। पश्चिमी संस्कृति निरन्तर भ्रमण प्रिय और मदहोशवादी है।

भारतीय संस्कृति सतरकतावादी है और पश्चिमी संस्कृति तर्कतावादी।

भारतीय संस्कृति सतरकतावादी संस्कृति है। यहां की मानव प्रकृति अपने जीवन के उद्धार के लिए हमेशा सतर्क रहती है। पाप – पुण्य का ख्याल क्षण-क्षण यहां के मानव मस्तिष्क को झकझोरता रहता है।

पश्चिमी संस्कृति के लोगों का मस्तिष्क हर बात को तर्क की कसौटी पर तोलता रहता है। बिना तर्क के उस संस्कृति में कुछ भी नहीं किया जाता।

भारतीय संस्कृति समष्टि वादी है और पाश्चात्य संस्कृति व्यष्टि वादी है।

भारतीय संस्कृति वसुधैव कुटुंबकम् की समष्टि वादी सोच को रखने वाली है। इसमें ” परहित सरिस धर्म न ही भाई,” की भावना से कार्य किया जाता है और पश्चिमी संस्कृति व्यक्तिवादी विचारधारा की पक्षधर है। वहां अस्तित्ववाद का विशेष महत्व है।

भारतीय संस्कृति आदर्शवादी है और पाश्चात्य संस्कृति यथार्थवादी है।

भारतीय संस्कृति आदर्शवादी है। हमारे यहां कोई न कोई जीवन का आदर्श बनाया जाता है और हम उस आदर्श का अनुसरण करके अपने जीवन के चरित्र को उद्घाटित करते हैं।

वहां पश्चिम में आदर्श के स्थान पर यथार्थ को महत्व दिया जाता है। यथार्थ भी वे भौतिक संसार को ही मानते हैं। भारतीय संस्कृति के वेदान्तिक यथार्थ को नहीं।

निष्कर्ष—Conclusion

निष्कर्षतः कहा जा सकता है कि संस्कृति कोई भी बुरी नहीं होती है, परन्तु जिस संस्कृति में मानवता, प्रेम, करुणा, एकता, समग्रता के गुणों के साथ – साथ वैविध्य में भी एकत्व का समग्र भाव विद्यमान हो; वह संस्कृति अधिक उदात्त और विशाल समझी जाती है। इन सभी गुणों का समावेश भारतीय संस्कृति में ही देखने को मिलता है।

यहां, शकों, हुणों, डचों, मंगोलों से लेकर अंग्रेजों तक के आक्रमणों और साम्राज्यवादों के चलते कई बार व्यवस्थाएं विदेशी हाथों में गई और उन्ही व्यवस्थाओं के चलते भारतीय संस्कृति ने अपने सर्वग्रही स्वभाव के चलते उन सभी संस्कृतियों का भी बहुत कुछ अपने आप में शामिल कर लिया।

भले ही आज भारत स्वतंत्र राष्ट्र है पर फिर भी उन सभी संस्कृतियों का समावेश भारतीय संस्कृति में आज भी विद्यमान मिलता है। यही समावेश भारतीय लोकतंत्र और धर्मनिरपेक्षता का समूचे विश्व में एक सशक्त उदाहरण है। इसी के चलते आज भारत पुनः विश्वगुरु होने की ताकत रखता है।

♦ हेमराज ठाकुर जी – जिला मण्डी, हिमाचल प्रदेश ♦

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  • “हेमराज ठाकुर जी“ ने, बहुत ही सरल शब्दों में सुंदर तरीके से बखूबी समझाने की कोशिश की है – संस्कृति होती क्या है? भारतीय संस्कृति, पाश्चात्य संस्कृति में क्या – क्या मुख्य फर्क है, किसी भी समाज के लिए संस्कृति क्यों जरूरी है। योग और ध्यान का हमारे जीवन में क्या महत्व है, संस्कृति मानव प्राणी का अन्तःकरण है और सभ्यता उसकी बाहरी जीवन शैली व प्रसाधन क्यों हैं। भारतीय संस्कृति और पाश्चात्य संस्कृति का बहुत ही अच्छे से तुलनात्मक व्याख्या किया है। भारतीय संस्कृति वसुधैव कुटुंबकम् की समष्टि वादी सोच को रखने वाली है। इस लेख के माध्यम से आने वाली अगली पीढ़ी को भारतीय संस्कृति को समझने में आसानी होगी। उन्हें गर्व होगा अपने ज्ञान और योग से पूर्ण महान भारतीय संस्कृति पर। आपने कम शब्दो में सभी मुख्य फर्क है को सरलता पूर्व समझाया हैं। मुझे पूर्ण विश्वास है इस लेख से जनमानस का कल्याण होगा।

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यह लेख (भारतीय संस्कृति और पाश्चात्य संस्कृति का तुलनात्मक अध्ययन।) “हेमराज ठाकुर जी” की रचना है। KMSRAJ51.COM — के पाठकों के लिए। आपकी कवितायें/लेख सरल शब्दो में दिल की गहराइयों तक उतर कर जीवन बदलने वाली होती है। मुझे पूर्ण विश्वास है आपकी कविताओं और लेख से जनमानस का कल्याण होगा।

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